bhootnath-novel-by-devkinandan-khatri-2
bhootnath by devkinandan khatri

दूसरी पहाड़ी पर चढ़कर ऊपर-ही-ऊपर जमना, सरस्वती और इंदुमति के पास पहुँचने पर जल्दी करने पर भी प्रभाकर सिंह को आधे घंटे से ज्यादा देर लग गई। “क्या इतनी देर तक दुश्मन ठहर सकता है? क्या इतनी देर तक ये नाजुक औरतें ऐसे भयानक दुश्मन के हाथ से अपने को बचा सकती हैं? क्या इस निर्जन स्थान में कोई उन औरतों का मददगार पहुँच सकता है? नहीं, ऐसी बात तो नहीं हो सकती!” यही सब कुछ सोचते हुए प्रभाकर सिंह बड़ी तेजी के साथ रास्ता तै करके वहाँ पहुँचे जहाँ जमना, सरस्वती और इंदुमति को छोड़ गये थे। उन्हें यह आशा न थी कि उन तीनों से मुलाकात होगी, मगर नहीं, ईश्वर बड़ा की कारसाज है, उसने इस निर्जन स्थान में भी उन औरतों के लिए एक बहुत बड़ा मददगार भेज दिया जिसकी बदौलत प्रभाकर सिंह के पहुँचने तक वे तीनों दुश्मन के हाथ से बची रह गईं।

भूतनाथ नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

प्रभाकर सिंह ने वहाँ पहुँचकर देखा कि जमना, सरस्वती और इंदुमति दुश्मन के खौफ से बदहवास होकर मैदान की तरफ भागी जा रही हैं और एक नौजवान बहादुर आदमी जिसके चेहरे पर नकाब पड़ी हुई है तलवार से उस दुश्मन का मुकाबला कर रहा है जो उन तीनों औरतों को मारने के लिए वहाँ आया था। यह तमाशा देख प्रभाकर सिंह तरद्दुद में पड़ गये और सोचने लगे कि हम उन भागती हुई औरतों को ढाँढस देकर लौटा लावे या पहिले इस बहादुर की मदद करें जो इस समय हमारे दुश्मन का मुकाबला बड़ी बहादुर के साथ कर रहा है। उन दोनों बहादुरों की अद्भुत लड़ाई को देखकर प्रभाकर सिंह प्रसन्न हो गये। थोड़ी देर के लिए उनके दिल से तमाम कुलफत जाती रही, और वे एकटक उन दोनों की लड़ाई का तमाशा देखने लगे। शैतान जो जमना इत्यादि को मारने आया था यद्यपि बहादुर था और लड़ाई में अपनी तमाम कारीगरी खर्च कर रहा था। मगर उस नकाबपोश के मुकाबले वह बहुत दबा हुआ मालूम पड़ने लगा, यहाँ तक कि उसका दम फूलने लगा और नकाबपोश के मोढ़े पर बैठकर उसकी तलवार दो टुकड़े हो गई।

कुछ देर के लिए लड़ाई रुक गई और दोनों बहादुर हटकर खड़े हो गये। उस शैतान दुश्मन को जिसका नाम इस मौके के लिए हम बेताल रख देते हैं, विश्वास था कि तलवार टूट जाने पर नकाबपोश उस पर जरूर हमला करेगा, मगर नकाबपोश ने ऐसा न किया। वह हटकर खड़ा हो गया और बेताल से बोला, “कहो जब किस चीज से लड़ोगे? मैं उस आदमी पर हर्बा चलाना उचित नहीं समझता जिसका हाथ हथियार से खाली हो।”

इसका जवाब बेताल ने कुछ न दिया, उसी समय नकाबपोश में प्रभाकर सिंह की तरफ देखा और कहा, “मुझे तुम्हारी मदद की कोई जरूरत नहीं है, तुम (हाथ का इशारा करके) उन औरतों को सम्हालो और ढाढ़स दो जो इस शैतान के डर से बदहवास होकर भागी जा रही हैं या दुश्मन का मुकाबला करो तो मैं उन्हें जाकर समझाऊँ और यहाँ लौटा न ले आऊँ।”

प्रभाकर सिंह के लिए में यह खयाल बिजली की तरह दौड़ गया कि मैं उन औरतों की तरफ जाता हूँ तो नकाबपोश मुझे नामर्द समझेगा और अगर स्वयं दुश्मन का मुकाबला करके नकाबपोश को औरतों की तरफ जाने के लिए कहता हूँ तो क्या जाने यह भी उन सभी का दुश्मन ही हो और उन औरतों के पास जाकर कोई बुराई का काम कर बैठे। इस खयाल से क्षणमात्र के लिए प्रभाकर सिंह को चुप कर दिया, इसके बाद प्रभाकर सिंह ने कहा, “जो तुम कहो वही करूँ।”

नकाबपोश : बेहतर होगा कि तुम उन्हीं औरतों की तरफ जाओ!

