‘अब मैं जाऊं?’
‘ऊंहु! अभी नहीं।’
‘देखो-काली घटाएं घिर रही हैं।’
‘तो क्या हुआ?’ अखिल ने पूछा और गोद में लेटी शिल्पा के होंठों पर उंगली फिराने लगा।
दोनों एक पार्क में झाड़ियों के पीछे बैठे थे।
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शिल्पा की आंखें बंद थीं। वह बोली- ‘वर्षा रानी आ जाएगी।’
‘ईश्वर करे कि वर्षा हो और ऐसी जमकर बरसे कि हम घर ही न जा सकें। पूरी रात यहीं रहें-इसी पार्क में।’
‘पगले कहीं के।’ शिल्पा ने मुस्कुराकर कहा और उठ गई।
अखिल ने उठकर निःश्वास ली और शिल्पा का हाथ थामकर बोला- ‘वास्तव में जा रही हो?’
‘जाना आवश्यक है। पापा के लिए दवाई खरीदनी हैं। मम्मी की तबीयत भी सुबह से ठीक नहीं है। मुझे तो चिंता है कि मेरे पश्चात् उनका क्या होगा।’
‘चिंता न करो। हम उनका पूरा-पूरा ख्याल रखेंगे। अब कब मिलोगी?’
‘शादी वाले दिन।’
‘बाप रे!’ यह एक सप्ताह का समय कैसे कटेगा।’
‘कुछ इंतजार में-कुछ यादों के सहारे। आओ चलें।’
फिर वे पार्क से बाहर आए और विपरीत दिशाओं में बढ़ गए। फुटपाथ पर अपने घर की ओर बढ़ते समय भी अखिल शिल्पा के विषय में ही सोचता रहा। एकाएक पीछे से आने वाली एक गाड़ी के ब्रेक ठीक उसके निकट चरमराए और अखिल चौंककर पीछे की ओर देखने लगा। किन्तु जो कुछ देखा-उसे देखते ही उसके चेहरे पर कडुवाहट-सी फैल गई।
यह निखिल था-जो गाड़ी से उतरकर उसी की ओर बढ़ रहा था। अखिल के कदम रुक गए। निखिल समीप आकर उसे कुछ क्षणों तक तो ध्यान से देखता रहा और फिर बोला- ‘कैसा है रे!’
‘अच्छा हूं।’ अखिल ने धीरे से उत्तर दिया। नजरें झुकी रहीं।
‘और-मम्मी-पापा?’
‘वे भी अच्छे हैं।’
‘आरती-भारती दीदी?’
‘सब ठीक हैं।’
इसके उपरांत कुछ क्षणों तक मौन रहा।
इस मौन को तोड़ते हुए निखिल फिर बोला- ‘सुना है-तेरी शादी हो रही है?’
‘हां।’
‘कब?’
‘ठीक एक सप्ताह बाद-15 को।’
‘लड़की कैसी है?’
‘अच्छी है।’
‘नाम…।’
‘शिल्पा वर्मा।’
‘एक बात मानेगा?’
‘वह क्या?’
‘मैं चाहता हूं-यह विवाह न हो।’
‘कारण?’
‘शिल्पा अच्छी लड़की नहीं।’
‘शिल्पा-अथवा आप स्वयं?’
‘क्या मतलब?’
अखिल ने इस बार नजरें ऊपर उठाईं और घृणा से बोला- ‘आप बता सकते हैं-आपके अंदर कौन-सी अच्छी बात है। ऐसा कौन-सा बुरा काम है-जो आप नहीं करते? ऐसा कौन-सा पाप है, जिसका साया प्रत्येक समय आपके साथ नहीं रहता? ऐसी कौन-सी बुराई है जो आपने निकटता से नहीं देखी।’
‘अखिल!’
‘आपने गैर कानूनी ढंग से दौलत इकट्ठी की। आपने अपने देश और समाज के साथ विश्वासघात किया। आप सुबह से शाम तक कई बार शराब पीते हैं और बाजारू लड़कियों के साथ घूमते हैं।’
‘चुप रहो अखिल!’ निखिल गुस्से से चीख पड़ा।
‘बात चुप रहने की नहीं भाई साहब!’ अखिल के स्वर में वही घृणा, वही तड़प और वही कडुवाहट थी। वह बोला- ‘बात है अच्छाई-बुराई की। शिल्पा के विषय में कुछ कहने से पहले आपको अपने गिरेबान में भी देखना चाहिए था। इंसान को चाहिए कि वह दूसरों के दोष देखने से पूर्व, अपने दोषों को दूर कर दे। और कुछ कहना है आपको?’
