karbala Novel by Munshi Premchand
karbala Novel by Munshi Premchand

तीसरा दृश्य: [कूफ़ा की अदालत – काजी और अमले बैठे हुए हैं। काज़ी के सिर पर अमामा है, बदन पर कबा, कमर में कमरबंद, सिपाही नीचे कुरते पहने हुए हैं। अदालत से कुछ दूर पर मसजिद है मुकद्दमें में पेश हो रहे हैं। कई आदमी एक शरीफ़ आदमी की मुश्कें कसे लाते हैं।]

काज़ी – इसने क्या खता की है?

ए० सि० – हुजूर, यह आदमी मसजिद में खड़ा लोगों से कह रहा था कि किसी को फौज में न दाखिल होना चाहिए।

कर्बला नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- कर्बला भाग-1

काज़ी – गवाह है?

ए० आ० – हुजूर, मैंने अपने कानों सुना है।

का० – इसे ले जाकर कत्ल कर दो।

मुल० – हुजूर, बिलकुल बेगुनाह हूं। ये दोनों सिपाही मेरी दुकान से कपड़े उठाए लाते थे। मैंने छीन लिया, इस पर इन्होंने मुझे पकड़ लिया। हुजूर मेरे पड़ोस के दुकानदारों से पूछ लें। बेगुनाह मारा जा रहा हूं। मेरे बाल-बच्चे तबाह हो जायेंगे।

का० – इसे यहां से हटाओ।

मुल० – (चिल्लाकर) या रसूल, तुम कयामत के लिये मेरा और इस कातिल का फैसला करना।

[दोनों सिपाही उसे ले जाते हैं। मसजिद की तरफ़ से आवाज़ आती है।]

“या खुदा, हम बेकस तेरी बारगाह में फ़रियाद करने आए हैं। हमें जालिम के फंदे से आज़ाद कर।”

[चार सिपाही 15-20 आदमियों की मुश्के कसे कोड़े मारते हुए लाते हैं।]

का० – इन पर क्या इलजाम है?

ए० सि० – हुजूर, ये उन आदमियों में से हैं, जिन्होंने हुसैन के पास क़ासिद भेजे थे।

का० – संगीन जुर्म है। कोई गवाह?

ए० सि० – हुजूर, कोई गवाह नहीं मिलता। शहरवालों के डर के मारे कोई गवाही देने पर राजी नहीं होता।

का० – इन्हें हिरासत में रखो, और जब गवाह मिल जायें, तो फिर पेश करो।

(सिपाही उन आदमियों को ले जाते हैं। फिर दो सिपाही एक औरत की दोनों कलाइयां बांधे हुए लाते हैं। )

का० – इस पर क्या इल्जाम है?

ए० सि० – हुजूर, जब हम लोग उन मुलजिमों को गिरफ्तार कर रहे थे, जो अभी गए हैं, तो इसने खलीफा को जालिम कहा था।

का – गवाह?

ए० औरत – हुजूर खुदा इसका मुंह न दिखाए, बड़ी बदजबान है।

का० – इसका मकान जब्त कर लो, और इसके सर के बाल नोच लो।

मु० औ० – खुदाबंद, मेरी आंखें फुट जायें, जो मैंने किसी को कुछ कहा हो। यह औरत मेरी सौत है। इसने डाह से मुझे फंसा दिया है। खुदा गवाह है कि मैं बेकसूर हूं।

का० – इसे फौरन् ले जाओ।

एक युवक – (रोता हुआ) या काजी, मेरी मां पर इतना जुल्म न कीजिए। आप भी तो किसी मां के बच्चे हैं। अगर कोई आपकी मां के बाल नोंचवाता, तो आपके दिल पर क्या गुजरती?

का० – इस मलऊन को पकड़कर दो सौ दुर्रे लगाओ।

[कई सिपाही आदमियों के गोल को बांधे हुए लाते हैं।]

का० – इन्होंने खुदा के किस हुक्म को तोड़ा है?

