तेरहवां दृश्य: [प्रातः काल का समय। जियाद का दरबार। मुसलिम को कई आदमी मुश्क कसे लाते हैं] मुस० – मेरा उस पर सलाम है, जो हिदायत पर चलता है, आकबत से डरता है, और सच्चे बादशाह की बंदगी करता है। चोबदार – मुसलिम! अमीर को सलाम करो। मुस० – चुप रह। अमीर, मेरा मालिक, मेरा […]
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कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -11
बारहवाँ दृश्य: [9 बजे रात का समय। मुसलिम एक अंधेरी गली में खड़े हैं। थोड़ी दूर पर एक चिराग जल रहा है। तौआ अपने मकान के दरवाजे पर बैठी हुई है।] मुस० – (स्वागत) उफ्! इतनी गरमी मालूम होती है कि बदन का खून आग हो गया। दिन-भर गुजर गया, कहीं पानी का एक बूंद […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -10
दसवाँ दृश्य: [संध्या का समय। जियाद का दरबार] जियाद – तुम लोगों में ऐसा एक आदमी भी नहीं है, जो मुसलिम का सुराग लगा सके। मैं वादा करता हूं कि पांच हजार दीनार उसकी नज़र करूंगा। एक दर० – हुजूर, कहीं सुराग नहीं मिलता। इतना पता तो मिलता है कि कई हजार आदमियों ने उनके […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -9
आठवाँ दृश्य: [नौ बजे रात का समय। कूफ़ा की जामा मसजिद। मुसलिम, मुख्तार, सुलेमान और हानी बैठे हुए हैं। कुछ आदमी द्वार पर बैठे हुए हैं।] सुले० – अब तक लोग नहीं आए? हानी – अब जाने की कम उम्मीद है। मुस० – आज जियाद का लौटना सितम हो गया। उसने लोगों को वादों के […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -8
छठा दृश्य: (संध्या का समय। सूर्यास्त हो चुका है। कूफ़ा का शहर – कोई सारवान ऊँट का गल्ला लिए दाखिल हो रहे हैं।) पहला – यार गलियों से चलना, नहीं तो किसी सिपाही की नज़र पड़ जाये, तो महीनों बेगार झेलनी पड़े। । दूसरा – हाँ हाँ, वे बला के मूजी है। कुछ लादने को […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -7
पांचवां दृश्य: [यजीद का दरबार। मुआविया बेड़ियां पहने हुए बैठे हुआ है। चार गुलाम नंगी तलवारें लिए उसके चारों तरफ़ खड़े हैं। यजीद के तख्त के करीब सरजून रूमी बैठा हुआ है।] मुआ० – (दिल में) नबी की औलाद पर यह जुल्म! मुझी से तो इसका बदला लिया जायेगा। बाप का कर्ज बेटे ही की […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -6
तीसरा दृश्य: [कूफ़ा की अदालत – काजी और अमले बैठे हुए हैं। काज़ी के सिर पर अमामा है, बदन पर कबा, कमर में कमरबंद, सिपाही नीचे कुरते पहने हुए हैं। अदालत से कुछ दूर पर मसजिद है मुकद्दमें में पेश हो रहे हैं। कई आदमी एक शरीफ़ आदमी की मुश्कें कसे लाते हैं।] काज़ी – […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -5
पहला दृश्य: {हुसैन का काफिला मक्का के निकट पहुंचता है। मक्का की पहाड़ियां नजर आ रही हैं। लोग काबा की मसजिद के द्वार पर हुसैन का स्वागत करने को खड़े हैं। हुसैन – यह लो, मक्काशरीफ़ आ गया। यही वह पाक मुकाम है, जहां रसूल ने दुनिया में कदम रखे। ये पहाड़ियां रसूल के सिजदों […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -4
छठा दृश्य : (समय-संध्या। कूफ़ा शहर का एक मकान। अब्दुल्लाह, कमर, वहब बातें कर रहें हैं।) अब्दु० – बड़ा गजब हो रहा है। शामी फ़ौज के सिपाही शहरवालों को पकड़-पकड़ जियाद के पास ले जा रहे हैं, और वहां जबरन उनसे बैयत ली जा रही है। कमर – तो लोग क्यों उसकी बैयत कबूल करते […]
कर्बला – मुंशी प्रेमचंद -3
पाँचवां दृश्य: (समय – आधी रात। हुसैन और अब्बास मसजिद के सहन में बैठे हुए हैं।) अब्बास – बड़ी खैरियत हुई, वरना मलऊन ने दुश्मनों का काम ही तमाम कर दिया था। हुसैन – तुम लोगों की जतन बड़े मौके पर काम आई। मुझे गुमान न था कि ये सब मेरे साथ इतनी दगा करेंगे। […]
