Karbala novel by Munshi Premchand
Karbala novel by Munshi Premchand

दसवाँ दृश्य: [संध्या का समय। जियाद का दरबार]

जियाद – तुम लोगों में ऐसा एक आदमी भी नहीं है, जो मुसलिम का सुराग लगा सके। मैं वादा करता हूं कि पांच हजार दीनार उसकी नज़र करूंगा।

एक दर० – हुजूर, कहीं सुराग नहीं मिलता। इतना पता तो मिलता है कि कई हजार आदमियों ने उनके हाथ पर हुसैन की बैयत की है। पर वह कहां ठहरे हैं, इसका पता नहीं चलता।

कर्बला नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- कर्बला भाग-1

[मुअक्किल का प्रवेश]

मुअ० – हुजूर को खुदा सलामत रखे, एक खुशखबरी लाया हूं। अपना ऊंट लेकर शहर के बाहर चारा काटने गया था कि एक आदमी को बड़ी तेजी से सांड़नी पर जाते रखा। मैंने पहचान लिया, वह सांड़िनी हानी की थी। उनकी खिदमत में कई साल रह चुका हूं। शक हुआ कि यह आदमी इधर कहां जा रहा है। उसे एक हीले से रोककर पकड़ लिया। जब मारने की धमकी दी, तो उसने कबूल किया कि मुसलिम का खत लेकर मक्के जा रहा हूं। मैंने वह खत उससे छीन लिया, यह हाजिर है। हुक्म हो, तो कासिद को पेश करूं।

जियाद – (खत पढ़कर) कसम खुदा की, मैं मुसलिम को जिंदा न छोडूंगा। मैं यहां मौजूद रहूं और 18 हजार आदमी हुसैन की बैयत कबूल कर लें। (कासिद से) तू किसका नौकर है?

कासिद – अपने आका का।

जियाद – तेरा आका कौन है?

कासिद – जिसने मुझे मिस्त्रियों के हाथ से खरीदा था।

जियाद – किसने तुझे खरीदा?

कासिद – जिसने रुपये दिए।

जियाद – किसने रुपये दिए?

कासिद – मेरे आका ने।

जियाद – तेरा आका कहां रहता है?

कासिद – अपने घर में।

जियाद – उसका घर कहां है?

कासिद – जहां उसके बुजुर्गों ने बनवाया था।

जियाद – कसम खुदा की, तू एक ही शैतान है। मैं जानता हूं कि तुझ जैसे आदमी के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए। (जल्लाद से) इसे ले जाकर कत्ल कर दे।

मुअ० – हुजूर, मैं खूब पहचानता हूं कि यह सांड़नी हानी की है।

जियाद – अगर तू मुसलिम का सुराग लगा दे, तो तुझे आजाद कर दूं, और पांच हजार दीनार इनाम दूं।

मुअ० – (दिल में) ये बड़े-बड़े हाकिम बड़ी-बड़ी थैलियां हड़प करने ही के लिए है। अक्ल खाक नहीं होती। जब सांड़नी मौजूद हैं, तो उसके मालिक का पता लगाना क्या मुश्किल है? आज किसी भले आदमी का मुंह देखा था। चल कर सांड़नी पर बैठ जाता हूं, और उसकी नकेल छोड़ देता हूं। आप ही अपने घर पहुंच जाएगी। वहीं मुसलिम का पता लग जाएगा।

(चला जाता है)

जियाद – (दिल में) अगर यह सांड़नी हानी की है, तो साफ जाहिर है कि वह भी इस साजिश में शरीक है। मैं अब तक उसे, अपना दोस्त समझता था। खुदा, कुछ नहीं मालूम होता कि कौन मेरा दोस्त है, और कौन दुश्मन। मैं अभी उसके घर गया था। अगर शरीक भी हानी का मददगार है, तो यही कहना पड़ेगा कि दुनिया में किसी पर भी एतबार नहीं किया जा सकता।

ग्यारहवाँ दृश्य: [10 बजे रात का समय। जियाद के महल के सामने सड़क पर सुलेमान, मुखतार और हानी चले आ रहे हैं।]

सुले० – जियाद के बर्ताव में अब कितना फर्क नज़र आता है।

मुख० – हां, वरना हमें मशविरा देने के लिए क्यों बुलाता।

हानी – मुझे तो खौफ़ है कि उसे मुसलिम की बैयत लेने की खबर मिल गई है। कहीं उसकी नीयत खराब न हो।

मुख० – शक और एतबार साथ-साथ नहीं होता। वरना वह आज आपके घर न जाता।

हानी – उस वक्त भी शायद भेद लेने ही के इरादे से गया हो। मुझसे गलती हुई कि अपने कबीले के कुछ आदमियों को साथ न लाया, तलवार भी नहीं ली।

सुले० – यह आपका वहम है।

[जियाद के मकान में वे सब दाखिल होते हैं। वहां कीस, शिमर, हज्जाज आदि बैठे हुए हैं।]

जियाद – अस्सलामअलेक। आइए, आप लोगों से एक खास मुआमले में सलाह लेनी है। क्यों शेख हानी, आपके साथ खलीफ़ा यजीद ने जो रियायतें की, क्या उनका यह बदला होना चाहिए था कि आप मुसलिम को अपने घर में ठहराएं, और लोगों को हुसैन की बैयत करने पर आमादा करें? हम आपका रुतबा और इज्जत बढ़ाते हैं, और आप हमारी जड़ खोदने की फिक्र में हैं?