ए०सि० – हुजूर, ये सब आदमी सामनेवाली मसजिद में खड़े होकर रो रहे थे।

का० – रोना कुफ्र है, इन सबों की आँखें फोड़ डाली जाये।

[सैकड़ों आदमी मसजिद की तरफ से तलवारें और भाले लिए दौड़े आते हैं, और अदालत को घेर लेते हैं।]

सुलेमान – कत्ल कर दो इस मरदूद मक्कार को, जो अदालत के मसनद पर बैठा हुआ अदालत का खून कर रहा है।

भूसा – नहीं, पकड़ लो। इसे जिंदा जलाएंगे।

[कई आदमी काजी पर टूट पड़ते हैं। ]

का० – शरा के मुताबिक मुसलमान पर मुसलमान का खून हराम है।

सुले० – तू मुसलमान नहीं! इन सिपाहियों में से एक भी न जाने पाए।

ए० सि० – या सुलेमान, हमारी क्या खता है! जिस आका के गुलाम हैं, उसका हुक्म न मानें, तो रोटियां क्योंकर चलें?

भूसा – जिस पेट के लिए तुम्हें खुदा के बंदों का ईजा पहुंचानी पड़े, उसको चाक कर देना चाहिए।

[सिपाहियों और बागियों में लड़ाई होने लगती है।]

सुले० – भाइयों, आपने इन जालिमों के साथ वहीं सलूक किया, जो वाजिब था, मगर भूल न जाइए कि जियाद इसकी इत्तला यजीद को जरूर देगा, और हमें कुचलने के लिए शाम से फ़ौज आएगी। आप लोग उसका मुकाबला करने को तैयार है?

[एक आवाज]

“अगर तैयार नहीं हैं तो हो जायेंगे।”

सुले० – हमने अभी तक यजीद की बैयत नहीं कबूल की, और न करेंगे। इमाम हुसैन की खिदमत में बार-बार क़ासिद भेजे गए, मगर वह तशरीफ नहीं लाए। ऐसी हालत में हमें क्या करना चाहिए?

हानी – इसमें से चंद खास आदमी खुद जायें और उन्हें साथ लाएं।

मुख्तार – हम लोगों ने रसूल की औलाद के साथ बार-बार ऐसी दगा की है कि हमारा एकबार उठ गया। मुझे खौफ़ है कि हज़रत हुसैन यहां हर्गिज न आएंगे।

सुले० – एक बार आखिरी कोशिश करना हमारा फर्ज है। हम लोग चल कर उनसे अर्ज करें कि हम कत्ल किए जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं, हमारी औरतों की आबरू भी सलामत नहीं। हमारी मुसीबत की कहानी सुनकर हुसैन को जरूर तरस आएगा, उनका दिल इतना सख्त नहीं हो सकता।

मुख्तार – मगर वह आपकी मुसीबतों पर तरस खाकर आएं, और तुमने उनकी मदद न की, तो सब-के-सब रूस्याह कहलाओगे। हमने पहले जो दवाएं की हैं, उनका फल पा रहे हैं, और फिर वहीं हरकत की, तो हम दुनिया और दीन में कहीं भी मुंह न दिखा सकेंगे। खूब सोच लो, आखिर तक तुम अपने इरादे पर कायम रह सकोगे। अगर तुम्हारा दिल हामी भरे, तो मैं दावे से कह सकता हूं कि उन्हें खींच लाऊंगा। लेकिन अगर तुम्हारे दिल कच्चे हैं, तुम अपनी जानें निसार करने को तैयार नहीं हो, अगर तुम्हें खौफ़ है कि तुम लालच के शिकार बन जाओगे, तो तुम उन्हें मक्के में पड़े रहने दो।

हज्जाज – खुदा की कसम, हम उनके पैरों पर अपनी जानें निछावर कर देंगे।

हारिस – हम अपनी बदनामी का दाग मिटा देंगे।

मुख्तार – खुदा की हाजिर जानकर वादा करो कि अपने कौल पर कायम रहोगे।

[कई आदमी एक साथ]