क्रोध और अपमान के कारण निखिल का समूचा जिस्म थर-थर कांप रहा था। किसी प्रकार अपने क्रोध को दबाते हुए वह बोला- ‘तू-तू भाई होकर भी मेरी इतनी-सी प्रार्थना नहीं मान सकता?’
‘भाई!’ व्यंग्य एवं जहर से भरी मुस्कुराहट के साथ अखिल बोला- ‘हुं-यह किसने कह दिया कि मैं आपका भाई हूं। आपका-मेरा रिश्ता ही क्या है? मैंने श्रीमान राजाराम जी के घर में जन्म लिया है और आप दौलत की दुनिया में पैदा हुए हैं।’
‘अखिल! अपनों से इतनी घृणा ठीक नहीं होती।’
‘अपनों से घृणा कोई करता भी नहीं है मिस्टर निखिल वर्मा! घृणा की जाती है दुश्मनों से।’
‘तो यूं कह न कि मैं तुम लोगों का दुश्मन हूं।’
‘जो व्यक्ति श्रीमान राजाराम जी के वंश में पैदा हुआ हो और जिसने उन्हीं के वंश पर कलंक लगाया हो-कीचड़ उछाली हो खानदान की इज्जत पर-ऐसा व्यक्ति हमारा दोस्त नहीं हो सकता मिस्टर निखिल वर्मा! अतः आप अपने दिमाग से यह बात निकाल दें कि आप हमारे अपने हैं-अथवा आपका हमसे कोई रिश्ता है। अच्छा होगा कि आप हमें भूल जाएं-क्योंकि हम आपको बहुत पहले भूल चुके हैं। हम भूल चुके हैं कि मिस्टर निखिल वर्मा हमारे अपने थे। हम यह भी भूल चुके हैं कि उन्होंने श्रीमती कौशल्या देवी की कोख से जन्म लिया था। आपने रिश्तों की चिता जलाई और हमने उसे जलांजली देकर अपने आपको समझा लिया मिस्टर निखिल वर्मा! पीड़ा हुई-किन्तु हम सब उसे विधाता का वरदान मानकर पी गए। हृदय का एक टुकड़ा कहीं दूर गिरा-और हमने उसे यह सोचकर न उठाया कि वह हमारा अपना न था। और-अब तो हम यही चाहते हैं कि वह टुकड़ा कभी हमारे समीप न आए-कभी हमसे न कहे कि वह हमारा अपना है।’ अखिल ने घृणा एवं क्रोध से कहा और तेजी से आगे बढ़ गया।
निखिल की आंखों में आंसू छलक आए।
वह कुछ क्षणों तक तो अखिल को डबडबाई आंखों से देखता रहा और फिर शीघ्रता से उसका मार्ग रोककर दयनीय स्वर में बोला- ‘अखिल! यह सब कहकर तूने बहुत बड़ा इनाम दिया मुझे। बहुत बड़ा इनाम दिया मेरे प्यार-दुलार का। किन्तु तेरा यह कहना झूठ है कि तू मुझे भूल चुका है। यह सत्य नहीं है कि तेरे-मेरे बीच कोई रिश्ता नहीं रहा। मेरे भाई! जो रिश्ते मां की कोख में बनते हैं और पिता की बांहों में किलकारियां मारते हैं, उन्हें तोड़ना इतना सरल नहीं होता। तू दूर रहकर भी मेरे पास रहेगा। तू पराया बनकर भी मेरा अपना रहेगा। और जानता है ऐसा क्यों होगा? क्योंकि हमें जन्म देने वाली मां एक ही है, क्योंकि हमने एक ही कोख में पांव फैलाए हैं।’
अखिल ने उपेक्षा से कहा- ‘मुझे आपकी इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं मिस्टर निखिल वर्मा!’
