पहला दृश्य: [दोपहर का समय। रेगिस्तान में हुसैन के काफिले का पड़ाव। बगूले उड़ रहे हैं। हुसैन असगर को गोद में लिए अपने खेमे के द्वार पर खड़े हैं!]
हुसैन – (मन में) उफ्, यह गर्मी! निगाहें जलती हैं। पत्थर की चट्टानों से चिनगारियां निकल रही हैं। झीलें, कुएं सब सूखे पड़े हुए हैं, गोया उन्हें गर्मी ने जला दिया हो। हवा से बदन झुलसा जाता है। बच्चों के चेहरे कैसे संवला गए हैं। यह सफेदी, यह रेगिस्तान, इसकी कहीं हद भी है या नहीं। जिन लोगों ने प्यास के मारे हौक-हौककर पानी पी लिया है,
कर्बला नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- कर्बला भाग-1
उनके कलेजे में दर्द हो रहा है। अब तक कूफ़ा से कोई कासिद नहीं आया। खुदा जाने मुसलिम का क्या हाल हुआ। करीने से ऐसा मालूम होता है कि ईराकवालों ने उनसे दगा की, और उनको शहीद कर दिया, वरना यह खामोशी क्यों? अगर वह जन्नत को सिधारे हैं, तो मेरे लिए भी दूसरा रास्ता नहीं हैं। शहादत मेरा इंतजार कर रही है। कोई मुझसे मिलने आ रहा हैं।
[फर्जूक का प्रवेश]
फर० – अस्सलामअलेक या हज़रत हुसैन, मैंने बहुत चाहा कि मक्के ही में आपकी जियारत करूं, लेकिन अफ़सोस, मेरी कोशिश बेकार हुई।
हुसैन – अगर ईराक से आए हो, तो वहां की क्या खबर हैं?
फर० – या हज़रत! वहां की खबरें वे ही हैं, जो आपको मालूम हैं। लोगों के दिल आपके साथ हैं, क्योंकि आप हक पर हैं और, उनकी तलवारें यजीद के साथ है, क्योंकि उसके पास दौलत है।
हुसैन – और मेरे भाई मुसलिम की भी कुछ खबर लाए हो?
फर० – उनकी रूह जन्नत में है, और सिर किले की दीवार पर।
मातम है कई दिन से मुसलमानों के घर में;
खंदक में है लाश उनकी व सर किले की दर में।
हुसैन – (सीने पर हाथ धरकर) आह! मुसलिम, वही हुआ, जिसका मुझे खौफ़ था। अब तक तुम्हें कफ़न भी नसीब नहीं हुआ। क्या तुम्हारी नेकनियती का यही सिला था? आह! तुम इतने दिनों तक मेरे साथ रहे, पर मैंने तुम्हारी कद्र न जानी। मैंने तुम्हारे ऊपर जुल्म किया, मैंने जान-बूझकर तुम्हारी जान ली। मेरे अजीज और दोस्त, सब के सब मुझे कूफ़ावालों से होशियार कर रहे थे, पर मैंने किसी की न सुनी, और तुम्हें हाथ से खोया। मैं उनके बेटों को और उनकी बीबी को कौन मुँह दिखाऊंगा।
[मुसलिम की लड़की फातिमा आती है।]
आओ बेटी, बैठो, मेरी गोद में चली आओ। कुछ खाया कि नहीं?
फातिमा – बुआ ने शहद और रोटी दी थी। चचाजान, अब हम लोग कै दिन में अब्बा के पास पहुंचेगे? पांच-छः दिन तो हो गए!
हुसैन – (दिल में) आह! कलेजा मुंह को आता है। इस सवाल का क्या जवाब दूं। कैसे कह दूं कि अब तेरे अब्बा जन्नत में मिलेंगे। (प्रकट) बेटी, खुदा की जब मरजी होगी।
अली० – आह! तुम अब्बाजान की गोद में बैठ गई। उतरिए चटपट।
फातिमा – तुम मेरे अब्बाजान की गोद में बैठोगे, तो मैं अभी उतार दूंगी।
हुसैन – बेटी, मैं ही तुम्हारा अब्बाजान हूं। तुम बैठी रहो। इसे बकने दो।
फातिमा – आप मेरी तरफ देखकर आंखों में आंसू क्यों भरे हुए हैं। आप मेरा इतना प्यार क्यों कर रहे हैं? आप यह क्यों कहते हैं कि मैं ही अब्बाजान हूं? ऐसी बातें तो यतीमों से की जाती हैं।
हुसैन – (रोकर) बेटी, तेरे अब्बा को खुदा ने बुला लिया।
[फातिमा रोती हुई अपनी मां के पास जाती है। औरतें रोने लगती हैं।]
जैनब – (बाहर आकर) भैया, यह क्या गजब हो गया?
