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क्या होता है कल्पवास?: Kalpwas
Importance of Kalpwas

Kalpwas: कल्पवास एक तपस्या के समान है इसमें संयम, नियम के साथ अल्पाहार, भूमि पर शयन, शुद्घ मन, वचन जरूरी है। कल्पवास के संदर्भ में माना गया है कि कल्पवासी को इच्छित फल तो मिलता ही है, उसे जन्म जन्मांतर के बंधनों से भी मुक्ति मिल जाती है।

कल्पवास का अर्थ

कल्पवास का अर्थ होता है संगम के तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान करना। प्रयाग (इलाहाबाद) कुम्भ मेले में कल्पवास का अत्यधिक महत्त्व माना गया है। कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है।

कैसे हुई शुरुआत?

कल्पवास की परंपरा अति प्राचीन है कहते हैं जब प्रयाग ऋषियों-मुनियों की तपोस्थली थी और गंगा-जमुना के आस-पास चारों ओर केवल जंगल था। उस समय ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा। उनके अनुसार इस दौरान गृहस्थों को अल्पकाल के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती थी।

कौन कर सकता है कल्पवास?

पौष कल्पवास के लिए वैसे तो उम्र की कोई बाध्यता नहीं है, लेकिन माना जाता है कि संसारी मोह-माया से मुक्त और जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके व्यक्ति को ही कल्पवास करना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिम्मेदारियों से बंधे व्यक्ति के लिए आत्मनियंत्रण कठिन माना जाता है।

कैसे करें कल्पवास?

कल्पवास की शुरुआत के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजन होती है। कल्पवासी अपने टेंट के बाहर जौ का बीज रोपित करता है। कल्पवास की समाप्ति पर इस पौधे को कल्पवासी अपने साथ ले जाता है। जबकि तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।

कल्पवास के नियम

Kalpwas
Kalpwas Rule

कल्पवास के नियमानुसार जो भी गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आया है वह पर्ण कुटी में रहता है। इस दौरान दिन में एक ही बार भोजन किया जाता है तथा मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभावपूर्ण रहा जाता है।
यहां झोपड़ियों (पर्ण कुटी) में रहने वालों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान के बाद संध्यावंदन से प्रारंभ होती है और देर रात तक प्रवचन और भजन-कीर्तन जैसे आध्यात्मिक कार्यों के साथ समाप्त होती है।
कल्पवास की शुरुआत करने के बाद इसे 12 वर्षों तक जारी रखने की परंपरा रही है। पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरंभ होता है और माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है। एक माह तक चलने वाले कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर शयन (सोना) करना होता है। इस दौरान श्रद्धालु फलाहार, एक समय का आहार या निराहार रहते हैं। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियमपूर्वक तीन समय गंगा स्नान और यथासंभव भजन-कीर्तन, प्रभु चर्चा और प्रभु लीला का दर्शन करना चाहिए।

पुराणों में कल्पवास की चर्चा

आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा के महत्त्व की चर्चा वेदों से लेकर महाभारत में मिलती है। पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि आकाश तथा स्वर्ग में जो देवता हैं, वे भूमि पर जन्म लेने की इच्छा रखते हैं। वे चाहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य का जन्म पाकर प्रयाग क्षेत्र में कल्पवास करें।
महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन्‌ा! प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना, इंद्रियों को वश में करके स्नान- ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है। मत्स्यपुराण के अनुसार – जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है और जो मोक्ष की अभिलाषा लेकर कल्पवास करता है उसे अवश्य मोक्ष मिलता है

कल्पवास का बदलता स्वरूप

हालांकि बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं बुजुर्गों के साथ कल्पवास में मदद करते-करते कई युवा खुद भी कल्पवास करने लगे हैं। कई विदेशी भी अपने भारतीय गुरुओं के सान्निधय में कल्पवास करने यहां आते हैं। लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। आज भी श्रद्धालु भयंकर सर्दी में कम से कम संसाधनों की सहायता लेकर कल्पवास करते हैं।

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