भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
सम्पादक जी से दीपावली पत्रिका के लिए कहानी लिखने का तीसरा स्मरण पत्र भी आ गया। कहानी लिखने के लिए मैं बैठा- वह माया रूपी कल्पना; मेरी पकड़ से बच कर कहीं भाग गयी, गुम हो गई। मैं जब चाहूँ, बुलाऊँ तो क्या आयेगी? खुली हुई औरों की तरह, प्रकाश में आने से सकुचा रही थी। जिद करूँ तो वह भी जिद्दी हो जाता, बेचैन हो, तो वह तरस खा कर अवश्य आयेगी।
ऐसी अवस्था में, मैं कहानी लिखने के लिए मुश्किल से तत्वों को बटोर रहा था, कि अचानक वह माया रूपी कल्पना की चूड़ियाँ अँकार उठी और मेरी कलम की नोंक लिखने के लिए तड़प उठी- मैं और मेरी कलम की नोंक ने मिल कर एक अपूर्व रचना का निर्माण किया।
मेरी बीबी की आवाज कानों में पड़ी, “ऐ जी देरी हो रही है… खा कर लिखिए न”
कहानी लिखने में खोया मैं, बिना उत्तर दिए लिखता रहा और दोपहर तीन बजे कहानी को समाप्त किया। ऊँगलियों को तोड़ते हुए मैं उठा और आराम कुर्सी पर आराम से लेट गया। मैंने मन में एक बार पूरी कहानी को दोहराया उसी समय, मैंने पत्नी को फिर से झाँकते हुए अनुभव किया। मुड़ कर देखे बिना मैंने कहा, “खाना परोसो मैं आ रहा हूँ, खा कर फिर से कमरे की आराम कुर्सी पर जा लेटा। दिया जलाने का समय हो गया था, पर पूरे शरीर में थकावट छायी हुई थी सो उठ न सका। उसी समय किसी की फुसफुसाहट और पैरों की ध्वनि सुनाई पड़ी और साथ ही पत्नी की आवाज भी आई, “अजी सुनते हो- आप से मिलने कोई आई हैं।” “कौन? आ जाओ अन्दर” -मैंने कहा मेरी बीबी के पीछे एक खूबसूरत लड़की आ रही थी। “आप इन्हें जानते हैं?” मेरी पत्नी ने पूछा ।
मैं उठा और उस लड़की को गौर से देखा- सिमटती हुई उस लड़की का चेहरा जाना-पहचाना-सा लगा। मेरी बीबी ने इसी बीच मेरे कमरे में लगे बिजली के स्वीच को दबा कर रोशनी की… मैंने सोचते हुए कहा- “अपनी वैजी-वैजन्ती तो नहीं हो?…”
“इसकी माँ को भी आप अच्छी तरह जानते हैं, शायद” मेरी बीबी ने कहा।
“हाँ हाँ…. बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ। अम्बूजम को”… वयः संधि की स्थिति में पड़ी वैजी, फूट कर हँस पड़ी..
मैंने कहा- छोटी-सी बच्ची थी तब देखा था इसे, अब इतनी बड़ी हो गयी हैं कि पहचान में नहीं आती। हम दोनों का घर एक ही मालिक का था। अम्बुजम मुझसे चार साल बड़ी है, तिरूवल्ली केनी से ऐयम्बर आ जाने के कारण अब उतना आना-जाना न रहा। एक दिन अचानक अम्बुजम के पति वेदान्तम से मुलाकात हुई और वे जबरदस्ती मुझे घर ले गये। उस समय ये वैजी फ्रॉक पहने मेरी गोद में आ बैठी और जेब टटोलने लगी, इसी उद्देश्य से कि चाकलेट मिलेगी। …दूसरे दिन उसका मन रखने के लिए मैंने एक चाकलेट का डिब्बा लाकर उसे दिया था। अब कैसी हैं दीदी? सब कुशल तो हैं? मैंने उसके गाल को थपथपाते हुए पूछा।
वैजी ने कहा, “सब कुशल हैं मामा। आप मेरे घर के इतने करीब है मालूम न था- हम लोग हॉल्स रोड़ में रहते है।
“वही बंगला है क्या जिस पर लिखा हैं- टी.वी. चारी” मैंने पूछा- वैजी ने सिर हिलाकर ‘हाँ’ कहा।
“तुम्हारे पिता को हम लोग वेदान्तम कहते थे- तुम्हें पता कैसे चला हम लोग यहाँ रहते हैं?”
