विवेक को थोड़ा होश आया तो सबसे पहले उसे छत नहर आई…उसने आंखें मलकर पलकें झपकाईं तो उसे याद आया कि वह तो रेल की पटरी पर महेश के साथ लेटा था…अचानक लोकल ट्रेन आई थी और उसका दिल बहुत जोर से धड़का था‒तो क्या मैं मर गया हूं?’ उसने सोचा, फिर मद्धिम से स्वर में पुकारा‒”महेश, कहां हो तुम?”
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“ज्यादा दूर नहीं हूं दोस्त।”
“नजर क्यों नहीं आ रहे…बस तुम्हारी आवाज सुनाई दे रही है।”
“इसका मतलब है हम दोनों मर गए हैं और परलोक में हैं।”
“यह तो बहुत बुरा हुआ…अंजला बेचारी सुहागिन बनने से पहले ही विधवा हो गई। वरना तुम्हारी भाभी होती।”
बेचारी का दुर्भाग्य-हम अफसोस करने भी नहीं जा सकते।”
“मगर तुमने आत्महत्या क्यों की?”
“अपनी मेडिकल रिपोर्ट चेकअप कराने पर पता चला कि मुझे ‘कैन्सर’ है।”
“कैन्सर?” विवेक उछल पड़ा‒”तब तो तू मर जाएगा।”
“तभी तो आत्महत्या कर ली।”
“यार, इलाज कराके तो देखता…शायद बच जाता।”
“कोई लाभ नहीं होता…कैन्सर का कोई इलाज नहीं, लेकिन तुझे मरने में इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए थी…शायद अंजला मान ही जाती।”
मैं तो तेरा साथ देने के लिए मर गया।
अचानक किसी की फटकार सुनकर दोनों उछल पड़े‒”क्या बकवास कर रहे हो, तुम लोग?”
“यार! यह तो तेरे डैडी की आवाज मालूम होती है‒क्या वह भी तेरे साथ मर गए?”
फिर एक जोरदार छड़ी की फटकार सुनाई दी और दोनों उछल पड़े…साथ ही उठकर बैठ गए।
“अरे!” विवेक महेश को देखकर चीखा‒”तू तो जिन्दा है।”
“और तू भी जिन्दा है।” महेश चीख पड़ा।
सेठ जगमोहन पास खड़े दोनों को घूरकर देख रहे थे‒”यह क्या मूर्खता कर रहे थे तुम दोनों…क्यों आत्महत्या कर रहे थे?”
“डैडी! जीवन से निराश आदमी और क्या कर सकता है?”
“तुम अपने इस मूर्ख दोस्त की दोस्ती छोड़ दो।” जगमोहन ने गुस्से से विवेक की ओर इशारा किया‒”वरना तुम्हें किसी दिन सचमुच मरना पड़ेगा।”
“डैडी! विवेक मेरा बचपन का दोस्त है।”
“तभी तो कह रहा हूं‒यह खानदानी बेवकूफ है‒इसका बाप भी मेरा बचपन का गहरा दोस्त था‒हम दोनों ने एक साथ ‘प्रेक्टिकल’ जीवन में कदम रखे थे।”
“बिना थ्योरी जाने?” विवेक ने आश्चर्य से पूछा।
“शटअप!” और विवेक आंखें मिचका कर रह गया‒”उसे बिजनेस की जरा भी सेंस नहीं थी…अगर उसके पास दिमाग होता तो हमारी ही तरह बड़ा आदमी बन गया होता।”
“अंकल! मेरी मां कहती हैं, आदमी अपने नसीबों से छोटा-बड़ा बनता है।”
“बकवास है…वह ‘कर्मों’ से छोटा-बड़ा बनता है।”
“अंकल! फिर एक मूर्ख के साथ आप जैसे अक्लमंद की दोस्ती कैसे निभ गई? मतलब यह है कि ऐसे ही मेरी और विवेक की दोस्ती बनी रहने दीजिए…इससे हमें मानसिक सन्तोष मिलता है।”