“बहुत अच्छा” कह प्रभाकर सिंह बड़ी तेजी के साथ उनकी तरफ लपक पड़े जो भागती हुई अब कुछ-कुछ आँखों की ओट हो चली थीं। वे भागती चली जाती थीं और पीछे की तरफ फिर-फिर कर देखती जाती थी। दौड़ते-दौड़ते वे एक ऐसे स्थान पर पहुँची जिसके आगे एक दरवाजा बना हुआ था जो इस समय खुला था। इन औरतों को इतनी फुर्सत कहाँ कि दीवार की लंबाई-चौड़ाई की जाँच करतीं या दूसरी तरफ भागने की कोशिश करतीं? वे सीधी उस दरवाजे के अन्दर घुस गईं, खास करके इस खयाल से भी कि अगर इसके अन्दर दरवाजा बंद कर लेंगे तो दुश्मन से बचाव हो जाएगा।

उसी समय प्रभाकर सिंह भी नजदीक पहुँच गये और इंदुमति की निगाह प्रभाकर सिंह के ऊपर जा पड़ी। प्रभाकर सिंह ने हाथ के इशारे से उसे रुक जाने के लिए कहा परन्तु उसी समय वह दरवाजा बंद हो गया जिसके अन्दर जमना, सरस्वती और इंदुमति घुस गई थी। प्रभाकर सिंह को यह चिंता उत्पन्न हुई कि यह दरवाजा खुद बंद हो गया या इंदुमति ने जान-बूझकर बंद कर दिया।

थोड़ी ही देर में प्रभाकर सिंह उस दरवाजे के पास पहुँचे और धक्का देकर उसे खोलना चाहा मगर दरवाजा न खुला। प्रभाकर सिंह ने चाहा कि आगे बढ़कर देखें कि यह दीवार कहाँ तक गई है परन्तु उसी समय सरस्वती की आवाज कान में पड़ने से वे रुक गए और ध्यान देकर सुनने लगे। यह आवाज उस दरवाजे के पास दीवार के अन्दर से आ रही थी मानो सरस्वती किसी दूसरे आदमी से बातचीत कर रही है, जैसा कि नीचे लिखा जाता है-

सरस्वती : हाय, यहाँ भी दुष्टों से हम लोगों का पिंड न छूटेगा! ये लोग इस तिलिस्म के अन्दर आ क्यों कर गये यही ताज्जुब है!

जवाब : (जो किसी जानकार आदमी के मुँह से निकली हुई आवाज मालूम पड़ती थी) खैर अब तो आ ही गये, अब तुम लोगों के निकाले हम लोग नहीं निकल सकते और अब तुम लोग जान बचा ही कर क्या करोगी क्योंकि प्रभाकर सिंह की निगाह में तुम लोगों की कुछ भी इज्जत न रही, उन्हीं की नहीं बल्कि मुझे भी वह सब हाल मालूम हो गया। इस समय तुम लोग उसी पाप का फल भोग रहे हो! अफसोस, मुझे तुम लोगों से ऐसी आशा कदापि न थी! अगर मैं ऐसा जानता तो इस पवित्र घाटी को तुम लोगों के पापमय शरीर से कभी अपवित्र होने न देता।

प्रभाकर सिंह : (ताज्जुब से मन में) हैं? क्या यह आवाज इन्द्रदेव की है!

सरस्वती : मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे हो! क्या किसी दुष्ट ने हम लोगों को बदनाम किया है? क्या किसी कमीने ने हम लोगों पर कलंक का धब्बा लगाना चाहा है? नहीं कदापि नहीं, स्वप्न में भी ऐसा नहीं हो सकता! हम लोगों के पवित्र मनों को डावाँडोल करने वाला इस संसार में कोई भी नहीं है! मैं इसके लिए खुले दिल से कसम खा सकती हूँ।

जवाब : दुनिया में जितने बदकार आदमी होते हैं वे कसम खाने में बहुत तेज होते हैं! मुझसे तुम लोगों की यह चालाकी नहीं चल सकती। जो कुछ मैं इस समय कह रहा हूँ वह केवल किसी से सुनी-सुनाई बातों के कारण नहीं है बल्कि मुझे इस बात का बहुत ही पक्का सबूत मिल चुका है जिससे तुम कदापि इनकार नहीं कर सकती।

प्रभाकरसिंह : (मन में) बेशक् वह बात ठीक मालूम होती है जो हरदेई ने मुझ से कही थी।

सरस्वती : कैसा सबूत और कैसी बदनामी? भला मैं भी तो उसे सुनूँ।

जवाब : तुम तो जरूर ही सुनोगी, अभी नहीं तो और घंटे भर में सही। प्रभाकर सिंह के सामने ही मैं इस बात को खोलूँगा और इस कहावत को चरितार्थ करके दिखा दूंगा कि ‘छिपत न दुष्कर पाप, कोटि जतन कीजे तऊ’।

सरस्वती : कोई चिंता नहीं, मैं भी अच्छी तरह उस आदमी का मुँह काला करूँगी जिसने हम लोगों को बदनाम किया है और अपने को अच्छी तरह निर्दोष साबित कर दिखाऊँगी।

आवाज : अगर तुम्हारे किये हो सकेगा तो जरूर ऐसा करना।

सरस्वती : हाँ-हाँ जरूर ही ऐसा करूँगी। मेरा दिल उसी समय खटका था जब प्रभाकर सिंह ने कुछ व्यंग्य के साथ बातें की थीं। मैं उस समय उनका मतलब कुछ नहीं समझ सकी थी मगर अब मालूम हो गया कि कोई महापुरुष हम लोगों को बदनाम करके अपना काम निकालना चाहते हैं।