“मेरी कक्षा की सहेली सुनन्ता आप की पड़ोसी हैं ‘मनियन’ नाम से आप की कई कहानियाँ पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। जो विचित्र ढंग की रहती हैं- कहानी से मेरा बहुत चाव है- आप इतनी अच्छी कहानियाँ कैसे लिख लेते हैं? मैं कोशिश तो करती हूँ, पर ढाई अक्षर भी काम के नहीं लिख पाती। वास्तव में मुझे बहुत खुशी हुई आप से मिलकर, आप की प्रत्येक कहानी की एक प्रति मैं पढ़ना चाहती हूँ। बड़ी चालाकी से वैजी ने ये जाल फेंका।
“इस समय तो केवल दो किताबें हैं- कह, अलमारी से दो किताबें “माइंड ऑफ मैन” और “आँधी और तूफान” नामक नयी कहानी और कहानी संग्रह निकाला- इसे उत्साह पूर्वक वैजी ने लेकर कहा- ऐसा नहीं, इस पर आप अपना हस्ताक्षर लिख कर दीजिए- “माइंड ऑफ मैन” नामक कहानी, तुम जैसी छोटी लड़की की समझ से बाहर है- बड़े लोग ही उस मनोवैज्ञानिक तत्व को समझ सकते हैं, इसलिए इसमें हमने लिख दिया है, ‘मामा की ओर से प्यार भरा भेंट’ पर ‘आँधी और तुफान’ लघु कहानी संग्रह हैं- आँधी से घबराना नहीं यदि आँधी न हो तो तूफान भी नहीं रहेगा और पानी भी नहीं बरसेगा- ये किताब तुम्हारे हृदय को पसीज कर अवश्य तुम्हें ठण्डक पहुँचायेगी-इसी अनुभव के साथ तुम्हारा मामा… लो लिख दिया हैं।
‘हम लोग वैष्णवी हैं और आप स्मार्था (अर्थात् शिव को मानने वाले) किस सम्बन्ध से आप मेरे मामा हो सकते हैं शरमाते हुए वैजी ने पूछा।’
जिस सम्बन्ध से तुम्हारी माता मेरी दीदी बनीं, उसी सम्बन्ध से मैं भी तुम्हारा मामा। मेरा उत्तर सुन वैजी जोर से हँस पड़ी। ऐसा लगा मानो उसके हँसने से पूरा संसार खिल उठा है। फिर मिलने का वादा कर, वह चली गई…।
मेरे बचपन के वे रंगीन दिन याद आ गए जो अम्बुजम के साथ बीता करते थे…। धुंधला-सा सब कुछ दिखाई पड़ रहा था। यादों में खोये हुए मुझे देखकर मेरी पत्नी ने कहा, कुछ सुना आपने?…. मेहमान कोई घर आये तो चाय-पानी के लिए कोई ‘टी सेट’ ही नहीं है….।
तो खरीद लो, यह कहकर मैं शर्ट पहन, बाहर जाने के लिए तैयार हुआ। … तीन दिन बाद जब मैं अंग्रेजी की किसी ‘आत्मकथा’ किताब पर डूबा हुआ था, तब मेरे पीछे वैजी चुपके से कब आकर खड़ी हो गयी, पता न चला। मुड़ कर जब मैंने उसे देखा तो मुझे ऐसा लगा, जैसे वैजी तमिल किताब की इन पंक्तियों के साथ वैसे ही बैठती है
….. कामदेव
को भी हराने वाली
लज्जा पूर्ण स्त्री।
हर कामिनियों के शौर्य
और गर्व स्वरूप प्रफुल्लित,
उसका देह खिल उठा।
“क्या है बेटी?” मैंने पूछा।
