Summary: करगट्टम और थेरू कूथु की अनूठी पूजा पद्धति
ढोल-नगाड़ों की गूंज, धूप-दीप की सुगंध और सैकड़ों आंखों की श्रद्धा के बीच यह बदलाव इतना गहरा होता है कि दर्शक भी उसे नश्वर इंसान नहीं बल्कि दिव्य शक्ति का प्रत्यक्ष अवतार मानने लगते हैं।
Tamil Nadu Unique Tradition: दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराएं हमेशा से रंग, संगीत और नृत्य से जुड़ी रही हैं। तमिलनाडु में एक ऐसी अनोखी पूजा पद्धति है जिसमें मंच पर कदम थिरकाने वाला नर्तक सिर्फ कलाकार नहीं रहता वह स्वयं देवता का रूप धारण कर लेता है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, धूप-दीप की सुगंध और सैकड़ों आंखों की श्रद्धा के बीच यह बदलाव इतना गहरा होता है कि दर्शक भी उसे नश्वर इंसान नहीं बल्कि दिव्य शक्ति का प्रत्यक्ष अवतार मानने लगते हैं। यह पद्धति गांव-गांव में होने वाले करगट्टम, कवडी अट्टम और विशेष रूप से थेरू कूथु जैसे नृत्य-नाटकों में देखने को मिलती है।
नर्तक से देवता बनने की यात्रा

इस अनुष्ठान की शुरुआत साधारण नृत्य से होती है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा, मुखौटा और गहनों से सुसज्जित होता है। ढोल और नागस्वरम की लय पर उसका नृत्य धीरे-धीरे उन्माद की स्थिति तक पहुंचता है। जैसे-जैसे लय तेज होती है कलाकार की सांस, चाल और नजर बदलने लगती है। माना जाता है कि इस क्षण देवता की आत्मा उसमें प्रवेश करती है। अब वह सिर्फ कहानी का पात्र नहीं बल्कि पूजा का केंद्र बन जाता है। भक्त उसके सामने झुकते हैं, आशीर्वाद लेते हैं और कभी-कभी अपनी समस्याओं का समाधान पूछते हैं।
पौराणिक कथा से जुड़ाव
इस परंपरा के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, मुरुगन युद्ध के समय अपने भक्तों को प्रेरित करने के लिए नृत्य का माध्यम अपनाते थे। देवी का यह रूप नर्तक के माध्यम से जीवंत होता है जिससे भक्तों का उत्साह और आस्था बढ़ती है। कुछ जगहों पर इसे पांडवों और कौरवों की कथाओं से भी जोड़ा जाता है जहां युद्ध के पहले देवता का आशीर्वाद पाने के लिए नृत्य-नाट्य आयोजित किए जाते थे।
पूजा का महत्व

ग्रामीण तमिलनाडु में यह सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामुदायिक एकजुटता का भी प्रतीक है। इसमें पूरा गांव शामिल होता है। कोई वाद्य बजाता है, कोई मंच सजाता है तो कोई कथा सुनाता है। माना जाता है कि जब नर्तक देवता बनता है तो गांव की सभी बाधाएं दूर होती हैं, रोग खत्म होते हैं और फसलें अच्छी होती हैं। यह लोगों के लिए आस्था, मनोरंजन और सामाजिक मेलजोल का संगम है।
सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
यह पूजा पद्धति कलाकारों को विशेष सम्मान देती है। साधारण किसान या मजदूर भी इस दिन देवता का रूप लेकर गांव में सर्वोच्च सम्मान पाता है। यह व्यवस्था कला को समाज से गहराई से जोड़ती है और पारंपरिक कथाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखती है। साथ ही, इसमें महिलाओं और बच्चों की भी भागीदारी होती है जिससे यह एक पारिवारिक उत्सव का रूप ले लेता है।
विसंगतियां और चुनौतियां

आधुनिक समय में कुछ विसंगतियां भी देखने को मिलती हैं। कभी-कभी नर्तक की ‘देवता’ वाली स्थिति का उपयोग निजी लाभ के लिए किया जाता है। जैसे लोगों से धन या उपहार लेना। साथ ही, व्यावसायिक आयोजनों में इसका आध्यात्मिक पक्ष कमजोर पड़ने लगा है। कुछ जगहों पर पारंपरिक वाद्य और वेशभूषा की जगह आधुनिक साउंड सिस्टम और चमकदार कपड़े ले रहे हैं जिससे मूल भाव कहीं खो सा जाता है।
तमिलनाडु की यह परंपरा सिर्फ एक नृत्य या नाटक नहीं, बल्कि देवता और भक्त के बीच जीवंत संवाद है, जहां आस्था नर्तक के शरीर में उतरकर अपने भक्तों तक पहुंचती है। यह अनोखी पूजा पद्धति आज भी इस बात का प्रमाण है कि कला, जब श्रद्धा से जुड़ती है तो वह साधारण इंसान को भी दिव्यता का प्रतीक बना सकती है।
