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bhootnath by devkinandan khatri

रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। बँगले के अन्दर जितने आदमी हैं सभी बेहोशी की नींद सो रहे हैं क्योंकि हरदेई ने जो बेहोशी की दवा खाने की वस्तुओं में मिला दी थी उसके सबब से सभी आदमी (उस अन्न के खाने से) बेहोश हो रहे हैं। हरदेई एक विश्वासी लौंडी थी और जमना तथा सरस्वती उसे जी-जान से मानती थीं इसलिए कोई आदमी उस पर शक नहीं कर सकता था, परन्तु इस समय हमारे पाठक बखूबी समझ गये होंगे कि यह हरदेई नहीं है बल्कि जिस तरह भूतनाथ प्रभाकर सिंह का रूप धारण किये हैं उसी तरह भूतनाथ का शागिर्द रामदास हरदेई की सूरत में काम कर रहा है, असली हरदेई को तो वह गिरफ्तार करके ले गया था। और सभों की तरह नकली प्रभाकर सिंह भी अपनी चारपाई पर बेहोश पड़े हुए हैं। हरदेई ने आकर प्रभाकर सिंह को लखलखा सुँघाया और जब वे होश में आ गए तो उनसे कहा, “अब उठिए, काम करने का समय आ गया।”

प्रभाकर सिंह : कितनी रात जा चुकी है?

हरदेई : आधी से ज्यादा।

प्रभाकर सिंह : सभों के साथ मुझे भी वही अन्न खाना पड़ा, यद्यपि मैंने बहुत कम भोजन किया था तथापि बेहोशी का असर ज्यादा रहा।

इतना कह प्रभाकर सिंह उठ खड़े हुए और सब तरफ घूम कर देखने लगे कि कहाँ कौन सोया हुआ है। जमना, सरस्वती, और इंदुमति तो उसी कमरे में फर्श के ऊपर सोई हुई थी जिसमें प्रभाकर सिंह थे और बाकी की सब लौडियाँ एक ऐयार दूसरे कमरे में पड़े हुए थे।

प्रभाकर सिंह ने जमना और सरस्वती की तरफ देखकर हरदेई से कहा, “पहिले तो मुझे यह देखना है कि इन लोगों ने किस ढंग पर अपना चेहरा रंगा हुआ है।”

हरदेई : मैं आपसे कह चुका हूँ कि इन लोगों ने एक प्रकार की झिल्ली चेहरे पर चढ़ाई हुई है जिस पर पानी का असर नहीं होता।

प्रभाकर सिंह : (जमना और सरस्वती के चेहरे पर से झिल्ली उतारकर) बेशक् यह अनूठी चीज है, इसे मैं अपने पास रखूँगा।

हरदेई : (अथवा रामदास) बेशक् यह चीज रखने योग्य है।

प्रभाकर सिंह : इन लोगों ने भी बड़ा ही उत्पात मचा रखा था, आज इनकी चालबाजियों का अंत हुआ। अब उन्हें शीघ्र ही दुनिया से उठा देना चाहिए नहीं तो एक-न-एक दिन इन दोनों की बदौलत बड़ा ही अनर्थ हो जाएगा और मैं किसी को अपना मुँह दिखाने लायक न रहूँगा। (कुछ सोचकर) मगर मुझे इनके गले पर छुरी न चलाई जाएगी, यद्यपि मैं इनकी जान लेने के लिए तैयार हूँ मगर लाचारी से।

हरदेई : यदि दया आती हो तो इन्हें किसी कुएँ में ढकेल कर निश्चिन्त हो जाइए। इस जंगल के पीछे की तरफ पहाड़ी के कुछ ऊपर चढ़ के एक कुआँ है जो इस काम के लिए बहुत ही मुनासिब होगा। मैं अच्छी तरह जाँच कर चुका हूँ कि वह बहुत गहरा और अँधेरा है, उसमें गया हुआ आदमी फिर नहीं निकल सकता।

प्रभाकर सिंह : अच्छी बात है, दोनों को ले चलकर उसी कुएँ में डाल दो, मगर इंदुमति को मैं अपने घर अर्थात् लामाघाटी में ले जाऊँगा क्योंकि इसकी जुबानी बहुत-सी बातों का पता लगाना है।

हरदेई : मैं इस राय को पसन्द नहीं करता, मैं इंदुमति को भी उसी कुएँ में पहुँचाना मुनासिब समझता हूँ।