जवाब : इस तरह की बातें तुम प्रभाकर सिंह को समझाना, मुझ पर इसका कुछ भी असर नहीं हो सकता, यदि मैं तुम्हारा नातेदार न होता तो मुझे इतना कहने की कुछ जरूरत भी न थी, मैं तुम लोगों का मुँह भी न देखता और अब भी ऐसा ही करूँगा। मैं नहीं चाहता कि अपना हाथ औरतों के खून से नापाक करूँ। तथापि एक दफे प्रभाकर सिंह के सामने इन बातों को साबित जरूर करूँगा जिसमें कोई यह न कहे कि जमना, सरस्वती और इंदुमति पर किसी ने व्यर्थ ही कलंक लगा! अच्छा अब मैं जाता हूँ, फिर मिलूँगा।

सरस्वती : अच्छा-अच्छा देखा जाएगा, इन चालबाजियों से काम नहीं चलेगा।

बस इसके बाद किसी तरह की आवाज न आई, अस्तु कुछ देर तक और कान लगा कर ध्यान देने के बाद प्रभाकर सिंह पुन : उस दीवार के अन्दर जाने का उद्योग करने लगे। इस खयाल से कि देखें यह दीवार कहाँ पर खतम हुई है वे दीवार के साथ-ही-साथ पूरब तरफ रवाना हुए। दीवार बहुत दूर तक नहीं गई थी, केवल चार या पाँच बिगहे के बाद मुड़ गई थी, अस्तु प्रभाकर सिंह भी घूमकर दूसरी तरफ चल पड़े। बीस-पच्चीस कदम आगे जाने के बाद उन्हें एक खुला दरवाजा मिला। प्रभाकर सिंह उस दरवाजे के अन्दर चले गए और दूर से जमना, सरस्वती और इंदुमति को एक पेड़ के नीचे बैठे देखा जो नीचे की तरफ सिर हुए आँखों से गरम-गरम आँसू गिरा रही थी। क्रोध में भरे हुए प्रभाकर सिंह उन तीनों के पास चले गये और सरस्वती की तरफ देखकर बोले, “वह कौन आदमी था जो अभी तुमसे बातें कर रहा था?”

सरस्वती : मुझे नहीं मालूम कि वह कौन था।

प्रभाकर सिंह : फिर तुमसे इस तरह की बात करने की उसे जरूरत ही क्या थी?

सरस्वती : सो भी मैं कुछ कह नहीं सकती।

प्रभाकर सिंह : हाँ ठीक है, मुझसे कहने की तुम्हें जरूरत ही क्या है! खैर जाने दो, मुझे भी विशेष सुनने की आवश्यकता नहीं है, तो मैं पहिले ही हरदेई की जुबानी तुम लोगों की बदकारियों का हाल सुनकर अपना दिल ठंडा कर चुका था, अब इस आदमी की बातें सुनकर और भी रहा-सहा शक जाता रहा, यद्यपि तुम लोग इस योग्य थीं कि इस दुनिया से उठा दी जातीं और यह पृथ्वी तुम्हारे असह्य बोझ से हल्की कर दी जाती, परन्तु नहीं, उस आदमी की तरह जो अभी तुमसे बातें कर रहा था मैं भी तुम लोगों के खून से अपना हाथ अपवित्र नहीं करना चाहता। खैर तुम दोनों बहिनों से तो मुझे कुछ विशेष कहता नहीं है, रही इंदुमति सो इसे मैं इस समय से सदैव के लिए त्याग करता हूँ। शास्त्र में लिखा हुआ है कि किसी का त्याग कर देना मार डालने के ही बराबर है।

इंदुमति : (रोती हुई हाथ जोड़कर) प्राणनाथ! क्या तुम दुश्मनों की जुबानी गढ़ी-गढ़ाई बातें सुन कर मुझे त्याग कर दोगे!!

प्रभाकर : हाँ त्याग कर दूंगा, क्योंकि जो कुछ बातें तुम्हारे विषय में मैंने सुनी हैं उन्हें यह दूसरा सबूत मिल जाने के कारण मैं सत्य मानता हूँ। केवल इतना ही नहीं, तुम्हारी ही जुबान से उन बातों की पुष्टि हो चुकी है। अब इसकी भी कोई जरूरत नहीं कि तुम लोगों को इस तिलिस्म के बाहर ले जाने का उद्योग करूँ, अस्तु अब मैं जाता हूँ। (छाती पर हाथ रख कर) मैं इस वज्र की चोट को इसी छाती पर सहन करूँगा और फिर जो कुछ ईश्वर दिखावेगा देखूँगा, मुझे विश्वास हो गया कि बस मेरे लिए दुनिया इतनी ही थी।

इतना कहकर प्रभाकर सिंह वहाँ से रवाना हो गए। इंदुमति रो-रोकर पुकारती ही रह गई मगर उन्होंने उसकी कुछ भी न सुनी। जिस खिड़की की राह वे इस दीवार के अन्दर गये थे उसी राह से वे बाहर चले आये और उस तरफ रवाना हुए जहाँ नकाबपोश और बैताल को लड़ते हुए छोड़ आये थे।