हानी – या अमीर, खुदा जानता है, मैंने मुसलिम को खुद नहीं बुलाया, वह रात को मेरे घर आए, और पनाह चाही। यह इंसानियत के खिलाफ था कि मैं उन्हें घर से निकाल देता। आप खुद सोच सकते हैं कि इसमें मेरी क्या खता थी।

जियाद – तुम्हें मालूम था कि हुसैन खलीफ़ा यजीद के दुश्मन हैं?

हानी – अगर मेरा दुश्मन भी मेरी पनाह में आता, तो मैं दरवाजा न बंद रहता।

जियाद – अगर तुम अपनी खैरियत चाहते हो, तो मुसलिम को मेरे हवाले कर दो। वरना कलाम पाक की कसम, तुम फिर आफताब की रोशनी न देखोगे।

हानी – या अमीर, अगर आप मेरे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर डालें, और उन टुकड़ों को आग में जला डालें, तो भी मैं मुसलिम को आपके हवाले न करूंगा। मुरौवत इसे कभी कबूल नहीं करती कि अपनी पनाह में आने वाले आदमी को दुश्मन के हवाले किया जाए। यह शराफत के खिलाफ है। अरब की आन के खिलाफ है। अगर मैं ऐसा करूं, तो अपनी ही निगाह में गिर जाऊंगा। मेरे मुंह पर हमेशा के लिए स्याही का दाग लग जायेगा और आनेवाली नस्ल मेरे नाम पर लानत करेंगी।

कीस – (हानी को एक किनारे ले जाकर) हानी, सोचो, इसका अंजाम क्या होगा? तुम पर, तुम्हारे खानदान पर, तुम्हारे कबीले पर आफत आ जाएगी। इतने आदमियों को कुर्बान करके एक आदमी की जान बचाना कहां की दानाई है?

हानी – कीस, तुम्हारे मुंह से ये बातें जेबा नहीं देती? मैं हुसैन के चचेरे भाई के साथ कभी दगा न करूंगा, चाहे मेरा सारा खानदान कत्ल कर दिया जाये।

जियाद – शायद तुम अपनी जिंदगी से बेजार हो गए हो।

हानी – आप मुझे अपने मकान पर बुलाकर मुझे कत्ल की धमकी दे रहे हैं। मैं कहता हूं कि मेरा एक कतरा खून इस आलीशान इमारत को हिला देगा। हानी बेकस, बेजार और बेमददगार नहीं है।

जियाद – (हानी के मुंह पर सोंटे से मारकर) खलीफा का नायब किसी के मुंह से अपनी तौहीन न सुनेगा, चाहे वह दस हजार कबीले का सरदार क्यों न हो।

हानी – (नाक से खून पोंछते हुए) जालिम! तुझे शर्म नहीं आती कि एक निहत्थे आदमी पर वार कर रहा है। काश मैं जानता कि तू दगा करेगा, तो तू यों न बैठा रहता।

सुले० – जियाद! मैं तुम्हें खबरदार किये देता हूं कि अगर हानी को कैद किया, तो तू भी सलामत न बचेगा।

[जियाद सुलेमान को मारने उठता है, लेकिन हज्जाज उसे रोक लेता है।]

जियाद – तुम लोग बैठे मुँह क्या ताक रहे हो, पकड़ लो इस बुड्ढे को। (बाहर की तरफ शोर मचता है।) यह शोर कैसा है?

कीस – (खिड़की से बाहर की तरफ झांककर) बागियों की एक फौज इस तरफ बढ़ती चली आ रही है।

जियाद – कितने आदमी होंगे?

कीस – कसम खुदा की, दस हजार से कम नहीं है।

जियाद – (सिपाही को बुलाकर) हानी को ले जाओ और उस कोठरी में बंद कर दो, जहां कभी आफताब की किरणें नहीं पहुँचती।

सुले० – जियाद मैं तुझे खबरदार किए देता हूं कि तुझे खुद न उसी कोठरी में कैद होना पड़े।

[सुलेमान और मुख्तार बाहर चले जाते हैं।]

कीस – बागियों की एक फौज बड़ी तेजी से बढ़ती चली आ रही है। बीस हजार से कम न होगी। मुसलिम झंडा लिए हुए सबके आगे हैं।

जियाद – दरवाजे बंद कर लो। अपनी-अपनी तलवारें लेकर तैयार हो जाओ। कसम खुदा की, मैं इस बगावत का मुकाबला जबान से करूंगा। (छत पर चढ़कर बागियों से पूछता है।) तुम लोग क्यों शोर मचाते हो?

