छठा दृश्य: (संध्या का समय। सूर्यास्त हो चुका है। कूफ़ा का शहर – कोई सारवान ऊँट का गल्ला लिए दाखिल हो रहे हैं।)
पहला – यार गलियों से चलना, नहीं तो किसी सिपाही की नज़र पड़ जाये, तो महीनों बेगार झेलनी पड़े। ।
दूसरा – हाँ हाँ, वे बला के मूजी है। कुछ लादने को नहीं होता, तो यों ही बैठ जाते हैं, और दस-बीस कोस का चक्कर लौट आते हैं। ऐसा अंधेर पहले कभी न होता था। मजूरी तो भाड़ में गई, ऊपर से लात और गालियां खाओ।
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तीसरा – यह सब महज पैसे आँटने के हथकंडे हैं। न-जाने कहां के कुत्ते आ के सिपाहियों में दाखिल हो गए। छोटे-बड़े एक ही रंग में रंगे हुए है। ।
चौथा – अमीर के पास फरियाद लेकर जाओ, तो उल्टे और बौछार पड़ती है। अजीब मुसीबत का सामना है। हजरत हुसैन जब तक न आएंगे, हमारे सिर से यह बला न टलेगी।
[मुसलिम पीछे से आते हैं।]
मुस० – क्यों यारो, इस शहर में कोई खुदा का बंदा ऐसा है, जिसके यहां मुसाफिरों के ठहरने को जगह मिल जाये?
पहला – यहां के रईसों की कुछ न पूछो। कहने को दो-चार बड़े आदमी हैं, मगर किसी के यहां पूरी मजूरी नहीं मिलती। हां, जरा गालियां कम देते हैं।
मुस० – सारे शहर में एक भी सच्चा मुसलमान नहीं है?
दूसरा – जनाब, यहां कोई शहर के काजी तो हैं नहीं, हां, मुख्तार की निस्बत सुनते हैं कि बड़े दीनदार आदमी है। हैसियत तो ऐसी नहीं, मगर खुदा ने हिम्मत दी है। कोई गरीब चला जाये, तो भूखा न लौटेगा।
तीसरा – सुना है, उनकी जागीर जब्त कर ली गई है।
मुस० – यह क्यों?
तीसरा – इसीलिये कि उन्होंने अब तक यजीद की बैयत नहीं ली।
मुस० – तुममें से मुझे कोई उनके घर तक पहुंचा सकता है?
चौथा – जनाब, यह ऊँटनियों के दुहने का वक्त है; हमें फुरसत नहीं। सीधे चले जाइए, आगे लाल मसजिद मिलेगी, वहीं उनका मकान है।
मुस० – खुदा तुम पर रहमत करे। अब चला जाऊंगा।
[परदा बदलता है। मसजिद के करीब मुख्तार का मकान]
मुस० – (एक बुड्ढे से) यही मुख्तार का मकान हैं न?
बुड्डा – जी हां, ग़रीब ही का नाम मुख्तार है। आइए, कहां से तशरीफ़ ला रहे हैं?
मुस० – मक्केशरीफ़ से।
मुख० – (मुसलिम के गले से लिपटकर) मुआफ कीजिएगा। बुढ़ापे की बीनाई शराबी की तोबा की तरह कमजोर होती है। आज बड़ा मुबारक दिन है। बारे हजरत ने हमारी फ़रियाद सुन ली। खैरियत से हैं न?
मुस० – (घोड़े से उतरकर) जी हां, सब खुदा का फ़जल है।
मुख० – खुदा जानता है, आपको देखकर आंखें शाद हो गई। हजरत का इरादा कब तक आने का है?
मुस० – (खत निकालकर मुख्तार को देते हैं) इसमें उन्होंने सब कुछ मुफ़स्सल लिख दिया है।
मुस० – (खत को छाती और आंखों से लगाकर पढ़ता है) खुशनसीब कि हजरत के कदमों से यह शहर पाक होगा। मेरी बैयत हाजिर है, और मेरे दोस्तों की तरफ से भी कोई अंदेशा नहीं।
[गुलाम को बुलाता है।]
गुलाम – जनाब ने क्यों याद फरमाया?