“बिल्कुल नहीं…यह भी कोई तुक है सिर्फ ‘मेडिकल रिपोर्ट’ देखने से ही कोई आत्महत्या करने की ठान ले और तुम उससे भी महामूर्ख हो, उसके कहने पर ही तुम उसके साथ रेल की पटरी पर लेट गए…अरे आदमी तो आखिरी सांसों तक जिन्दा रहने के लिए मौत से जूझता है…चलो उठो…गाड़ी में बैठो।”
“अंकल! मैंने इसे मरने के लिए नहीं कहा था…मरने से रोकने की कोशिश की थी…यह मेरा प्रेम-गुरु है…इससे मैं प्रेमशास्त्र सीखता हूं…मगर अभी तक लड़की नहीं फंसी है।”
“और….तेरे साथ!” जगमोहन ने छड़ी चलाई तो विवेक कूद कर भाग पड़ा…जगमोहन ने बड़बड़ाते हुए महेश की ओर देखा और बोले‒”चलो, उठो! फिर कभी आत्महत्या की कल्पना भी मत करना‒हम जल्दी ही तुम्हें इलाज के लिए अमरीका भिजवाने वाले हैं।”
महेश अनमने मन से उठकर अपने पिता के साथ बाहर आकर एअरकंडीशंड गाड़ी में आ बैठा। गाड़ी जगमोहन स्वयं ड्राइव कर रहे थे….दोनों में से किसी को इस बात का ज्ञान नहीं कि पिछली सीट के नीचे विवेक लेटा हुआ है।
सेठ जगमोहन कह रहे थे‒”जिस तरह रतन हमारा दोस्त था वैसे ही तुम्हारी मम्मी और विवेक की मां आपस में गहरी सहेलियां थीं…और एक बहुत बड़ा संयोग कि दोनों ने एक ही हस्पताल में एक ही समय तुम्हें और विवेक को जन्म दिया था।
“अच्छा! बड़ा अजीब संयोग है।”
“हां बेटे! यह बात हमने तुम्हें कभी नहीं बताई…क्योंकि जब तुम दोनों की कुण्डलियां पंडितजी से बनवाई गई थीं तो उन्होंने विवेक की कुण्डली देखकर कहा था कि यह लड़का राजकुमार बनकर जिन्दगी गुजारेगा।”
“सच…डैडी?”
“यही तो हम तुम्हें बता रहे हैं…बताओ तुम राजकुमार बनकर जीना चाहते हो या विवेक की भांति कंगाल?”
“लेकिन डैडी, अभी विवेक की उम्र ही क्या है?”
“बेटे…पूत कपूत पालने में ही नजर आ जाते हैं…जो नौजवान अच्छा स्वस्थ और सुन्दर होते हुए भी अनचाही लड़की से सम्बन्ध जोड़ सकता है, भला राजकुमार क्या बन सकता है…आजकल की लड़कियां भी राजकुमार ही को पसंद करती हैं।”
“मगर डैडी…विवेक तो उसे बहुत प्यार करता है।”
“क्या वह भी विवेक से प्यार करती है?”
“अभी तक तो नहीं।”
“कभी नहीं करेगी…आजकल की लड़कियां भले ही झोपड़पट्टी में जन्म लें, लेकिन सपने महलों ही के देखती हैं…उन्हें बंगला चाहिए…कार चाहिए।”
“डैडी! विवेक का दिल टूट जाएगा।”
“क्या बकवास है…दिल भी क्या कोई शीशे या मिट्टी का बना है….दिल तो मांस का वह लोथड़ा है जो खून को साफ करके जीवन को सक्रिय रखता है। यह शरीर के लिए एक कुदरती डायलेसिस मशीन है।”
महेश कुछ नहीं बोला। सेठ जगमोहन ने फिर कहा‒”जानते हो तुम्हारी शादी कितने बड़े सेठ की लड़की से निश्चित हुई है?”
“डैडी! अभी मेरा इलाज तो होने दीजिए।”
“बेटे तुम अच्छे हो जाओगे….इलाज चलता रहेगा…मगर हम इतना अच्छा रिश्ता हाथ से नहीं जानें देंगे।”
“कौन-से सेठ की बेटी है?”
