Karbala novel by Munshi Premchand
Karbala novel by Munshi Premchand

छठा दृश्य: कर्बला का मैदान। एक तरफ केरात-नदी लहरें मार रही है। हुसैन मैदान में खड़े हैं। अब्बास और अली अकबर भी उनके साथ हैं।]

अली अकबर – दरिया के किनारे खेमे लगाए जाएं, वहां ठंडी हवा आएगी।

अब्बास – बड़ी फ़िजा की जगह है।

हुसैन – (आंखों में आंसू भरे हुए) भाई, लहराते हुए दरिया को देखकर खुद-बखुद दिल भरा आता है। मुझे खूब याद है कि इसी जगह एक बार वालिद मरहूम की फौज उतरी थी।

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बाबा बहुत गमगीन थे। उनकी आंखों से आंसू न थमते थे। न खाना खाते थे, न सोते थे। मैंने पूछा – “या हजरत, आप क्यों इस कदर बेताब है ?” मुझे छाती से लिपटाकर बोले – “बेटा, तू मेरे बाद एक दिन यहां आएगा, उस दिन तुझे मेरे रोने का सबब मालूम होगा। आज मुझे उनकी वह बात याद आती है। उनका रोना बेसबब नहीं था। इसी जगह हमारे खून बहाए जायेंगे, इसी जगह हमारी बहनें और बेटियां, कैद की जाएंगी, इसी जगह हमारे आदमी कत्ल होंगे, और हम जिल्लत उठाएंगे। खुदा की कसम, इसी जगह मेरी गर्दन की रगें कटेंगी और मेरी दाढ़ी खून में रंगी जायेगी। इसी जगह का वादा मेरे नाना से अल्लाहताला ने किया है, और उसका वादा तक़रीर की तहरीर है।

[गाते हैं।]

देगा जगह कोई मुश्ते गुबार को,

बैठेगा कौन लेके किसी बेकरार को।

दर सैकड़ों कफ़स में हैं, फिर भी असीर हूं,

कैसा मकां मिला है, गरीबे-दबार को।

दिल-सौज कौन है, जो न जाने के जुल्म से,

देखे मेरी बुझी हुई शमए-मज़ार को।।

आखिर है दास्तान शबे-गम कि बाद मर्ग,

करता है बंद दीदए-अख्तर शुमार को।

आवाज ए-चमन की उम्मीद और मेरे बाद –

चुप कर दिया फ़लक ने ज़बाने-बहार को।

राहत कहां नसीब कि सहराए-गम को धूप,

देती है आग हर शजरे शायादार को।

खुद आसमां को नक्शे-वफा से है दुश्मनी,

तुम क्यों मिटा रहे हो निशाने-मजार को।

इस हादिसे से कबूल कि मैं फिर कुछ न कह सकूं,

सुन लो बयान हाले-दिले बेकरार को।

[जैनब खेमे से बाहर निकल आती है।]

जैनब – भैया, यह कौन-सा सहरा है कि इसे देखकर खौफ से कलेजा मुंह को आ रहा है। बानू बहुत घबराई हुई है, और असगर छाती से मुंह नहीं लगाता।

हुसैन – बहन! यही कर्बला का मैदान है।

जैनब – (दोनों हाथों से सिर पीटकर) भैया, मेरी आंखों के तारे, तुम पर मेरी जान निसार हो। हमें तक़दीर ने यहां कहां लाके छोड़ा, क्यों कहीं और चलते?

हुसैन – बहन, कहां जाऊं? चारो तरफ से नाके बंद हैं। जियाद का हुक्म कि मेरा लश्कर यहीं उतरे। मजबूर हूं, लड़ाई में बहस नहीं करना चाहता।

जैनब – हाय भैया! यह बड़ी मनहूस जगह है। मुझे लड़कपन से यहां की खबर है। हाय भैया! इस जगह तुम मुझसे बिछुड़ जाओगे। मैं बैठी देखूंगी, और तुम बर्छियां खाओगे। मुझे मदीने भी न पहुंचा सकोगे? रसून की औलाद यहीं तबाह होगी, उनकी नामूस यहीं लूटेगी। हाय तकदीर!

इस दश्त में तुम मुझसे बिछुड़ जाओगे भाई,

गर खाक भी छानूं, तो न हाथ आवेगा भाई।

बहनों को मदीने में न पहुंचाओगे भाई,

मैं देखूगी और बरछिया तुम खाओगे भाई।

औलाद से बानू की यह छूटने की जगह है,

नामूसे-नबी की यही लूटने की जगह है।

[बेहोश हो जाती हैं। लोग पानी के छींटे देते हैं]

अली अक० – या हजरत, खेमे कहां लगाए जाये?