मुख० – देखो, इसी वक्त हारिस, हज्जाज, सुलेमान, शिमर, कीस, शैस और हानी के मकान पर जाओ और मेरा यह रुक्का दिखाकर जवाब लाओ।
गुलाम – रुक्का लेकर चला जाता है।
[गुलाम रुक्का लेकर चला जाता हैं।]
पहले मुझे ऐसा मालूम होता था कि हज़रत का कोई क़ासिद आएगा, तो मैं शायद दीवाना हो जाऊंगा, पर इस वक्त आपको सामने देखकर भी खामोश बैठा हुआ हूं। किसी शायर ने सच कहा है- ‘जो मजा इन्तजार में देखा, वह नहीं वस्लेयार में देखा।’ जन्नत का खयाल कितना दिलफ़रेब हैं, पर शायद उसमें दाखिल होने पर इतनी खुशी न रहे। आइए, नमाज़ अदा कर लें। इसके बाद कुछ आराम फरमा लीजिए। फिर दम मारने की फुरसत न मिलेगी।
दोनों मकान के अंदर चले जाते हैं। परदा बदलता है।
(मुसलिम और मुख्तार बैठे हुए हैं।)
मुस० – कितने आदमी बैयत लेने के लिये तैयार हैं?
मुख० – देखिए, सब अभी आ जाते हैं। अगर यजीद की जानिब से जुल्म और सख्ती इसी तरह होती रही, तो हमारे मददगारों की तादाद दिन-दिन बढ़ती जायेगी। लेकिन कहीं उसने दिलजोई शुरू कर दी, तो हमें इतनी आसानी से कामयाबी न होगी।
[सुलेमान का प्रवेश]
सुले० – अस्सलामअलेक हज़रत मुसलिम, आपको देखकर आंखें रोशन हो गई; मेरे कबीले के सौ आदमी बैयत लेने की हाजिर हैं और सब-के-सब अपनी बात पर मिटनेवाले आदमी हैं।
मुस० – आपको खुदा नजात दे। इन आदमियों से कहिए, कल जामा मसजिद में जमा हों। आपका खत पढ़कर भैया को बहुत रंज हुआ। उन्होंने तो फैसला कर लिया था कि रसूल के मजार पर बैठे हुए जिंदगी गुजार दे, पर आपके आखिरी खत ने उन्हें बेक़रार कर दिया। सायल की हिमायत से वह कभी नहीं मुंह मोड़ सकते।
[शैस, कीस, शिमर, साद और हज्जाज का प्रवेश]
शैस – अस्सलामअलेक हजरत, आपको देखकर जिगर ठंडा हो गया।
कीस – अस्सलामअलेक, आपके क़दमों से हमारे वीरान घर आबाद हो गए।
हल्जाज – अस्सलामअलेक, आपको देखकर हमारे मुर्दा तन में जान आ गई।
मुस० – (सबसे गले मिलकर) हज़रत इमाम ने मुझे यह खत देकर आपकी खिदमत में भेजा है।
[शिमर खत लेकर ऊंची आवाज से पढ़ता है, और सब लोग सिर झुकाए सुनते हैं।]
शैस – हमारे ज़हे नसीब, मैं तो अभी दस्तख्वान पर था। खबर पाते ही आपकी ज़ियारत करने दौड़ा।
हज्जाज – मैं तो अभी-अभी बसरे से लौटा हूं, दम भी न मारने पाया था कि आपके तशरीफ़ लाने की खबर पाई। मेरे कबीले के बहुत से आदमी बैयत लेने को बाहर खड़े हैं।
मुस० – उन्हें कल जामा मसजिद में बुलाइए।
शिमर – वह कौन-सा दिन होगा कि मलऊन यजीद के जुल्म से नज़ात होगी।
शैस – हज़रत हुसैन ने हम गरीबों की आवाज़ सुन ली। अब हमारे बुरे दिन न रहेंगे।
कीस – हमारी किस्मत के सितारे अब रोशन होंगे। मेरी दिली तमन्ना है कि जियाद का सिर अपने पैरों के नीचे देखें।
शिमर – मैंने तो मिन्नत मानी है कि मलऊन जियाद के मुंह में कालिख लगाकर सारे शहर में फिराऊं।
कोस – मैं तो यजीद की नाक काटकर उसकी हथेली पर रख देना चाहता हूं।
[हानी, कसीर और अशअस का प्रवेश।]
हानी – या बिरादर हुसैन, आप पर, खुदा की रहमत हो।
कीस – अल्लाहताला आप पर साया रखे। हम सब आपकी राह देख रहे थे।
मुस० – भाई साहब ने मुझे यह खत देकर आपकी तसकीन के लिए भेजा है।
[हानी ख़त लेकर आंखों से लगाता है, और आंखों में ऐनक लगाकर पढ़ता है।]
शिमर – अब जियाद की खबर लूंगा।
कीस – मैं तो यजीद की आंखों में मिर्च डालकर उसका तड़पना देखूंगा।
मुस० – आप लोग भी कल अपने कबीलेवालों का जामा मसजिद में बुलाएं। कल तीन-चार हजार आदमी आ जाएंगे?
