जीवन जीना सिखाने वाले गीता के टिप्स
भगवद् गीता हिंदू धर्म का प्रमुख ग्रंथ है। इस ग्रंथ में लाइफ स्टाइल व मैनेजमेंट के कई गुर छिपे हुए हैं।
Bhagavad Gita Lessons: हिंदू धर्म में भगवद् गीता प्रमुख धर्म ग्रंथों में से एक है। इसे सभी वेद व पुराणों का सार माना गया है। जिसमें लाइफ स्टाइल व मैनेजमेंट दोनों के गुर छिपे हुए हैं। यही वजह है कि गीता के उपदेश मनुष्य के आम जीवन से लेकर मैनेजमेंट की कक्षाओं तक पहुंचाए जा रहे हैं। आज हम भी आपको गीता की उन दस शिक्षाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो जीवन के हर पहलु व क्षेत्र में उपयोगी है।
Bhagavad Gita Lessons:आलस छोड़ कर्म करें

गीता का पहला सूत्र कर्म करते रहने का है। गीता के अनुसार मनुष्य को कभी भी आलसी, अकर्मण्य या क्रियाहीन नहीं होना चाहिए। अपने कर्तव्य के अनुसार लगातार कर्म करते रहना चाहिए। ये कर्म फल की इच्छा से भी ना हो। क्योंकि फल मनुष्य के हाथ में नहीं है और फल की कामना स्वार्थ, लोभ व मोह से संबंध रखती है। कामना पूरी नहीं होने पर क्रोध भी बढ़ता है। ये सब परमात्मा को प्राप्त करने में बाधक है।
सुख – दुख से परे आनंद की प्राप्ति

गीता में भगवान श्रीकृष्ण दुख से बचने का उपाय भी बताते हैं। वे कहते हैं कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति स्थाई नहीं है। वह बदलते रहते हैं। इनमें आसक्ति रखने से ही सुख व दुख होते हैं। इसलिए हर परिवर्तनशील चीज को दर्शक की तरह देखते हुए जो स्थाई परमात्म तत्व है उसमें खुद को लगाना चाहिए। इससे मनुष्य सुख व दुख दोनों से ऊपर उठते हुए परम आनंद को प्राप्त कर सकता है।
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वर्तमान पर फोकस करें

अक्सर लोग अतीत की यादों व भविष्य की चिंताओं में रहते हैं। जबकि गीता मनुष्यों को वर्तमान में जीने की कला बताती है। गीता के अनुसार जीवन का आनंद ना तो बीते हुए कल और ना ही भविष्य में है। बल्कि, जीवन का आनंद वर्तमान में जीने में है। वर्तमान पर ध्यान देने पर भविष्य अपने आप अच्छा होगा।
कारण अच्छा तो फल भी अच्छा

गीता में कहा है कि हर कार्य व परिणाम के पीछे कोई ना कोई कारण होता है। इसलिए कार्य व परिणाम अच्छा करने के लिए कारण ठीक होना जरूरी है। इसलिए मनुष्य को कारण अच्छा करने पर ध्यान देना चाहिए। इससे परिणाम अपने आप अच्छा होगा।
मौत की फिक्र ना करें

गीता मनुष्य को निडर होकर जीना सिखाती है। क्योंकि व्यक्ति को सबसे ज्यादा डर मरने का लगता है, जबकि गीता कहती है कि शरीर व आत्मा दोनों अलग- अलग है। इनमें शरीर तो हर पल बदलते हुए अंत में खत्म हो जाता है, लेकिन अजर व अमर आत्मा को कर्म के अनुसार फिर नया शरीर या मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिए शरीर के बूढे होने या मरने की चिंता व डर नहीं होना चाहिए।
बदलाव प्रकृति का नियम

गीता के अनुसार प्रकृति में कुछ भी स्थाई नहीं होने की वजह से उसमें बदलाव होता रहता है। इन बदलावों की वजह से ही जीवन में गरीबी- अमीरी, रोग- नीरोग तथा सुख दु:ख चलते रहते हैं।
नीरोग रहने का सूत्र

गीता में नीरोग रहने का सूत्र भी दिया गया है। इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सात्विक, राजसिक व तामसिक भोजन के बारे में बताते हुए सात्विक यानी वसा रहित, हल्का व सात्विक भोजन के साथ प्रणायाम व अष्टांग योग जैसे साधन बताए हैं।
निष्पक्षता व सांप्रदायिक सौहार्द

गीता भेदभाव व धार्मिक कट्टता विरोध करती है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जो हर प्राणी में ईश्वर को देखता है वही सच्चा देखता है। यानी किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म, वर्ण आदि से ऊपर उठकर समभाव से देखना चाहिए। गीता के अनुसार ज्ञानीजन विद्या से संपन्न ब्राह्मण तथा गाय, हाथी, श्वान और चांडाल में समदर्शी होते हैं। वे सभी जीवों में प्रभु के दर्शन करते हैं। इस तरह ये विचार धार्मिक कट्टरता को खत्म व सांप्रदायिक सौहार्द को भी बढ़ाते हैं।
आशा व अपेक्षा से बचें

गीता के अनुसार मनुष्य को कर्म किसी उम्मीद या आशा से नहीं करना चाहिए। क्योंकि यदि किसी से अपेक्षा कर कोई कार्य किया जाएगा तो वह उसके पूरी होने के मोह में बंध जाएगा। फिर यदि वह अपेक्षा पूरी नहीं हुई तो उसे क्रोध आएगा। इस तरह वह काम, क्रोध व लोभ में ही फंसा रहेगा।
कट्टरता से बचें, सहजता को पकड़ें

गीता धर्म में जड़ता की विरोधी व सहज मार्ग की समर्थक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने परमात्मा की प्राप्ति का कोई एक मार्ग ही नहीं बताया। बल्कि, इसके लिए भक्ति, ज्ञान व कर्म तीन तरह के योग बताए। सगुण व निर्गुण दोनों की उपासना को भी सही ठहराया। इस तरह उन्होंने धर्म के किसी एक मार्ग के प्रति कट्टरता की जगह मनुष्यों को जो भी सहज व सरल मार्ग लगे उसे अपनाने का रास्ता बताया।