वहाँ पहुँचकर प्रभाकर सिंह ने दोनों में से एक को भी न पाया, न तो बैताल ही पर निगाह पड़ी और न नकाबपोश ही की सूरत दिखाई दी। ताज्जुब के साथ प्रभाकर सिंह चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि कहीं मैं जगह तो नहीं भूल गया या वे दोनों ही तो आपस में फैसला करके कहीं नहीं चले गये।

कुछ देर तक इधर-उधर ढूँढ़ने के बाद प्रभाकर सिंह एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गये और झुकी हुई गर्दन को हाथ का सहारादे कर तरह-तरह की बातें सोचने लगे। इन्हें इंदुमति को त्याग देने का बहुत ही रंज था और वे अपनी जल्दबाजी पर कुछ देर के बाद पछताने लग गये थे। वे अपने दिल में कहने लगे कि अफसोस, मैंने इस काम में जल्दबाजी की। यद्यपि इंदुमति की बदकारी का हाल सुनकर मेरे सिर से पैर तक आग लग गई थी। मगर मुझे उसका कुछ सबूत भी तो ढूँढ़ लेना चाहिए था। संभव है कि हरदेई इन सभों की दुश्मन बन गई हो और उसने हम लोगों को रंज पहुँचाने के खयाल से ऐसी मनगढ़ंत कहानी कहकर और इंदुमति पर इल्जाम लगाकर अपना कलेजा ठंडा किया हो। अगर वास्तव में यही बात हो तो कोई ताज्जुब नहीं क्योंकि हरदेई का उन तीनों के साथ न रहकर अलग ही तिलिस्म के अन्दर दिखाई देना कोई मामूली बात नहीं है बल्कि इसका कोई खास सबब जरूर है। अच्छा तो वह दूसरा आदमी कौन हो सकता है जिसने उस दीवार के अन्दर सरस्वती से बातचीत की थी? संभव है कि बैताल की तरह वह भी इंदुमति, जमना और सरस्वती का दुश्मन हो और मुझे सुनाने और धोखे में डालने के लिए उसने यह ढंग रचा हो। हो सकता है, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। साथ ही इसके यह भी तो सोचना चाहिए कि अगर जमना, सरस्वती का ऐसा ही बुरा काम करना होता तो वे मुझे और इंदुमति को अपने घर क्यों लातीं और मेरे साथ ऐसा अच्छा सलूक क्यों करती? नहीं-नहीं, इंदुमति से मुझे ऐसी आशा नहीं हो सकती। वह इंदुमति जो लड़कपन से आज तक अपने विशुद्ध आचरण के कारण बराबर अच्छी और नेक गिनी गई है आज ऐसा कर्म करे यह कब संभव है? और हो भी तो क्या आश्चर्य है,आदमी के दिल को बदलते क्या देर लगती है? जो हो मगर मुझे ऐसी जल्दी न करनी चाहिए थी। और कुछ नहीं तो इंदुमति से हरदेई वाली बात खुलासे-तौर पर कहकर उसका जवाब भी तो सुन लेना उचित था। आह, मैंने जो कुछ किया वह कर्तव्य के विरुद्ध था। हरदेई ने जरूर मुझे धोखे में डाला, वह दगाबाज थी, अगर ऐसा न होता तो मेरे जेब से तिलिस्मी किताब चुराकर क्यों भाग जाती? परन्तु उसके भाग जाने का भी तो कोई सबूत नहीं है। उसका खून से भरा हुआ कपड़ा केलों के झुरमुट में मिला था जिसमें खयाल हो सकता है कि वह दुश्मनों के हाथ पड़ गई। लेकिन अगर ऐसा ही था और दुश्मन उसके सर पर आ गया था तो उसने चिल्लाकर मुझे जगा क्यों न दिया! संभव है कि वह खून से भरा हुआ कपड़ा हरदेई ही के हाथ का रखा हो।

इस तरह की बातें थोड़ी देर तक प्रभाकर सिंह सोचते और दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने से बेचैन होते रहे, परन्तु इस बात का ठीक निश्चय नहीं कर सकते थे कि उन्होंने जो कुछ बर्ताव इंदुमति के साथ किया वह उचित था या अनुचित।

इस तरह की चिंता करते-करते संध्या हो गई। सूर्य भगवान इस दुनिया को छोड़ किसी दूसरी दुनिया को अपनी चमक-दमक से प्रफुल्लित करने के लिए चले गये। यह बात औरों को चाहे बुरी मालूम हो परन्तु खुले दिल से मुँह दिखाने वालों से आसमान के सितारों को बहुत भली मालूम हुई। अस्तु वे दुनिया के विचित्र मामले को लापरवाही के साथ देखने के लिए निकल आये और औरों के साथ ही प्रभाकर सिंह की अवस्था पर अफसोस करने लगे। प्रभाकर सिंह अपने विचारों में ऐसे डूबे हुए थे कि उनको इस बात की कुछ खबर ही न थी।

जब रात कुछ ज्यादा बीत गई और सर्दी लगने लगी तब प्रभाकर सिंह चैतन्य हुए और आसमान की तरफ देखकर आश्चर्य करने लगे तथा अपने ही आप बोल उठे, “ओह बहुत देर हो गई। मैंने इस तरफ कुछ ध्यान ही नहीं दिया और न अपने लिए कुछ बंदोबस्त ही किया। अस्तु अब तो रात इसी जंगल मैदान में बिता देनी पड़ेगी।”