शैस – खुदा झूठ न बुलवाए, तो इसके दसगुने हो जायेंगे।
हानी – नबी की औलाद की शान और ही है। वह हुस्न, वह इखलाक, वह शराफत कहीं नज़र ही नहीं आती।
कीस – यजीद को देखो, खासा हब्शी मालूम होता है।
हज्जाज – जियाद तो खासा सारवान है।
मुस० – तो कल शाम को जामा मसजिद में आने की ठहरी।
शिमर – तो हम लोग चलकर अपने कबीलों को तैयार करें, ताकि जो लोग इस वक्त यहां न हों, वे भी आ जायें
[सब लोग चले जाते हैं]
मुस० – (दिल में) ये सब कूफा के नामी सरदार हैं। हमारी फतह जरूर होगी और एक बार तकदीर को जक उठानी पड़ेगी। बीस हजार आदमियों की बैयत मिल गई, तो फिर हुसैन को खिलाफ़त की मसनद पर बैठने से कौन रोक सकता है, जरूर बैठेंगे।
सातवाँ दृश्य: [कूफ़ा के चौक में कई दुकानदार बातें कर रहे हैं।]
पहला – सुना, आज हजरत हुसैन तशरीफ लानेवाले हैं।
दूसरा – हां, कल मुख्तार के मकान पर बड़ा जमघट था। मक्का से कोई साहब उनके आने की खबर लाए हैं।
तीसरा – खुदा करे, जल्द आवें। किसी तरह इन जालिमों से पीछा छूटे। मैंने बैयत तो यजीद की ले ली है, लेकिन हज़रत आएंगे, तो फौरन फिर जाऊंगा।
चौथा – लोग कहते थे, बड़ी धूमधाम से आ रहे हैं। पैदल और सवार फौजें हैं। खेमे वगैरह ऊँटों पर लदे हुए हैं।
पहला – दुकान बढ़ाओ, हम लोग भी चलें। तकदीर में जो कुछ बिकना था, बिक चुका। आकबत की भी तो कुछ फिक्र करनी चाहिए। (चौंककर) अरे बाजे की आवाजें कहां से आ रही हैं।
दूसरा – आ गए शायद।
[सब दौड़ते हैं। जियाद का जलूस सामने से आता है। जियाद मिंबर पर खड़ा हो जाता है।]
कई आवाजें – मुबारक हो, मुबारक हो, या हजरत हुसैन!
जियाद – दोस्तों, मैं हुसैन नहीं हूं। हुसैन का अदना गुलाम रसूल पाक के कदमों पर निसार होने वाला आपका नाचीज खादिम बिन जियाद हूं।
एक आवाज – जियाद है, मलऊन जियाद है।
दूसरा – गिरा दो मिंबर पर से; उतार दो मरदूद को।
तीसरा – लगा दो तीर का निशाना। ज़ालिम की जबान बंद हो जाय।
चौथा – खामोश, खामोश। सुनो, क्या कहता है?