हुसैन – बहन, क्या कहूं, सितम टूट पड़ा। मुसलिम तो शहीद हो गए। कूफावालों ने दगा की।
जैनब – तो ऐसे दगाबाजों से मदद की क्या उम्मीद हो सकती है? मैं तुमसे मिन्नत करती हूं कि यहीं से वापस चलो। कूफ़ावालों ने कभी वफ़ा नहीं की।
[मुसलिम के बेटे अब्दुल्ला का प्रवेश।]
अब्बदुल्ला – फूफीजान, अब तो अगर तकदीर भी रास्ते में खड़ी हो जाये, तो भी मेरे कदम पीछे न हटेंगे। तुफ् है मुझ पर, अगर अपने बाप का बदला न लूं! हाय वह इंसान, जिसने किसी से बदी नहीं की, जो रहम और मुरौवत का पुतला था, जो दिल का इतना साफ था कि उसे किसी का शुबहा न होता था इतनी बेदरदी से कत्ल किया जाये।
(अब्बास का प्रवेश)
अब्बास – बेशक, अब कूफ़ावालों को उनकी दगा की सज़ा दिए बगैर लौट जाना ऐसी जिल्लत हैं जिससे हमारी गर्दन हमेशा झुकी रहेगी। खुदा को जो कुछ मंजूर है, वह होगा। हम सब शहीद हो जायें, रसूल के खानदान का निशान मिट जाये, पर यहां से लौटकर हम दुनिया को अपने ऊपर हंसने का मौका न देंगे। मुझे यकीन है कि यह शरारत कूफ़ा के रईसों और सरदारों की है, जिन्हें जियाद के वादों ने दीवाना बना रखा है। आप जिस वक्त कूफा में कदम रखेंगे, रियाया अपने सरदारों से मुंह फेरकर आपके कदमों पर झुकेगी और वह दिन दूर नहीं जब यजीद का नापाक सिर उसके तन से जुदा होगा। आप खुदा का नाम लेकर खेमे उखड़वाइए। अब देर करने का मौका नहीं है। हक के लिए शहीद होना वह मौत है जिसके लिए फरिश्तों की रूहें तड़पती हैं।
जैनब – भैया, मैं तुझ पर सदके। घर वापस चलो।
हुसैन – आह! अब यहां से वापस होना मेरे अख्तियार की बात नहीं है। मुझे दूर से दुश्मन की फौज का गुबार नजर आ रहा है। पुश्त की तरफ भी दुश्मन ने रास्ता रोक रखा है। दाहिने-बाएं कोसों तक बस्ती का निशान नहीं। कूफा में हमें तख्त नसीब हो या तख्ता, हमारे लिए कोई दूसरा मुकाम नहीं है। अब्बास, जाकर मेरे साथियों से कह दो, मैं उन्हें खुशी से इजाज़त देता हूं, जहां जिसका जी चाहे, चला जाये। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। चलो, हम लोग खेमे उखाड़े।
दूसरा दृश्य
दूसरा दृश्य: [संध्या का समय। हुसैन का काफिला रेगिस्तान में चला जा रहा है।]
अब्बास – अल्लाहोअकबर । वह कूफ़ा के दरख्त नज़र आने लगे।
हबीद – अभी कूफ़ा दूर है। कोई दूसरा गांव होगा।
अब्बास – रसूल पाक की कसम, फौज है। भालों की नोंके साफ नज़र आ रही हैं।
हुसैन – हां, फौज ही है। दुश्मनों ने कूफ़े से हमारी दावत का यह सामान भेजा है। यहीं उस टीले के करीब खेमे लगा दो। अजब नहीं कि इसी मैदान में किस्मतों का फैसला हो।
[काफिला रुक जाता हैं। खेमे गड़ने लगते हैं। बेगमें ऊंटों से उतरती हैं। दुश्मन की फौज करीब आ जाती है।
अब्बास – खबरदार, कोई कदम आगे न रखे। यहां हजरत हुसैन के खेमे हैं।
अली अक० – अभी जाकर इन बेअदबों की तबीह करता हूं।
हुसैन – अब्बास, पूछो, ये लोग कौन हैं, और क्या चाहते हैं?
अब्बास – (फौज से) तुम्हारा सरदार कौन हैं?