अब्बास – मेरी सलाह तो है कि दरिया के किनारे लगें।

हुसैन – नहीं, भैया, दुश्मन हमें दरिया के किनारे न उतरने देंगे। इसी मैदान में खेमे लगाओ, खुदा यहां भी है, और वहां भी। उसकी मर्जी पूरी होकर रहेगी।

[जैनब को औरतें उठाकर खेमे में ले जाती हैं।]

बानू – हाय-हाय! बाजीजान को क्या हो गया। या खुदा हम मुसीबत के मारे हुए हैं, हमारे हाल पर रहम कर।

हुसैन – बानू, यह मेरी बहन नहीं, मां है। अगर इस्लाम में बुतपरस्ती हराम न होती, तो मैं इसकी इबादत करता। यह मेरे खानदान का रोशन सितारा है। मुझ-सा खुशनसीब भाई दुनिया में और कौन होगा, जिसे खुदा ने ऐसी बहन अता की। जैनब के मुंह पर पानी के छींटे देते हैं।

सातवां दृश्य: [नसीमा अपने कमरे में अकेली बैठी हुई है – समय 12 बजे रात का।]

नसीमा – (दिल में) वह अब तक नहीं आए। गुलाम को उन्हें साथ लाने के लिए भेजा, वह भी वहीं का हो रहा। खुदा करे, वह आते हों। दुनिया में रहते हुए हमारे ऊपर मुल्क की हालात का असर न पड़े। मुहल्ले में आग लगी हो तो अपना दरवाजा बंद करके बैठ रहना खतरे से नहीं बचा सकता। मैंने अपने तई इन झगड़ों से कितना बचाया था, यहां तक कि अब्बाजान और अम्मा जो यजीद की बैयत न कबूल करने के जुर्म में जलावतन कर दिए गए, तब भी मैं अपना दरवाजा बंद किए बैठी रही, पर कोई तदबीर कारगर न हुई। बैयत की बला फिर गले पड़ी। वहब मेरे लिए सब कुछ करने को तैयार है। वह यजीद की बैयत भी कबूल कर लेता, चाहे उसके दिल को कितना ही सदमा हो। पर जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर अब मेरा दिन भी यजीद की बैयत की तरफ मायल नहीं होता, उससे नफरत होती है। मुसलिम कितनी बेदरदी से कत्ल किए गए हानी को जालिम ने किस बुरी तरह कत्ल कराया। यह सब देखकर अगर यजीद की बैयत कबूल कर लूं, तो शायद मेरा जमीर मुझे कभी मुआफ न करेगा। हमेशा पहलू में खलिश होती रहेगी। आह! इस खलिश को भी सह सकती हूं, पर वहब की रूहानी कोफ्त अब नहीं सही जाती। मैंने उन पर बहुत जुलम किए। अब उनकी मुहब्बत की जंजीर को और न खींचूंगी। जिस दिन से अब्बा और अम्मा निकाले गए हैं, मैंने वहब को कभी दिल से खुश नहीं देखा। उनकी वह जिंदादिली गायब हो गई। यों वह अब भी मेरे साथ हंसते हैं, गाते हैं, पर में जानती हूं, यह मेरी दिलजुई है। मैं उन्हें जब अकेले बैठे देखती हूं, तो वह उदास और बेचैन नजर आते हैं… वह आ गए, चलूं, दरवाजा खोल दूं।

[जाकर दरवाजा खोल देती है। वहब अंदर दाखिल होता है।]

नसीमा – तुम आ गए, वरना मैं खुद आती। तबियत बहुत घबरा रही थी। गुलाम कहां रह गया?

वहब – क़त्ल कर दिया गया। नसीमा, मैंने किसी को इतनी दिलेरी से जान लेते नहीं देखा। इतनी लापरवाही से कोई कुत्ते के सामने लुकमा भी न फेंकता होगा। मैं तो समझता हूं, वह कोई औलिया था। ।

नसीमा – हाय, मेरे वफ़ादार और गरीब सालिम! खुदा तुझे जन्नत नसीब करे। जालिमों ने उसे क्यों कत्ल किया?

