क्या है मर्सिया के मुहर्रम में गाये जाने का महत्व: Muharram 2023
Muharram 2023 and Marsiya Song

Muharram 2023: समाज में पर्व का बहुत महत्त्व है। पर्व संस्कृति का हिस्सा होते हैं। पर्व से हमारी यादें जुड़ी होती हैं। न्याय , ईमानदारी , प्रेम और त्याग का सही अर्थ व्यक्ति को पर्व ही सिखाते हैं। हर पर्व के पीछे एक ऐसी कहानी है जो हमें जीवन को सही तरह से जीने की सीख देती है। हर त्यौहार और उससे जुड़ी संस्कृति का अपना महत्व है। इसी तरह एक मातमी पर्व है मुहर्रम , मुहर्रम ख़ुशी का पर्व तो नहीं है लेकिन इसमें इमाम हुसैन के त्याग को श्रद्धा पूर्वक याद किया जाता है। क्या आप जानते हैं मुहर्रम क्यों मनाया जाता है, आखिर इसके पीछे कौन सी कहानी है और ये मातमी पर्व हमें क्या सिखाता है। तो जानिए मुहर्रम से जुड़ी कुछ बातें जो शायद आप न जानते हों।

मुहर्रम क्यों मनाया जाता है ?

Muharram 2023
Muharram 2023 Celebration

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना माना जाता है। इसे बहुत ही पवित्र महीना माना जाता है। मुहर्रम को मनाने का कारण है इमाम हुसैन की शहादत। जी हाँ इस्लाम धर्म के पैगम्बर हज़रत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन, यज़ीद की सेना से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उन्हीं की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यज़ीद ने खुद को ख़लीफ़ा घोषित किया और सभी को इसे मानने पर मजबूर किया लेकिन इमाम हुसैन ने उसे ख़लीफ़ा मानने से इंकार कर दिया। ऐसा करने पर यजीद और इमाम हुसैन के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में शहीद होने के बाद से उनकी शहादत को याद करने का मातमी पर्व है मुहर्रम। इस जुलूस में मर्सिया गाया जाता है। ये मर्सिया ऐसा होता है कि किसी की भी आँखें नम हो जाएं।

क्या है मर्सिया

मर्सिया यानी शोकगीत जिसे मुहर्रम में इमाम हुसैन की शहादत पर पढ़ा या गाया जाता है। इसकी शुरुआत दिल्ली में हुई थी लेकिन फिर बाद में ये विधा लखनऊ में पहुंची। मर्सिया गीतों में इमाम हुसैन की शहादत का विस्तार पूर्वक वर्णन किया जाता है। ये गीत, सुनने वाले को रुला देते हैं। यूँ तो मर्सिया कई लोगों ने लिखा है लेकिन लखनऊ के इन दो शायरों मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर के मर्सिये बहुत प्रसिद्ध हैं। ‘ज़मीं कर्बला की सजाई गयी है, ये जंगल में बस्ती बसाई गयी है’, ‘कितना बुलंद तेरा मुक़द्दर है कर्बला,कतरे की क्या बिसात समंदर अगर न हो, दुनिया है एक क़तरा समंदर है कर्बला’ इस तरह के कई गीत हैं जिन्हें मुहर्रम के मौके पर गाया जाता है।

एकता दर्शाता मुहर्रम

इस देश में अनेकता में जो एकता है उसकी अनगिनत मिसालें पेश हैं। इसी तरह एक मिसाल है लखनऊ की। लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के कार्यकाल में एक बार यूँ हुआ कि होली और मुहर्रम एक साथ पड़ गए। जहाँ होली हर्षोल्लास से मनाते हैं तो वहीं मुहर्रम ग़म का महीना है। ऐसे में वाजिद अली शाह ने ये तय किया कि एक ख़ास वक़्त तक मुहर्रम का जुलूस निकलेगा और उसके बाद होली खेली जाएगी। इस तरह से दोनों पर्व मनाए गए। मुहर्रम में निकाले जाने वाले जुलूस का सम्मान होता है, ताज़ियादारी और अज़ादारी में हिन्दू परिवार हिस्सा लेते हैं। बिहार में भी ये एकता देखने को मिलती है। इस जुलूस को निकालने के लिए चंदा इकठ्ठा किया जाता है हिन्दू परिवारों के द्वारा भी इसमें भाग लिया जाता है। विनम्रता से मौजूद रहना और जुलूस के लिए रास्ते को साफ़ करने का काम हिन्दू परिवार बड़ी श्रद्धा से करते हैं।

सृष्टि मिश्रा, फीचर राइटर हैं , यूं तो लगभग हर विषय पर लिखती हैं लेकिन बॉलीवुड फीचर लेखन उनका प्रिय विषय है। सृष्टि का जन्म उनके ननिहाल फैज़ाबाद में हुआ, पढ़ाई लिखाई दिल्ली में हुई। हिंदी और बांग्ला कहानी और उपन्यास में ख़ास रुचि रखती...