जियाद – अगर आप समझते हैं कि मैं जालिम हूं, तो बेशक मुझे तीर का निशान बनाइए, पत्थरों से मारिए, कत्ल कीजिए, हाजिर हूं। जालिम गर्दन जदनी है और जो जुल्म बर्दाश्त करे, वह बेगैरत है। मुझे गरूर है कि आप में गैरत है, जोश है।
कई आवाजें – सुनो, सुनो, खामोश।
जियाद – हां, मैं गैरत से, गरूर से नहीं डरता, क्योंकि यही वह ताक है, जो किसी कौम को जालिम के हाथ से बचा सकती है। खुदा के लिए उस जुल्म की नाकदरी न कीजिए, जिसने आपकी गैरत को जगाया। यही मेरी मंशा थी, यही यजीद की मंशा थी, और खुदा का शुक्र कि हमारी तमन्ना पूरी हुई। अब हमें यकीन हो गया कि हम आपके ऊपर भरोसा कर सकते हैं। जालिम उस्ताद की भी कभी-कभी जरूरत होती है। हज़रत हुसैन जैसा पाक-नीयत दीनदार बुजुर्ग आपको यह सबक न दे सकता था। यह हम जैसे कमीना, खुदगरज आदमियों ही का काम था। लेकिन अगर हमारी नीयत खराब होती, तो आप आज मुझे यहां खड़े होकर उन रियायतों का एलान करते न देखते, जो मैं अभी-अभी करने वाला हूं। इन एलानों से आप पर मेरे कौल की सच्चाई रोशन है जायेगी।
कई आवाजें – खामोश, खामोश, सुनो-सुनो।
जियाद – खलीफा, यजीद का हुक्म है कि कूफा और बसरा का हरएक बालिग मर्द पांच सौ दिरहम सालाना खजाने से पाए।
बहुत-सी आवाजें – सुभानअल्लाह, सुभानअल्लाह।
जियाद – और कूफ़ा व बसरे की हरएक बालिग औरत दो सौ दिरहम पाए, जब तक उसका निकाह न हो।
बहुत-सी आवाजें – सुभानअल्लाह, सुभानअल्लाह।
जियाद – और हरएक बेवा को सौ दिरहम सालाना मिलें, जब तक उसकी आंखें बंद न हो जायें, वह दूसरा निकाह न कर ले।
बहुत-सी आवाजें – सुभानअल्लाह, सुभानअल्लाह
जियाद – यह मेरे हाथ में खलीफ़ा का फ़रमान है। देखिए, जिसे यकीन न हो। हरएक यतीम को बालिग होने तक सौ दिरहम सालाना मुकर्रर किया गया है। हर एक जवान मर्द और औरत को शादी के वक्त एक हजार दिरहम एकमुश्त खर्च के लिए दिया जायेगा।
बहुत-सी आवाजें – खुदा खलीफा यजीद को सलामत रखे। कितनी फैयाजी की है।
जियाद – अभी और सुनिए, तब फैसला कीजिए कि यजीद जालिम है या रियाया-परवर? उसका हुक्म है कि हरएक कबीले के सरदार को दरिया के किनारे की उतनी जमीन अता की जाय, जितनी दूर उसका तीर जा सके।
बहुत-सी आवाजें – हम यजीद की बैयत मंजूर करते हैं। यजीद हमारा खलीफा है।
जियाद – नहीं, यजीद बैयत के लिए आपकी रिश्वत नहीं देता। बैयत आपके अख्तियार में हैं। जिसे जी चाहे, दीजिए। यजीद हुसैन से दुश्मनी करना नहीं चाहता। उसका हुक्म है कि नदियों के घाट का महसूल मुआफ कर दिया जायें।
बहुत-सी आवाजें – हम यजीद को अपना खलीफ़ा तसलीम करते हैं।
जियाद – नहीं-नहीं, यजीद कभी हुसैन के हक को जायल न करेगा। हुसैन मालिक हैं, फ़ाज़िल हैं, आबिद हैं, जाहिद हैं, यजीद को इनमें से कोई सिफ़र रखने का दावा नहीं। यजीद में अगर कोई सिफ़त है, तो यह कि वह जुल्म करना जानता है, खासकर नाजुक वक्त पर, जब माल और जान की हिफाजत करने वाला कोई न हो, जब सब अपने हक और दावे पेश करने में मशरूफ हों।
बहुत-सी आवाजें – जालिम यजीद ही हमारा अमीर है। दिल से उसकी बैयत कबूल करते हैं।
जियाद – सोचिए, और गौर से सोचिए। अगर खिलाफ़त के दूसरे दावेदारों की तरह यजीद भी किसी गोशे में बैठे हुए बैयत की फिक्र करते, तो आज मुल्क की क्या हालत होती? आपकी जान व माल की हिफाजत कौन करता? कौन मुल्क को बाहर के हमलों से और अन्दर की लड़ाइयों से बचाता? कौन सड़कों और बंदरगाहों को डाकुओं से महफूज रखता? कौन कौम की बहू-बेटियों की हुरमल का जिम्मेदार होता? जिस एक आदमी की जात से कौम और मुल्क को नाजुक मौके पर कितने फायदे पहुंचे हों, और जिसने खलीफ़ा चुने जाने का इंतजार न करके ये बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां सिर पर ले ली हों, क्या वह इसी काबिल है कि उसे मलंऊन और मरदूद कहा जाय, उसे सरे बाजार में गालियां दी जाये?
