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करीब 5000 साल पहले लिखे गए इस भारतीय महाकाव्य की हर एक बात आज भी लोगों को सही राह पर चलने की प्रेरणा देती है। इसकी शिक्षाएं, आचरण और व्यावहारिक पाठ इंसान को नैतिकता सिखाते हैं।
Bhagavad Gita Shlok: भगवद गीता को जीवन का सारा कहा जाता है। करीब 5000 साल पहले लिखे गए इस भारतीय महाकाव्य की हर एक बात आज भी लोगों को सही राह पर चलने की प्रेरणा देती है। इसकी शिक्षाएं, आचरण और व्यावहारिक पाठ इंसान को नैतिकता सिखाते हैं। रिश्तों को कैसे निभाना है और उन्हें कैसे संभालना है, ये दोनों की ज्ञान गीता सभी को देती है। भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच संवादों का यह सिलसिला इस तरह बुना गया है कि इसका हर एक शब्द अपने आप में पूरा ज्ञान है। आज हम आपको बता रहे है कि इस महाकाव्य के 5 सबसे शक्तिशाली श्लोक, जो आपकी जिंदगी को ट्रैक पर ला सकते हैं।
1. कर्मफलं न संशयः स कर्म योग तस्य कार्यं कर्म करो मा कर्मफलहेतुः

भगवत गीता का यह श्लोक लोगों को कर्म के प्रति समर्पण सिखाता है। यह श्लोक कर्मयोग का सार बताता है। इसमें श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म का फल निश्चित नहीं है, कर्म ही योग है। इसलिए अपना कर्म पूरे समर्पण के साथ करो। फल की चिंता मत करो। यह बात आज के समय में भी एकदम सटीक है। फल की चिंता किए बिना जो लोग अपने कर्म को महत्व देते हैं, वे जिंदगी में सफलता जरूर पाते हैं।
2. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
यह श्लोक भारतीय संस्कृति का आधार है। हर बच्चे को बचपन से ही इसकी सीख दी जाती है। इस श्लोक का अर्थ है, अपने कर्तव्यों को पूरा करने का अधिकार सभी को है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वह इन कर्मों के फल का भी हकदार हो। इसका अर्थ है परिणामों और लाभ पर फोकस करने की जगह अपनी जिम्मेदारियों और कर्म पर फोकस करें। एक तरह से ये श्लोक आपको स्वार्थ और लाभ का मोह छोड़ने की प्रेरणा देता है।
3. अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूतशयस्थित:
यह श्लोक भारतीय संस्कृति का आधार है। अक्सर हम सभी कहते हैं कि भगवान हर जगह है, वो आपके हर कार्य को देख रहा है। बस, यही इस श्लोक का सार है। इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मैं सभी प्राणियों के हृदय में रहता हूं। इसका एक अर्थ ये भी है कि ईश्वर हर समय आपको देख रहे हैं इसलिए कोई गलत काम न करें।
4. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
यह श्लोक सभी को नैतिकता और धर्म का महत्व बताता है। इसमें श्री कृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि इस धरती पर अधर्म की कोई जगह नहीं है। वे कहते हैं, जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ेगा और धर्म में गिरावट आएगी, बुरे कर्म बढ़ेंगे तो मैं इसे खत्म करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लूंगा।
5. क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति
गीता का यह महत्वपूर्ण श्लोक हमें सिखाता है कि क्रोध आपके जीवन को हमेशा कई परेशानियों और नकारात्मकता से भर देगा। इसमें श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि क्रोध आपकी बुद्धि नष्ट कर देता है। यह आपको विनाश के रास्ते पर ले जाता है। इसके कारण आप तर्कसंगत सोच नहीं पाते और भ्रम के कारण गलत निर्णय ले लेते हैं। इसलिए अपने गुस्से को कंट्रोल करना आना चाहिए।