‘मत ले दिलचस्पी, किन्तु बस मेरी एक प्रार्थना मान ले। इस शादी को रोक दे। मत कर यह शादी-तोड़ दे इस रिश्ते को। तोड़ दे अखिल भइया! देख-देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूं। यह शादी न रुकी तो बहुत बड़ा अन्याय हो जाएगा। यह-यह पाप होगा अखिल!’ कहते-कहते निखिल ने अपने हाथ जोड़ दिए। उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे।
यह सुनकर अखिल घृणा से बोला- ‘पाप, पुण्य और अन्याय। मिस्टर निखिल वर्मा! मैं यह भली प्रकार जानता हूं कि यह शब्द आपकी जुबान पर क्यों आए हैं। वास्तव में मेरा आपसे पहले विवाह होना अन्याय तो है ही-एक प्रकार से पाप भी है। और यह सब इसलिए-क्योंकि मैं आपसे छोटा हूं, क्योंकि पारिवारिक नियमों के अनुसार शादी का सेहरा पहले बड़े भाई के सिर पर बंधता है और यहां इसके विपरीत हो रहा है-अन्याय की बात तो है ही। अन्याय की नहीं-दुःख की भी। खैर-अब इजाजत दीजिए। बहुत देर हो गई-नमस्ते!’ इसके उपरांत अखिल तेज-तेज पग उठाते हुए वहां से चला गया।
निखिल की आंखों से आंसुओं की बूंदें ढुलकती रहीं।
मनु ने गुन-गुनाते हुए कमरे में पांव रखे और चौंक गई। मुस्कुराते हुए होंठ एक-दूसरे से यों जकड़ गए-मानो खुलना ही न जानते हों। आनंद कुर्सी पर बैठा हुआ सिगरेट फूंक रहा था।
मनु फिर आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ी और बैग रखकर अपने बाल संवारने लगी।
आनंद ने उसे देखकर व्यंग्य से कहा- ‘लौट आईं आप?’
‘तुम कब आए।’ उत्तर देने के बजाय मनु ने प्रश्न किया।
‘आया तो अभी हूं, किन्तु कॉलेज न गया था।’
‘फिर कहां रहे?’
‘सागर…सरोवर में नौका विहार करता रहा।’
मनु के सामने विस्फोट-सा गूंज गया। चौंककर उसने आनंद को देखा। आनंद उठकर बोला- ‘सचमुच बहुत अच्छा था मौसम। आकाश में घटाएं, ठंडी हवाएं और किनारे से टकराती सरोवर की लहरों का धीमा-धीमा संगीत। मैं तो सब कुछ भूल गया इस दृश्य को देखकर। लौटने का मन ही न था। सच-कितना सुख मिलता है प्रकृति की गोद में लेटकर! हवाओं से बातेें करते हुए-लहरों से खेलते हुए यों लगता है मानो प्रकृति स्वयं नृत्य कर रही हो।’
मनु का हृदय कांप गया।
समझते देर न लगी कि आनंद ने उसका पीछा किया होगा। फिर भी स्वयं को संभालकर वह शुष्क स्वर में बोली- ‘तुम-तुम कहना क्या चाहते हो?’
‘मुबारकबाद देना चाहता हूं तुम्हें।’ मनु के समीप आकर आनंद बोला- ‘इस बात के लिए कि तुम्हें अपना खोया हुआ प्यार मिल गया। वह प्यार, जिसे तुमने किसी वक्त ठोकर मार दी थी-आज फिर तुम्हारे हृदय से लग गया। किन्तु यह सब एकाएक कैसे हो गया?’
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‘किसकी बात कर रहे हो?’
‘निखिल की।’ एक वही तो है जिसे तुम अपना पहला प्यार कह सकती हो।’
‘मेरा कोई प्यार नहीं।’
‘तो फिर यह सब क्या है?’
‘क्या है?’
‘तुम्हारे उसके साथ मांडका के खंडहरों में घूमना, रोशनी बाग में मिलना और उसके साथ सागर सरोवर में नौका विहार करना। और मिलन भी ऐसा जिसमें जन्म-जमांतर की प्यास मिटी हो। ऐसा मिलन-जिसमें दो जिस्म एक जान हो गए हों। बता सकती हो-यह सब क्या था?’
मनु ने कुछ न कहा और ब्रुश रखकर बिस्तर पर बैठ गई। कुछ क्षणोपरांत अपनी ओर एक पत्रिका सरकाकर वह बोली- ‘मेरे पास तुम्हारे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं।’
‘उत्तर तो तुम्हें देना पड़ेगा मनु!’ आनंद का स्वर एकाएक कठोर हो गया। उसने सिगरेट ऐश ट्रे में डाल दी और मनु के पास आकर उसे घूरते हुए बोला- ‘इसलिए देना पड़ेगा-क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो, तुमने विवाह किया है मुझसे।’
‘तुम चाहो तो इस संबंध को तोड़ सकते हो।’
‘क्या!’ आनंद के चेहरे पर यह सुनते ही सन्नाटा फैल गया। मनु की ओर से ऐसे उत्तर की आशा उसे न थी। क्षण भर मौन रहने के उपरांत वह घृणा से बोला- ‘मैं-मैं इस संबंध को तोड़ दूं?’
