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ganesh : दरिद्रता से बचने के लिए गणेश जी को ये चीजें न करें अर्पित

गणेश उत्सव आरंभ होते ही घर में गणपति को स्थापित किया जाता है। घर में पूरे विधि विधान से गणेश जी के आगमन के बाद बप्पा की पसंदीदा चीजों को भोग के लिए तैयार किया जाता है। इसके अलावा पूजन के दौरान भी वही सामग्री रखी जाती है, जो गणपति जी को प्रिय है। ऐसा माना जाता है कि विघ्नहर्ता गणेश अपने भक्तों के सारे संकट हर लेते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। अगर आप भी चाहते हैं कि गणपति की कृपा दृष्टि आप पर सदैव बनी रहे, तो जो चीजें गणपति को पसंद नहीं है, उन्हें पूजा में नहीं रखना चाहिए। आइए जानते हैं गणपति जी को कौन सी चीजें अप्रिय हैं जिन्हें पूजा में शामिल करना उचित नहीं है।

टूटे हुए चावल न रखें

गणपति पूजा के दौरान अक्षत अर्पित करना बेहद शुभ है। ऐसा माना जाता है कि अक्षत अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। चावल अर्पित करने से पहले इन्हें थोड़ा गीला करना आवश्यक होता है। इसके अलावा टूटे हुए चावल जिन्हें टुकड़ा चावल भी कहते हैं, उनको पूजा में रखना दरिद्रता को बुलाने के बराबर है।

सूखे फूलों को अर्पित न करें

भूलकर भी गणपति जी के पूजन में सूखे हुए फूलों का इस्तेमाल न करें। दरअसल सूखे फूल उदासीनता और नकारात्मकता को दर्शाते है, जिससे परिवार के सौभाग्य को हानि पहुँचती है। ऐसे में पूजन के दौरान केवल ताजे फूलों को ही रखें।

सफेद रंग के फूल पूजा में न रखें

गणपति जी की पूजा के दौरान सफेद रंग के फूलों को इस्तेमाल न करें। दरअसल सफेद रंग चंद्रमा का प्रतीक है और चंद्रमा ने एक पौराणिक कथा के अनुसार गणपति जी का उपहास किया, जिसके बाद गणपति जी ने च्रद्रमा को श्राप दिया था। इसीलिए गणेश जी के पूजन में सफेद जनेउ, सफेद चंदन, सफेद वस्त्र और सफेद फूल नहीं अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश जी को गुड़हल के लाल और पीले रंग के फूल चढ़ाने चाहिए। वे उन्हें बेहद प्रिय हैं। इसके अलावा उन्हें गेंदे के फूल भी चढ़ा सकते हैं। इसके अलावा सफेद कपड़ों को पहनने से भी परहेज़ करना चाहिए। जहां तक संभव हो लाल या पीले रंग के वस्त्र ही धारण करने चाहिए। 

क्या है पूजा में तुलसी न रखने के पीछे की पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के मुताबिक गणपति जी ने तुलसी को श्राप दिया था, जिसके चलते गणेश जी के पूजन के दौरान तुलसी को रखना वर्जित है। इस कथा के अनुसार एक बार गणेश जी गंगा के तट पर तपस्या कर रहे थे। तभी तुलसी जी अपने विवाह के लिए तीर्थयात्रा पर थी और अच्छे वर की तलाश कर रही थी। गंगा के किनारे पहुंचते ही उनकी नज़र तपस्या में लीन गणेश जी पर गई और वे उनकी ओर आर्कषित होने लगी। उन्होंने प्रेम में विवश होकर तपस्या में मग्न गणपति जी को तपस्या से उठा दिया और उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। तपस्या भंग होने से क्रोध में बैठे गणेश जी ने तुलसी जी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

गणेश जी के न कहने पर तुलसी जी ने उन्हें दो विवाह होने का श्राप दे डाला। अब उनके श्राप से गणपति महाराज और भी क्रोध में भर गए और क्रोधवश उन्होंने तुलसी जी को असुर से विवाह होने का श्राप दे डाला।  इसके बाद तुलसी जी ने गणेशजी से इसके लिए माफी भी मांगी। तुलसी जी की इस अवस्था को देखकर गणेश जी ने कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा, लेकिन इसके बाद तुम पौधे का रूप धारण कर लोगी और विष्णु जी ही तुम्हें पवित्र और पूजनीय होने का आशीर्वाद देंगे। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि मेरी पूजा में तुम्हारा शामिल होना वर्जित होगा। इस कथा के हिसाब से गणेश पूजा में तुलसी जी की मौजूदगी नहीं होती है।

गजानन को 21 गांठ वाली दूर्वा चढ़ाएं

लंबोदर को दूर्वा बेहद प्रिय है और इससे एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार अनादि काल में अनलासुर नाम का एक दैत्य हुआ करता था, जो मनुष्यों को जिंदा ही निगल जाता था। उससे देवता भी बेहद भयभीत रहने लगे और वे शिवजी की शरण में गए। उन्होंने पूरी समस्या जानने के बाद ऋषि मुनियों और देवताओं को गणेश जी के पास जाने का सुझाव दिया। सभी गणपति के पास पहुंचे और अपनी समस्या उनके समक्ष रखी। भगवान गणेश ने दैत्य के आंतंक को समाप्त करने के लिए उससे युद्ध करने की ठानी। युद्ध के दौरान भगवान गणेश ने दैत्य को निगल लिया। अब दैत्य ने शरीर में प्रवेश करने के बाद आग उगली, जिससे गणेश जी को जलन महसूस होने लगी। तभी वो जलन शांत करने के लिए कश्यप ऋषि के पास पहुंचे। उन्होंने गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठें बनाकर खाने के लिए दी। दूर्वा को खाते ही गणेश जी के पेट की जलन शांत हो गई। कहा जाता है तभी से भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई। मगर पूजा में 21 गांठों वाली दूर्वा ही चढ़ाएं। इससे कम दूर्वा चढ़ाने पर पूजा सार्थक नहीं मानी जाएगी।

प्रसाद को भक्तों में अवश्य बांटें

भगवान गणेश के पूजन के दौरान लगाए गए भोग को उसी वक्त परिवार के सदस्यों या अन्य लोगों में वितरित कर दें। ऐसा माना जाता है कि अगर भोग लगाने के बाद प्रसाद को यूं ही सिंघासन के समीप रख दिया जाता है, तो घर गृहस्थी में दरिद्रता का वास हो जाता है। ऐसे में गणेश पूजन के प्रसाद को तुरंत ही लोगों में बांट देना चाहिए।

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