Karbala novel by Munshi Premchand
Karbala novel by Munshi Premchand

तेरहवां दृश्य: [प्रातः काल का समय। जियाद का दरबार। मुसलिम को कई आदमी मुश्क कसे लाते हैं]

मुस० – मेरा उस पर सलाम है, जो हिदायत पर चलता है, आकबत से डरता है, और सच्चे बादशाह की बंदगी करता है।

चोबदार – मुसलिम! अमीर को सलाम करो।

मुस० – चुप रह। अमीर, मेरा मालिक, मेरा आका, मेरा इमाम हुसैन है।

जियाद – तुमने कूफ़ा में आकर कानू के मुताबिक कायम की हुई बादशाहत को उखाड़ने की कोशिश की, बागियों को भड़काया और रियासत में निफ़ाक पैदा किया?

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मुस० – कूफ़ा-कानून के मुताबिक न कोई सल्तनत कायम थी, न है। मैं उस शख्श का कासिद हूं, जो चुनाव के कानून से, विरासत के कानून से और लियाकत से अमीर है। कूफ़ावालों ने खुद उसे अमीर बनाया। अगर तुमने लोगों के साथ इंसाफ किया होता, तो बेशक, तुम्हारा हुक्म जायज था। रियाया की मर्जी और सब हकों को मिटा देती है। मगर तुमने लोगों पर वे जुल्म किए कि कैसर ने भी न किए थे। बेगुनाहों को सजाएं दीं, जुरमानें के हीले से उनकी दौलत लूटी, अमन रखने के हीले से उनके सरदारों को कत्ल किया। ऐसे जालिम हाकिम को, चाहे वह किसी हक के बिना पर हुकूमत करता हो, हुकूमत करने का कोई हक नहीं रहता, क्योंकि हैवानी ताकत कोई हक नहीं है। ऐसी हुकूमत को मिटाना हर सच्चे आदमी का फर्ज है और जो इस फर्ज से खौफ़ या लालच के कारण मुंह मोड़ता है, वह इंसान और खुदा दोनों ही की निगाहों में गुनाहगार है। मैंने अपने मकदूर-भर रियाया को तेरे पंजे से छुड़ाने की कोशिश की और मौका पाऊंगा, तो फिर करूंगा।

जियाद – वल्लाह, तू फिर इसका मौका न पाएगा। तूने बगावत की है। बगावत की सजा कत्ल है। और दूसरे बागियों की इबरत के लिये मैं तुझे इस तरह कत्ल कराऊंगा, जैसे अब तक न किया गया होगा।

मुस० – बेशक। यह लियाकत तुझी में है।

जियाद – इस गुस्ताख को ले जाओ, और सबसे ऊंची छत पर क़त्ल करो।

मुस० – साद, तुमको मालूम है कि तुम मेरे कराबतमंद हो?

साद – मालूम है।

मुस० – मैं तुमसे कुछ वसीयत करना चाहता हूं।

साद – शौक से करो।

मुस० – मैंने यहां कई आदमियों से कर्ज लेकर अपनी जरूरतों पर खर्च किए थे। इस कागज पर उनके नाम और रकमें दर्ज हैं। तुम मेरा घोड़ा और मेरे हथियार बेचकर यह कर्ज अदा कर देना, वरना हिसाब के दिन मुझे इन आदमियों से शर्मिंदा होना होगा।

साद – इसका इत्मीनान रखिए।

मुस० – मेरी लाश को दफ़न करा देना।

साद – यह मेरे इमकान में नहीं है।

[जल्लाद आकर मुसलिम को ले जाता है]

अश० – था अमीर, मुसलिम क़त्ल हुए अब बगावत का कोई अंदेशा नहीं। अब आप हानी की जानबख्शी कीजिए।

जियाद – कलाम पाक की कसम, अगर मेरी नजात भी होती हो, तो हानी को नहीं छोड़ सकता।

अश० – लोग बिगड़ खड़े हों, तो?

जियाद – जब कौम के सरदार मेरे तरफ़दार हैं, तो रियाया की तरफ से कोई अंदेशा नहीं। (जल्लाद को बुलाकर) तूने मुसलिम को कत्ल किया?

जल्लाद – अमीर के हुक्म की तामील हो गई। खुदावंद किसी को इतनी दिलेरी से जान देते नहीं देखा। पहले नमाज पढ़ा, तब मुझसे मुस्कराकर कहा – ‘तू अपना काम कर’।

जियाद – तूने उसे नमाज क्यों पढ़ने दिया? किसके हुक्म से?

जल्लाद – गरीबपरवर, आखिर नमाज के रोकने का अजाब जल्लादों के लिए भी भारी है। जिस्म को सिर से अलग कर देना इतना बड़ा गुनाह नहीं है जितना किसी को खुदा की इबादत से रोकना।

जियाद – चुप रह नामाकूल । तू क्या जानता है, किसको क्या सज़ा देनी चाहिए। गैरतमंदों के लिये रूहानी जिल्लत कत्ल से कहीं ज्यादा तकलीफ देती है। खैर, अब हानी को ले जा और चौराहे पर कत्ल कर डाल।

एक आ० – खुदावंद, यह खिदमत मुझे सुपुर्द हो।

जियाद – तू कौन है।

आ० – हानी का गुलाम हूं। मुझ पर उसने इतने जुल्म किए है कि मैं उनके खून का प्यासा हो गया हूं। आपकी निगाह हो जाये, तो मेरी पुरानी आरजू पूरी हो। मैं इस तरह क़त्ल करूंगा कि देखने वाले आंखें बंद कर लेंगे।

जियाद – कलाम पाक की कसम, तेरा सवाल जरूर पूरा करूंगा।

[गुलाम हानी को पकड़े हुए ले जाता है। कई सिपाही तलवारें लिए साथ-साथ जाते हैं।]

गुलाम – (हानी से) मेरे प्यारे आका मैंने जिंदगी भर आपका नमक खाया, कितनी ही खताएं की, पर आपने कभी कड़ी निगाहों से नहीं देखा। अब आपके जिस्म पर किसी बेदर्द कातिल का हाथ पड़े, वह मैं नहीं देख सकता। मैं इस हालात में भी आपकी खिदमत करना चाहता हूं। मैं आपकी रूह को इस जिस्म की कैद से इस तरह आजाद करूंगा कि जरा भी तकलीफ न हो। खुदा आपको जन्नत दे, और खता माफ करे।