अपनी चिंता में निमग्न प्रभाकर सिंह को खाने-पीने की तथा और किसी जरूरी काम की फिक्र न रही वे पुन : उसी तरह सिर नीचा करके सोचने लग गये। ऐसी अवस्था में निद्रादेवी ने भी उनका साथ छोड़ दिया और उन्हें अपने खयाल में डूबे रहने दिया।

आधी रात बीत जाने के बाद अपनी बाईं तरफ कुछ उजाला देख प्रभाकर सिंह चौंक पड़े और उजाले की तरफ देखने लगे। यह रोशनी उसी दीवार के अन्दर से आ रही थी जिसके अन्दर जाकर प्रभाकर सिंह ने जमना, सरस्वती और इंदुमति से मुलाकात की थी और अनुचित अवस्था में उनका तिरस्कार किया था।

यह रोशनी मामूली नहीं थी बल्कि बहुत ज्यादा और दिल में खुटका पैदा करने वाली थी। मालूम होता था कि कई मन लकड़ियाँ बटोरकर उसमें किसी ने आग लगा दी हो। प्रभाकर सिंह का दिल धड़कने लगा और वे घबराहट के साथ उस पल-पल में बढ़ती हुई रोशनी को बड़े गौर से देखते हुए उठ खड़े हुए।

प्रभाकर सिंह के दिल की इस समय क्या अवस्था थी इसका कहना बड़ा ही कठिन है। यद्यपि वे उस दीवार के अन्दर जाकर उस रोशनी का कारण जानने के लिए उत्कंठित हो रहे थे परन्तु दिल की परेशानी और घबराहट ने मानो उनकी ताकत छीन ली थी और पैर उठाना भारी हो गया था। तथापि उन्होंने बड़ी कठिनता से अपने दिल को सम्हाला और धीरे-धीरे कदम उठाकर उसी दीवार की तरफ आने लगे। जब उस दीवार के पास पहुँचे तो उसी खिड़की की राह उसके अन्दर घुसे जिस राह से पहिले गये थे। इस समय वह रोशनी जो एक दफे बड़ी तेजी के साथ बढ़ चुकी थी धीरे-धीरे कम होने लगी थी।

जहाँ पर जमना, सरस्वती और इंदुमति से मुलाकात हुई थी वहाँ पहुँचकर प्रभाकर सिंह ने देखा कि एक बहुत बड़ी चिता सुलग रही है और बहुत ध्यान देने पर मालूम होता है कि उसके अन्दर कोई लाश भी जल रही है जो अब अन्तिम अवस्था को पहुँचकर भस्म हुआ ही चाहती है। धुएँ में बदबू होने से भी इस बात की पुष्टि होती थी।

प्रभाकर सिंह का दिल बड़ी तेजी के साथ उछल रहा था और वे बेचैनी और घबराहट के साथ उस चिता को देख रहे थे कि यकायक उनकी आँखें डबडबा आईं और गरम-गरम आँसू उनके गुलाबी गालों पर मोतियों की तरह लुढ़कने लगे। इससे भी उनके दिल की हालत न सम्हाली और वे बड़े जोर से पुकार उठे, “हाय इन्दे! क्या यह धधकती हुई अग्नि के अन्दर तू ही तो नहीं है? इतना कहकर प्रभाकर सिंह जमीन पर बैठ गए और सिर पर हाथ रखकर अपने दिल को काबू में लाने की कोशिश करने लगे।

घंटे भर तक अपने को सम्हालने का उद्योग करने पर भी वे कृतकार्य न हुए और फिर उठ कर बड़ी बेदिली के साथ पुन : उसी चिता की तरफ देखने लगे जो अब लगभग निर्धूम हो रही थी परन्तु उसकी रोशनी दूर-दूर तक फैल रही थी।

घर पर बनाएं रेस्टोरेंट जैसी दाल, हर कोई चाटता रह जाएगा उंगलियां: Dal Fry Recipe

यकायक प्रभाकर सिंह की निगाह किसी चीज पर पड़ी जो उस चिता से कुछ दूरी पर थी परन्तु आग की रोशनी के कारण अच्छी तरह दिखाई दे रही थी। प्रभाकर सिंह उसके पास चले गये और बिना कुछ सोचे-विचारे उसे उठाकर बड़े गौर से देखने लगे। यह कपड़े का एक टुकड़ा था जो हाथ भर से कुछ ज्यादा बड़ा था। प्रभाकर सिंह ने पहिचाना कि यह इंदुमति की उसी साड़ी में का टुकड़ा है जिसे पहिरे हुए उसे आज उन्होंने उस जगह पर देखा था। इस टुकड़े ने उनके लिद को चकनाचूर कर दिया और उस समय तो उनकी अजीब हालत हो गई जब उसे टुकड़े के एक कोने में कुछ बँधा हुआ उन्होंने देखा। खोलने पर मालूम हुआ कि वह एक चिट्ठी है जिसकी लिखावट ठीक इंदुमति के हाथ की लिखावट की-सी है, परन्तु अफसोस कि इस रोशनी में तो वह पढ़ी ही नहीं जाती और चिता की आँच अपने पास आने की इजाजत नहीं देती। अब उस चिता में इतनी रोशनी भी नहीं रह गई थी कि दूर ही से इस लिखावट को पढ़ सकें।

