Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

फिल्म तैयार हो चुकी थी। उसका प्रिंट देखकर निखिल ने अनमने ढंग से कहा- ‘ठीक है।’

पाशा उसे ध्यान से देख रहा था। फिर जब निखिल ने अपने लिए शराब का गिलास तैयार किया तो पाशा उससे बोला- ‘सर! क्या आपकी तबीयत ठीक नहीं।’

अभिशाप नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

‘क्यों?’

‘माफ करें सर! आज आपके चेहरे पर वो रौनक नहीं। मैं आपको दोपहर से ही परेशान देख रहा हूं।’

‘हां! हम वास्तव में परेशान हैं पाशा!’ निखिल ने शराब का घूंट भरा और पाशा से कहा- ‘जानते हो क्यों?’

‘नो सर! यदि मैं जानता तो आपसे ऐसा प्रश्न ही क्यों करता?’

‘हमारी परेशानी का कारण है शिल्पा।’

‘मैं समझ गया सर! शिल्पा नौकरी छोड़कर चली गई-इसलिए, किन्तु मैं तो इसे परेशानी जैसी बात नहीं समझता। हमारी फिल्म कंपनी में ऐसी कई लड़कियां काम कर रही हैं, जो शिल्पा से भी अधिक सुंदर हैं। आप कहें तो मैं कामिनी, मधु, प्रिया-किसी को भी आपके पास भेज दूं।’

‘नहीं मिस्टर पाशा! नहीं।’

‘सर!’ पाशा बोला- ‘आज एक नई लड़की और आई थी। नाम है जानू बनर्जी, बंगाली है। किन्तु हुस्न! मैं सच कहता हूं सर! उस जैसी लड़की आपने पहले कभी न देखी होगी। विशेषकर उसकी आंखें और होंठ तो इतने सुंदर हैं कि पूछिए मत। सर! वह हमारी फिल्म में काम करने को तैयार है। मैं अगली फिल्म उसी को लेकर बनाना चाहता हूं। आप कहें तो उसे फोन कर दूं?’

निखिल ने इस बार झुंझलाकर कहा- ‘मिस्टर पाशा! आप गलत सोच रहे हैं। शिल्पा हमारी परेशानी की वजह है, किन्तु इसलिए नहीं कि वह नौकरी छोड़कर चली गई है, बल्कि इसलिए कि वह हमारे छोटे भाई से शादी कर रही है।’

‘व्हाट!’ पाशा चौंककर बोला- ‘यह कैसे हो सकता है सर! एक बाजारू लड़की आपके घर की बहू कैसे बन सकती है।’ आप तो जानते ही हैं सर! कि जो लड़की किसी एक के बिस्तर पर सो सकती है, वह किसी के भी बिस्तर पर सो सकती है। मैं ऐसी लड़कियों को वेश्याएं मानता हूं और एक वेश्या को कोई अधिकार नहीं कि वह किसी के घराने की बहू बने। आपको उन लोगों से बता देना चाहिए कि…।’

‘हमारा उन लोगों से कोई संबंध नहीं।’

‘संबंध नहीं! फिर तो आपको यह सब भूल ही जाना चाहिए सर! वे लोग कुछ भी करें।’ पाशा ने कहा। फिर उसे एकाएक अपनी भूल का अहसास हुआ और वह बोला- ‘सॉरी सर! असली बात तो यह है कि जिस लड़की के साथ आप कई रातें गुजार चुके हैं, वही आपके छोटे भाई की पत्नी बन रही है। मेरा ख्याल है-आप इसे पाप मान रहे हैं। वैसे तो आज की दुनिया में सब कुछ चलता है सर! किन्तु हिन्दू परिवारों में ऐसा कभी नहीं होता। लेकिन-लेकिन आप शिल्पा को तो समझा सकते हैं।’

‘शिल्पा अपनी जिद्द पर अड़ी है।’ निखिल ने कहा और गिलास खाली करके सिगरेट सुलगाने लगा।

‘ब्लैकमेल कर रही है आपको।’ पाशा बोला- ‘मैं इस किस्म की लड़कियों को अच्छी तरह जानता हूं। कोई इनसे एक बार मिल तो ले-उसके बाद ये उसका जोंक की तरह खून पीती हैं। बंबई में मेरे साथ ऐसा ही हुआ था। एक लड़की थी-अच्छी थी। मैं उसके चक्कर में फंस गया। मैंने उसके साथ सिर्फ तीन रातें गुजारीं और चौथे दिन एक लिफाफा मेरे पास भेज दिया। उसमें मेरी तस्वीरें थीं और साथ में था एक पत्र। किन्तु मेरा क्या बिगड़ता-अकेला था। न बीवी न बच्चे। मैंने भी कह दिया कि करो बदनामी-बात खत्म हो गई। मगर यदि बीवी होती तो फांसी का फंदा गले में पड़ जाता। मारे जाते पाशा मियां।’ कहकर पाशा धीरे से हंस पड़ा।

निखिल ने बातों का विषय बदलकर पूछा- ‘पंकज आया था?’

