पितृ दोष लक्षण एवं निवारण
pitru dosh lakshan evam nivaran

Pitra Dosh: पितृ दोष होने पर कई प्रकार के कष्टï, समस्याओं का सामना व्यक्ति को करना पड़ता है ऐसे में हमें चाहिए कि पितृ दोष निवारण केउपाय करें। आइए जानें लेख से क्या है पितृ दोष, इसेलक्षण व निवारण?

पिछले जन्म का कर्ज इस जन्म में, या इससे भी अगले जन्मों में जरूर चुकाना पड़ता है। इसे जितना जल्द चुका दिया जाए, उतना ही हितकर होगा। ऋण के न चुकने तक श्राप शांति नहीं लेने देगा। ये ऋण धन के अलावा भी अन्य प्रकार के हो सकते हैं। मृत्यु के पश्चात् स्थूल शरीर से आत्मा के अलग हो जाने पर शरीर तो मिट्टी में मिल जाता है, राख हो जाता है, किंतु आत्मा का शरीर के बिना भी अस्तित्त्व बना रहता है।

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आत्मा को दूसरा शरीर प्राप्त होने में कुछ समय लग सकता है। यह अंतराल कुछ घंटों, या अनेक युगों तक का भी हो सकता है। यह सूक्ष्म शरीरी आत्मा यदि शुभ संस्कारी न हो, तो प्रेत-पिशाच आदि अशरीरी योनियों में भटकती रहती है। जो कार्य आत्मा स्थूल शरीरधारी हो कर नहीं कर पाती, वह सूक्ष्म शरीरदारी होकर करने में पूर्ण समर्थ हो जाती है।

पितृ हमारे पूर्वज हैं जिन्हें हम देवता के समान पूजते हैं। पितृ हमारे बुजुर्गों के वे सूक्ष्म शरीर हैं जो मृत्यु पर्यंत पुनर्जन्म होने तक विभिन्न लोकों में वास करते हैं तथा अपनी वृत्ति अनुसार भोगों को याद करते हैं, जो उन्होंने इंद्रियों द्वारा इस धरती पर भोगे थे तथा स्थूल शरीर उपलब्ध न होने के कारण उनकी याद में तड़पते हैं। मनुदेवल का कथन-
वसव: पितरोज्ञेया रुद्रज्ञेया पितामहा।
प्रपितामहास्तथादित्या श्रुतिरेषांसनातनी॥

पिता को वसु, पितामह को रुद्र और प्रपितामह को आदित्य जानना चाहिए।
‘आयु पुत्रान्यश: स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलंश्रयम्।
पशुन् सौख्यं धनंधान्यं प्राप्नुयात्पितृ पूजनात्॥

पितरों की पूजा करने से आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, धन धान्य प्राप्त होते हैं। स्कंद पुराण के काशी खंड पूर्वार्ध के अनुसार जो चलते, खड़े होते, जप और ध्यान करते खाते-पीते, जागते-सोते तथा बात करते समय भी सदा गंगा जी का स्मरण करते हैं, वे संसार के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और जो पितरों के लिए भक्तिपूर्वक, गुड़, घी, और तिल के साथ मधुयुक्त खीर गंगा जी में स्थापित करते हैं, उनके पितृ 100 वर्ष तक तृप्त हो जाते हैं तथा संतुष्ट होकर अपनी संतानों को नाना प्रकार की, मनोवांछित वस्तुएं प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति गंगा जल से शिवलिंग को स्नान कराते हैं, उनके पितृ यदि भारी नरक में भी पड़े हों, वे भी तृप्त हो जाते हैं। गंगा जल, दूध, कुशा, घी, मधु, गाय के दूध का दही, लाल कनेर तथा लाल चंदन, इन आठों को मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें, तो पितृ सूर्य लोक में जाकर प्रतिष्ठित हो जाते हैं। मानव अपनी भौतिक इच्छा इंद्रियों के द्वारा पूर्ण करने का प्रयास करता है। मृत्यु के समय उसकी अदम्य वासना, अथवा इच्छा पूरी करने की मानसिकता उसे प्रेत योनि की ओर ले जाती है। परद्रव्य का दुरुपयोग करने से, अथवा वासना रहने से जीवन प्रेत योनि में जाता है। अपने भौतिक देह का मोह न रहे, इसलिए उसके रिश्तेदार उसका दाह-संस्कार करते हैं।