इस समय कोई दुश्मन भी प्रभाकर सिंह की बेचैनी को देखता तो कदाचित् उनके हाथ हमदर्दी का बर्ताव करता।

धीरे-धीरे चिता ठंडी हो गई मगर प्रभाकर सिंह ने उसका पीछा न छोड़ा, उस के पास ही बैठकर रात बिता दी। हाथ में वह कागज लिए हुए कई घंटे तक प्रभाकर सिंह सुबह की सुफेदी का इंतजार करते रहे और जब पत्र पढ़ने योग्य चाँदना हो गया तब उसे बड़ी बेचैनी के साथ पढ़ने लगे। यह लिखा हुआ था-

“प्राणनाथ! बस हो चुका, दुनिया इतनी ही थी। मैं अब जाती हूँ और तुम्हें दयामय परमात्मा के सुपुर्द करती हूँ। मैं जब तक इस दुनिया में रही बहुत ही सुखी रही, तरह-तरह के दुःख भोगने पर भी मुझे विशेष कष्ट न हुआ क्योंकि तुम्हारे प्रेम का सहारा हरदम मेरे साथ था। इसे अतिरिक्त आशालता की हरियाली जिसका सब कुछ संबंध तुम्हारे ही शरीर के साथ था, मुझे सदैव प्रसन्न रखती थी, परन्तु अब इस दुनिया में मेरे लिए कुछ नहीं रहा और मेरी वह आशालता भी बिलकुल ही सूख गई। तुम्हारे अतिरिक्त यदि और कुछ इस दुनिया में मुझे देना होता तो मैं अवश्य जीती रहती परन्तु नहीं, जब तुम्हीं ने मुझे त्याग दिया तो अब क्यों और किसके लिए जिऊँ? मैं इसी विचार से बहुत संतुष्ट हूँ कि तुम्हारे मेरे लिए दुःख न होगा क्योंकि किसी दुष्ट की कृपा से तुम मुझसे रुष्ट हो चुके हो इसलिए तुमने मुझे त्याग दिया और तुम्हें मेरे मरने का कुछ भी दुखी न होगा, परन्तु यदि कदाचित् किसी समय इस जालसाजी का भंडा फट जाय और तुम्हारे विचार से मैं बेकसूर समझी जाऊँ तो यही प्रार्थना है कि तुम मेरे लिए कदापि दुखी न होना, बस…”

इस पत्र को पढ़कर प्रभाकर सिंह बहुत बेचैन हुए। मालूम होता था कि किसी ने अन्दर घुस और हाथ से पकड़ के उनका कलेजा ऐंठ दिया है। यद्यपि उन्होंने इंदुमति का तिरस्कार कर दिया था परन्तु इस समय उनके दिल ने गवाही दे दी कि ‘हाय, तूने व्यर्थ इंदुमति को त्याग दिया! वह वास्तव में निर्दोष थी इसी कारण तेरे उन शब्दों को बर्दाश्त न कर सकी जो उसके सतीत्व में धब्बा लगाने के लिए तूने कहे थे! हाय इन्दे! अब मुझे मालूम हो गया कि तू वास्तव में निर्दोष थी, आज नहीं तो कल इस बात का पता लग ही जाएगा।’ इतना कहकर प्रभाकर सिंह ने पुन : उस चिता की तरफ देखा और कुछ सोचने के बाद गरम-गरम आँसू बहाते हुए वहाँ से रवाना हुए मगर उनकी भृकुटी, उनके फड़कते हुए होंठ और उनकी लाल-लाल आँखों से जाना जाता है कि इस समय किसी से बदला लेने का ध्यान उनके दिल में जोश मार रहा था।

उस दीवार के बाहर हो जाने के बाद प्रभाकर सिंह को यकायक यह खयाल पैदा हुआ कि इंदुमति का हाल तो जो हुआ मालूम हो गया, परन्तु जमना और सरस्वती के विषय में कुछ मालूम न हुआ, संभव है कि वहाँ उन लोगों ने भी इसी तरह कुछ लिखकर रख दिया हो मुलाकात हो गई तो उनकी जुबानी इंदुमति की अन्तिम अवस्था का ठीक-ठाक हाल मालूम हो जाएगा। यह सोचकर प्रभाकर सिंह पुन : पलट पड़े और उस चिता के पास जाकर इधर-उधर देखने लगे परन्तु और किसी बात का पता न लगा, लाचार प्रभाकर सिंह लौटकर उस दीवार के बाहर निकल आये।

अब दिन घंटे-भर से ज्यादा चढ़ चुका था। दीवार के बाहर निकलकर प्रभाकर सिंह कुछ सोचने लगे और इधर-उधर देखने के बाद कुछ सोच कर एक पेड़ के ऊपर चढ़ गये और दूर तक निगाह दौड़ा कर देखने लगे। यकायक उनकी निगाह हरदेई के ऊपर पड़ी जो उसी दीवार की तरफ बढ़ी जा रही थी जिकसे अन्दर जमना, सरस्वती और इंदुमति को प्रभाकर सिंह ने छोड़ा था। हरदेई को देखते ही प्रभाकर सिंह पेड़ के नीचे उतरे और बड़ी तेजी के साथ उसी तरफ जाने लगे।

