karbala Novel by Munshi Premchand
karbala Novel by Munshi Premchand

छठा दृश्य : (समय-संध्या। कूफ़ा शहर का एक मकान। अब्दुल्लाह, कमर, वहब बातें कर रहें हैं।)

अब्दु० – बड़ा गजब हो रहा है। शामी फ़ौज के सिपाही शहरवालों को पकड़-पकड़ जियाद के पास ले जा रहे हैं, और वहां जबरन उनसे बैयत ली जा रही है।

कमर – तो लोग क्यों उसकी बैयत कबूल करते हैं?

कर्बला नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- कर्बला भाग-1

अब्दु – न करें, तो करें। अमीरों और रईसों को तो जागीर और मंसब की हवस ने फोड़ लिया। बेचारे गरीब क्या करें। नहीं बैयत लेते, तो मारे जाते है, शहरबदर किए जाते हैं। जिन गिने-गिनाए रईसों ने बैयत नहीं ली, उन पर भी संख्ती करने की तैयारियां हो रही है। मगर जियाद चाहता है कि कूफ़ावाले आपस ही में लड़ जाएं। इसीलिए उसने अब तक कोई सख्ती नहीं की है।

कमर – यजीद को खिलाफ़त का कोई हक तो है नहीं, महज तलवार का जोर है। शरा के मुताबिक हमारे खलीफा हुसैन हैं।

अब्दु० – वह तो जाहिर ही है, मगर यहां के लोगों को जो जानते हो न। पहले तो ऐसा शोर मचाएंगे, गोया जान देने पर आमादा हैं, पर ज़रा किसी ने लालच दिखलाया, और सारा शोर ठंडा हो गया! गिने हुए आदमियों को छोड़कर सभी बैयत ले रहे हैं।

कमर – तो फिर हमारे ऊपर भी तो वहीं मुसीबत आनी है।

अब्दु० – इसी फिक्र में तो पड़ा हूं। कुछ सूझता ही नहीं।

कमर – सूझना ही क्या है। यजीद की बैयत हर्गिज मत कबूल करो।

अब्दु० – अपनी खुशी की बात नहीं है।

कमर – क्या होगा?

अब्दु० – वजीफ़ा बंद हो जायेगा।

कमर – ईमान के सामने वजीफे की कोई हस्ती नहीं।

अब्दु० – जागीर ज्यादा नहीं, तो परवरिश तो हो ही जाती है। वह फौरन छिन जाएंगी। कितनी मेहनत से हमने मेवों का बाग लगाया है। यह कब गंवारा होगा कि हमारी मेहनत का फल दूसरे खायें। कलाम पाक की कलम, मेरे बाग पर बड़ों-बड़ों को रश्क है।

कमर – बाग के लिए ईमान बेचना पड़े, तो बाग की तरफ़ आंख उठाकर देखना भी गुनाह है।

अब्दु० – कमर, मामला इतना आसान नहीं है, जितना तुमने समझ रखा है। जायदाद के लिए इंसान अपनी जान देता है, भाई-भाई दुश्मन हो जाते है, बाप-बेटों में, मियां बीवी में तिफ़ाक पड़ जाता है। अगर उसे लोग इतनी आसानी से छोड़ सकते, तो दुनिया जन्नत बन जाती है।

कमर – यह सही है, मगर ईमान के मुकाबले जायदाद ही की नहीं, जिंदगी की भी कोई हस्ती नहीं। दुनिया की चीजें एक दिन छूट जाएंगी, मगर ईमान हो हमेशा साथ रहेगा।

अब्दु० – शहरबदर होना पड़ा। तो यह मकान हाथ से निकल जाएगा। अभी पिछले साल बनकर तैयार हुआ है। देहातों में, जंगल में बद्दुओं की तरह मारे-मारे घूमना पड़ेगा। क्या जला-वतनी कोई मामूली चीज है?

कमर – दीन के लिए लोगों से सल्तनतें तर्क कर दी हैं, सिर कटाए हैं, और हंसते-हंसते सूलियों पर चढ़ गए हैं। दीन की दुनिया पर हमेशा जीत रही है, और रहेंगी।

अब्दु० – वहब अपनी अम्माजान की बातें सुन रहे हो?