लक्षण क्या हैं? – भारतीय ज्योतिष के अनुसार सूर्य इस सौर मंडल का राजा है। सूर्य से पिता की स्थिति का अवलोकन किया जाता है। शनि सूर्य का पुत्र है और सूर्य का परम शत्रु भी है। ज्योतिष में शनि वायु विकार का कारक है। जातक पितृ दोष से पीड़ित है या नहीं, कुंडली इस बात को प्रमाणित करती है। सूर्य जब शनि के प्रभाव में (साथ बैठकर, दृष्टि में रहकर) होता है, तो ऐसा जातक निश्चय ही पितृ दोष से पीड़ित रहता है। जब शनि के साथ-साथ राहु भी सूर्य को पीड़ित करता है, तो देखने में आता है कि जातक के पितृ किसी अन्य चांडाल प्रकृति की आत्माओं से पीड़ित हैं। ज्योतिष में राहु दादा का कारक है। कुंडली के बारहवें, लग्न, या द्वितीय भाव में राहु हो, तो ऐसे जातक भी पितृ दोष से पीड़ित होते हैं।

‘बृहतपाराशरी ग्रंथ’ में कुल 14 श्राप बताये गये हैं। उनमें से पितृ श्राप, प्रेत श्राप, सर्प श्राप यदि हों तो संतति नहीं होती; यदि हो जाए, तो जीवित नहीं रहती। किसी को पुत्र संतति नहीं होती। किसी के धन का अपव्यय होता है, किसी को व्यवसाय में अपयश मिलता है और विचार नास्तिक होते हैं। लगातार आपत्तियां आती रहती हैं, खेती में अपयश मिलता है। पशु यकायक मर जाते हैं। कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है। घर में कोई न कोई सदा बीमार रहता है। माता-पिता से झगड़ा होता है, स्त्रियों को पीड़ा होती है। उनका गर्भपात होता है; व्याधि का उपचार करने से कुछ भी असर नहीं होता। भोजन के वक्त झगड़ा होना, भोजन की थाली दूर करना, गृहस्थी में सुखी पति अथवा पत्नी का त्याग करना, घर के किसी व्यक्ति का बिना बताये निकल जाना, कष्ट से प्राप्त धन अधूरा लगना, किसी व्यक्ति के शरीर में भूत या पिशाच का संचार होना, मंद बुद्धि का होना या पागल हो जाना। पूरी मेहनत के बाद भी किये गये कार्यों में अपेक्षित सुफल नहीं मिलते हैं, या अनावश्यक विलंब से मिलते हैं। परिवार में मांगलिक कार्यों (योग्य संतान आदि के विवाह) में सभी परिस्थितियां अनुकूल होने पर भी अनावश्यक विलंब होता है। शरीर में बिना वजह दर्द और भारीपन रहता है। परिवार में बने-बनाये काम अंतिम समय पर बिगड़ जाते हैं।