“अल्लाहोअकबर! हम हुसैन पर फ़िदा हो जायेंगे।”

सुले० – तो मैं उनकी खिदमत में खत लिखता हूं।

[खत लिखता है।]

हज्जाज – इतना जरूर लिख देना कि हम आपके नाना मुहम्मद मुस्तफा का वास्ता देकर आपसे अर्ज करते हैं कि हमारे ऊपर कीजिए।

हारिस – यह और लिख देना कि हम बेशुमार अर्जिया आपकी खिदमत में भेज चुके, और आप तशरीफ न लाए। अगर आप अब भी न आए, तो हम कल कयामत के रोज रसूल के हजूर में आपका दामन पकड़ेंगे।

हज्जाज – और कहेंगे या खुदा, हुसैन ने हम पर जुल्म किया था। क्योंकि हम पर जुल्म होते देखकर वह खामोश बैठे रहे, तो उसे वक्त आप क्या जवाब देंगे, और रसूल को क्या मुंह दिखाएंगे।

कीस – मेरे क़बीले में एक हज़ार जवान हैं, जो हुसैन के इंतजार में बैठे हुए हैं।

हज्जाज – शायद शाम तक जियाद कुछ आदमी जमा कर ले।

हारिस – अभी वह खामोश रहेगा। यजीद की फ़ौज आ जायेगी, तब हमारे ऊपर हमला करेगा।

शिमर – क्यों न लगे हाथ उसका भी खातमा कर दें, किस्सा पाक हो।

हारिस – वाह, अब तक वह यहां बैठा होगा?

सुले० – मैंने सारी दास्तान लिख दी। कौन इस खत को ले जायेगा।

शिमर – मैं हाजिर हूं।

सुले० – किसके पास ऐसी सांड़नी है, जो थकान न जानती हो, जो इस तरह दौड़ सकती हो, जैसे जियाद लूट के माल की तरफ?

एक युवक – मेरे पास ऐसी सांड़नी है, जो तीन दिन में इस खत का जवाब ला सकती है। यह खिदमत बजा लाने का हक मेरा है, क्योंकि मुझसे ज्यादा मजलूम और कोई न होगा, जिसकी मां के बाल काजी के हुक्म से अभी-अभी नीचे गए है।

सुले० – बेशक, तुम्हारा हक सबसे ज्यादा है। यह खत लो, और इसके पहले कि हमारा पसीना ठंडा हो, मक्का की तरफ रवाना हो जाओ।

[युवक चला जाता है]

आइए, हम लोग मसजिद में नमाज अदा कर लें। खत का जवाब तीन दिन में आएगा। हजरत हुसैन के आने में अभी एक महीने की देर है। जियाद भी शायद उसके पहले नहीं लौट सकता। ये दिन हमें तैयारियों में सर्फ करने चाहिए, क्योंकि यजीद की खिलाफत का फैसला कूफा में होगा या तो वह खिलाफत के मसनद पर बैठेगा, या जाहिलों की इबादत का मजार बनेगा। अगर कूफ़ा ने खिलाफ़त को नबी के खानदान में वापस कर दिया, तो उसका नाम हमेशा रोशन रहेगा।

[सब जाते हैं।]

चौथा दृश्य: [स्थान – काबा, मरदाना बैठक। हुसैन, जुबेर, अब्बास, मुसलिम अली असगर आदि बैठे दिखाई देते हैं।]

हुसैन – यह पांचवीं सफ़ारत है। एक हजार से ज्यादा खतूत आ चुके हैं। उन पर दस्तखत करने वालों की तादाद पंद्रह हजार से कम नहीं है।

मुस० – और सभी बड़े-बड़े कबीलों के सरदार हैं। सुलेमान, हारिस, हज्जाज, शिमर, मुख्तार, हानी, ये मामूली आदमी नहीं हैं।

जुबेर – मैं तो अर्ज कर चुका कि मुसल्लम ईराक आपकी बैयत कबूल करने के लिये बेकरार है।