‘हां!’ मनु दृढ़ता से बोली- ‘यदि हम दोनों को एक-दूसरे पर विश्वास नहीं तो फिर यह ही ठीक रहेगा।’
‘और उस प्यार का क्या होगा?’
‘कौन-सा प्यार?’
‘वही जो तुमने मुझसे किया था।’
‘वह एक भूल थी मेरी। यदि मुझे पता होता कि तुम इतने गंदे इंसान हो तो मैं कदापि तुम्हें अपनी ओर बढ़ने का अवसर न देती।’
‘गंदा कौन है-तुम अथवा मैं।’
‘तुम!’ पत्रिका के पृष्ठ पलटते हुए मनु दृढ़ता से बोली- ‘क्योंकि तुमने जिसे प्रेम किया-उसी को शक की नजरों से देखा।’
‘किन्तु तुमने तो जिसे प्यार किया-उसी के साथ विश्वासघात किया।’
‘मैंने किसी के साथ विश्वासघात नहीं किया।’
‘प्रेम किसी से और विवाह किसी से-क्या यह विश्वासघात नहीं। अपने पति को धोखा देकर गैरों के साथ घूमना-क्या यह विश्वासघात नहीं?’
‘नहीं! मैं इसे विश्वासघात नहीं मानती। निखिल मेरा मित्र है और मित्र के साथ घूमना कोई पाप नहीं होता।’
‘मित्र के साथ वासना का खेल खेलना तो पाप होता है।’
‘यू शटअप आनंद!’ मनु एकाएक गुस्से से चीख पड़ी और हाथ में थामी पत्रिका को पटककर बोली- ‘जुबान को लगाम दो अपनी। शर्म आनी चाहिए तुम्हें ऐसे गंदे घिनौने शब्दों का प्रयोग करते हुए।’
आनंद ने घृणा से दांत पीसकर कहा- ‘शर्म तो मुझे वास्तव में आ रही है मनु! शर्म मुझे मांडका में भी आई थी और सागर सरोवर के निकट भी, किन्तु मैं फिर भी इतना बेशर्म निकला कि चुपचाप वहां से चला आया। मेरे स्थान पर कोई और होता तो न जाने वह क्या कर बैठता।’

तभी बातों का सिलसिला रुक गया।
गोपीनाथ कमरे में आ गए थे।
उन्हें देखकर आनंद कमरे से बाहर चला गया। मनु फिर से पत्रिका के पृष्ठ उलटने लगी। गोपीनाथ ने उसे गुस्से में देखा तो बोले- ‘क्या हुआ? आनंद से झगड़ा हो गया?’
‘नहीं-ऐसा कुछ नहीं हुआ पापा, मनु ने बात को छुपाया। वह सब बताकर वह अपने पिता को दुखी करना नहीं चाहती थी।
‘कुछ तो हुआ है। आनंद भी गुस्से में था।’
मनु को कहना पड़ा- ‘आनंद साहब को मेरा निखिल से मिलना-जुलना पसंद नहीं।’
‘क्यों?’
‘वही जानें! मैं निखिल के साथ घूमने चली गई-तो उसका पारा चढ़ गया।’
‘आनंद तो ऐसा न था।’
‘मैंने ही उसे समझने में भूल की।’
‘कोई बात नहीं-मैं उससे बात करूंगा।’ गोपीनाथ ने कहा-फिर कुछ सोचकर बोले- ‘गाड़ी चलाई थी?’
‘हां।’
‘मैं वरयानी के पास जा रहा हूं।’
‘गाड़ी ले जाइए।’
‘सोच तो यही रहा था।’
‘चाबी तो आपके पास होगी?’
‘हां।’
‘खाने के समय तक तो लौट आओगे?’ मनु ने पूछा।
‘कोशिश करूंगा।’ गोपीनाथ ने वॉल क्लॉक में समय देखते हुए कहा और बाहर चले गए।
मनु उठी और खिड़की के सामने आकर बाहर का दृश्य देखने लगी। काली-काली घटाएं अब पूरे आकाश पर फैलती जा रही थीं।
अभिशाप-भाग-13 दिनांक 03 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