दूसरे भाव एवं सूर्य से वर्तमान काल, दशम भाव एवं चंद्र से भूत काल तथा व्यय भाव और राहु से पितृ दोष देखा जाता है। पितृ दोष 3 प्रकार के हैं- सौम्य पितृ दोष, सामान्य पितृ दोष तथा उग्र पितृ दोष।
सौम्य पितृ दोष- जातक के जन्मांग में 2, 6 और 12 वें भाव में राहु होने से सौम्य पितृ दोष बनता है। पितरों की ओर से सिर्फ नाराजगी मिलती है। परंतु वे प्रसन्न होकर अपनी कृपा भी प्रदान करते हैं। इस दोष में जातक को अपने पूर्व जन्मों के अच्छे कर्मों का फल भी नहीं मिलता है। इसी वजह से जातक को इस जन्म में ज्यादा मेहनत के बाद ही फल मिलता है।
उपाय- पितृ तर्पण विधि करें। पितरों के मास में गाय और कुत्ते को रोटी दें।
सामान्य पितृ दोष- जन्मांग में आत्मा और पिता का कारक सूर्य राहु के साथ युति में हो, तो पितृ दोष का निर्माण होता है। ऐसे जातक विविध परेशानियों तथा जीवन संग्राम से ऊब जाते हैं। सूर्य-राहु जहां पर स्थित हैं, उसका फल जातक को परेशानी से मिलता है। बाहरी रूप से सुखी लगते हुए जातक के जीवन में कुछ अधूरा रह जाता है।
उपाय- ‘सर्वपितृ मनोकामना सिद्ध करु करु स्वाहा मंत्र बोलते हुए, तांबे के लोटे से पीपल वृक्ष को पानी चढ़ाते हुए, उसकी प्रदक्षिणा करें। उसे दीप दिखाएं।
उग्र पितृ दोष- जन्मांग में 2, 6, 8, या 12 वें भाव में सूर्य-राहु की युति उग्र पितृ दोष बनाती है। मेष से कन्या राशि के राहु-सूर्य बहुत उग्र पितृ दोष की तीव्रता को कम करते हैं। इसके विपरीत तुला से मीन राशि का सूर्य-राहु उग्र पितृ दोष की तीव्रता को बढ़ावा देते हैं। जातक जीवन में धन हानि एवं प्रत्येक पद पर बाधाओं का सामना करता है।
उपाय- नारायण बली श्राद्ध, पितृ स्तवन पाठ, पिंड दान, तर्पण क्रिया करें। सूर्य उपासना एवं गायत्री मंत्र भी जपें। जन्मांग में पंचम भाव के स्वामी की एक माला का जाप करें एवं स्तोत्र भी पढ़ें। इन 3 पितृ दोषों में भगवान शिव की आराधना एवं राहु स्तोत्र का पाठ भी प्रभावशाली माना जाता है।

1. लग्न में राहु, पंचम में शनि-सूर्य सप्तम में क्षीण चंद्र और व्यय स्थान में गुरु हो।
2.शनि पंचमेश होकर अष्टम स्थान में हो, लग्न में मंगल हो।
3. लग्न में पाप ग्रह, व्यय में सूर्य, पंचम में शनि, मंगल, बुध और पंचमेश अष्टम में।
4. पंचम में शनि, लग्न में राहु, बृहस्पति अष्टम में।
5. लग्न में राहु, गुरु, शुक्र, अथवा चंद्र, शनि के साथ लग्नेश अष्टम में।
6. लग्न में शनि, पंचम में राहु, अष्टम में सूर्य, व्यय में मंगल।
7. सप्तमेश 6, 8, 12 स्थानों में, पंचम में चंद्र, लग्न में शनि।
8. पुत्र कारक गुरु शनि की राशि (मकर, कुंभ) में, पंचमेश शत्रु ग्रह से दृष्ट हो।
9. अष्टमेश पंचम में, शनि, शुक्र के साथ हो और गुरु अष्टम में हो, तो प्रेत श्राप से संतति का नाश होता है।
10.षष्ठेश, अथवा नवमेश पंचम में हो।
11.लग्न में पंचम में सूर्य, मंगल-शनि अष्टम में, अथवा व्यय में राहु-गुरु हों।
12. पंचम में नीच राशि का सूर्य-शनि के नवमांश में, सूर्य पाप ग्रह के कर्तरीत हो।
13. नवमेश 6, 8, 12 स्थानों में, गुरु पाप ग्रह की राशि में, पंचम में पाप ग्रह और लग्नेश भी पाप ग्रह हो।
14. पंचम में नीच सूर्य, मेष में शनि नीच मंगल के अशांत पाप ग्रह से दृष्ट हों।
15. लग्न में पाप ग्रह, दशमेश 6, 8, 12 स्थानों में, पुत्र कारक गुरु पाप ग्रह की राशि में, पंचम स्थान में पाप ग्रह।
16. दशम का अधिपति पंचमेश के साथ लग्न स्थान में, पंचम स्थान और दशम स्थान में पाप ग्रह।
17. पंचम स्थान का स्वामी सूर्य हो, तो वह पंचम, अथवा नवम् स्थान में पाप ग्रह के साथ, अथवा उनसे दृष्ट।
18. व्ययेश लग्न स्थान में, अष्टमेश पंचम में और दशमेश अष्टम स्थान में होने से पित्तरों के श्राप के कारण संतति जीवित नहीं रहती।