‘यस सर!’

‘स्क्रिप्ट कब मिलेगी?’

‘कल आ जाएगी।’

‘परसों से शूटिंग का काम शुरू कर दो।’

‘ठीक है सर! किन्तु वह लड़की…।’

‘कौन-सी लड़की?’ निखिल ने पूछा।

‘जानू बनर्जी।’ पाशा ने बताया।

‘तुम उसे फिल्म में लेना चाहते हो?’

‘सर! लड़की अच्छी है।’

‘विशेषकर आपके लिए। खैर-फिल्म के डायरेक्टर आप हैं-जैसा उचित समझें वैसा करें।’

‘थैंक्यू सर!’

इसके पश्चात् पाशा चला गया और निखिल अपने लिए फिर से शराब का गिलास भरने लगा। उसी समय फोन की घंटी बजी। निखिल ने रिसीवर उठाया-दूसरी ओर से मनु की आवाज सुनाई दी, निक्की! मैं मनु बोल रही हूं।’

‘कैसी हो?’

‘अच्छी नहीं हूं निक्की।!’

‘क्यों-क्या हुआ?’ निखिल ने चौंककर पूछा।

‘आनंद से झगड़ा हो गया।’

‘मेरी समझ में नहीं आता-तुम उससे निभाओगी कैसे?’

‘निभेगी तो नहीं निक्की!’

‘झगड़ा किस बात पर हुआ?’

‘आनंद हमारा पीछा करता हुआ सागर सरोवर तक पहुंच गया था और उससे पहले मांडका भी गया था।’

‘व्हाट!’ निखिल चौंककर बोला- ‘यह दार्शनिक है अथवा जासूस।’

‘पूरा जासूस है।’

‘इसका मतलब है कि वह अपनी आंखों से सब कुछ देख चुका है?’

‘हां।’

‘फिर तो बात बहुत आगे बढ़ गई होगी?’

‘अभी तो उतनी नहीं बढ़ी, किन्तु बढ़ जाएगी।’

‘क्या करोगी?’

‘मैंने फैसला कर लिया है-मैं उससे संबंध तोड़ लूंगी, फोन पर मनु की आवाज सुनाई पड़ी- ‘बस एक ही शंका है मन में।’

‘वह क्या?’

‘मैंने आनंद से संबंध तोड़ लिए और तुमने मुझे स्वीकार न किया तो…?’

‘कैसी बातें करती हो मनु! मैं तो तुम्हारी राह में पलकें बिछाए बैठा हूं। हर पल प्रतीक्षा कर रहा हूं। तुम आकर तो देखो-तुम्हारे आने से तो मुझे संसार भर की खुशियां मिल जाएंगी। आ जाओ न मनु!’

‘मैं आऊंगी निक्की! मैं जरूर आऊंगी।’

‘आज ही आ जाओ न। बहुत उदास हूं। बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं अपने आपको। तुम आ जाओगी तो बहुत चैन मिलेगा।’

‘नहीं निक्की! अभी स्थाई रूप से आना संभव नहीं। थोड़ा समय लगेगा। पापा से भी कहना पड़ेगा।’

‘तुम आज थोड़ी देर के लिए भी नहीं आ सकतीं?’

‘नहीं बाबा! आज नहीं। आनंद घर पर ही हैं। कल वह कॉलेज जाएगा तब देखूंगी।’

‘किस समय?’

‘दस और चार के बीच। वहीं तुम्हारे स्टूडियो में। ओ-के-।’

‘ओ-के-।’ निखिल ने कहा ओर एक निःश्वास लेकर रिसीवर रख दिया। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी उलझनें न थीं।

अखिल जब घर लौटा तो उस समय राजाराम बरामदे में बैठा आज का समाचार-पत्र देख रहा था। अखिल को देखकर वह बड़बड़ाया- ‘विचित्र-सी बात है। 20 करोड़ की डकैती का रहस्य आज तक नहीं खुला। पुलिस लुटेरों का पता लगाने में पूरी तरह असफल रही।’

अखिल ने रुककर पूछा- ‘आप किसकी बात कर रहे हैं पापा?’