हुसैन – मुझे तो अभी तक उनकी बातों पर एतबार नहीं होता। खुदा जाने, क्यों मेरे दिल में उनकी तरफ से दगा का शुबहा घुसा हुआ है। मुझे हबीब की बातें नहीं भूलती, जो उसने चलते-चलते कही थी।

मुस० – गुस्ताखी तो है, पर आपका उन पर शक करना बेजा है। आखिर आप उनकी वफ़ादारी का और क्या सबूत चाहते हैं? वे कसमें खाते हैं, वादे करते हैं, साफ़ लिखते हैं कि आपकी मदद के लिये बीस हजार सूरमा तैयार बैठे हुए हैं। अब और क्या चाहिए?

जुबेर – कम-से-कम मैं तो ऐसे सबूत पाकर पल की भी देर न करता।

अब्बास – मुझे तो इन कूफ़ियों पर उस वक्त भी एतबार न आएगा, अगर उनके बीसों हजार आदमी यहाँ आकर आपकी बैयत की कसम खा लें। अगर वह कुरान शरीफ़ हाथ में लेकर कसमें खायें, तो भी मैं उनसे दूर भागूं।

[तारिक आता है।]

तारिक – अस्सलाम अलेक या हुसैन।

हुसैन – खुदा तुम पर रहमत करे। कहां से आ रहे हो?

तारिक – कूफ़ा के मजलूमों ने अपनी फ़रियाद सुनाने के लिये आपकी खिदमत में भेजा है। आफ़ताब डूबते चला था, और आफ़ताब डूबते आया हूं, और आफ़ताब निकलने के पहले यहां से जाना है।

मुस० – हवा पर आए हो या तख्तए-सुलेमान पर? कसम है पाक रसूल की कि मैं उस घोड़े के लिये पांच हजार दीनार पेश कर सकता हूं।

तारिक – हुजूर, घोड़ी नहीं, सांड़नी है, जो सफ़र में खाना और थकना नहीं जानती।

(हुसैन के हाथ में खत देता है)

हुसैन – (खत पढ़कर) आह, कितना दर्द-भरा खत है। जालिमों ने दिल निकालकर रख दिया है। यह कितना गजब का जुमला है कि अगर आप न आएंगे, तो हम आकवत में आपसे इंसाफ़ का दावा करेंगे। आह! उन्होंने नाना का वास्ता दिया है। मैं नाना के नाम पर अपनी जान को यों फ़िदा कर सकता हूं, जैसे कोई हरीस अपना ईमान फ़िदा कर देता है। इतना जुल्म! इतनी सख्ती! दिन-दहाड़े लूट! ! दिन-दहाड़े औरतों की बेआबरूई! जरा-जरा-सी बातों पर लोगों का कत्ल किया जाना! अब्बास, अब मुझे सब की ताब नहीं है। मैं अपनी बैयत के लिये हर्गिज न जाता, पर मुसीबतजदों की हिमायत के लिये न जाऊं, यह मेरी गैरत गंवारा नहीं करती।

मुस० – या बिरादर, आप इसका कुछ गम न करें, मैं इसी कासिद के साथ वहां जाऊंगा और वहां की कैफियत की इत्तिला दूंगा। मेरा खत देखकर आप मुनासिब फैसला कीजिएगा।

हुसैन – तब तक यजीद उन गरीबों पर खुदा जाने क्या-क्या सितम ढाए। उसका अजाब मेरी गर्दन पर होगा। सोचो, जब कयामत के दिन वे लोग फ़रियादी होंगे, तो मैं नाना को क्या मुंह दिखाऊंगा। जब वह मुझसे पूछेंगे कि तुझे जान इतनी प्यारी थी कि तूने मेरे बंदों पर जुल्म होते देखे, और खामोश बैठा रहा, उस वक्त मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा। मुसलिम, मेरा जी चाहता है कि मैं भी तुम्हारे साथ चलूं।