प्रभाकर सिंह : (कुछ सोचकर) अच्छा खैर इसे भी उसी में दाखिल करो।

इतना कह कर नकली प्रभाकर सिंह ने जमना को और रामदास ने सरस्वती को उठाकर पीठ पर लाद दिया और उस कुएँ पर चले गये जिसका पता रामदास ने दिया था।

यह कुआँ बँगले के पश्चिम तरफ पहाड़ी के कुछ ऊपर चढ़कर पड़ता था। कुआँ बहुत प्रशस्त और गहरा था मगर इसका मुँह इतना छोटा था कि वहाँ के रहने वालों ने एक मामूली पत्थर की चट्टान से उसे ढाँक रखा था। कदाचित् रामदास को इसका पता अच्छी तरह लग चुका था इसलिए वह नकली प्रभाकर सिंह को लिए हुए बहुत जल्द वहाँ जा पहुँचा। जमना और सरस्वती को जमीन पर रख दोनों ने मिलकर उस कुएँ का मुँह खोला और फिर उन दोनों औरतों को एक-एक करके उसके अन्दर फेंक दिया। अफसोस! अफसोस! अफसोस! भूतनाथ को इस दुष्कर्म का क्या नतीजा भोगना पड़ेगा इस पर उसने कुछ भी ध्यान न दिया!

दोनों बेचारियों को कुएँ में ढकेल कर भूतनाथ ने ध्यान देकर और कान लगा कर सुना कि नीचे गिरने की आवाज आती है या नहीं, मगर किसी तरह भी आवाज उसके कान में न गई जिससे उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ।

उन दोनों को कुएँ में ढकेलने के बाद रामदास दौड़ा हुआ गया और इंदुमति को उठा लाया। भूतनाथ ने उसे भी कुएँ के अन्दर ढकेल दिया और फिर पत्थर से उसका मुँह उसी तरह ढाँक दिया जैसा पहिले था।

इस काम से छुट्टी पाकर भूतनाथ और रामदास ने यह सोचा कि अब बाकी की औरतें जो इस घाटी में मौजूद हैं उन्हें भी मार कर बखेड़ा तय कर देना चाहिए क्योंकि इनमें से अगर एक भी जीती रह जाएगी तो भंडा फूटने का डर लगा ही रह जाएगा, अस्तु यह निश्चय किया गया कि उन सभों के लिए कोई दूसरा कुआँ खोजना चाहिए, क्योंकि जिस कुएँ में जमना और सरस्वती तथा इंदु को डाला है उसके अन्दर घुसकर देखना उचित है कि उसमें पानी है कि नहीं अथवा उसके अन्दर का क्या हाल है।

आखिर ऐसा ही हुआ। उस कुएँ से थोड़ी दूर पहाड़ के ऊपर चढ़कर एक कुआँ और था जिसका मुँह बहुत चौड़ा था। भूतनाथ और रामदास दोनों आदमी सब बेहोश लौंडियों को बँगले के अन्दर और बाहर से उठा लाए और एक-एक करके उस कुएँ के अन्दर डाल दिया। आह, भूतनाथ का कैसा कड़ा कलेजा था और यह कैसा घृणित काम उसने किया! अब उस घाटी के अन्दर कोई भी न रहा जो इन दोनों की खबर ले।

अब सवेरा हो गया बल्कि सूर्य भगवान भी उदयाचल से निकलकर अपनी आँखों से भूतनाथ और रामदास के कुकर्म देखने लगे।

भूतनाथ और रामदास उस कुएँ पर आये जिसमें जमना, सरस्वती और इंदुमति को ढकेल दिया था। भूतनाथ ने रामदास से कहा कि तू कमन्द के सहारे इस कुएँ के अन्दर उतर जा और देख कि इसमें पानी है या नहीं।

भूतनाथ की आज्ञानुसार रामदास कमन्द थामकर उसके अन्दर उतर गया। कमन्द का दूसरा सिरा भूतनाथ ने एक पत्थर से मजबूती के साथ अड़ा दिया था। रामदास ने नीचे आकर आवाज दी–“गुरुजी, यह कुआँ इस लायक नहीं था कि इसके अन्दर दुश्मनों को डाला जाता बल्कि यह तो स्वर्ग से भी बढ़ कर सुख देने वाला है। लीजिए अब कमन्द को छोड़ता हूँ बैंच लीजिए, क्योंकि अब मैं बाहर आने की इच्छा नहीं करता।”

रामदास की बात सुनकर भूतनाथ को बड़ा आश्चर्य हुआ और जब उसने कमन्द बैंच कर देखा तो वास्तव में उसे ढीला पाया।

भूतनाथ-खण्ड-2/ भाग-16 दिनांक 10 Mar. 2022 समय 06:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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