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प्रतीक्षा स्वीकृति भाव बढ़ाती है: Life Lessons in Hindi
Life Lessons in Hindi

Life Lessons in Hindi: प्रतीक्षा भी दो प्रकार की होती है। एक है निराश मन से प्रतीक्षा करना और निराश होते ही जाना। दूसरी है प्रेम में प्रतीक्षा, जिसका हर क्षण उत्साह और उल्लास से भरा रहता है। ऐसी प्रतीक्षा अपने में ही एक उत्सव है, क्योंकि मिलन होते ही प्राप्ति का सुख समाप्त हो जाता है।

जीवन में तीन चीजों की उपलब्धि सचमुच कठिन है। पहला यह मनुष्य जीवन। दूसरा मनुष्य जीवन मिलने के उपरांत अध्यात्म में रुचि और साधना। आप देखते हो कि लाखों लोगों का रुख इस ओर नहीं होता। समाज में कुछ इने-गिने लोगों को ही अध्यात्म और साधना का स्वाद लगता है। और यह स्वाद एक प्रसाद है। उसकी अनुकंपा है। अधिकतर लोग तो एक मशीन की तरह जी रहे हैं- बस खाना, पीना और सोना। उन्हें जीवन के वास्तविक मूल्यों का कुछ पता नहीं। ऐसे लोगों के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यह उनका दुर्भाग्य है। हालांकि यही जीवन का सत्य है और इसी से जीवन मूल्यवान है। और तीसरी चीज है किसी संत सद्गुरु का सान्निध्य जो बहुत मुश्किल से मिलता है। इसके लिए चाहिए प्रतीक्षा। उचित समय पर यह भी हो जाता है, पर तब तक धैर्य, असीम धैर्य और प्रतीक्षा की आवश्यकता होती है।
एक बार एक महात्मा ने एक कहानी सुनाई। उनके दो शिष्य थे। उनमें से एक वृद्ध था, उनका बहुत पुराना और पक्का अनुयायी, कड़ी साधना करने वाला। एक दिन उसने गुरु से पूछा, मुझे मोक्ष या बुद्धत्व की प्राप्ति कब होगी? गुरु बोले, अभी तीन जन्म और लगेंगे। यह सुनते ही शिष्य ने कहा, मैं बीस वर्षों से कड़ी साधना में लगा हूं, मुझे क्या आप अनाड़ी समझते हैं। बीस साल की साधना के बाद भी तीन जन्म और। नहीं-नहीं। वह इतना क्रोधित और निराश हो गया कि उसने वहीं अपनी माला तोड़ दी, आसन पटक दिया और चला गया। दूसरा अनुयायी एक युवा लड़का था, उसने भी यही प्रश्न किया। गुरु ने उससे कहा, तुम्हें बुद्धत्व प्राप्त करने में कितने जन्म लगेंगे, जितने इस पेड़ के पत्ते हैं। यह सुनते ही वह खुशी से नाचने लगा और बोला, वाह, बस इतना ही। और इस पेड़ के पत्ते तो गिने भी जा सकते है। वाह, आखिर तो वह दिन आ ही जाएगा। इतनी प्रसन्नता थी उस युवक की, इतना था उसका संतोष, धैर्य और स्वीकृति भाव। कहते हैं, वह तभी, वहीं पर बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया धैर्य ही बुद्धत्व का मूल मंत्र है। अनन्त धैर्य और प्रतीक्षा। परन्तु प्रेम में प्रतीक्षा है तो कठिन। अधिकांश व्यक्ति तो जीवन में प्रतीक्षा निराश होकर ही करते हैं, प्रेम से नहीं कर पाते।
प्रतीक्षा भी दो प्रकार की होती है। एक है निराश मन से प्रतीक्षा करना और निराश होते ही जाना। दूसरी है प्रेम में प्रतीक्षा, जिसका हर क्षण उत्साह और उल्लास से भरा रहता है। ऐसी प्रतीक्षा अपने में ही एक उत्सव है, क्योंकि मिलन होते ही प्राप्ति का सुख समाप्त हो जाता है। तुमने देखा, जो है उसमें हमें सुख नहीं मिलता, जो नहीं है, उसमें मन सुख ढूंढता है। हां, तो प्रतीक्षा अपने में ही एक बहुत बढ़िया साधना है हमारे विकास के लिए। प्रतीक्षा प्रेम की क्षमता और हमारा स्वीकृति भाव बढ़ाती है। अपने भीतर की गहराई को मापने का यह एक सुन्दर पैमाना है।
यह प्रेम-पथ अपने में पूर्ण है और जीवन से जुड़ा हुआ है। ऐसा नहीं कि कुछ नित्य नियम कुछ समय के लिए करके फिर वही अपना मशीनी जीवन जीते रहें और गिला-शिकवा करते रहें कि हमें तो कोई गहरा अनुभव होता ही नहीं। ऐसी शिकायतें मुझे कई लोगों से सुनने को मिलती है कि उनकी साधना, अर्चना तो ठीक है, परन्तु वह उनके जीवन का एक अटूट अंग नहीं बन पाई और न ही उसके जीवन में कोई बदलाव ही आया है। बस यहीं पर आत्मज्ञान की आवश्यकता है। अभ्यास और वैराग्य आत्म उन्नति के दो अंग हैं। आत्मज्ञान का यह पक्ष जीवन्त है, अत: जीवन में उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते, यह अनश्वर सत्य कि मैं आत्मा हूं हमारे भीतर सुदृढ़ होता जाता है। इस पथ ने प्रेम, ज्ञान, कर्म, सेवा सबको अपने भीतर समाहित कर लिया है, ताकि विशुद्ध चेतना का झरना सदा बहता रहे।

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