मुस० – मुझे तो इसका यकीन है कि सुलेमान – जैसा आदमी कभी दगा नहीं कर सकता।

जुबेर – हर्गिज नहीं।

मुस० – पर मैं यही मुनासिब समझता हूं कि पहले वहां जाकर अपना इत्मीनान कर लूं।

मुस० – बच्चों को गैव का इल्म होता है। इसका फैसला अली असगर पर छोड़ दिया जाये। क्यों बेटा, मैं भी मुसलिम के साथ जाऊं, या उनके खत का इंतजार करूं।

अली अस० – नहीं अब्बाजान, अभी मुसलिम चाचा ही को जाने दीजिए। आप चलेंगे, तो कई दिन तैयारियों में लग जायेंगे। ऐसा न हो, इतने दिनों में वे बेचारे निराश हो जायें।

अब्बास – बेटा, तेरी उम्र दराज हो। तूने खूब फैसला किया। खुदा तुझे बुरी नजर से बचाए।

हुसैन – अच्छी बात है, मुसलिम, तुम सबेरे रवाना हो जाओ। अपने साथ पांच गुलाम लेते जाओ। रास्ते में शायद इनकी जरूरत पड़े। मैं कूफ़ावालों के नाम यह खत लिख देता हूं, उन्हें दिखा देना। इंशा अल्लाह, हम तुमसे जल्दी ही मिलेंगे। वहां बड़े एहतियात से काम लेना, अपने को छिपाए रखना, और किसी ऐसे आदमी के घर उतरना, जो सबसे एतबार के लायक हो। मेरे पास एक खत रोजाना भेजना।

मुस० – खुदा से दुआ कीजिए कि वह मेरी हिदायत करे। मैं बड़ी भारी जिम्मेदारी लेकर जा रहा हूं। सुबह की नमाज पढ़कर मैं रवाना हो जाऊंगा। तब तक तारिक की साड़नी भी आराम कर लेगी।

[हुसैन खत लिखकर मुसलिम को देते हैं। मुसलिम दरवाजे की तरफ़ चलते हैं।]

हुसैन – (मुसलिम के साथ दरवाजे तक आकर) रात तो अंधेरी है।

मुस० – उम्मीद की रोशनी तो दिल में है।

हुसैन – (मुसलिम से बगलगीर होकर) अच्छा भैया, जाओ। मेरा दिल तुम्हारे साथ रहेगा। जो कुछ होने वाला है, जानता हूं। इसकी खबर मिल चुकी है। तकदीर से कोई चारा नहीं, नहीं जानता, यह तकदीर क्या है! अगर खुदा का हुक्म है, तो छुपकर, सूरत बदलकर, दगाबाजों की तरह क्यों आती है। खुदा क्या साफ़ और खुले एक अल्फ़ाज में अपना हुक्म नहीं भेजता। अपने बेकस बच्चों का शिकार टट्टी की आड़ से क्यों करता है। जाओ, कहता हूं, पर जी चाहता है, न जाने दूं। काश, तुम कह देते कि मैं न जाऊंगा। मगर तक़दीर ने तुम्हारी जबान बंद कर रखी है। अच्छा, रूखसत। उम्मीद है कि अल्लाह हम दोनों को एक साथ शहादत का दर्जा देगा।

[मुसलिम बाहर चला जाता है। हुसैन आंखें पोंछते हुए हरम में दाखिल होते हैं।]

जैनब – भैया, आज फिर कोई क़ासिद आया था क्या?

हुसैन – हां जैनब, आया था। यजीद कूफ़ावालों पर बड़ा जुल्म कर रहा है। मेरा वहां जाना लाजिमी है। अभी तो मैंने मुसलिम को वहां भेज दिया है, पर खुद भी बहुत जल्द आना चाहता हूं।

जैनब – आपके एकाएक क्यों अपनी राय बदल दी? कम-से-कम मुसलिम के खत के आने का इंतजार कीजिए। मैं तो आपको हरगिज न जाने दूंगी। आपको वह ख्वाब याद है, जो आपने रसूल की कब्र पर देखा था?