हुर – (सामने आकर) मेरा नाम हुर है। हज़रत हुसैन का गुलाम हूं।
अब्बास – दोस्त दुश्मन बनकर आए, तो वह भी दुश्मन है।
हुर – या हजरत, हाकिम के हुक्म से मजबूर हूं, बैयत से मजबूर हूं, नमक की कैद से मजबूर हूं, लेकिन दिल हुसैन ही का गुलाम है।
हुसैन – (अब्बास से) भाई, आने दो, इसकी बातों में सच्चाई की बू आती है।
हुर – या हजरत, आपको कूफ़ावालों ने दगा दी है! जियाद और यजीद, दोनों आपको कत्ल करने की तैयारियां कर रहे हैं। चारों तरफ से फौजें जमा की जा रही हैं। कूफ़ा के सरदार आप से जंग करने के लिए तैयार बैठे हैं।
हुसैन – पहले यह बतलाओ कि तुम्हारे सिपाही क्यों इतने निढाल और परेशान हो रहे हैं?
हुर – या हज़रत, क्या अर्ज करूं। तीन पहर से पानी का एक बूंद न मिला। प्यास के मारे सबों के दम लबों पर आ रहे हैं।
हुसैन – (अब्बास से) भैया, प्यासों की प्यास बुझानी एक सौ नमाज़ों से ज्यादा सवाब का काम है। तुम्हारे पास पानी हो, तो इन्हें पिला दो। क्या हुआ, अगर मेरे ये दुश्मन हैं, हैं तो मुसलमान – मेरे नाना के नाम पर मरनेवाले।
अब्बास – या हजरत, आपके साथ बच्चे हैं, औरतें हैं और पानी यहां उनका है।
हुसैन – इन्हें पानी पिला दो, मेरे बच्चों का खुदा है।
[अब्बास, अली अकबर, हबीब पानी की मशकें लाकर सिपाहियों को पानी पिलाते हैं।]
अब्बास – हुर, अब यह बतलाओं कि तुम हमसे सुलह करना चाहते हो या जंग?
हुर – हज़रत, मुझे आपसे न जंग का हुक्म दिया गया है, न सुलह का। मैं सिर्फ इसलिए भेजा गया हूं कि हजरत को जियाद के पास ले जाऊं, और किसी दूसरी तरफ न जाने दूं।
अब्बास – इसके मानी यह हैं कि तुम जंग करना चाहते हो। हम किसी खलीफ़ा या आमिल के हुक्म के पाबंद नहीं है कि किसी खास तरफ जायें। मुल्क खुदा का है। हम आजादी से जहां चाहेंगे, जायेंगे। अगर हमको कोई रोकेगा, तो उसे कांटों की तरह रास्ते से हटा देंगे।
हुसैन – नमाज़ का वक्त आ गया। पहले नमाज अदा कर लें, उसके बाद और बातें होंगी। हुर, तुम मेरे साथ नमाज़ पढ़ोगे या अपनी फौज के साथ?
हुर – या हजरत, आपके पीछे खड़े होकर नमाज अदा करने का सवाब न छोडूंगा, चाहे मेरी फौज मुझसे जुदा क्यों न हो जाये।
तीसरा दृश्य: [संध्या का समय – नसीमा बगीचे में बैठी आहिस्ता-आहिस्ता गा रही है।]
दफ़न करने ले चले जब मेरे घर से मुझे,
काश तुम भी झांक लेते रौज़ने घर से मुझे।
सांस पूरी हो चुकी दुनिया से रुख्सत हो चुका,
तुम अब आए हो उठाने मेरे बिस्तर से मुझे।
क्यों उठाता है मुझे मेरी तमन्ना को निकाल,
तेरे दर तक खींच लाई थी यही घर से मुझे।
हिज्र की सब कुछ यही मूनिस था मेरा ऐ क़जा –
एक जरा रो लेने दे मिल-मिल के बिस्तर से मुझे।
याद है तस्कीन अब तक वह जमाना याद है,
जब छुड़ाया था फलक ने मेरे दिलवर से मुझे
[वहब का प्रवेश। नसीमा चुप हो जाती है।]
वहब – खामोश क्यों हो गई। यही सुनकर मैं आया था।
नसीमा – मेरा गाना ख़याल है, तनहाई का मूनिस अपना दर्द क्यों सुनाऊं, जब कोई सुनना न चाहे।
बहब – नसीमा, शिकवे करने का हक मेरा है, तुम इसे ज़बरदस्ती छीन लेती हो।
