Muhurat Importance: विवाह हर व्यक्ति के जीवन में खास महत्व रखता है। सभी धर्म में अलग-अलग नियम और परंपरा के अनुसार विवाह संपन्न होते हैं। हिंदू धर्म में भी विवाह से जुड़ी कई रीति-रिवाज और परंपराएं होती हैं। लेकिन विवाह के लिए जो चीज सबसे अधिक मायने रखती है वह है ‘मुहूर्त’। जिस प्रकार विवाह तय करने से पहले वर-वधू का कुंडली मिलान किया जाता है, उसी प्रकार विवाह की तिथि तय करने से पहले मुहूर्त निकाला जाता है। यह हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण और अनिवार्य परंपराओं में एक है।
दरअसल हिंदू धर्म में सभी शुभ-मांगलिक कार्यों से पहले मुहूर्त निकालने की परंपरा है, मान्यता है कि शुभ तिथि और मुहूर्त में किए कार्य संपन्न होते हैं। विवाह मुहूर्त, कुंडली, लग्न ये सभी एक प्रकार से प्राचीन ज्योतिष गणित और विज्ञान से जुड़ा है। विवाह हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक है और विवाह के लिए मुहूर्त निकालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आइए जानते हैं विवाह के लिए कैसे निकाला जाता है मुहूर्त और क्या है इस परंपरा का महत्व।
कैसे निकालते हैं विवाह मुहूर्त

शादी-विवाह के लिए मुहूर्त निर्धारण करने के लिए कुंडली में विवाह से जुड़े भाव और भावेश की स्थिति, विवाह में योगदान निभाने वाले ग्रहों की दशा-अंतर्दशा और वर्तमान ग्रह-गोचर की स्थिति देखी जाती है। वर या वधू का जन्म जिस चंद्र नक्षत्र में होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर का भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही विवाह मुहूर्त निकालने के लिए वर-वधू की राशि में विवाह की एक समान तिथि को भी विवाह मुहूर्त के लिए लिया जाता है। कुंडली मिलान के बाद राशियों में जो तारीखें समान होती है, विवाह के लिए उन्हें भी शुभ माना जाता है।
विवाह मुहूर्त में लग्न की भूमिका
आपने शादी-विवाह में कई बार सुना होगा कि, पंडित जी या पुरोहित कहते हैं कि वधू को बुलाइए मुहूर्त निकला जा रहा है। दरअसल विवाह मुहूर्त में लग्न की यही उपयोगिता है। लग्न का संबंध फेरे के समय से होता है। शादी की तारीख तय होने के बाद लग्न का निर्धारण होता है। इसमें यदि किसी प्रकार की भूल हो जाए तो इसे एक गंभीर दोष माना जता है। इस प्रकार से हिंदू विवाह संस्कार के लिए तिथि को शरीर, चंद्रमा को मन, योग व नक्षत्रों को शरीर के अंग और लग्न और आत्मा माना जाता है। इस तरह से लग्न विवाह की आत्मा है, जिसके बगैर शुभ विवाह अधूरा होता है।
विवाह लग्न के लिए इन्हें नहीं माना जाता शुभ

- विवाह लग्न के लिए वर-वधू के लग्न राशि से अष्टम राशि का लग्न शुभ नहीं होता।
- जन्म कुंडली में अष्टम भाव का स्वामी विवाह लग्न में नहीं होना चाहिए।
- विवाह लग्न से द्वादश और दशम भाव में शनि स्थित नहीं होना चाहिए।
- विवाह लग्न से तृतीया भाव में शुक्र और लग्न में कोई पाप ग्रह नहीं हो.
- विवाह लग्न में चंद्रमा का पीड़ित होना भी अशुभ माना जाता है।
- विवाह लग्न से चंद्रमा, शुक्र और मंगल अष्टम भाव में स्थित नहीं रहना चाहिए।
- साथ ही विवाह लग्न से कोई ग्रह सप्तम भाव में नहीं होना चाहिए।
विवाह मुहूर्त के लिए इन बातों का रखना होता है ध्यान

विवाह मुहूर्त लिए नौ ग्रह अलग-अलग तरह से प्रभाव डालते हैं, जिसे विवाह मुहूर्त या लग्न के समय देखा जाता है। जैसे विवाह के लग्न के लिए सूर्य पहले और सातवें भाव में नहीं होना चाहिए। चंद्रमा पहले, छठे और आठवें भाव में नहीं होना चाहिए। बृहस्पति सातवें और आठवें भाव में नहीं होना चाहिए।
विवाह के लिए मुहूर्त निकालते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि, बृहस्पति और शुक्र अस्त नहीं होने चाहिए। क्योंकि दांपत्य जीवन और शुभ कार्यों में इन ग्रहों की खास भूमिका होती है। वैवाहिक सुख में वर के लिए शुक्र और वधू के लिए बृहस्पति को देखा जाता है।
इसके साथ ही जब भद्रा या मकर संक्रांति होती है, तब भी विवाह नहीं होना चाहिए। लत्ता, पात, युति, वेध, यामित्र, बाण पंचक, एकार्गल, उपग्रह, क्रांतिसाम्य और दग्धा दोष ऐसे 10 दोष होते हैं, जिनमें विवाह नहीं होते हैं।