एक आ० – हम तुझसे हानी के खून का बदला लेने आए हैं।

जियाद – कलाम पाक की कसम, जीते-जागते आदमी के खून का बदला आज तक कभी किसी ने न लिया। अगर मैं झूठा हूं, तो तुम्हारे शहर का काजी तो झूठ न बोलेगा। (काजी को नीचे से बुलाकर) बागियों से कह दो, हानी जिंदा है।

काजी – या अमीर! मैं हानी को जब तक अपनी आंखों से न देख लूं, मेरी जबान से यह तसदीक न होगी।

जियाद – कलाम पाक की कसम, मैं तमाम मुल्लाओं को वासिल जहन्नुम कर दूंगा। जा, देख आ, जल्दी कर।

[काजी नीचे जाता है, और क्षण भर में लौट आता है।]

काजी – ऐ कूफा के बाशिंदों! मैं ईमान की रू से तसदीक करता हूं कि शेख हानी जिंदा है। हां, उनकी नाक से खून जारी है।

मुस० – बढ़े चलो। महल पर चढ़ जाओ। क्या कहा, जीने नहीं है? जवां मरदों को कभी जीने का मुहताज नहीं देखा। तुम आप जीने बन जाओ।

जियाद – (दिल में) जालिम एक दूसरों के कंधों पर चढ़ रहे हैं। (प्रकट) दोस्तों, यह हंगामा किसलिए है? मैं हुसैन का दुश्मन नहीं हैं। मुसलिम का दुश्मन नहीं हूं, अगर तुमने हुसैन की बैयत कबूल की है, तो मुबारक हो। वह शौक से आए। मैं यजीद का गुलाम नहीं हूं। जिसे कौन का खलीफ़ा बनाए उसका गुलाम हूं, लेकिन इसका तसफिया हंगामें से न होगा, इस मकान को पस्त करने से न होगा, अगर ऐसा हो, तो सबसे पहले इस पर मेरा हाथ उठेगा। मुझे कत्ल करने से भी फैसला न होगा, अगर ऐसा हो, तो मैं अपने हाथों अपना सिर कलम करने को तैयार हूं। इसका फैसला आपस की सलाह से होगा।

मुस० – ठहरो, बस, थोड़ी कसर और है। ऊपर पहुंचे कि तुम्हारी फतह है।

सुले० – ऐं! ये लोग भागे कहां जाते हैं? ठहरो-ठहरो, क्या बात है?

एक सि० – देखिए, कीस कुछ कह रहा है।

कीस – (खिड़की से सर निकालकर) भाइयो, हम और तुम एक शहर के रहनेवाले। क्या तुम हमारे खून से अपनी तलवारों की प्यास बुझाओगे? तुममें से कितने ही मेरे साथ खेले हुए हैं। क्या यह मुनासिब है कि हम एक दूसरे का खून बहाएं! हम लोगों ने दौलत के लालच से, रुतबे के लालच से और हुकूमत के लालच से यजीद की बैयत नहीं कबूल की हैं, बल्कि महज इसलिए कि कूफ़ा की गलियों में खून के नाले न बहें।

कई आ० – हम जियाद से लड़ना चाहते हैं, अपने भाइयों से नहीं।

मुस० – ठहरो-ठहरो। इस दगाबाज की बातों में न आओ।

सुले० – अफ़सोस, कोई नहीं सुनता। सब भागे चले जाते हैं। वह कौन बदनसीब है, जिसके आदमी इतनी आसानी से बहकाए जा सकते हैं।

मुस० – मेरी नादानी थी कि इन पर एतबार किया।

सुले० – मैं हजरत हुसैन को कौन-सा मुंह दिखाऊंगा। ऐसे लोग दगा देते जा रहे हैं, जिनको मैं तकदीर से ज्यादा अटल समझता था। कीस गया, हज्जाज गया, हारिश गया, शीश ने दगा दी, अशअस ने दगा दी। जितने अपने थे, सब बेगाने हो गए।

मुख० – अब हमारे साथ कुल तीस आदमी और रह गए।

[यजीद के सिपाही महल से निकलते हैं। खुदा, इन मूजियों से बचाओ। हजरत मुसलिम, मुझे अब कोई ऐसा मकान नजर नहीं आता, जहां आपकी हिफ़ाजत कर सकूँ। मुझे यहां की मिट्टी से भी दगा की बू आ रही है]

कसीर – गरीब का मकान हाजिर है।

मुख० – अच्छी बात है। हजरत मुसलिम, आप इनके साथ जाये। हमें रुखसत कीजिए। हम दो-चार ऐसे आदमियों का रहना जरूरी है, जो हजरत हुसैन पर अपनी जान निसार कर सकें। हमें अपनी जान प्यारी नहीं, लेकिन हुसैन की खातिर उसकी हिफाजत करनी पड़ेगी।

[वे दोनों एक गली में गायब हो जाते हैं।]