तीसरा दृश्य: [दोपहर का समय। हजरत हुसैन अब्बास के साथ खेमे के दरवाजे पर खड़े मैदाने-जंग की तरफ़ ताक रहे हैं।]
हुसैन – कैसे-कैसे जांबाज दोस्त रुखसत हो गए और होते जा रहे हैं। प्यास से कलेजे मुंह को आ रहे हैं, और ये जालिम नमाज तक की मुहलत नहीं देते। आह! जहीर का सा दीनदार उठ गया, मुसलिम बिन ऊसजा इस आलमेजईफ़ी में भी कितने जोश से लड़े। किस-किसका नाम गिनाऊं।
अब्बास – या हजरत, मुझे अंदेशा हो रहा है कि शिमर कोई नया सितम ढाने की तैयारियां कर रहा है। यह देखिए, वह सिपाहियों की एक बड़ी जमैयत लिए इधर चला जाता है।
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हबीब – (जोर से) शिमर, खबरदार, अगर इधर एक कदम भी बढ़ाया, तो तेरी लाश पर कुत्ते रोवेंगे। तुझे शर्म नहीं आती जालिम कि अहलेबैत के खेमे पर हमला करना चाहता है।
शिमर – हम इस हमले से जंग का फैसला कर देना चाहते हैं। जवानो, तीर बरसाओ।
हुसैन – अफसोस, घोड़े मरे जा रहे हैं। घुटने टेककर बैठ जाओ, और तीरों का जवाब दो। खुदा ही हमारा वाली और हाफ़िज है।
शिमर – बढ़ो-बढ़ो, एक आन में फैसला हुआ जाता है।
सिपाही – देखते नहीं हो; हमारी सर्फे खाली होती जाती हैं! यह तीर हैं। या खुदा का गजब। हम आदमियों से लड़ने आए हैं, देवों से नहीं।
शिमर – लकड़ियां जलाओ, फौरन इन खेमों पर आग के अंगारे फेंकों, जलते हुए कुंदे फेंको, जलाकर खाक स्याह कर दो।
[आग की बारिश होने लगती है। औरतें खेमे से चिल्लाती हुई बाहर निकल आती है।]
जैनब – तुफू है तुझ पर जालिम, मर्दों से नहीं, औरतों पर अपनी दिलेरी दिखाता है।
हुसैन – साद! यह क्या सितम है? तुम लोगों का दुश्मन में हूं। मुझसे लड़ो, खेमों में और औरतों और बच्चों के सिवा कोई मर्द नहीं है। वे गरीब निकलकर भाग न सकीं, तो हम इधर चले जायेंगे, तुमसे लड़ न सकेंगे। अफसोस है कि इतनी जमैयत के होते हुए भी तुम यह विदअतें कर रहे हो।
शिमर – फेंको अंगारे। मुझे दोजख में जलना नसीब हो, अगर मैं इन सब खेमों को जला न डालूं।
शीस – शिमर, तुम्हारी यह हरकत आईने जंग के खिलाफ़ है। हिसाब के दिन तुम्हीं इसके जिम्मेदार होंगे।
कीस – रोको अपने आदमियों को।
शिमर – मैं अपने फ़ैल का मुख्तार हूं। आग बरसाओ, लगा दो आग।
शीस – साद, खुदा को क्या मुंह दिखाओगे?
हबीब – दोस्त, टूट पड़ो, शिमर पर, बाज की तरह टूट पड़ो। नामूसे-हुसैन पर निसार हो जाओ। एकबारगी नेजों का वार करो।
[हबीब और उनके साथ दस आदमी नेजे ले जाकर शिमर पर टूट पड़ते हैं। शिमर भागता है, और उसकी फौज भी भाग जाती है।]
हुसैन – हबीब, तुमने आज अहलेबैत की आबरू रख ली। खुदा तुम्हें इसकी सज़ा दे।
हबीब – या मौला, दुश्मन दो-चार लम्हों के लिए हट गया है, नमाज का वक्त आ गया है, हमारी तमन्ना है कि आपके साथ आखिरी नमाज पढ़ लें। शायद फिर यह मौका न मिले।
हुसैन – खुदा तुम पर रहम करे, अजान दो। ऐ साद, क्या तू इस्लाम की शरियत को भी भूल गया? क्या इतनी मुहलत न देगा कि नमाज पढ़कर जंग की जाय?