वहब – आह! मेरे ही कारण उस गरीब की जान गई। जामा मसजिद में हजारों आदमी जमा थे। खबर है, और तहकीक खबर है कि हजरत हुसैन मक्के से बैयत लेने आ रहे हैं। जालिमों के होश उड़े हुए हैं। जो पहले बच रहे थे, उनसे अब यजीद की खिलाफत का हलफ़ लिया जा रहा है। जियाद ने जब मुझसे हलफ़ लेने को कहा, तो मैं राजी हो गया। इनकार करता तो उसी वक्त कैदखाने में डाल दिया जाता। जियाद ने खुश होकर मेरी तारीफ की, और यजीद के हामियों की सफ़ में ऊंचे दर्जे पर बिठाया, जागरीर में इजाफा किया, और कोई मंसब भी देना चाहते हैं। उसकी मंशा यह भी है कि सब हामियों को एक सफ़ में बिठाकर एकबारगी सबसे हलफ़ ले लिया जाये, इसीलिये मुझे देर हो रही थी। इसी असना में सालिम पहुंचा, और मुझे यजीदवालों की सफ़ में बैठे देखकर मुझसे बदजबानी करने लगा। मुझे दगाबाज जमानासाज बेशर्म, खुदा जाने, क्या-क्या कहा, और उसी जोश में यजीद और जियाद दोनों ही को शान में बेअदबी की। मुझे ताना देता हुआ बोला, मैं आज तुम्हारे नमक की कैद से आजाद हो गया। मुझे कत्ल होना मंजूर है, मगर ऐसे आदमी की गुलामी मंजूर नहीं, जो खुद दूसरों का गुलाम है। जियाद ने हुक्म दिया – इस बदमाश की गर्दन मार दो और, जल्लादों ने वहीं सहन में उसको कत्ल कर डाला। हाय! मेरी आंखों के सामने उसकी जान ली गई, और मैं उसके हक़ में जबान तक न खोल सका, उसकी तड़पती हुई लाश मेरी आंखों के सामने घसीटकर कुत्तों के आगे डाल दी गई, और मेरे खून में जोश न आया। आफियत बड़े महंगे दामों में मिलती है।

नसीमा – बेशक, महंगे दाम हैं। तुमने अभी बैयत तो नहीं ली?

वहब – अभी नहीं, बहुत देर हो गई, लोगों की तादाद बढ़ती जाती थी आखिर आज हलफ़ लेना मुल्तवी किया गया। कल फिर सबकी तलबी है।

नसीमा – तुम इन जालिमों को बैयत हर्गिज न लेना।

वहब – नहीं नसीमा, अब उसका मौका निकल गया।

नसीमा – मैं तुमसे मिन्नत करती हूं, हर्गिज न लेना।

वहब – तुम मेरी दिलजूई के लिए अपने ऊपर जब्र कर रही हो।

नसीमा – नहीं वहब, अगर तुम दिल से भी बैयत कबूल करनी चाहो, तो मैं खुश न हूंगी। में भी इंसान हूं वहब, निरी भेड़ नहीं हूं। मेरे दिल के जज़बात मुर्दा नहीं हुए है। मैं तुम्हें इन जालिमों के सामने सिर न झुकाने दूंगी। जानती हूं जागरी जब्त हो जायेगी, वजीफ़ा बंद हो जायेगा, जलावतन कर दिए जायेंगे। मैं तुम्हारे साथ ये सारी आफ़ते झेल लूंगी।

वहब – और अगर जालिमों ने इतने ही पर बस न की?

नसीमा – आह वहब, अगर यह होना है, तो खुदा के लिए इसी वक्त यहां से चले चलो। किसी सामान की जरूरत नहीं। इसी तरह, इन्हीं पांवों चलो। यहां से दूर किसी दरख्त के साए में बैठकर दिन काट दूंगी, पर इन जालिमों की खुशामद न करूंगी।

वहब – (नसीमा को गले लगाकर) नसीमा, मेरी जान तुझ पर फ़िदा हो। जालिमों की सख्ती मेरे हक में अकसीर हो गई। अब उस जुल्म से मुझे को शिकायत नहीं। हमारे जिस्म बारहा गले मिल चुके हैं, आज हमारी रूहें गले मिली हैं, मगर इस वक्त नाके बंद होगे।

नसीमा – जालिमों के नौकर बहुत ईमानदार नहीं होते। मैं उसे 50 दीनार दूंगी, और वहीं हमें अपने घोड़े पर सवार कराके शहर के बाहर पहुंचा देगा। वहब – सोच लो, बागियों के साथ किसी किसम की रू-रियायत नहीं हो सकती उनकी एक ही सजा है, और वह है कत्ल।

नसीमा – वहब, इंसान के दिल की कैफियत हमेशा एक-सी नहीं रहती। केंचुए से डरने वाला आदमी सांप की गर्दन पकड़ लेता है। ऐश के वंदे गुदड़ियों में मस्त हो जाते हैं। मैंने समझा था, जो खतरा है, घोंसलों से बाहर निकलने में है, अंदर बैठे रहने में आराम-ही-आराम है। पर अब मालूम हुआ कि सैयाद के हाथ घोंसले के अंदर भी पहुंच जाते हैं। हमारी नजात जमाना से भागने में नहीं, उसका मुकाबला करने में है। तुम्हारी सोहबत ने, मुल्क की हालत ने, कौम के रईसों और अमीरों की पस्ती ने, मुझ पर रोशन कर दिया कि यहां इत्मीनान के मानी ईमान-फ़रोशी और आफ़ियत के मानी हककुशी हैं। ईमान और हक़ की हिफ़ाजत असली आफियत और इत्मीनान है। शायद ने खूब कहा है –

लुफ्त मरने में है बाकी न मज़ा जीने में,

कुछ अगर है, तो यही खूने-जिगर पीने में।

वहब – मुआफ करो नसीमा, मैंने तुम्हें पहचानने में गलती की। चलो, सफ़र का सामान करें।