“सेठ महेन्द्र नाथ की इकलौती बेटी कुमारी अंजला नाथ।”
महेश उछल पड़ा…साथ ही पीछे लेटा हुआ विवेक भी उछल कर बैठता हुआ बोला‒”अंजला! कदापि नहीं…वही तो मेरी प्रेमिका है।”
दूसरे ही क्षण सेठ जगमोहन ने फुल ब्रेक लगाए‒गाड़ी चिरमिरा कर रुकी…और पीछे आने वाली तीन-चार गाड़ियां एक-दूसरी से टकराती चली गईं। सेठ जगमोहन हड़बड़ाकर नीचे उतर आए…दूसरी ओर से विवेक निकल पड़ा…सेठ जगमोहन का झगड़ा पिछली गाड़ी वाले से होने लगा। उसके ऊपर तीसरी गाड़ी वाला अकड़ने लगा और इसी प्रकार तीसरी गाड़ी वाले से चौथा।
उधर महेश ने मुड़कर विवेक से कहा‒”हाय! तू यहां क्या कर रहा था?”
“तेरी दोस्ती का तमाशा देख रहा था…साले मेरी ही प्रेमिका को मेरी भाभी बनाएगा? इससे पहले ही तू कैन्सर से मर जाएगा।”
“विवेक! अरे, सुन तो सही।”
“तू कौन होता है मुझे सुनाने वाला…बड़ा दोस्त बन रहा था। प्रेमशास्त्र सिखाने चला था मुझे।”
फिर महेश उसे पुकारता ही रह गया…लेकिन विवेक भीड़ में घुस कर गायब हो गया।
मारे गुस्से के विवेक का दिमाग भी खौल रहा था‒वह सड़क पर पैदल ही तेज-तेज चल रहा था। एक क्रॉसिंग पर उसे रेड सिग्नल के कारण रुकना पड़ा…उसके बराबर एक बस आकर रुकी जिसकी ऊपर वाली, सीटों वाली खिड़की से झांक कर वही लड़का चिल्लाया, जिसकी मोटरसाइकिल विवेक भगा कर ले गया था‒”अबे, विवेक के बच्चे…ठहर जा साले…मैं नीचे आ रहा हूं।” फिर वह खिड़की से ही नीचे कूदने की कोशिश करने लगा तो विवेक गुस्से से हाथ हिलाकर बोला‒
“अबे हाथी की दुम…उधर से सीढ़ियां उतर कर आ।”
“देख लूंगा, तुझे साले…मेरी चालीस हजार की गाड़ी लेकर भाग गया।”
अचानक विवेक को याद आया कि वह मोटरसाइकिल तो वहीं खड़ी रह गई थी जहां वह महेश के साथ रेल की पटरियों पर मरते-मरते बचा था…चाबी भी उसी में लगी थी‒क्या खबर कोई उठाकर ले गया हो।
“अरे बाप रे!” दूसरे ही क्षण वह तेजी से भाग खड़ा हुआ।
“अबे ठहर…विवेक….।”
विवेक ने छलांग लगाई…किसी की गाड़ी के बोनट पर चढ़ा, किसी की छत पर…और भीड़ से निकल कर सड़क पर भागने लगा‒मोटर साइकिल वाला बहुत पीछे रह गया था। इतने में एक मोटर साइकिल विवेक के बराबर दौड़ने लगी। सवार नौजवान ने कहा‒
“आपको कहीं बहुत जल्दी पहुंचना है?”
“हां, यदि साहब…मेरी साली के हसबैण्ड का साढू खतरे में है।”
“आइए….बैठ जाइए…मैं ड्रॉप कर दूंगा।”
विवेक उछल कर चलती मोटरसाइकिल पिछली सीट पर बैठ गया।
“कैसी चल रही है यह मोटरसाइकिल?”
“एकदम शानदार…।”
“ट्रायल ले रहा हूं…आज ही मिली है।”
“दहेज में?”
“जी नहीं‒सड़क पर।” नौजवान हंसने लगा और बोला‒”दरअसल मेरे पिताजी पुलिस में दरोगा हैं…एक जगह दो नौजवान रेल की पटरी पर आत्महत्या कर रहे थे…उन्हीं में से किसी की यह गाड़ी थी…दोनों पटरी पर बेहोश थे…पापा ने मोटरसाइकिल देखकर एक कान्स्टेबल को भिजवाकर मोटरसाइकिल उठवा ली।”
विवेक उछल पड़ा।
“क्या हुआ?” मोटर साइकिल चलाने वाले ने पूछा‒मैं बहुत दिन से स्कूटर के लिए हठ कर रहा था…पापा ने मुझे फोन करके बुलवाया और यह गाड़ी मुझे दिलवा दी…अब इसका दूसरा रंग हो जाएगा…नए पेपर्स बन जाएंगे…इंजन और बॉडी के नम्बर बदल डाले जाएंगे…और गाड़ी मेरी हो गई।”
“इतनी अच्छी गाड़ी तुम्हें मुफ्त में मिल जाएगी…मुझे विश्वास नहीं आता।”
“अरे! हम पुलिस वालों को सब कुछ मुफ्त में मिलता है।”
“मुझे इसके इंजन में कुछ गड़बड़ लगती है।”
“आप क्या मकैनिक हैं?”