शिमर – खुदा पाक की कसम, हर्गिज नहीं। तुम बेनमाज़ क़त्ल किए जाओगे। शरियत बागियों के लिए नहीं है।
हबीब – या मौला, आप नमाज अदा फरमाएं, इस मूजी को बकने दें। इसकी इतनी मजाल नहीं है कि नमाज में मुखिल हो।
[लोग नमाज पढ़ने लगते हैं। साहसराय और उनके सातों भाई हुसैन की पुश्त पर खड़े शिमर के तीरों से उनको बचाते रहते हैं। नमाज खत्म हो जाती है।]
हुसैन – दोस्तों, मेरे प्यारे गमसारो, यह नमाज इस्लाम की तारीख में यादगार रहेगी। अगर खुदा के इन दिलेर बंदों ने, हमारे पुश्त पर खड़े होकर, हमें दुश्मनों के तीरों से न बचाया होता, तो हमारी नमाज हर्गिज न पूरी होती। ऐ हकपरस्तों, हम तुम्हें सलाम करते हैं। अगर्चे तुम मोमिन नहीं हो, लेकिन जिस मजहब के पैरों ऐसे हकपरजर, ऐसे इंसाफ पर जान देने वाले, जिंदगी को इस तरह नाचीज समझने वाले, मजलूमों की हिमायत में सिर कटाने वाले हों, वह सच्चा और मिनजानिब खुदा है। वह मजहब दुनिया में हमेशा कायम रहे और नूरे इस्लाम के साथ उसकी रोशनी भी चारों तरफ फैले।
साहसराय – भगवन् आपने हमारे प्रति जो शुभेच्छाएं प्रकट की हैं, उनके लिए हम आपके कृतज्ञ हैं। मेरी भी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जब कभी इस्लाम को हमारे रक्त की आवश्यकता हो, तो हमारी जाति में अपना वक्ष खोल देने वालों की कमी न रहे। अब मुझे आज्ञा हो कि चलकर अपने प्रायश्चित की क्रिया पूरी करूं।
हुसैन – नहीं, मेरे दोस्तों, जब तक हम बाकी हैं, अपने मेहमानों को मैदान में न जाने देंगे?
साहस० – हजरत, हम आपके मेहमान नहीं, सेवक हैं। सत्य और न्याय पर मरना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य है। यह हमारा कर्त्तव्य मात्र है, किसी पर एहसान नहीं।
हुसैन – आह! किस मुंह से कहूं कि जाइए। खुदा करे इस मैदान में हमारे और आपके खून से जिस इमारत की बुनियाद पड़ी है, वह जमाने की नज़र में हमेशा महफूज रहे, वह कभी वीरान न हो, उसमें हमेशा नग़मे की सदाएं बुलंद हों, और आफ़ताब की किरणें हमेशा उस पर चमकती रहें।
[सातों भाई गाते हुए मैदान में जाते हैं।]
जय भारत, जय भारत, जय मम प्राणपते !
भाल विशाल चमत्कृत सित हिमगिर राजे,
परसत बाल प्रभाकर हेम-प्रभा ब्राजे।
जय भारत….
ऋषि – मुनि पुण्य तपोनिधि तेज-पुंजधारी,
सब विधि अधम अविद्या भव-भय-तमहारी।
जय भारत…
जय जय वेद चतुर्मुख अखिल भेद ज्ञाता,
सुविमल शांति सुधा-निधि मुद मंगलदाता।
जय भारत…
जय जय विश्व-विदांवर जय विश्रुत नामी,
जय जय धर्म-धुरंधर जय श्रुति-पथगामी।
जय भारत…
अजित अजेय अलौकिक अतुलित बलधामा,
पूरन प्रेम-पयोनिधि शुभ गुन-गुन-ग्रामा।
जय भारत…
हे प्रिय पूज्य परम मन नमो – नमो देवा,
बिनवत अधम – पापि जन ग्रहन करहु सेवा।
जय भारत…
अब्बास – गज़ब के जांबाज हैं। अब मुझ पर यह हकीकत खुली कि इस्लाम के दायरे के बाहर भी इस्लाम है। ये सचमुच मुसलमान हैं और रसूल पाक ऐसे आदमियों की शफाअत न करें, मुमकिन नहीं।
हुसैन – कितनी दिलेरी से लड़ रहे हैं!
अब्बास – फौज में बेखौफ़ घुसे जाते हैं। ऐसी बेजिगरी से किसी को मौत के मुंह में जाते नहीं देखा।
अली अक० – ऐसे पांच सौ आदमी भी हमारे साथ होते, तो मैदान हमारा था।
हुसैन – आह! वह साहसहाय घोड़े से गिरे। मक्कार शिमर ने पीछे से वार किया। इस्लाम को बदनाम करने वाला मूजी!
