मुहूर्त का मतलब है किसी शुभ और मांगलिक कार्य को शुरू करने के लिए एक निश्चित समय व तिथि का निर्धारण करना। अगर हम सरल शब्दों में इसे परिभाषित करें तो, किसी भी कार्य विशेष के लिए पंचांग के माध्यम से निश्चित की गई समयावधि को मुहूर्त कहा जाता है। हिन्दू धर्म और वैदिक ज्योतिष में बिना मुहूर्त के किसी भी शुभ कार्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर शुभ कार्य को आरंभ करने का एक निश्चित समय होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय विशेष में ग्रह और नक्षत्र के प्रभाव से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
क्या है मुहूर्त का महत्व और उपयोगिता
प्राचीन काल से ही हिंदू धर्म में मुहूर्त को एक खास महत्व दिया जाता रहा है। मुहूर्त को लेकर किए गए कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति की गणना करके ही मुहूर्त का निर्धारण किया जाता है। इसके अलावा हर महत्वपूर्ण और शुभ कार्य के दौरान यज्ञ और हवन करने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि यज्ञ व हवन से उठने वाला धुआं वातावरण को शुद्ध करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। हिन्दू समाज में लोग आज भी मांगलिक कार्यों के सफलतापूर्वक संपन्न होने की कामना के लिए शुभ घड़ी का इंतज़ार करते हैं। कार्य की मंगलकामना के लिए विशेष दिनों का इंतज़ार करते हैं। 
अलग अलग तर्क
मुहूर्त को लेकर अलग.अलग तर्क और धारणाओं के बीच इसकी प्रासंगिकता और महत्व का अवलोकन करना चाहिए। सबसे पहले जो बात ज़हन में आती है, वो ये है कि हमें किसी कार्य की सफलता के लिए मुहूर्त की आवश्यकता क्यों पड़ती है।  दरअसल मुहूर्त एक ऐसा विचार है, जो एक धारणा का प्रतीक है कि एक तय समय और तिथि पर शुरू होने वाला कार्य शुभ व मंगलकारी होगा और जीवन में खुशहाली लेकर आएगा। ब्रह्मांड में होने वाली खगोलीय घटनाओं का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। क्योंकि विभिन्न ग्रहों की चाल के फलस्वरूप जीवन में परिवर्तन आते हैं। ये बदलाव हमें अच्छे और बुरे समय का आभास कराते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम दिन, तिथि और नक्षत्र आदि की गणना करके कोई कार्य आरंभ करें। जो शुभ फल देने वाला साबित हो।
कैसे जानें शुभ मुहूर्त 
मुहूर्त के बारे में जानने का एकमात्र साधन है पंचांग। वैदिक ज्योतिष में पंचांग का बड़ा महत्व होता है। पंचांग के 5 अंग, वार, तिथि, नक्षत्र, योग और करण की गणना के आधार पर मुहूर्त निकाला जाता है। इनमें तिथियों को पांच भागों में बांटा गया है। नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता, और पूर्णा तिथि है। उसी प्रकार पक्ष भी दो भागों में विभक्त हैय शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। वहीं नक्षत्र 27 प्रकार के होते हैं। एक दिन में 30 मुहूर्त होते हैं। इनमें सबसे पहले मुहूर्त का नाम रुद्र है जो प्रात काल 6 बजे से शुरू होता है। इसके बाद क्रमश हर 48 मिनट के अतंराल पर आहि, मित्र, पितृ, वसु, वराह, विश्वेदवा, विधि आदि होते हैं। इसके अलावा चंद्रमा और सूर्य के निरायण और अक्षांश को 27 भागों में बांटकर योग की गणना की जाती है।
नामकरण संस्कार
संक्रांति के दिन और भद्रा को छोड़कर 1, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13 तिथियों में जन्मकाल से ग्यारहवें या बारहवें दिन, सोमवार, बुधवार अथवा शुक्रवार को तथा जिस दिन अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, अभिजित, पुष्य, स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा इनमें से किसी नक्षत्र में चंद्रमा हो, तब बच्चे का नामकरण करना चाहिए।
मुण्डन संस्कार 
जन्मकाल से अथवा गर्भाधान काल से तीसरे अथवा सातवें वर्ष में चैत्र को छोड़कर उत्तरायण सूर्य में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार अथवा शुक्रवार को ज्येष्ठा, मृगशिरा, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, अश्विनी, अभिजित व पुष्य नक्षत्रों में 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तिथियों में बच्चे का मुंडन संस्कार करना चाहिए।
विद्या आरंभ संस्कार
उत्तरायण में कुंभ का सूर्य छोड़कर बुध, बृहस्पतिवार, शुक्रवार या रविवार को 2, 3, 5, 6, 10, 11, 12 तिथियों में पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मूल, पूष्य, अनुराधा, आश्लेषा, रेवती, अश्विनी नक्षत्रों में विद्या प्रारंभ करना शुभ होता है। मकान खरीदने के लिए. बना हुआ मकान खरीदने के लिए मृगशिरा, अश्लेषा, मघा, विशाखा, मूल, पुनर्वसु एवं रेवती नक्षत्र उत्तम है। प्रत्येक महीने में तीनों रिक्ता अशुभ होती हैं। ये रिक्ता तिथियां निम्न हैं. चतुर्थी, नवमी एवं चौदस या चतुर्दशी। रिक्ता से आशय रिक्त से है, जिसे बोलचाल की भाषा में खालीपन या सूनापन लिए हुए रिक्त यानि खाली तिथियां कहते हैं। अतः इन उक्त तीनों तिथियों में गृह निर्माणनिषेध है।
शुभ नक्षत्र  
किसी भी शुभ महीने के रोहिणी, पुष्य, अश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपदा, स्वाति, हस्तचित्रा, रेवती, शतभिषा, धनिष्ठा सर्वाधिक उत्तम एवं पवित्र नक्षत्र हैं। गृह निर्माण या कोई भी शुभ कार्य इन नक्षत्रों में करना हितकर है। बाकी सभी नक्षत्र सामान्य नक्षत्रों की श्रेणी में आ जाते हैं।
सात स और शुभता 
शास्त्रानुसार स अथवा श वर्ण से शुरू होने वाले सात शुभ लक्षणों में गृहारंभ निर्मित करने से धन.धान्य व अपूर्व सुख.वैभव की निरंतर वृद्धि होती है व पारिवारिक सदस्यों का बौद्धिक, मानसिक व सामाजिक विकास होता है। सप्त साकार का यह योग है, स्वाति नक्षत्र, शनिवार का दिन, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि, शुभ योग, सिंह लग्न एवं श्रावण माह। अतः गृह निर्माण या कोई भी कार्य के शुभारंभ में मुहूर्त पर विचार कर उसे क्रियान्वित करना अत्यावश्यक है।

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