“आज छुट्टी है मामा, पिता जी भी शहर में नहीं हैं। सोचा आप से मिल आऊँ। कुछ तकलीफ तो नहीं हैं आप को”
“जितनी देर चाहो बातें कर लो। मैं तो बिलकुल खाली बैठा हूँ। ….हाँ तो किस कक्षा में पढ़ती हो? कौन से स्कूल में?” हाथ की पुस्तक बन्द करते हुए मैंने पूछा।
“हाईस्कूल, सेन्ट तेरिसा कॉन्वेंट स्कूल में मामा” पिता चाहते हैं कि मैं अंग्रेजी ही पढूँ और बोलूँ भी। तमिल से उन्हें सख्त नफरत है। पर मैं तमिल ही चाहती हूँ। माँ से आप के बारे में कहा था। वे आप के बारे में बहुत ऊँचा ख्याल रखती हैं। मैं भी आप जैसे महान व्यक्ति से मित्रता करके अपने को धन्य मानती हूँ। आप ने कहा था ‘माइंड ऑफ मेन’ नामक कहानी मनोवैज्ञानिक तत्व पर आधारित है और छोटी लड़कियों को समझ में नहीं आयेगी, पर मैं तो पूरी कहानी अच्छी तरह समझ गयी। एक दम नया ‘थीम’ था। मेरी पढी हए कई किताबों से ये भिन्न थीं। लडकियों के बारे में कई नावलें मैंने पढी हैं, पर ये कहानी किस प्रकार का मनोवैज्ञानिक तत्व पर प्रकाश डालती हैं, क्या आप बता सकते हैं? पूछते हुए उसके गालों पर लाली छा गयी- आँखों में शर्म भी, देह में अपूर्व लज्जा झलक उठी। चौदह साल की लड़की के ये भाव देखकर मुझे कम आश्चर्य नहीं हुआ।
“सब तमिल किताब पढ़ती हो? क्या तुम्हारे पिता को इस बात का पता है?” मैंने सवाल किया। “हे भगवान, जान चली जायेगी पता चला तो- माँ से गुस्सा हो जायेंगे- स्कूल की किताबें छोड़, ये सब पढूं तो सर्वनाश हो जायेगा। आपकी किताब थी इसलिए माँ ने तो कुछ नहीं कहा, और पिताजी जानते ही नहीं थे- एक ही झटके में पूरी किताब पढ़ डाली। नावल में रामू जैसा कोई संसार में होगा क्या मामा? या केवल कल्पना हैं” वैजी ने जिज्ञासा स्वरूप पूछा।
“कौन?” इतना बड़ा प्रश्न पूछ रही हो? अच्छा तो मैं तुम्हारे पिता से मिलकर कह देता हूँ कि तुम तमिल किताब पढ़ती हो। “न बाबा न, जिद करने लगी।”
“अच्छा छोड़ दिया चलो। तुम्हें कहानियाँ खूब पसन्द है क्या?” “बहुत” रामू से मिलना चाहती हूँ” – नादान-सा प्रश्न किया वैजी ने।
अरे पगली वो तो अनुभव और कल्पना से सृष्टि की गयी ‘राम’ हैं। वो तो अर्धसत्य है- पर रामू जैसा कोई लड़का हो तो क्या तुम उसे पसन्द करोगी? मैंने पूछा…।
…इसे सुन वैजी यादों में खो गयी, खिड़की के बाहर का वातावरण कुछ देर देखती रही मानो नावेल को वह एक बार दोहरा रही हो और अचानक मुड़ कर मुझे गौर से देखा और फिर शर्म से आँखे झुक गयी- धीरे से कहा-“मामा…” मैंने पूछा “क्या है बेटी।”