अब्बास – वह दूसरा भाई भी गिरा।
हुसैन – इनके रिवाज के मुताबिक लाशों को जलाना होगा। चिता तैयार कराओ।
अली अक० – तीसरा भाई भी मारा गया।
अब्बास – जालिमों ने चारों तरफ से घेर लिया, मगर किस गजब के तीरंदाज हैं। तीर का शोला-सा निकलता है!
अली अक० – अल्लाह, उनके तीरों से आग निकल रही है। कोहराम मच गया, सारी जमैयत परेशान होकर भागी जा रही है।
अब्बास – चारों सूरमा दुश्मन के खेमों की तरफ जा रहे हैं। फौज काई की तरह फटती जाती है। वह खेमों से शोला निकलने लगे!
अली अक० – या खुदा, चारों देखते-देखते गायब हो गये।
हुसैन – शायद उनके सामने कोई खदक खोदी गई है।
अब्बास – जी हां, यही मेरा भी खयाल है।
हुसैन – चिताएं तैयार कराओ। अगर फ़रेब न किया जाता, तो ये सारी फौज को खाक़ कर देते। तीर है या मौजजा।
अब्बास – खुदा के ऐसे बंदे भी है, जो बिना गरज के हक़ पर सिर कटाते हैं।
हुसैन – ये उस पाक मुल्क के रहने वाले हैं, जहां सबसे पहले तौहीद की सदा उठी थी। खुदा से मेरी दुआ है कि इन्हें शहीदों में ऊंचा रुतबा दे। वह चिता में शोले उठे! ऐ खुदा, यह सोज इस्लाम के दिल से कभी न मिटे, इस क़ौम के लिए हमारे दिलेर हमेशा अपना खून बहाते रहें, यह बीज जो आज आग में बोया गया है, क़यामत तक फलता रहे।
चौथा दृश्य: [जैनब अपने खेमे में बैठी हुई है। शाम का वक्त।]
जैनब – (स्वगत) अब्बास और अली अकबर के सिवा अब भैया के कोई रफ़ीक बाकी नहीं रहे। सब लोग उन पर निसार हो गए। हाय, कासिम-सा जवान, मुसलिम के बेटे, अब्बास के भाई, भैया इमाम हसन के चारों बेटे, सब दाग दिए गए। देखते-देखते हरा-भरा बाग वीरान् हो गया, गुलजार बस्ती उजड़ गई। सभी माताओं के कलेजे ठंडे हुए। बापों के दिल बाग-बाग हुए। एक में ही बदनसीब नामुराद रह गई। खुदा ने मुझे भी दो बेटे दिए हैं, पर जब वे काम ही न आए, तो उनको देखकर जिगर क्या ठंडा हो। इससे तो यही बेहतर होता कि मैं बांझ ही रहती। तब यह बेवफ़ाई का दाग तो माथे पर न लगता। हुसैन ने इन लड़कों को अपने लड़कों की तरह समझा, लड़कों की तरह पाला, पर वे इस मुसीबत में, तारीकी में, साए की तरह साथ छोड़ देते हैं, दगा कर रहे हैं। हां, यह दगा नहीं, तो और क्या है? आखिर भैया अपने दिल में क्या समझ रहे होंगे। कहीं यह खयाल न करते हों कि मैंने ही उन्हें मैदान जाने से मना कर दिया है। यह खयाल न पैदा हो कि मैं उनके साथ अपनी गरज निकालने के लिए जमानासाजी कर रही थी। आह! उन्हें क्योंकर अपना दिल खोलकर दिखा दूं कि वह उनके लिए कितना बेकरार है, पर अपने लड़कों पर काबू नहीं। जाओ, जैसे तुमने मेरे मुंह में कालिख लगाई है, मैं भी तुम्हें दूध न बख्शूंगी। ये इतने कम हिम्मत कैसे हो गए। जिसका नाना रण में तूफ़ान पैदा कर देता था, जिनके बाप की ललकार सुनकर दुश्मनों के कलेजे दहल जाते थे, वे ही लड़के इतने वादे, पस्तहिम्मत हों। यह मेरी तकदीर की खराबी है, और क्या! जब रण में जाना ही नहीं, तो वे हथियार सजाकर क्यों मुझे जलाते हैं। भैया को कौन-सा मुंह दिखाऊंगी, उनके सामने आंखें कैसे उठाऊंगी।
[दोनों लड़कों का प्रवेश]
औम – अम्माजान, आप हमारा फैसला कर दीजिए। मैं पहले रण में जाता हूं, पर यह मुझे जाने नहीं देता, कहता है, पहले में जाऊंगा। सुबह से यही बहस छिड़ी हुई है, किसी तरह छोड़ता ही नहीं। बताओ, बड़े भाई के होते हुए छोटा भाई शहीद हो, यह कहां का इंसाफ है?
