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अपनी पूरी जिंदगी परिवार के नाम करने के बावजूद आज भी कुछ महिलाएं खुद को ठगा सा महसूस करती हैं। दिनभर रसोई और घर के सदस्यों के लिए काम करना, खुद को उनकी पसंद के अनुसार ढालना, रात में पति को खुश करना और बदले में न कोई तारीफ, न ही कोई मदद।
Steps for Self-Discovery: कुछ बॉलीवुड फिल्में समाज का आइना होती हैं। एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी की फिल्म ‘सुखी’ हो या फिर एक्ट्रेस सानिया मल्होत्रा की फिल्म ‘मिसेज‘। इन फिल्मों ने महिलाओं की दबी हुई भावनाओं को खूबसूरती और गहराई से दिखाया। ये फिल्में कुछ महिलाओं को अपनी कहानी जैसी महसूस होती हैं। दिनभर रसोई और घर के सदस्यों के लिए काम करना, खुद को उनकी पसंद के अनुसार ढालना, रात में पति को खुश करना और बदले में न कोई तारीफ, न ही कोई मदद। अपनी पूरी जिंदगी परिवार के नाम करने के बावजूद आज भी कुछ महिलाएं खुद को ठगा सा महसूस करती हैं।
समझौता एक सीमा तक सही

समाजशास्त्री रुचिका शर्मा का कहना है कि हर शादी में पति और पत्नी दोनों को ही कुछ एडजस्टमेंट करने होते हैं। लेकिन यह दोनों के संयुक्त प्रयास होने चाहिए। अगर अकेले पत्नी ही अपने आपको बदलने की कोशिश करती है और इस सफर में खुद को भूल बैठती है तो यह पूरी तरह से गलत है। परिवार की नींव को प्यार, अपनेपन और त्याग सभी मिलकर मजबूत बनाते हैं। यह अकेले पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है। नया परिवार नई बहू के लिए अजनबी होता है, यह परिवार के हर सदस्य का भी फर्ज है कि वह बहू का साथ दे। अगर लाख कोशिशों के बावजूद परिवार और पति आपको नहीं समझ पा रहा है तो आपको अपनी राह चुननी चाहिए। फिल्म में रिचा ने जो फैसला किया वह सही था। युवती को अपने अस्तित्व के लिए खड़ा होना चाहिए।
खुश करना सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नहीं
सोशल मीडिया पर पोस्ट एक वीडियो में मनोचिकित्सक श्रीधर चांडक कहते हैं कि आमतौर पर भारतीय परिवारों में युवतियों को यही सिखाया जाता है कि आपको ससुराल में सभी को खुश रखना है। लेकिन जब आप सभी को खुश करना सिर्फ अपनी जिम्मेदारी मान बैठते हैं तो आप अपना स्तर खुद ही गिरा लेते हैं। किसी को खुश करना कभी किसी की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। क्योंकि आप चाहे कुछ भी कर लो सभी को पूरी तरह से खुश नहीं कर सकते।
दो पैमानों में बांटा जा सकता है उम्मीदों को
दरअसल, उम्मीदों को दो पैमानों में बांटा जा सकता है। न्यूट्रल पॉजिटिव और न्यूट्रल नेगेटिव। ‘तुमने मेरी उम्मीद से काम नहीं किया, लेकिन कोई बात नहीं।’ वहीं, अगर उम्मीद के अनुसार काम हो गया तो सामने वाला का आभार जताना एक पॉजिटिव रवैया है। वहीं न्यूट्रल नेगेटिव सोच वाले लोगों के लिए आप चाहे कुछ भी कर लो, वो कभी खुश नहीं होते हैं। यह एक छलनी की तरह होते हैं, जिसमें कितना भी पानी क्यों न डाल लें ये कभी भर ही नहीं सकती। दूसरी ओर आप जो काम कर लेते हैं, वो उसे आपकी जिम्मेदारी मानते हैं और उसके लिए कोई धन्यवाद भी नहीं करते।
दूसरा पक्ष भी समझें
मनोवैज्ञानिक श्रीधर चांडक का कहना है कि आपको यह बात भी समझनी होगी कि लड़ाई झगड़े हर परिवार में होते हैं। यह बहुत ही नॉर्मल होता है। लेकिन अगर ये झगड़े बहुत ही ज्यादा हो रहे हैं तो यह आप पर निर्भर है कि आप कितना सहन कर सकती हैं। खुशियां और दुख, खुशियों और सुख के पैमाने सभी के लिए अलग अलग होते हैं। इन्हें कब तक सहना है यह हर किसी की पर्सनल चॉइस है। हालांकि अपने एक अन्य वीडियो में मनोवैज्ञानिक ने युवतियों को यह भी समझाया कि अपने गुस्से को रिचा की तरह इकट्ठा करके एक साथ विस्फोट करना कोई हल नहीं है। आप अपने गुस्से और नाराजगी को समय समय पर जाहिर करें, जिससे उसका हल निकल सके। और कुछ नहीं तो इससे आपका मन ही हल्का होगा। दूसरा, आप जो काम नहीं कर सकती, उसके लिए खुलकर मना करें। इससे सामने वाले को एक बार बुरा लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे वो भी परिस्थितियों को समझने लगेंगे।