1. प्रश्न कुंडली में 2, 6, 8 या 12 वें भाव में राहु-केतु प्रेतात्मा का सर्जन बताते हैं।
2. प्रश्न कुंडली में अष्टम, या द्वादश भाव में गुरु प्रेतात्मा का अस्त्वि बताता है।
3. द्वादश, या अष्टम में बुध के साथ राहु भी हो, तो सप्तम, या अष्टम भाव में शुक्र पूर्वज दोष माना जाता है।
4. द्वादश भाव में शुक्र को स्त्री योनि दोष मानते हैं।

चतुर्थ, पंचम और दशम भाव की राशि, इनमें स्थित ग्रह, ग्रहों की दृष्टि, ग्रहों का बलाबल, ज्योतिष योग आदि देख कर कह सकते हैं कि जातक पितृ दोष से पीड़ित रहेगा या नहीं। अनेक बार जातक की जन्म पत्रिका, ग्रह दशा सब अच्छी होती है, किंतु उसके शुभ कामों में अड़चन बहुत आती हैं। इसका कारण भी सरल बोली में लोग देव पितृ दोष बताते हैं। पंडित को लग्न कुंडली, चलित और नवांश कुंडली बना कर देखनी चाहिए। जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव माता का, पचंम भाव विद्या और गुरु का और दशम भाव पिता का होता है। चंद्र लग्न, चलित चक्र, नवांश आदि का सूक्ष्म अध्ययन कर देखना चाहिए कि इनका सुख है या नहीं है? यदि कोई बाधा हो, तो दान-धर्म से इनका कोप, या दोष शांत कर, नि:स्वार्थ भाव से इनकी सेवा करनी चाहिए। यदि ये जीवित नहीं हों, तो पितृ तर्पण, श्राद्ध, दानादि कर गीता पाठ, श्रीमद्भागवत सप्ताह, एकादशी व्रत और उद्यापन, गया के पवित्र तीर्थ में पिंड दान करना श्रेष्ठ उपाय है।
मेष लग्न– लग्न कुंडली में मेष लग्न आने पर शरीर में रोग और बार-बार कोई न कोई पीड़ा होती रहती है। पीपल को जल चढ़ाने, सायं दीप जलाने, पिंडदान, जलघट दान से यह दोष दूर होता है।
वृष लग्न– यदि वृष लग्न हो तो नेत्र या कर्ण दोष, पीड़ा, या स्वर रोग होते हैं। शांति हेतु नव दुर्गा पूजन, खीर से देवी के निमित्त होम और कन्या-ब्राह्मïण भोजन से शुभ रहता है।
मिथुन लग्न– यदि मिथुन लग्न हो तो देवी या माता का दोष मानना चाहिए। किसी गरीब की कन्या की शादी या बीमारी में सहायता करना, ‘कुल देवी’ का मंदिर स्थापित कर नित पूजन-भजन करना चाहिए।
कर्क लग्न– कर्क लग्न होने पर परिवार में पेट, या फेफड़े से संबंधित रोगों से परेशानी रहती है। दूध, या उड़द के बने पदार्थ दान करने और पवित्र नदी या स्थानों पर दीप प्रज्जवलित करने से लाभ होता है।
सिंह लग्न– यह लग्न हो, तो ग्रहों का गोचर दोष जानना चाहिए। पिंड दान, अन्न और शैया दान से लाभ होता है। आवश्यकता अनुसार ग्रह का दान, या जाप करना चाहिए।
कन्या लग्न– पूर्व जन्म कृत दोष जान कर शिव पूजन, श्री भागवत महापुराण, या गीता पाठ करना और होम, जप विद्यानानुसार करना शुभ रहता है।