“देरी हो रही है मामा, अब चलती हूँ, पिताजी आ गये होंगे, आप मेरे घर आईये न। माँ ने बुलाया हैं- कब आइयेगा?” “आज नहीं, फिर कभी! तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूँ। “क्यों मामा?, मेरे बारे में कहना है क्या?” चिंता की रेखा वैजी के माथे पर छा गयी।
मैं जोर से हँस पड़ा, वैजी को तभी इत्मीनान हुआ।
मैं सेन्ट तेरिसा कॉन्वेंट से चला आ रहा था और बच्चों को कार एवं बस पर चढते ध्यान दे रहा था कि अचानक किसी ने धीरे से पुकारा ‘मामा’ मेरे साथ चलिये ना, माँ आप से मिलना चाहती है। मोती जैसे दांतों को दिखाते हुए उस बच्ची ने प्यार से बुलाया।
मैं इनकार न कर सका, और उसके साथ कार में जा बैठा। इतना आनन्द और उत्साह उसके मुख पर झलक रहा था। कहने लगी-
“परीक्षा चल रही है मामा, इसी कारण मैं कहानियाँ पढ़ नहीं पा रही हूँ। धीरज से कुछ दिन मैं सह लूंगी, फिर कोई मुझे रोक नहीं सकता “दो मिलाप” नामक एक नावेल लिखा है क्या? सब कह रहे हैं कि वो बहुत अच्छी हैं -एक लड़की की वेदना भरी कहानी है जो दो पुरुषों को रख कर कष्ट झेलती है। उसका दुख पाठक के हृदय को हिला देने वाला जैसा है। क्या ये सच हैं मामा? फिर आप ने उस दिन ये किताब क्यों नहीं दी?”
उसे पढ़ने की उम्र में ही तो दिया जा सकता हैं। तेज चलती गाड़ी में हवा के झोंकों के कारण उसकी माँग बिगड़ी जा रही थी जिसे वो उँगलियों से ठीक करती जा रही थी। उसकी ऊँगलियों में स्याही के निशान लगे हुए थे।
बँगले के अन्दर पोर्टिको में कार रुकी, दोनों उतरे, वेदान्तम बाहर ही खड़े हुए थे। पहले से कुछ अच्छे मिजाज दिखाई दिए। ऊपर से गंजे बाल, बनियाईन से थोड़ा बाहर निकला उनका पेट, पहले मुझे देखते ही न पहचनाते जैसा चेहरा बनाया। कुछ भी हो, क्या मुझे इतनी जल्दी भूल सकते थे वे, “अरे बालू, क्या हैं माई-इतने दिनों के बाद? -आओ-आओ, कह कर मुझे बैठक ले गये।
इसी बीच वैजी मम्मी से कह आयी। पहले तो अम्बुजम मुझे पहचान न सकी फिर बोली, ‘आओ बालू बहुत अजीब बात है कि वैजी आप को कहीं से पकड़ लायी, नहीं तो मिलने का मौका ही कहा मिलता।’ मैं पुराने सम्बन्ध को छोड़ना नहीं चाहती हूँ।
“नहीं दीदी… मैं पत्रिकाओं के लिए कहानी वगैराह लिखता हूँ न…” बात यूँ आरम्भ करते देख वैजी परेशान हो उठी। कहीं पिता को मालूम न पड़ जाये- बेटी की परेशानी का पूरा अन्दाज किया अम्बूजम ने और तुरन्त टोकती हुई बोल उठी…। आओ न अन्दर बालू… कितने वर्ष हो गये मिल कर।”