“मेरे पापा मकैनिक हैं‒जरा रोकिए तो सही….छोटा-मोटा नुक्स तो मैं भी ठीक कर लेता हूं।”
नौजवान ने मोटरसाइकिल रोक ली। विवेक ने उतरकर कहा‒
“लाइए…मैं स्टार्ट करके देखूं।”
नौजवान ने मोटरसाइकिल विवेक को दे दी। विवेक ने इंजन स्टार्ट किया और बोला‒”जरा चलाकर देखूं?”
“जरूर देखिए।”
विवेक ने गियर डाला और मोटरसाइकिल फर्राटे भरती चली गई…नौजवान मुस्कराता रहा और फिर जब गाड़ी लौटी ही नहीं तो वह चिल्लाता हुआ दौड़ा‒”अरे…अरे…मेरी मोटरसाइकिल।”
काफी देर तक वह दौड़ता रहा…फिर हांफकर लड़खड़ाने लगा तो विवेक से उसके साथ चलते हुए बोला‒
“भाई साहब! आपको कहीं जल्दी पहुंचना है।”
“हां भाई साहब! एक चोर मेरी मोटरसाइकिल लेकर भाग गया है मुझे लिफ्ट दे दीजिए।”
“तो आइए…मेरी मोटरसाइकिल पर…!” वह चिल्लाकर दौड़ा।

लेकिन विवेक मोटरसाइकिल दौड़ाता हुआ बहुत आगे निकल गया था…फिर टर्न लेकर बीच वाले फुटपाथ से दूसरी तरफ बहुत जोर से वापस हुआ….नौजवान को उसने आगे ही दौड़ते देखा। कुछ देर बाद उसे वही लड़का नजर आ गया जिसकी मोटरसाइकिल थी…वह लड़का अभी तक दौड़ रहा था। विवेक अगले कट पर मोटरसाइकिल को टर्न देकर लाया और उस लड़के के बराबर दौड़ाते हुए बोला‒
“अबे घोंचू, क्यों रेस लगा रहा है?”
“वो…वो…मेरी मोटरसाइकिल….।”
“चल, मेरे साथ बैठकर पीछा कर।” लड़का बैठ गया तो विवेक ने उससे कहा‒”अब तू चला, मैं थक गया हूं।”
लड़का मोटरसाइकिल दौड़ाता चला गया…विवेक ने हाथ झाड़े और मुड़कर एक ईरानी रेस्टोरेंट में चाय पीने लगा। अभी वह गिलास पूरा खत्म भी नहीं कर पाया था कि एक लड़के ने कहा‒
“साहब! उधर आपको एक मेमसाहब बुलाएला है। वह अपना नाम अंजला बताएली है।”
विवेक को फंदा पड़ते-पड़ते बचा….जल्दी से गिलास लड़के को थमा कर, आस्तीन से होंठों को पोंछता हुआ वह बाहर आया तो सामने खड़ी गाड़ी के पास उसे देवयानी नजर आई…वह विवेक को देखकर मुस्कराई। विवेक इधर-उधर देखने लगा।
“अरे! इधर-उधर क्या देख रहे हो। ‘हीरो’।”
“अभी इधर अंजला की गाड़ी खड़ी थी।”
देवयानी हंसकर बोली‒”मैंने ही तुम्हें अंजला के नाम से बुलाया था।”
“ठहर! चल…साली चालाक कहीं की।”
“अन्दर क्या करने गए थे?”
“महेश का खून पीने तुमसे मतलब?”
“महेश का खून मैं तुम्हें नहीं पिलाऊंगी।”
“ऐसी वैसी हरकत तो नहीं करेगी?”
“जानते हो तुम्हें अंजला ने क्यों ठुकरा दिया?”
“क्यों?”
“अब गाड़ी में बैठो, तो बताऊँ।”
विवेक गाड़ी में बैठ गया। देवयानी ने गाड़ी स्टार्ट कर दी और पूछा‒”बीयर पियोगे?”
