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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -22

पांचवां दृश्य: [12 बजे रात का समय। लड़ाई ज़रा देर के लिए बंद है। दुश्मन की फ़ौज गाफिल है। दरिया का किनारा । अब्बास हाथों में मशक लिए दरिया के किनारे खड़े हैं।] अब्बास – (दिल में) हम दरिया से कितने करीब हैं। इतनी ही दूर पर यह दरिया के पास मार रहा है, पर […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -21

तीसरा दृश्य: [दोपहर का समय। हजरत हुसैन अब्बास के साथ खेमे के दरवाजे पर खड़े मैदाने-जंग की तरफ़ ताक रहे हैं।] हुसैन – कैसे-कैसे जांबाज दोस्त रुखसत हो गए और होते जा रहे हैं। प्यास से कलेजे मुंह को आ रहे हैं, और ये जालिम नमाज तक की मुहलत नहीं देते। आह! जहीर का सा […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -20

पहला दृश्य: [समय 9 बजे दिन। दोनों फ़ौजे लड़ाई के लिये तैयार हैं।] हुर – या हजरत, मुझे मैदान में जाने की इजाजत मिले। अब शहादत का शौक रोके नहीं रुकता। हुसैन – वाह, अभी आए हो और अभी चले जाओगे। यह मेहमाननेवाजी का दस्तूर नहीं कि हम तुम्हें आते-ही-आते रुखसत कर दें। हुर – […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -19

आठवाँ दृश्य: [प्रातः काल हुसैन के लश्कर में जंग की तैयारियां हो रही हैं।] अब्बास – खेमे एक दूसरे से मिला दिए गए, और उनके चारों तरफ खंदके खोद डाली गई, उनमें लकड़ियां भर दी गई। नक्कारा बजवा दूं? हुसैन – नहीं, अभी नही। मैं जंग में पहले कदम नहीं बढ़ाना चाहता। मैं एक बार […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -18

छठा दृश्य: [प्रातः काल। शाम का लश्कर। हुर और साद घोड़ों पर सवार फ़ौज का मुआयना कर हैं।] हुर – अभी तक जियाद ने आपके खत का जबान नहीं दिया? साद – उसके इंतजार में रात-भर आंखें नहीं लगीं। जब किसी की आहट मिलती थी, तो गुमान होता था कि कासिद है। मुझे तो यकीन […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -17

चौथा दृश्य: [हुसैन के हरम की औरतें बैठी हुई बातें कर रही हैं। शाम का वक्त।] सुगरा – अम्मा, बड़ी प्यास लगी है। अली असगर – पानी, बूआ पानी। हंफ़ा – कुर्बान गई, बेटे कितना पानी पियोगे? अभी लाई। (मश्को को जाकर देखती है, और छाती पीटती लौटती है) ऐ कुरबान गई बीबी, कहीं एक […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -16

पहला दृश्य: [प्रातः काल का समय। जियाद फर्श पर बैठा हुआ सोच रहा है।] जियाद – (स्वगत) उस वफ़ादारी की क्या कीमत है, जो महज जबान तक महदूद रहे? कूफ़ा के सभी सरदार, जो मुसलिम बिन अकील से जंग करते वक्त बग़लें झांक रहे हैं। कोई इस मुहिम को अंजाम देने का बीड़ा नहीं उठाता। […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -15

छठा दृश्य: कर्बला का मैदान। एक तरफ केरात-नदी लहरें मार रही है। हुसैन मैदान में खड़े हैं। अब्बास और अली अकबर भी उनके साथ हैं।] अली अकबर – दरिया के किनारे खेमे लगाए जाएं, वहां ठंडी हवा आएगी। अब्बास – बड़ी फ़िजा की जगह है। हुसैन – (आंखों में आंसू भरे हुए) भाई, लहराते हुए […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -14

चौथा दृश्य: [आधी रात का समय। अब्बास हुसैन के खेमे के सामने खड़े पहरा दे रहे हैं। हुसैन आहिस्ता से आकर खेमे के करीब खड़ा हो जाता है।] हुर – (दिल में) खुदा को क्या मुंह दिखाऊंगा? किस मुंह से रसूल के सामने जाऊंगा? आह, गुलामी तेरा बुरा हो। जिस बुजुर्ग ने हमें ईमान की […]

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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -13

पहला दृश्य: [दोपहर का समय। रेगिस्तान में हुसैन के काफिले का पड़ाव। बगूले उड़ रहे हैं। हुसैन असगर को गोद में लिए अपने खेमे के द्वार पर खड़े हैं!] हुसैन – (मन में) उफ्, यह गर्मी! निगाहें जलती हैं। पत्थर की चट्टानों से चिनगारियां निकल रही हैं। झीलें, कुएं सब सूखे पड़े हुए हैं, गोया […]

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