एक आवाज – हम बहुत नादिम हैं। खुदा हमारा गुनाह मुआफ करे।
शिमर – हमने खलीफ़ा यजीद के साथ बड़ी बेइंसाफी की है।
जियाद – हां, आपने जरूर बेइंसाफी की है। मैं यह बिना खौफ़ कहता हूं, ऐसा आदमी इससे कहीं अच्छे बर्ताव के लायक था। हुसैन की इज्जत यजीद के और मेरे दिल में उससे जरा भी कम नहीं है, जितनी और किसी के दिल में होगी। अगर आप उन्हें अपना खलीफा तसलीम करते हैं, तो मुबारक हो। हम खुश, हमारा खुदा खुश। यजीद सबसे पहले उनकी बैयत मंजूर करेगा, उसके बाद मैं हूंगा। रसूल पाक ने खिलाफत के लिए इंतखाब की शर्त लगा दी है। मगर हुसैन के लिए इसकी कैद नहीं।
कीस – है। यह कैद सबके लिए एक-सा है।
जियाद – अगर है, तो इंतखाब का बेहतर और कौन मौका होगा। आप अपनी रजा और रगबत से किसी का लिहाज और मुरौवत किए बगैर जिसे चाहें, खलीफ़ा तसलीम कर लें। मैं कसरत राय को मानकर यजीद को इसकी इत्तला दे दूंगा।
एक तरफ से – हम यजीद को खलीफ़ा मानते हैं।
दूसरी तरफ से – हम यजीद की बैयत कबूल करते हैं।
तीसरी तरफ से – यजीद, यजीद, यजीद।
जियाद – खामोश, हुसैन को कौन खलीफ़ा मानता है?
[कोई आवाज नहीं आती।]
जियाद – आप जानते हैं, यजीद आबिद नहीं।
कई आवाजें – हमें आबिद की जरूरत नहीं।
जियाद – यजीद आलिम नहीं, फ़ाजिल नहीं, हाफ़िज नहीं।
कई आवाजें – हमें आलिम फ़ाजिल की जरूरत नहीं,
हज्जाज – कितना फैयाज़ है।
शिमर – किसी खलीफ़ा ने इतनी फैयाजी नहीं की।
शैस – आबिद कभी फैयाज नहीं होता।
अशअस – अभी, कुछ न पूछो, मसजिद के मुल्लाओं को देखो, रोटियों पर जान देते हैं।
जियाद – अच्छा, यजीद को आपने अपना खलीफ़ा तो मान लिया, लेकिन हैजाज, मिस्त्र, यमन के लोग किसी और को खलीफ़ा मान लें, तो?
ब० अ० – हम खलीफा यजीद के लिए जान दे देंगे।
जियाद – बहुत मुमकिन है कि हजरत हुसैन ही को वे लोग अपना खलीफा बनाए, तो आप अपना कौल निभाएंगे?
ब० आ० – निभाएंगे। यजीद के सिवा और कोई खलीफ़ा नहीं हो सकता। बैयत लेने के लिये भेजा है और शायद खुद भी आ रहे हैं। यजीद को गोशे में बैठकर, खुदा की याद करना इससे कहीं अच्छा मालूम होगा कि वह इस्लाम में निफ़ाक की आग भड़काएं। अभी मौका है, आप लोग खूब गौर कर लें।
शिमर – हमने खूब गौर कर लिया है।
हज्जाज – हुसैन को न जाने क्यों खिलाफ़त की हवस है। बैठे हुए खुदा की इबादत क्यों नहीं करते?
कीस – हुसैन मदीनावालों के साथ जो सलूक करेंगे, वह कभी हमारे साथ नहीं कर सकते।
शैस – उनका आना बला का आना है।
जियाद – अगर आप चाहते हैं कि मुल्क में अमन रहे, तो खबरदार, इस वक्त एक आदमी भी जामा मसजिद में न जाये। हुसैन आए, हमारे सिर आंखों पर। हम उनकी ताजीम करेंगे, उनकी खिदमत करेंगे, लेकिन उन्हें खिलाफ़त का दावा पेश करते देखेंगे, तो मुल्क में अमन रखने के लिए हमें आपकी जरूरत होगी। यही आपकी आजमाइश का वक्त होगा, और इसी में पूरे उतरने पर इस्लाम की जिंदगी का दारमदार है।
[मिंबर पर से उतर आता है।]
शैस – बड़ी गलती हुई कि हुसैन को खत लिखा।
शिमर – मैं तो अब जामा मसजिद न जाऊंगा।
कीस – यहां कौन जाता है।
शैश – काश, इन्हीं रियायतों का चंद रोज पहले एलान कर दिया गया होता, तो खत लिखने की नौबत ही क्यों आती।
शिमर – दीन की फिक्र मोटे आदमी करें, यहां दुनिया की फिक्र काफी है।
[सब जाते हैं।]