तुला लग्न– शरीर में बार-बार पीड़ा, रक्त, या ज्वर दोष होते हैं। सिंदूर, तिल, तेल, उड़द और लोह पदार्थ, ब्राह्मïण को भोजन कराकर दान देना शुभ रहेगा।
वृश्चिक लग्न– इस लग्न के होने पर प्रेत या बेतालादि का दोष मानना चाहिए। नियमानुसार होम करते समय कमल पुष्प और गुग्गल की आहुती तथा दान, धर्म भोजन कराना चाहिए।
धनु लग्न- विविध प्रकार के भयानक रोग होते हैं। अपने कुल देवता का पूजन-अर्चन करने से शांति रहती है।
मकर लग्न- हड्डियों, या जोड़ों में पीड़ा, व्यर्थ व्यय या चिंताएं होती हैं। रुद्र पूजन, सहस्र धारा, शिव महिमा स्तोत्र पाठ, ब्राह्मïण भोजन, दान से सुख प्राप्त होता है।
कुंभ लग्न- पूर्वजों का कोप, या कुल देवी का कोप समझना चाहिए। विधि अनुसार, पितृ या देव-ऋषि तर्पण गीता पाठ करना चाहिए। इससे पितृ प्रसन्न होकर कोप त्याग देते हैं।
मीन लग्न- मीन लग्न होने पर भूतनी या प्रेतनी का दोष मानना चाहिए। ऐसे रोगी, अत्यधिक पीड़ा के कारण, उछलते-कूदते और यातना भोगते हुए, अनापशनाप प्रलाप करते हैं। इन्हें अनपढ़ लोग देवता का भाव आना भी कहते हैं। वस्तुत: यह एक हिस्टीरिया जैसा भयंकर रोग है। इसकी शांति हेतु गणेश जी, शिव जी, हनुमान जी, या भैरव जी का पूजन, मंत्र पाठ कर, 108 गुग्गल और त्रिमुखी दुर्वा की विधिनुसार आहुति देकर, ब्राह्मणों को भोजन करा कर, छतरी, लालटेन, या टॉर्च, पांच उत्तम वस्त्र, बर्तन और जूते आदि दान करना शुभ रहता है।

भोजन से पहले अपने हिस्से की पहली रोटी में से एक चौथाई रोटी निकालें और इसे चिड़िया, पक्षी, अथवा गाय को खिलाएं। पिता को पूर्ण सम्मान दें और उन्हें खुश रखें। पितरों के निमित्त घर में दीपक, अगरबत्ती नित्य प्रति जलाएं। अमावस्या को पितरों के नाम का धूप-दीप करें और गरीब व्यक्ति को यथायोग्य खाना खिलाएं। माघ, वैशाख, ज्येष्ठ और भाद्रपद माह की अमावस्या को पितरों के निमित्त यथायोग्य दान (कपड़े और बर्तन) करें। हर अमावस्या को 5 फल गाय को खिलाएं। पितरों का तर्पण करें। रोज प्रात:, पूजा के समय, ‘ऊं पितरा नम:का कम से कम 21 बार जाप करें।
प्राणी को अपने पूर्व जन्मों में किये कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। भगवान ने मात्र मनुष्य को ही विशेषाधिकार दिया है कि वह धर्म और कर्म के साथ, पूर्व जन्म के कुकर्मों के अंतर्गत मिले दंडों को कम करें। वर्तमान जन्म को सुधारें। इसीलिए मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ कहलाती है।