नसीमा – तुम मेरे हो, तुम्हारा सब कुछ मेरा है, पर मुझे इसका यक़ीन नहीं आता। मुझे हरदम यही अंदेशा रहता है कि तुम मुझे भूल जाओगे, तुम्हारा दिल मुझसे बेज़ार हो जायेगा, मुझसे बेतनाई करने लगोगे। यह ख़याल दिल से नहीं निकलता। बहुत चाहती हूं कि निकल जाये, पर वह किसी पानी से भीगी हुई बिल्ली की तरह नहीं निकलता। तब मैं रोने लगती हूं, और गमनाक ख़याल मुझे चारों तरफ से घेर लेते हैं। तुमने न-जाने मुझ पर कौन-सा जादू कर दिया है कि मैं अपनी नहीं रही। मुझे ऐसा गुमान होता है कि हमारी बहार थोड़े ही दिनों की मेहमान है। मैं तुमसे इल्तजा करती हूं कि मेरी तरफ से निगाहें न मोटी करना, वरना मेरा दिल पाश-पाश हो जायेगा। मुझे यहां आने के पहले कभी न मालूम हुआ था कि मेरा दिल इतना नाजुक है।
वहब – मेरी कैफियत इससे ठीक उल्टी है। मेरे दिल में एक नई कूबत आ गई है, मुझे खयाल होता है अब दुनिया की कोई फ़िक्र, कोई तगीव, कोई आरजू मेरे दिल पर फ़तह नहीं पा सकती। ऐसी कोई ताकत नहीं है, जिसका मैं मुकाबला न कर सकूँ। तुमने मेरे दिल की कूबत सौगुनी कर दी। यहां तक अब मुझे मौत का भी गम नहीं। मुहब्बत ने मुझे दिलेर, बैखौफ़, मजबूत बना दिया है, मुझे तो ऐसा गुमान होता है कि मुहब्बत कूबते-दिल की कीमिया है।
नसीमा – वहब, इन बातों से वहशत हो रही है, शायद हमारी तबाही के सामान हो रहे हैं। वहब, मैं तुम्हें न जाने दूंगी, कलाम पाक की कसम, कहीं न जाने दूंगी। मुझे इसकी फिक्र नहीं कि कौन खलीफ़ा होता है और कौन अमीर। मुझे माल व ज़र की, इलाके व जागीर की मुतलक परवा नहीं। मैं तुम्हें चाहती हूं, सिर्फ तुम्हें।
[कमर का प्रवेश]
कमर – वहब, देख, दरवाजे पर जालिम जियाद के सिपाही क्या गजब कर रहे हैं। तेरे वालिद को गिरफ्तार कर लिया है और जामा मसजिद की तरफ़ खींचे लिए जाते हैं।
नसीमा – हाय सितम, इसीलिए तो मुझे वहसत हो रही थी।
[वहब उठ खड़ा होता है। नसीमा उसका हाथ पकड़ लेती है।]
वहब – नसीमा, मैं अभी लौटा आता हूं, तुम घबराओ नहीं।
नसीमा – नहीं-नहीं, तुम यहां मुझे जिंदा छोड़कर नहीं जा सकते। मैं जियाद को जानती हूं, तुमको भी जानती हूं। जियाद के सामने जाकर फिर तुम नहीं लौट सकते। |
कमर – बेटा, अगर नसीमा तुझे नहीं जाने देती, तो मत जा। मगर याद रख, तेरे चेहरे पर हमेशा के लिए स्याही का दाग लग जायेगा। खुद जाती हूं। नसीमा, शायद हमारी-तुम्हारी फिर मुलाकात न हो, यह आखिरी मुलाकात है। रुखसत। वहब, घर-बार तुझे सौंपा, खुदा तुझे नेकी की तौफ़ीक दे, तेरी उम्र दराज़ हो।
वहब – अम्मा, मैं भी चलता हूं।
कमर – नहीं, तुझ पर अपनी बीबी का हक़ सबसे ज्यादा है।
वहब – नसीमा, खुदा के लिए…।
नसीमा – नहीं। मेरे प्यारे आका, मुझे जिंदा छोड़कर नहीं।
[कमर चली जाती है। वहब सिर थामकर बैठ जाता है।]
नसीमा – प्यारे, तुम्हारी मुहब्बत की कतावार हूं, जो सजा चाहे दो। मुहब्बत खुदगरज होती है। मैं अपने चमन को हवा के झोंकों से बचाना चाहती हूं। काश तकदीर ने मुझे इस गुलज़ार में न बिठाया होता, काश मैंने इस चमन में अपना घोंसला न बनाया होता, तो आज वर्क और सैयाद का इतना खौफ़ क्यों होता! मेरी बदौलत तुम्हें यह नदामत उठानी पड़ी, काश मैं मर जाती!
[नसीमा वहब के पैरों पर सिर रख देती है।]