‘आज से एक वर्ष पहले गुजरात के नागरिक बैंक में 20 करोड़ की डकैती पड़ी थी, किन्तु पुलिस न तो लूट का रुपया ही बरामद कर सकी और न ही लुटेरों को पकड़ सकी।’

‘हो सकता है-लुटेरे बहुत चालाक हों और अपने पीछे कोई सूत्र न छोड़ गए हों।’

‘ईश्वर ही जाने।’ कहकर राजाराम ने बात समाप्त की और फिर अखबार एक ओर रखकर वह अखिल से बोले- ‘कार्ड छप गए?’

‘कल मिलेंगे।’

‘वहां तो नहीं गया था?’

‘कहां?’

‘उसी रईस के पास।’

‘पापा! मेरे हृदय में निखिल के लिए आपसे भी अधिक घृणा है। अतः उनसे मिलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।’

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‘किन्तु एक बात मेरी समझ में नहीं आई।’ राजाराम ने घृणा से कहा- ‘वह यह क्यों चाहता है कि ये शादी रुक जाए?’

‘सीधी-सी बात है पापा!’ अखिल बोला- ‘निखिल को यह बात कांटे की तरह चुभ रही है कि उससे पहले अखिल की शादी हो रही है। वे साहब इसे अपना अपमान समझ रहे हैं।’

‘अपमान तो उसका होगा ही, हम नहीं करेंगे-तो कुदरत करेगी। लोग अच्छा-बुरा कुछ भी करते समय यह भूल जाते हैं कि ऊपर वाले की नजरें बहुत तेज होती हैं। वह सब कुछ देखता है और सबके कर्मों का हिसाब रखता है। तू यह देखना कि ये ही दौलत उसे लेकर डूबेगी। कहीं का न रहेगा वह। इंसान अपने आपको भले ही जीवन भर धोखा देता रहे किन्तु विधाता को धोखा नहीं दे सकता।’

‘आप ठीक कहते हैं पापा!’ अखिल ने कहा। फिर एकाएक उसे कुछ याद आया और वह बैठकर बोला- ‘पापा! आज विनोद भाई साहब मिले थे।’

‘तू गया था वहां?’

‘नहीं, बाजार में कुछ खरीद रहे थे।’

‘क्या कह रहा था?’

‘कह रहे थे-यदि तुम्हारे पापा मेरी बात मान लेते तो आज यह बात बढ़ते-बढ़ते यहां तक न पहुंचती। मुझे लगता है वे आज भी समझौता करने को तैयार हैं।’

‘समझौता?’

‘हां पापा! और उस समझौते में उनकी वही शर्त होगी-स्कूटर।’

यह सुनते ही राजाराम के चेहरे पर संसार भर की कडुवाहट फैल गई। घृणा से दांत पीसकर वह बोला- ‘नहीं होगा यह समझौता-किसी भी कीमत पर नहीं। क्या सोचते हैं वे लोग-क्या समझते हैं वे अपने आपको। उनकी दृष्टि में स्कूटर ही सब कुछ हो गया और हमारी भारती कुछ भी नहीं। एक स्कूटर के लिए उन्होंने मेरी भारती को ठोकर मार दी। मार-पीटकर घर से निकाल दिया मेरी बच्ची को। मैं पूछता हूं-ऐसा कौन-सा गुण है जो हमारी भारती में नहीं है? वह सुंदर है, सुशील है, पढ़ी लिखी है। मगर उन्हें तो भारती की नहीं स्कूटर की जरूरत थी।’

अखिल ने कुछ न कहा।

एक पल रुककर राजाराम उससे बोले- ‘सुनो! इस बार विनोद मिले तो करारा जवाब देना उसे। उससे कहना कि भारती उस घर से एक बार निकाल दी गई है और दोबारा नहीं जाएगी। नहीं जाएगी भारती।’

‘आप चिंता न करें पापा! दीदी तो स्वयं वहां जाने को तैयार नहीं है। चलिए-आप अंदर चलकर लेट जाइए।’

‘मैं ठीक हूं।’ राजाराम ने कहा और फिर से अखबार उठा लिया।

‘मम्मी कहां है?’ एक पल बाद अखिल ने पूछा।

‘पड़ोस में गई है। आरती से कह दे-एक प्याला चाय बना देगी।’ अखिल यह सुनकर कमरे में चला गया।

अभिशाप-भाग-14 दिनांक 04 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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