“मैं उठा और अन्दर गया। उनके सामने मैं कुछ नहीं कहना चाहती थी। वैजी ने आप के बारे में सब कुछ, मुझे बता दिया। आप बहुत पास ही में रहते हैं शायद। वैजी की तो प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं, तुम्हारी कहानियों से तो उसे फुरसत ही नहीं मिलती। पढ़ कर हमें भी सुनाती हैं। पिता से छुप-छुप कर सब तमिल नावेल पढ़ लेती हैं। इतनी तो बुद्धिमान थी जो आप को यहाँ ले आयी।”
“दीदी, पुराने स्वाद कैसे भूले जा सकते हैं, तुम्हारी लड़की जो ठहरी।
अम्बूजम कुछ स्तब्ध रह गई। पति अच्छे स्थिति में रहते हुए भी अहंभाव तनिक मात्रा में भी नहीं था। उसी पुराने ढंग से मेरा स्वागत किया। कुछ पकवान और चाय दिया। वैजी भी नहा धो कर दूसरे कपड़े पहन कर आ गयी। मानो माँ के बचपन की सुन्दरता को चुरा कर लायी हो। अम्बुजम की नयी ‘एडिशन’ जैसे । “मामा आइए न ऊपर कमरे में चलते हैं… अपनी सब किताबें दिखाती हूँ-पिता से छुपकर कितने कष्ट से इकट्ठा की हैं- छुपा कर ही सब रखा हैं।” कहती हुई मुझे राह दिखाती ऊपर अपने कमरे में ले चली। “पूर्व की ओर कमरा था। कन्या लड़की की झलक उस वातावरण के प्रत्येक चीज पर छाई हुई थी। दीवार के एक ओर बड़ा-सा ‘कन्याकुमारी’ का चित्र था जिसके नीचे एक चन्दन के शैल्फ पर “ॐ” के आकार की अगरबत्ती स्टैन्ड थी। एक काँच की अलमारी जिसके अन्दर सजी हुई किताबें नजर आ रही थी। मुख्य तौर से उसमें केवल तमिल नावेल ही थे। मच्छरदानी लगी हुई एक खटिया, कमरे के दोनों कोने पर एक-एक सोफा। उस पुण्य मंदिर जैसे कमरे में पाँव रखते ही संकोच हो रहा था। वैजी ने हमें बैठने को कहा, “मामा यही मेरा कमरा है। कैसा लगा आप को?” “बहुत खूब, कन्या के योग्य ही हैं।” सुनकर उसको खुशी हुई। तुम शाम को कहीं बाहर नहीं जाती हो? खेलने-कूदने के लिऐ?” मैंने पूछा तो वह कहने लगी-
“सिनेमा तो मेरे लिए जहर जैसा है, ड्रामा के लिए कभी-कभी चली जाती हूँ, खेलना वगैरा तो मैंने छोड़ दिया है।”
“आश्चर्य! आज-कल की लड़कियों से बहुत भिन्न हो फिर समय कैसे बिताती हो?” मैंने पूछा।
“नई-नई किताबों को पढ़ कर या कभी रेडियो में Veena या Violin वादन सुन कर” अजीब किस्म की इस लड़की को थोड़ी देर के लिए ध्यान से देखा…। इस छोटी-सी लड़की के मस्तिष्क में कितने विचित्र और अजीब किस्म के विचार भरे हुए थे। …अन्य लोगों से इसकी बातें और स्वभाव भी कितने भिन्न हैं….”
“मामा…एक बात मैं पूछना चाहती हूँ। आप ने कितने किस्म की लड़कियों के जोड़ों की कहानियाँ लिखी हैं, पर मेरी उम्र की लड़कियों के बारे में आपने क्यों नहीं लिखा?”