“मैं शराब नहीं पीता।”
“इसीलिए तो अंजला तुम्हें पसन्द नहीं करती…वैसे बीयर शराब नहीं होती।”
“अंजला की पसंद से शराब का क्या सम्बन्ध?”
“हाई-सोसायटी और ऊंचे स्टैण्डर्ड के लोग फैशन के लिए विस्की पीते हैं‒तुमने फिल्मों में नहीं देखा।” देवयानी ने कहा।
“फिल्मों में यह भी तो बताया जाता है कि शराब जहर होती है।”
“सब बकवास है…अपनी सीमा तक पीने में आदमी के अन्दर आत्मविश्वास जागता है…उसका साहस बढ़ता है।”
“देवयानी….तुम जैसी लड़की और प्रेम-गुरु।”
“व्हाट? अंजला से बढ़कर अच्छी प्रेम-गुरु और कोई नहीं हो सकती… एक बार परीक्षा लेकर देख तो लो।”
“अपन को तेरी शिक्षा नहीं चाहिए…रोको गाड़ी।”
“सोच लो….हमेशा के लिए अंजला को खो बैठोगे।”
विवेक सिर खुजाता हुआ कुछ सोचने लगा…देवयानी ने उसे कनखियों से देखा और बोली‒”एक डिब्बा ‘बीयर’ पीकर देखो…स्वयं ही प्रेम ज्वाला जाग उठेगी….तुम प्रेम करना सीखोगे तो मन से सीखोगे…स्वयं ही प्रेम करना आ जाएगा।”
“सच कह रही हो?”
“झूठ निकला तो फिर कभी सूरत मत देखना।”
“तो लाओ डिब्बा।”
देवयानी ने बीयर का खुला हुआ डिब्बा उसकी ओर बढ़ा दिया…जिसमें आधी बीयर और आधी विस्की मिली हुई थी।
विवेक ने पहला घूंट भर कर बुरा-सा मुंह बनाया‒यह तो बहुत कड़वी है।
हर रोग की अच्छी दवा कड़वी ही होती है।

फिर देवयानी घूंट भरने लगी। कार जुहू बीच पर जानकी कुटीर की अंधेरी गली में एक जगह रुक गई।
“इधर कहां ले आई?” विवेक ने कहा।
“यही तो प्रेम सीखने के लिए उचित स्थान है।”
“तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रही?”
“सचमुच तुम बहुत भोले हो और पगले भी…यह ‘जैट एज’ है…वह पुराना जमाना नहीं जब लड़के को पहले लड़की का पीछा करना पड़ता था…प्यार के घिसे-पिटे शब्द रटने पड़ते थे….और अब तो सीधा उसका हाथ पकड़ो और उसके होंठों को चूम लो।”
“अबे हट…आवारा कहीं की।”
“डिब्बा खाली कर लो जल्दी से….यह आवारापन नहीं…प्रेम-ग्रंथ का पहला पाठ है।”
विवेक ने जल्दी-जल्दी डिब्बा खाली करके कहा‒”और दो।”
देवयानी हंस पड़ी…इस बार उसने विस्की का क्वार्टर दे दिया।
“हाय! यह तो दारू है।” विवेक बोला।
“देशी दारू नहीं….शुद्ध इम्पोर्टिड विस्की है।”
विवेक ने ढक्कन खोला….विस्की का घूंट भरा तो हिचकी आ गई वह बोला‒”हां…अब सिखाओ प्रेम-शास्त्र का श्री गणेश।”
“श्री गणेश तो हो चुका…एक घूंट और लो और मुझे सीने से लगा लो।”
नशा बढ़ चुका था। वह अपने होश में नहीं था…उसने बाकी ‘क्वार्टर’ भी खाली कर दिया और खाली बोतल बाहर फेंक कर देवयानी को सीने से लगा लिया। देवयानी ने उसके होंठ चूमने चाहे तो वह घबराकर बोला‒”छोड़ो मुझे….यह क्या बदतमीजी है!”
मगर…देवयानी की सांसें तेज चल रही थीं….उसने खींचकर विवेक को लिपटा लिया‒इस बार दोनों में कोई भी अपने भावों को नियंत्रित नहीं कर सका…और दोनों एक तेज प्रवाह में बहते चले गए।