यह हरदेई वही नकली हरदेई थी जो एक दफे प्रभाकर सिंह को धोखे में डाल चुकी थी अर्थात् भूतनाथ का शागिर्द रामदास इस समय भी हरदेई की सूरत बना हुआ भूतनाथ के साथ ही इस तिलिस्म के अन्दर आया हुआ था और पुन : जमना, सरस्वती, इंदुमति और प्रभाकर सिंह को धोखे में डालकर अपना या अपने ओस्ताद का कुछ काम निकालना चाहता था, मगर इस समय उसे यह खबर न थी कि प्रभाकर सिंह मुझे देख रहे हैं और न प्रभाकर सिंह से मिला ही चाहता था।

रामदास ने जब आशा के विरुद्ध प्रभाकर सिंह को अपनी तरफ आते देखा तो ताज्जुब में आकर चौंक पड़ा तथा भाग जाना मुनासिब समझकर खड़ा हो गया और सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए।

प्रभाकर सिंह : (नकली हरदेई के पास पहुँचकर) हरदेई, तू यहाँ कैसे आई?

हरदेई : मेरी किस्मत मुझे यहाँ ले आई। मैं तो उसी समय अपनी जान से हाथ धो चुकी थी जिस समय आपसे अलग हुई थी, मगर मेरी किस्मत में अभी कुछ और जीना बदा था इसलिए एक महापुरुष की मदद से बच गई।

प्रभाकर सिंह : आखिर तुम पर क्या आफत आई थी सो तो सुनूँ?

हरदेई : आप जब थकावट मिटाने के लिए चबूतरे पर लेट गये तो उसी समय आपकी आँख लग गई, मैं बड़ी देर तक चुपचाप बैठी-बैठी घबड़ा गई थी इसलिए उठ कर इधर-उधर टहलने लगी। घूमती-फिरती मैं कुछ दूर निकल गई, उसी समय यकायक पत्तों के झुरमुट में से एक आदमी निकल आया जो स्याह कपड़े और नकाब से अपने बदन और चेहरे को छिपाए हुए था। मैं उसे देखकर घबड़ा गई और दौड़ कर आपकी तरफ आने लगी मगर उसने झपटकर मुझे पकड़ लिया और एक मुक्का मेरी पीठ पर इस जोर से मारा कि मैं तिलमिला कर बैठ गई। उसने मुझे जबरदस्ती कोई दवा सूंघ दी जिससे मैं बेहोश हो गई और तनोबदन की सुधि जाती रही। दूसरे दिन जब मैं होश में आई तो अपने को मैदान और जंगल में पड़े हुए पाया, तब से मैं आपको बराबर खोज रही हूँ।

प्रभाकर सिंह : (हरदेई की बेतुकी बातों को ताज्जुब से सुनकर) आखिर उसने तुझे इस तरह सता कर क्या फायदा उठाया?

हरदेई : (कुछ घबड़ानी सी होकर) सो तो मैं कुछ भी नहीं जानती।

प्रभाकर सिंह : उसने छुरी या खंजर से तुझे जख्मी तो नहीं किया?

हरदेई : जी नहीं।

प्रभाकर सिंह : मैं जब सोकर उठा तो तुझे ढूँढ़ने लगा। एक जगह केले के झुरमुट में तेरे कपड़े का टुकड़ा खून से भरा हुआ देखा था जिससे मुझे खयाल हुआ कि हरदेई को किसी ने खंजर या छुरी से जख्मी किया है।

हरदेई : जी नहीं, मुझे तो इस बात की कुछ भी खबर नहीं।

प्रभाकर सिंह : और वह महात्मा पुरुष कौन थे जिन्होंने तुझे बचाया? अभी-अभी तो तू कह चुकी है कि ‘बेहोशी के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को मैदान और जंगल में पड़े हुए पाया’ अस्तु कैसे समझा जा कि किसी महापुरुष ने तुझे बचाया?

नकली हरदेई के चेहरे पर घबराहट की निशानी छा गई और वह इस भाव को छिपाने के लिए मुड़ कर पीछे की तरफ देखने लगी मगर प्रभाकर सिंह इस ढंग को अच्छी तरह समझ गए और जरा तीखी आवाज में बोले, “बस मुझे ज्यादा देर तक ठहरने की फुरसत नहीं है, मेरी बात का जवाब जल्दी-जल्दी देती जा!”

हरदेई : जी हाँ, जब मैं खुलासे-तौर पर अपना हाल कहूँगी तब आपको मालूम हो जाएगा कि वह महात्मा कौन था और अब कहाँ हैं जिसने मुझे बचाया था, मैंने संक्षेप में ही अपना हाल आपसे कहा था।

प्रभाकर सिंह : खैर तो वह खुलासा हाल कहने में देर क्या है! अच्छा जाने दे खुलासा हाल में भी सुन लूँगा, पहिले तेरी तलाशी लिया चाहता हूँ।

हरदेई : (घबड़ाकर) तलाशी कैसी और क्यों?

