Onam Festival: पर्व हमारे जीवन में ऊर्जा, उमंग और खुशहाली लेकर आते हैं जैसे तमिलनाडू में पोंगल, असम में बीहू, पंजाब में लोहड़ी, उसी भव्यता और उत्साह के साथ केरल में ओणम पर्वोत्सव मनाया जाता है। आइए विस्तार पूर्वक जानते हैं, क्यों और कैसे मनाया जाता है पर्व ओणम?
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यह पर्व प्राचीन राजा महाबली की याद में मनाया जाता है। और यह दस दिनों तक चलता है, इन दिनों घरों में फूलों की रंगोली बनाई जाती है और घरों को सजाया भी जाता है।
महिलायें इस दिन नाचने-गाने में मस्त रहती हैं। ओणम के दौरान तरह-तरह के लोक नृत्य देखने को मिलते हैं। शेरनृत्य, कुचीपुड़ी, ओड़िसी, कथक नृत्य प्रमुख हैं। इस त्योहार का पहला और दसवां दिन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।
केरल में ओणम के उपलक्ष्य में साध्य भी बनता है जो पूरी तरह से शुद्ध तथा शाकाहारी होता है। साध्य में व्यंजनों की संख्या 11 से 64 तक हो सकती है और इसका मुख्य भोजन पका हुआ चावल होता है जो विभिन्न प्रकार की दालों, सब्जियों, चटनी, खीर आदि के साथ खाया जाता है। भोजन को बनाने में चावल और नारियल के तेल का उपयोग भारी मात्रा में होता है।
इसको खाने केलिए इसे केले के पत्ते में परोसा जाता है। खाने के बाद लोग खेलना पसंद करते हैं जहां बच्चों से लेकर बूढ़े-बुजर्ग कई तरह के खेल खेलते हैं वहीं नौजवान कायनकली एवं अट्टाकलम जैसे खेल खेलते हैं। कायनकली में प्रतियोगी एक दूसरे पर अपनी मु_ी से वार करते हैं, अट्टाकलम में एक टीम गोल के अंदर रहकर बचाव करती है तो दूसरी उन्हें वहां से निकालने का प्रयास करती है। नर्तक चेहरे पर लकड़ी के बने देवी देवताओं के मुखौटे पहन कर धार्मिक कथाओं पर नृत्य करते हैैं।
ओणम पर्व में चारों तरफ नौकायान की धूम रहती है। इन नावों का एक भाग सांप के फन की तरह घुमावदार होता है इस कारण इसे स्नैक बोट भी कहते हंै। नावों को हरी, लाल छतरी के द्वारा विशेष रूप से सजाया जाता है। ओणम पर्व के पांचवें दिन नौका रेस का आयोजन होता है जब हजारों की संख्या में लोग नदी के तट पर इसका आनन्द लेते हैं।
ओणम कथा
राजा महाबली, प्रहलाद के पोते थे। प्रहलाद असुर हिरणकश्यप के बेटे थे, प्रहलाद असुर होते हुए भी भगवान विष्णु के परम भक्त थे। प्रहलाद की तरह महाबली भी बचपन से ही भगवान विष्णु जी के भक्त थे। वे बहुत ही न्यायप्रिय, दानी, अच्छे, पराक्रमी, दयालू, प्रजा का हित करने वाले राजा थे। महाबली की प्रजा उनसे बहुत प्रसन्न रहती थी, और उनकी प्रजा उनको भगवान के बराबर का दर्जा दिया करती थी। जिसके कारण महाबली में धीरे-धीरे घमंड भी आने लगा था। ब्रह्मïाण्ड में असुरी शक्ति बहुत बढ़ गई थी जिसको खत्म करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु जी से सहायता मांगी।
और तभी भगवान विष्णु माता अदिति के बेटे के रूप में ‘वामन’ बन कर जन्म लेते हैं। एक बार महाबली अश्वमेघ यज्ञ करते हैं। महाबली कहते हैं, इस यज्ञ के दौरान उनसे जो कोई जो कुछ भी मांगेगा उसे अवश्य मिलेगा। इस बात को सुनकर वामन इस यज्ञ शाला में पधारते हैं महाबली वामन से कहते हैं कि वो उनकी किस प्रकार से सेवा करें, वामन मुस्कराते हुए कहते हैं, मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, मुझे बस तीन पग जमीन दे दो। उनकी ये बात सुन महाबली के गुरु समझ जाते हैं कि ये कोई साधारण बालक नहीं है, वे महाबली को उनकी इच्छा पूरी न करने को कहते हैं।
लेकिन महाबली एक अच्छे राजा थे, वे अपने वचनों के पक्के थे, वो वामन को तीन पग जमीन देने को तैयार हो जाते हंै। ये बात सुनकर वामन अपने विशाल रूप में आ जाते हैं वो अपने पहले कदम में पूरी धरती, दूसरे कदम में स्वर्गलोक नाप लेते हैं अब महाबली के पास देने को कुछ बचा ही नहीं तो तीसरे पग के लिए राजा अपना सिर वामन के पैर के नीचे रख देते हैं ऐसा करते ही, राजा पाताललोक में समां जाते हैं पाताललोक में जाने से पहले महाबली से एक इच्छा पूछी जाती है।
महाबली भगवान विष्णु जी से कहते हैं कि हर साल धरती में ओणम का पर्व उनकी याद में मनाया जाए, और उन्हें इस दिन धरती पर आने की अनुमति दी जाये, ताकि वे यहां आकर अपनी प्रजा से मिलकर, उनके सुख दु:ख को जान सकें।