“अब मैं लिखंगा…” मैंने कहा- इस छोटे से प्रश्न ने ही हमें जगा दिया। उसी समय एक साये को दरवाजे पर पड़ते देखा। तुरन्त वैजी ने मुड़ कर देखा…
“कौन है वो वैजी?” मैंने पूछा “कोई नहीं मामा … सामने वाला लड़का हैं।” … “सामने कौन रहता हैं?” मैंने फिर प्रश्न किया। उसी समय वह नौजवान नीला शर्ट और सफेद पैजामा पहने अन्दर आ गया। …वैजी की ओर उसने किताब बढ़ा दी। …वैजी ने किताब लेकर मुझ से कहा… “आप की साहित्यिक रचनाओं में रुचि रखने वालों में से एक ये भी हैं… आप “मनियण” हैं।” उस लड़के की ओर मुड़ कर वैजी ने कहा। लड़का नमस्कार करके कहने लगा… “बड़ी प्रसन्नता हुई आप से मिल कर, यह कह वह तुरन्त चला गया। …उसके चले जाने के बाद वैजी कुछ देर चुप-चाप बैठी रही।
मौन भंग करते हुए मैंने कहा- “अच्छा वैजी मैं चलता हूँ, और जैसे तुमने कहा था वैसे ही तुम्हारी उम्र की लड़कियों की कहानी लिख कर लाऊँगा।”
बैठक से गुजरते समय, मैंने वेदान्तम से आज्ञा ली, अम्बुजम ने खाने को कहा, पर किसी और दिन आने का वादा करके, मैं चला आया।
“एक हफ्ते के लिए मैं कही भी बाहर न गया और पत्नी को भी कठोर आज्ञा दे दी, कि कोई भी मिलने आये तो कह दे कि मैं घर में नहीं हूँ” और वैजी के मन मुताबिक उसी के उम्र की कहानी लिख डाली, परन्तु इस कहानी में वैजी और वो सामने वाले लड़के को साथ न जोड़कर उसके स्वभाव के विचित्रता को ध्यान में रख कर दूसरी ओर घुमा दिया। मेरी लिखी कहानी से मुझे ही संतुष्टि मिली। वैजी को दिखाने ले गया। उसके पिता कहीं बाहर गये हुए थे। वैजी घर में ही थी। मेरे हाथ से लिपटे हुए कागज को छीनकर अपने कमरे में दौड़ चली, ताकि मुझसे पहले वह कहानी पढ़ ले।
अम्बूजम ने पहले जैसा ही हमारा स्वागत किया और फिर मैं वैजी के कमरे में गया।
वैजी हाथ में वह कहानी लिए बैठी सोच रही थी। मुझे देखते ही उसे लौटा दिया और कहा… “पहले मैंने सोचा, खुद पढ़ लूँ, नहीं, आप पढ़ कर हमें सुनाइये…. मैं सुनूँगी…”
मैं पढ़ने लगा…कहानी का शीर्षक है “मनीमलर” “मोतियों की माला।” मैं धीरे-धीरे उसे पढ़ने लगा। लगभग तीस पृष्ठ की कहानी थी। तन्मय हो कर वैजी सुन रही थी और स्थिति के अनुरूप उसके चेहरे पर परिवर्तन हो रहा था। कहानी खत्म हुई। मैंने कागज को नीचे रख दिया। पर वैजी बिना हिले उसी तरह बैठी रही…। “मैंने पूछा” कहानी कैसी लगी तुम्हें?
दोनों हाथों से चेहरा बन्द करके वैजी फूट-फूट कर रोने लगी। मैं घबरा कर उठ खड़ा हुआ। वैजी ने आँसू भरी आँखों को उठा कर, वेदना से भरी आवाज में मुझसे पूछा…आप ने मेरे मन की बात को कैसे जान लिया? कैसे मामा? …बताओ न कैसे?”
“मामा मैंने कभी किसी को अपने मन की बात नहीं कही फिर आप को कैसे पता चला। कुछ रुक कर फिर वैजी कहने लगी “जब तक किसी को अपने आप पर ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े, तब तक ऐसा वास्तविक चित्रण करना कठिन हैं।”
मैं कछ सहम गया- “तम क्या कह रही हो?” मैंने पछा. कहने लगी “वही जिसे आप ने कहानी में वर्णन किया। -नहीं, कभी नहीं हो सकता, कहानी जिस तरह चलती है उससे तो यही साबित होता हैं कि वो मामी जिसे मैंने उस दिन आप के घर में देखा था, वो आप की पत्नी नहीं हैं, कोई और ही है जो आप के बचपन में ही आप के हृदय में एक-स्थान रख चली गयी… कौन है मामा वो? मुझे बताइए ना।
-अचरज में भर उठा मैं। मुझे किसी ने उस प्रकार का सद्मा नहीं पहुँचाया जैसे उसके प्रश्न ने पहुंचाया। साठ साल की उम्र में जो अनुभव मैंने प्राप्त किया, वह इस नन्ही-सी बालिका में, मैं देख रहा था, जिसे देख कर अपने को धन्य मानने में मजबूर होना पड़ा और उसे नमस्कार किया।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
