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Ganesh Puja Vidhi : भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थ को गणेश चतुर्थी के तौर पर मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसी कारण इस दिन को गणेश उत्सव के रूप में मनाया जाता है। विघ्नहर्ता गणपति का स्वरूप बेहद मनोहर एवं मंगलदायक है। गणेश चतुर्थी के दस दिन पहले गणपति बप्पा को घर में विराजित करने का विधान है। उनको घर में लाने से पहले उनके भक्तजन खूब तैयारियां करते हैं।

हर ओर उंमग और मुस्कान नजर आती है। गणेश जी के स्थान से लेकर पूजा के विधि विधान तक सभी तैयारियां पूर्ण कर ली जाती है। एकदंत और चतुर्बाहु से सुशोभित गणपति के चारों हाथों में पाश, अंकुश, दंत और वरमुद्रा धारण किए हुए है। उनके ध्वज पर मूषक का चिन्ह बना हुआ है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्त वस्त्रधारी हैं। वे अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।

गणपति को घर में लाने से पहले रखें इन बातों का ध्यान

  • सबसे पहले जहां गणपति विराजेंगे उस स्थान को स्वच्छ पानी से धोएं और स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं। उसके बाद चार हल्दी की बिन्दी लगाएं और एक मुट्ठीभर अक्षत रखें।
  • इसके बाद उस स्वच्छ जगह पर एक चौकी रखें और उस स्थान पर एक पीले या लाल रंग का स्वच्छ कपड़ा बिछाएं।
  • उस स्थल को रंगोली से सजाएं और चारों ओर दीपक या लाइट्स लगाएं और उस स्थल की रोशनी बढ़ाएं।
  • स्थल के पास एक तांबे का कलश साफ जल से भरें और उस पर केले के पत्ते और नारियल लगाएं, ताकि घर में संपन्नता बनी रहे। 
  • इसके अलावा जब गणपति को लेने जाएं, तो उस वक्त चाहे स्त्री हो या पुरूष सभी साफ और नए कपड़े पहनकर जाएं।
  • हाथों में मंजीरे या ढ़ोलक जरूर लेकर जाएं, ताकि गणपति का पूरे हर्षोंल्लास के साथ आगमन किया जा सके।
  • गणपति के घर में आगमन से पहले गृहलक्ष्मी को गणेश जी की आरती उतारनी चाहिए और मंत्रों का जाप करते हुए सभी को एक साथ मिलकर शुभ मुहूर्त पर उन्हें उनके स्थान पर स्थापित करना चाहिए।
  • इसके बाद गणेश जी को पंचमेवा और मोदक का भोग अवश्य लगवाएं। पंचमेवा का भोग गणपति जी को रोज लगवाना चाहिए।

क्यों करते हैं गणपति के अंगों की पूजा?

गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि  और बुद्धि का दाता भी कहकर पुकारा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गणेश चतुर्थी की पूजा दोपहर को करनी चाहिए। इससे विद्याध्ययन का शुभारंभ होता है और फिर गणेश जी सभी दुखों को हर कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। आप चाहें तो गाय के गोबर से भी प्रतिमा बना सकते हैं। गणपति जी के कानों में वैदिक ज्ञान, सूंड में धर्म, दाएं हाथ में वरदान, बाएं हाथ में अन्न, पेट में सुख-समृद्धि, नेत्रों में लक्ष्य, नाभि में ब्रह्मांड, चरणों में सप्तलोक और मस्तक में ब्रह्मलोक होता है। जो जातक शुद्ध तन और मन से उनके इन अंगों के दर्शन करता है उसकी विद्या, धन, संतान और स्वास्थ्य से संबंधित सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। इसके अतिरिक्त जीवन में आने वाली अड़चनों और संकटों से छुटकारा मिलता है।

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