हुसैन – हां जैनब, खूब याद है, इसी वजह से मैं जाने की जल्दी कर रहा हूं। उस ख्वाब ने मेरी तक़दीर को मेरे सामने खोलकर रख दिया। तक़दीर से बचने की भी कोई तदबीर है? खुदा का हुक्म भी टल सकता है। खिलाफ़त की तमन्ना को दिल से मिटा सकता हूं, पर गैरत को तो नहीं मिटा सकता, बेकसों की इमदाद से तो मुंह नहीं मोड़ सकता।

शहर० – आप जो कुछ करते हैं, उसमें खुदा और तक़दीर को क्यों खींच लाते हैं। जब आपको मालूम है कि कूफ़ा में लोग आपके साथ दगा करेंगे, तो वहां जाइए ही क्यों? तकदीर आपको खींच तो न ले जाएगी? बेकसों की इमदाद जरूर आपका और आप ही का नहीं, हरएक इंसान का फर्ज है, लेकिन आपके कुन्बे की भी तो कोई खबर लेने वाला हो? इंसान पर दुनिया से पहले खानदान का हक होता है।

हुसैन – ज़रा इस खत को पढ़ लो और तब कहो कि मैंने जो फैसला किया है, वह मुनासिब है या नहीं। (शहरबानू के हाथ के खत देकर) देखा! इससे क्या साबित होता है? लेकिन जितने आदमियों ने इस पर दस्तखत किए हैं, उसके आधे भी मेरे साथ हो जायेंगे, तो मैं यजीद का काफ़िया तंग कर दूंगा। इस्लाम की खिलाफ़त इतना आला रुतबा है कि उसकी कोशिश में जान दे देना भी जिल्लत नहीं। जब मेरे हाथों में एक स्याहकार बैदीन आदमी को सजा देने का मौका आया है, तो उससे फायदा न उठाना पहले सिरे की पस्तहिम्मती है। घर में आग लगते देखकर उसमें कूद पड़ना नादानी है, लेकिन पानी मिल रहा हो, तो उनसे आग को न बुझाना उनसे भी बड़ी नादानी है।

सकीना – मगर अब्बाजान, अब तो मुहर्रम का महीना आ रहा है। फूफ़ीजान की बहुत दिनों से आरजू थी कि इस महीने में यहां रहती।

हुसैन – तुम लोगों को ले जाने का मेरा इरादा नहीं है।

जैनब – भैया, ऐसा भी हो सकता है कि आप वहां जायें, और हम यहां रहें! खुदा जाने, कैसी पड़े, कैसी न पड़े।

सकीना – अब्बाजान दिल्लगी करते हैं, और आप लोग सच समझ गई।

कुलसूम – और कोई चले, चाहे न चले, मैं तो ज़रूर ही जाऊंगी। मेरे दिल से लगी हुई है कि एक बार यजीद को खूब आड़े हाथों लेती।

सकीना – मैं अपनी फतह का कसीदा लिखने के लिए बेताब हूं।

शहर० – आप समझते हैं कि हमारे साथ रहने से आपको तरद्दुद होगा, पर मैं पूछती हूं, आपको वहां फंसाकर दुश्मनों ने इधर हमला कर दिया, तो हमारी हिफ़ाजत की फिक्र आपको चैन लेने देगी?

जैनब – असगर हुड़क-हुड़ककर जान दे देगा।

सकीना – हम अपने ऊपर इस बदनामी का दाग नहीं लगा सकती कि रसूल के बेटे ने तो इस्लाम की हिमायत में जान दी, और बेटियां हरम में बैठी रहीं।

हुसैन – (स्वगत) शहरबानू ने मार्के की बात कही, अगर दुश्मनों ने हरम पर हमला कर दिया, तो हम वहां बेठे-बैठे क्या कर लेंगे? इन्हें यहां छोड़ देना अपने किले की दीवार में शिगाफ़ कर देने से कम खतरनाक नहीं। (प्रकट) नहीं, मैं तो तुम लोगों पर जब्र नहीं करता, अगर चलना चाहती हो, तो शौक़ से चलो।