वहब – जी हां, सुन रहा हूं, और दिल में फ़ख्र कर रहा हूं कि मैं ऐसी दीन-परवर मां का बेटा हूं। मैं आपसे सच अर्ज करता हूं कि कीस, हज्जाज, हुर, अशअस जैसे रऊसा को बैयत कबूल करते देखकर मैं भी नीम राजी हो गया था, पर आपकी बातों ने हिम्मत मजबूत कर दी। अब मैं सब कुछ झेलने को तैयार हूं।

अब्दु० – वहब, दीन हम बूढ़ों के लिए है, जिन्होंने दुनिया के मजे उठा लिए। जवानों के लिए दुनिया है। तुम अभी शादी करके लौटे हो, बहू की चूड़ियां भी मैली नहीं हुई। जानते हो, वह एक रईस की बेटी है, नाजों में पली है, क्या उसे भी खानावीरानी की मुसीबतों में डालना चाहते हो? हम और कमर तो हज करने चले जायेंगे। तुम मेरी जायदाद के वारिस हो, मुझे यह तसकीन रहेगा कि मेरी मिहनत रायगां नहीं हुई। तुमने मां को नसीहत पर अमल किया, तो मुझे बेहद सदमा होगा। पहले जाकर नसीमा से पूछो तो?

वहब – मुझे अपने ईमान के मामले में किसी से पूछने की जरूरत नहीं। मुझे यकीन है कि खिलाफत के हकदार हजरत हुसैन हैं। यजीद की बैयत कभी न कबूल करूंगा, जायदाद रहे या न रहे, जान रहे या न रहे।

कमर – बेटा, तेरी मां तुझ पर फिदा ही, तेरी बातों ने दिल खुश कर दिया। आज मेरी जैसी खुशनसीब मां दुनिया में न होगी। मगर बेटा, तुम्हारे अब्बाजान ठीक कहते हैं, नसीमा से पूछ लो, देखो, वह क्या कहती है। मैं नहीं चाहती कि हम लोगों की दीन-परवरी के वाइस उसे तकलीफ हो, और जंगलों की खाक छाननी पड़े। उसकी दिलजोई करना तुम्हारा फर्ज है।

वहब – आप फरमाती हैं, तो मैं उससे भी पूछ लूंगा। मगर में साफ़ कहें देता हूं कि उसकी रजा का गुलाम न बनूंगा। अगर उसे दीन के मुकाबले में ऐश व आराम ज्यादा पसंद है, तो शौक से रहे, लेकिन मैं बैयत की जिल्लत न उठाऊंगा।

(दरवाजा खोलकर बाहर चला जाता है।)

सातवां दृश्य: (अरब का एक गांव – एक विशाल मंदिर बना हुआ है, तालाब है, जिसके पक्के घाट बने हुए हैं, मनोहर बगीचा, मोर, हिरण, गाय आदि पशु-पक्षी इधर-उधर विचर रहे हैं। साहसराय और उनके बंधु तालाब के किनारे संध्या-हवन, ईश्वर-प्रार्थना कर रहे हैं।)

गाना (स्तुति)

हरि, धर्म प्राण से प्यारा हो।

अखिलेष, अनंत विधाता हो, मंगलमय, मोदप्रदाता हो;

भय-भंजन शिव जन-त्राता हो, अविनाशी अद्भुत ज्ञाता हो।

तेरा ही एक सहारा हो;

हरि धर्म प्राण से प्यारा हो।

बल, वीर्य, पराक्रम त्वेष रहे, सद्धर्म धरा पर शेष रहे;

श्रुति-भानु, एकांत-वेश रहे, धन-ज्ञान-कला-युत देश रहे।

सर्वत्र प्रेम की धारा हो;

हरि, धर्म प्राण से प्यारा हो।

भारत तन-मन-धन सारा हो, उसकी सेवा सब द्वारा हो;

निज मान-सम्मान दुलारा हो, सबकी आंखों का तारा हो।

जीवन-सर्वस्व हमारा हो;

हरि, धर्म प्राण से प्यारा हो।

(साहसराय प्रार्थना करते हैं।)

भगवान्, हमें शक्ति प्रदान कीजिए कि सदैव अपने व्रत का पालन करें। अश्वत्थामा की संतान का, निरंतर सेवामार्ग का अवलंबन करें, उनका रक्त सदैव दोनों की रक्षा में बहता रहे, उनके सिर सदैव न्याय और सत्य पर बलिदान होते रहें। और, प्रभो! वह दिन आए कि हम प्रायश्चित-संस्कार से मुक्त होकर तपोभूमि भारत को पयाम करें, और ऋषियों के सेवा-सत्कार में मग्न होकर अपना जीवन सफल करें। हे नाथ, हमें सद्बुद्धि दीजिए कि निरंतर कर्म-पथ पर स्थिर रहें, और उस कलंक-कालिमा को, जो हमारे आदि पुरुष ने हमारे मुख पर लगा दी है, अपनी सुकीर्ति से धोकर अपना मुख उज्ज्वल करें। जब हम स्वदेश यात्रा करें, तो हमारे मुख पर आत्मगौरव का प्रकाश हो, हमारे स्वदेश-बंधु सहर्ष हमारा स्वागत करें, और हम वहां पतित बनकर नहीं, समाज के प्रतिष्ठित अंग बनकर जीवन व्यतीत करें।