मुहम्मद – तो अम्माजान, यह कहां का इंसाफ है कि बड़ा भाई तो मरने जाये, और छोटा भाई बैठा उसकी लाश पर मातम करे। अम्मा, आप चाहे खुश हों या नाराज, यह तो मुझसे न होगा। शायद इनका यह खयाल हो कि मैं जग काबिल नहीं हूं। छोटा हूं, क्या जवाब दूं, लेकिन खुदा चाहेगा, तो –
एक हमले में गर हम न उलट दें सफ़े लश्कर,
फिर दूध न अपना हमें तुम बख्शियो मादर!
शह के क़दमे-पाक पै सिर देके फिरेंगे,
या रण से सिरे – शिम्रोउमर लेके फिरेंगे।
अम्माजान, आप न मेरी खातिर कीजिए न इनकी, इंसाफ़ से फरमाइये पहले किसको जाने का हक है?
जैनब – अच्छा, तुम लोगों के रण में जाने का यह मतलब था। मैं कुछ और समझ रही थी। प्यारो, तुम्हारी मां ने तुम्हारी दिलेरी पर शक किया, इसे माफ करो। मालूम नहीं, मुझे क्या हो गया था कि मेरे दिल में तुम्हारी तरफ से ऐसे बसबसे पैदा हुए। लो, मैं झगड़ा चुकाए देती हूं। तुम दोनों खुदा का नाम लेकर साथ-साथ सिधारो, और दिखा दो कि तुम किसी शब्बीर की उल्फ़त में कम नहीं हो। मेरी और मेरे खानदान की आबरू तुम्हारे हाथ है।
शेरों के लिए नंग है तलवार से डरना,
मैदान में तन-मन के सिपर सीनों को करना।
हर जख्म पै दम उलफ़ते-शब्बीर का भरना,
कुरबान गई जीने से, बेहतर है वह मरना।
दुनिया में भला इज्जते-इस्लाम तो रह जाय,
तुम जीते रहो, या न रहो, नाम तो रह जाय।
नाना की तरह कौन बगा करता है देखूं?
सिर कौन हजारों के जुदा करता है देखूं?
हक़ कौन बहुत मां का अदा करता है देखूं?
एक-एक सफ़े-जंग में क्या करता है देखूं?
दिखलाइयों हाथों से सफाई का तमाशा,
मैं परदे से देलूंगी लड़ाई का तमाशा।
यह तो मैं जानती हूं कि तुम नाम करोगे, पर कमसिन बहुत हो, इसलिए समझाती हूं। जाओ, तुम्हें खुदा को सौंपा।
[दोनों मैदान की तरफ जाकर लड़ते हैं, और जैनब परदे की आड़ से देखती है। शहरबानू का प्रवेश]
शहरबानू – है-है, बहन, यह तुमने क्या सितम किया? इन नन्हें-नन्हें बच्चों को रण में झोंक दिया। अभी अली अकबर बैठा ही हुआ है, अब्बास मौजूद ही है, ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी?
जैनब – वे किसी के रोके रुकते थे? कल ही से हथियार सजे मुंतजिर बैठे है। रात-भर तलवारें साफ की गई है और यहां आए ही किसलिए थे। जिन्दगी बाकी है, तो दोनों फिर आएंगे (मर जाने का गम नहीं, आखिर किस दिन काम आते। जिहाद में छोटे-बड़े की तमीज नहीं रहती मैं रसूल पाक को कौन मुंह दिखाती।
शहरबानू – देखो, हाय-हाय, दोनों को दुश्मनों ने किस तरह घेर रखा है। कोई जाकर बेचारों को घेर भी नहीं लेता। शब्बीर भी बैठे तमाशा देख रहे हैं। यह नहीं कि किसी को भेज दें। वे तो जरा-जरा से, पर कैसे मछलियों की तरह चमकते फिरते है! खैर, अच्छा हुआ, अब्बास दौड़े जा रहे हैं।
[अब्बास का मैदान की तरफ दौड़े हुए आना।]
जैनब – (खेमे से निकलकर) अब्बास, तुम्हें रसूल पाक की कसम है, जो उन्हें लौटा जाओ। हां, उनका दिल बढ़ाते जाओ। क्या मुझे शहादत के सवाब में कुछ भी देने का इरादा नहीं है? भैया तो इतने खुदगरज कभी न थे!
[दोनों भाई मारे जाते हैं। हुसैन और अब्बास उनकी लाश उठाने जाते हैं, और जैनब एक आह भरकर बेहोश हो जाती है।]