प्रभाकर सिंह : इसका जवाब मैं तलाशी लेने के बाद दूँगा।

हरदेई : आखिर मुझ पर आपको किस तरह का शक हुआ?

प्रभाकर सिंह : मुझे कई बातों का शक हुआ जो मैं अभी कहना नहीं चाहता। इतना कहते ही कहते प्रभाकर सिंह ने हरदेई का हाथ पकड़ लिया क्योंकि उसने रंग-ढंग से मालूम होता था कि वह भागना चाहती है। हरदेई ने पहिले तो चाहा कि झटका देकर अपने को प्रभाकर सिंह के कब्जे से छुड़ा ले मगर ऐसा न हो सका। प्रभाकर सिंह ने जब देखा कि यह धोखा देकर भाग जाने की फिक्र में है तब उन्हें बेहिसाब क्रोध चढ़ आया और एक मुक्का उसकी गरदन पर मार कर जबरदस्ती उन्होंने उसके ऊपर का कपड़े बैंच लिया।

रामदास यद्यपि ऐयार था मगर उसमें इतनी ताकत न थी कि वह प्रभाकर सिंह का मुकाबला कर सकता। प्रभाकर सिंह के हाथ का मुक्का खाकर वह बेचैन हो गया और उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया, और फिर उसकी हिम्मत न पड़ी कि वह भाग जाने के लिए उद्योग करे। प्रभाकर सिंह को भी विश्वास हो गया कि यह हरदेई नहीं बल्कि कोई ऐयार है। मामूली कपड़ा उतार लेने के साथ ही प्रभाकर सिंह का बचा-बचाया शक भी जाता रहा, साथ ही इसके उन्होंने यह भी निश्चय कर लिया कि हमारी तिलिस्मी किताब जरूर इसी ऐयार ने चुराई है।

तिलिस्मी किताब पा जाने की उम्मीद में प्रभाकर सिंह ने जहाँ तक हो सका बड़ी होशियारी के साथ उसकी तलाशी ली और उसके ऐयारी के बटुए में भी, जिसे वह छिपाकर रखे हुए था, देखा मगर किताब हाथ न लगी। तलाशी में केवल ऐयारी का बटुआ, खंजर और एक कटार उसके पास से मिला जिसे प्रभाकर सिंह ने अपने कब्जे में कर लिया और पूछा, “बस अब तो तेरा भेद अच्छी तरह खुल गया। खैर यह बता कि तेरा क्या नाम है और मेरे साथ तूने इस तरह की दगाबाजी क्यों की?”

रामदास : क्या जो कुछ मैं बताऊँगा उस पर आप विश्वास कर लेंगे?

प्रभाकर : नहीं।

रामदास : फिर इसे पूछने से फायदा क्या?

प्रभाकर सिंह ने क्रोध-भरी आँखों से सिर से पैर तक उसे देखा और कहा, “बेशक् कोई फायदा नहीं मगर तूने मेरे साथ बड़ी दगाबाजी की और व्यर्थ ही बेचारी इंदुमति पर झूठा कलंक लगाकर उसे और साथ-ही-साथ इसके मुझे भी बर्बाद कर दिया।”

रामदास : बेशक् मैंने किया तो बहुत बुरा मगर मैं तो ऐयार हूँ, मालिक की भलाई के लिए उद्योग करना मेरा धर्म है। जो कुछ मुझसे बन पड़ा किया, अब आपके कब्जे में हूँ जो उचित और धर्म समझिए कीजिए।

प्रभाकरसिंह : (क्रोध को दबाते हुए) तू किसका ऐयार है?

रामदास : मैं पहिले ही कह चुका हूँ कि मेरी बातों पर आपको विश्वास न होगा, फिर इन सब बातों को पूछने से फायदा क्या है?

प्रभाकर सिंह का दिल पहिले ही से जख्मी हो रहा था, अब जो मालूम हुआ कि हरदेई वास्तव में हरदेई नहीं है बल्कि कोई ऐयार है और इसने धोखा देकर अपना काम निकालने के लिए इंदुमति, जमना और सरस्वती को बदनाम किया था तो उनके दुःख और क्रोध की सीमा न रही, तिस पर रामदास की ढिठाई ने उसकी क्रोधाग्नि को और भड़का दिया, अस्तु वे उचित-अनुचित का कुछ भी विचार न कर सके। उन्होंने रामदास की कमर में एक लात ऐसी मारी कि वह सम्हाल न सका और जमीन पर गिर पड़ा, इसके बाद लात और जूते ने उसकी ऐसी खातिरदारी की कि वह बेहोश हो गया और उसके मुँह से खून भी बहने लगा। इतने पर भी प्रभाकर सिंह का क्रोध शान्त न हुआ और उसे कुछ और सजा दिया चाहते थे कि सामने से आवाज आई, “हाँ, हाँ, बस जाने दो, हो चुका, बहुत हुआ।”

प्रभाकर सिंह ने आँख उठाकर सामने की तरफ देखा तो एक वृद्ध महात्मा पर उनकी निगाह पड़ी जो तेजी के साथ प्रभाकर सिंह की तरफ बढ़े आ रहे थे।

भूतनाथ-खण्ड-3/ भाग-6 दिनांक 16 Mar. 2022 समय 06:00 बजे साम प्रकाशित होगा

Leave a comment