{सेवक का प्रवेश}

सेवक – दीनानाथ, समाचार आया है, अमीर मुआबिया के बेटे यजीद ने खिलाफ़त पर अधिकार कर लिया।

साहस०– यजीद ने खिलाफत पर अधिकार कर लिया! यह कैसा? उसका खिलाफ़त पर क्या स्वत्व था? खिलाफ़त हो हजरत अली के बेटे इमाम हुसैन को मिलनी चाहिए थी।

हरजसराय – हां, हक तो हुसैन ही का है। मुआबिया से पहले से इसी शर्त पर संधि हुई थी।

सिहदत्त – यजीद की शरारत है। मुझे मालूम है, वह अभिमानी, तामसी और विलास-भोगी मनुष्य है। विषय वासना में मग्न रहता है। हम ऐसे दुर्जन की खिलाफ़त कदापि स्वीकार नहीं कर सकते।

पुण्यराय – (सेवक से) कुछ मालूम हुआ, हुसैन क्या कर रहे हैं?

सेवक – दीनबंधु, वह मदीना से भागकर मक्का चले गए हैं।

सिह० – यह उनकी भूल है, तुरंत मदीनावासियों को संगठित करके यजीद के नाजिम का वध कर देना चाहिए था, इसके पश्चात अपनी खिलाफत की घोषणा कर देनी थी। मदीना को छोड़कर उन्होंने अपनी निर्बलता स्वीकार कर ली।

रामसिंह – हुसैन धर्मनिष्ठ पुरुष है। अपने बंधुओं का रक्त नहीं बहाना चाहते।

ध्रुवदत्त – जीव हिंसा महापाप है। धर्मात्मा पुरुष कितने ही संकट में पड़े, किंतु अहिंसा-व्रत को नहीं त्याग सकता।

भीरुदत्त – न्याय-रक्षा के लिये हिंसा करना पाप नहीं। जीव-हिंसा न्याय हिंसा से अच्छी है।

साहस० – अगर वास्तव में यजीद ने खिलाफ़त का अपहरण कर लिया है, तो हमें अपने व्रत के अनुसार न्याय-पक्ष ग्रहण करना पड़ेगा। यजीद शक्तिशाली है, इसमें संदेह नहीं, पर हम न्याय-व्रत का उल्लंघन नहीं कर सकते। हमें उसके पास दूत भेजकर इसका निश्चय कर लेना चाहिए कि हमें किस पथ पर अनुसरण करना उचित है।

सिंहदत्त – जब यह सिद्ध है कि उसने अन्याय किया, तो उसके पास दूत भेजकर विलंब क्यों किया जाये? हमें तुरंत उससे संग्राम करना चाहिए। अन्याय को भी अपने पक्ष का समर्थन करने के लिये युक्तियों का अभाव नहीं होता।

हरजसराय – मैं पूछता हूं, अभी समर की बात क्यों की जाये। राजनीति के तीनों सिद्धांतों की परीक्षा कर लेने के पश्चात् ही शस्त्र ग्रहण करना चाहिए। विशेषकर इस समय हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम आत्मगौरव की दुहाई देते हुए रण-क्षेत्र में कूद पड़े। शस्त्र-ग्रहण सर्वदा अंतिम उपाय होना चाहिए।

सिंहदत्त – धन आत्मा की रक्षा के लिये ही है।

हरजसराय – आत्मा बहुत की व्यापक शब्द है। धन केवल धर्म की रक्षा के लिये है।

रामसिंह – धर्म की रक्षा रक्त से नहीं होती शील, विनय, सदुपदेश, सहानुभूति, सेवा, ये सब उसके परीक्षित साधन हैं, और हमें स्वयं इन साधनों की सफलता का अनुभव हो चुका है।

सिंहदत्त – राजनीति के क्षेत्र में ये साधन उसी समय सफल होते हैं, जब शस्त्र उनके सहायक हों। अन्यथा युद्ध-लाभ से अधिक उनका मूल्य नहीं होता।

साहसराय – हमारा कर्त्तव्य अपनी वीरता का प्रदर्शन अथवा राज्य प्रबंध की निपुणता दिखाना नहीं है, न हमारा अभीष्ट अहिंसा-व्रत का पालन करना है। हमने केवल अन्याय को दमन करने का व्रत धारण किया है, चाहे उसके लिये किसी उपाय का अवलंबन करना पड़े। इसलिये सबसे पहले हमें दूतों द्वारा यजीद के मनोभाव का परिचय प्राप्त करना चाहिए। उसके पश्चात् हमें निश्चय करना होगा कि हमारा कर्त्तव्य क्या है। मैं रामसिंह और भीरुदत्त से अनुरोध करता हूं कि ये आज ही शाम को यात्रा पर अग्रसर हो जायें।