Bhagavad Gita Lessons
Bhagavad Gita Lessons

Bhagavad Gita Lessons: महाभारत के युद्ध से पूर्व विचलित अर्जुन को सही राह दिखाने के लिए योगेश्वर कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था। प्रस्तुत लेख से जानें कि क्या है गीता का महात्म्य, जिसके कारण आज भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है।

गी ता और रामायण दो ऐसे प्रकाश स्तंभ हैं जो धर्म और संस्कृति के धरातल पर ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं। सद् गृहस्थ रहते हुए भी इन महान ग्रंथों के आदर्शों को अपना कर भगवतपरायण जीवन व्यतीत
किया जा सकता है। समस्त धार्मिक ग्रंथों में गीता को तो ‘मुकुटमणि’कहा जाता है। इसलिए गीता पश्चिमी देशों में भी सर्वाधिक प्रिय है। दुनियाभर में गीता को उद्धरित किया जाता है। भगवद्गीता मूलत: संस्कृत महाकाव्य है जो महाभारत की एक घटना के रूप में प्राप्त हुआ था। लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता सुनाई थी। इसके 18 अध्यायों में वे उपदेश हैं जो हमारे ज्ञान चक्षुओं को खोलते हैं। इसलिए गीता का पठन-पाठन पूर्व काल से ही होता रहा है।

भगवद्गीता का शुभारंभ तब हुआ था जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मित्र और भक्त अर्जुन का रथ हांकने के लिए सहर्ष सारथी होना स्वीकार किया था। अज्ञान का तिमिर ज्ञान रूपी अंजन की श्लाका से दूर हो जाता है। यह बात अलग है कि आजकल पुस्तकों से अर्जित जानकारी व सूचनाओं को ही ज्ञान समझा जाने लगा है। गीता के संदर्भ में ज्ञान का आशय उस दिव्य ज्ञान से होता है जिसकी प्राप्ति मानव जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। उस ज्ञान की खोज करनी पड़ती है किंतु भगवद्गीता के अध्ययन से वह सहज मिल जाता है। न्यायालयों में साक्षी गीता पर हाथ रखकर जो कहते हैं उसे सच माना जाता है। गीता, ज्ञान का महासागर है। यद्यपि ज्ञान तो बोध है। ज्ञान को एकत्र नहीं किया जाता है। ज्ञान का तो उदय होता है। जब, जहां, जिसे ईश्वरीय अनुभूति हो जाए वहीं उसका ‘ज्ञानोदय’ हो जाता है। यह स्थिति समाधि की भी हो सकती है और सहज भी। जहां ज्ञान का प्रकाश हो जाता है वहां अज्ञान नहीं रहता। यह बात अलग है कि ज्ञान दिव्य, आंतरिक प्रत्यक्ष, परोक्ष, लौकिक, जन्मजात, किताबी और व्यावहारिक कई प्रकार का होता है। गीता में इन सभी का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। गीता से हमें एक नई दृष्टि प्राप्त होती है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अ भ् य ु त् थ ा न म ध म र् स् य त द ा त् भ ा ं ग सृजाभ्यहम।
अर्थात् जब भी, जहां भी धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है तब मैं अवतार लेता हूं। यह भगवान का नियम है जो गीता के अध्याय 4/7 में दिया गया है। इसी प्रकार अध्याय 2/47 में कहा गया है कि –

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, मा कर्म फल हेतु र्भूभा ते संगोस्तव कर्माणि।

अर्थात् तुम्हें अपना कर्म करने का अधिकार है। फल की इच्छा मत करो।

Bhagavad Gita Lessons-shrimad bhagavad gita guides from darkness to light
shrimad bhagavad gita guides from darkness to light

सचमुच यह सूत्र बहुत गहरा और गंभीर है। इसे समझने वाले कभी निराश नहीं होते। ज्ञान के संबंध में गीता के अध्याय 11 में कहा गया है कि जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान के आलोक से प्रकाशित होते हैं तभी सतोगुण की अभिव्यक्ति को अनुभव किया जा सकता है। इसलिए अज्ञानियों को गीता के रहस्य कभी न तो रुचिकर लगते हैं और न उनकी समझ में ही आते हैं। गीता के अध्याय 4/39 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो दिव्य ज्ञान को समर्पित हैं और जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया है। वही इस दिव्य ज्ञान को पाने का अधिकारी है और इसे प्राप्त करते ही वह तुरंत आध्यात्मिक शांति को प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक अनुभव और अनुभूति हमारी चेतना, मोक्ष का साधन और विद्या को ज्ञान कहा गया है। ज्ञानपिपासु और जिज्ञासु जब गीता की शरण में जाते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन की तरह उनके ज्ञान चक्षु भी
खुल जाते हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि सामान्य व्यक्ति इस संसार में मोहग्रस्त हो जाते हैं। वे अपने संकल्प भूल जाते हैं। इसलिए कदम-कदम पर कष्ट और क्लेश दिखाई देने लगते हैं। यही बातें हमारे दुखों का प्रमुख कारण बन रही हैं। गीता में हमारी चुनौतियों का कल्याणकारी समाधान मिल जाता है।
गीता में निष्काम कर्मयोग की शिक्षा दी गई है। मन तथा इंद्रियों का नियंत्रण, ध्यान, योग, भगवद् ज्ञान, भगवद् प्राप्ति, भक्ति योग, प्रकृति के गुण, दैवी तथा आसुरी स्वभाव, श्रद्धा तथा संन्यास की सिद्धि आदि परम गुह्य ज्ञान का वर्णन किया गया है। इसलिए गीता से यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है। स्वभाव समदर्शी होने लगता है। यह कोई साधारण बात नहीं है। जो अल्पबुद्धि होते हैं उनका आत्मज्ञान नष्ट हो जाता है। वे क्रूरता से सभी का अहित करते हैं। गीता हमें इस आसुरी स्वभाव से बचाती है। मानव कल्याण की दृष्टि से गीता का
ज्ञान अत्यंत लाभकारी है। बशर्ते हम ज्ञान के इस अद्भुत भंडार को पूर्ण भक्ति भाव से ग्रहण कर लें।
सांसारिक उलझनों में फंसे और कठिनाइयों से जूझ रहे लोगों को गीता उसी प्रकार से सही रास्ता दिखाती है
जैसे अर्जुन को युद्ध करते समय भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में दिखाया था। कुरुक्षेत्र का अर्थ है कर्मक्षेत्र। जो कर्मशील है, कर्मवीर है और कर्मण्यता का भाव रखते हैं उन्हें भगवद्गीता का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए।