शुक्र पर संभवत: किसी समय, पृथ्वी की तरह, अपार जल मौजूद था। मगर यह वाष्पन द्वारा समाप्त हो गया। अब शुक्र की सतह पूर्णत: शुष्क है। शुक्र काम चेष्टा, सौंदर्य, प्रजनन शक्ति ललित कलाओं का स्वामी है। यह सफाई पसंद, सुरुचि वाला, विनयी, मिलनसार, उदार हृदय, यशस्वी बनाता है एवं कला कौशल, नाटक, अभिनय, चित्रकला में रुचि देता है। यह सूर्य के साथ हो, तो जातक कलाकार, चित्रकार, नेत्र रोगी, विलासी, कामुक, अविचारी होता है।

चंद्रमा के साथ यह बलवान् होता है। जातक व्यापारी, धनवान, सुखी एवं भोगी होता है। यह मंगल के साथ हो, तो व्यापारकुशल, धातुओं का कार्य करने वाला, योगी, कार्यपरायण, तेज वाहन चलाने वाला, गतिशील, अनेक स्त्रियों का उपभोग करने वाला होता है। बुध के साथ यह विद्या, बुद्धिमत्ता, साहस आदि देता है। जातक मुंशी, लेखक, सुखी, विलासी, राजमान्य, राज्याधिकारी, शासक होता है और गुरु के साथ सुखी, बलवान् तथा विद्वान् बनाता है। शुक्र-शनि का योग निम्न मनोवृत्ति का सूचक है, जो पाखंडी, दंभी, स्वार्थी बनाता है।

शुक्र ग्रहों में पृथ्वी के सबसे निकट है। सूर्य से दूरी में शुक्र दूसरे स्थान पर है (बुध निकटस्थ है) शुक्र प्रेम का ग्रह है। यह सौंदर्य, प्रेम, यौनाकर्षण और मनुष्य के अंतर्मन की वास्तविकता का प्रतीक है। शुक्र मंगल के बाद दूसरा ग्रह है, जो सबसे कम वक्री गति में आता है।

पृथ्वी से देखने पर वक्री गति में ग्रह उल्टा चलता प्रतीत होता है। ऐसा उस समय होता है, जब वक्री ग्रह और पृथ्वी सूर्य के एक ओर आ जाते हैं। ऐसे में शुक्र का भ्रमण (पश्चिम से पूर्व) वक्री हो जाएगा, क्योंकि पृथ्वी तथा अधिसंख्य ग्रह पूर्व से पश्चिम में भ्रमण करते हैं। हालांकि शुक्र विपरीत दिशा में भ्रमण करता है, इसलिए वहां पर सूर्य पश्चिम में उगता है। शुक्र के वातावरण में 96 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड मौजूद है। इस वजह से शुक्र का तापमान 4000 से से भी अधिक है। अन्य गैसों में 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.003 प्रतिशत वाष्प तथा बाकी अन्य गैसों की अल्प मात्राएं इसमें हैं।

वातावरण की ऊंचाई सतह से 30 कि. मी. है। बादल गंधक अम्ल (सल्फ्यूरिक एसिड) से परिपूर्ण हैं। बहुत से खोजी यान शुक्र की सतह पर उतरे, पर असफल रहे। 1975 में सर्वप्रथम वहां की पथरीली सतह का चित्र प्राप्त हुआ और वहां के तापमान की जानकारी मिली। शुक्र पर बादलों की उपस्थिति और वहां की जलवायु के कारण मानचित्रण के लिए राडार का उपयोग किया जाता है। शुक्र की सतह मुख्यत: एक विशाल मैदान है। कुछ ऊंचे और नीचे इलाके भी हैं।

ऊंचे क्षेत्र कुल क्षेत्रफल के लगभग 27 प्रतिशत है, जबकि निचले क्षेत्र 8 प्रतिशत हैं। शुक्र पर सबसे उंचाई पर मैक्सवेल पर्वत है। शुक्र पर एक विशाल ज्वालामुखी ‘सपस मोंस’ स्थित है, जो 400 कि. मी. चौड़ा और लगभग 1.6 कि. मी. ऊंचा है। शुक्र दूरस्थ ग्रहों पर जाने वाले अंतरिक्ष यानों के लिए सुविधाजनक पड़ाव है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ग्रह अपने गुरुत्व बल से अंतरिक्ष यान को ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम होते हैं।

फरवरी 1990 में बृहस्पति पर जाने वाले यान गैलीलिओ ने शुक्र के चित्र लिये थे। शुक्र गंधकीय अम्ल से युक्त बादलों से ढका रहता है। ये बादल मुख्यत: कार्बन डाईऑक्साइड से निर्मित हैं। इन बादलों की गति पृथ्वी के तूफानों की गति से 3 गुना अधिक है। शुक्र आकार, भौतिक संरचना और घनत्व में पृथ्वी के समान है। बादलों से घिरा होने के कारण शुक्र के बारे में दूरदर्शी से बहुत कम जानकारी मिल पाती है। शुक्र की संहति और आयतन लगभग पृथ्वी के समान है।

संहति पृथ्वी का 81.5 प्रतिशत और आयतन 86 प्रतिशत है। चमकीला होने के कारण शुक्र को भोर का तारा भी कहते हैं। 19वीं शताब्दि में लोगों का विश्वास था कि अगर शुक्र आकाश में दिखाई देता है, तो वह समय राजाओं के लिए खुशियां मनाने का होता है। 

शुक्र संबंधी कुछ तथ्य निम्न हैं

  • शुक्र सूर्य की परिक्रमा पृथ्वी के 224.7 दिनों में पूर्ण करता है। शुक्र का एक दिन पृथ्वी के 243 दिनों के बराबर होता है। ऐसा शुक्र की धीमी दैनिक गति के कारण है।
  • शुक्र पृथ्वी के मुकाबले अधिक पूर्ण गोल है।
  • शुक्र बहुत गर्म है। इसका तापमान बहुत अधिक होता है।
  • इसके वातावरण में हाइड्रोजन और हीलियम भी अल्प मात्रा में मौजूद हैं।
  • इसकी सतह पर चलने वाली आंधियों का वेग 3 से 13 कि. मी. प्रति घंटा है।
  • इसकी सतह पर काफी मात्रा में सूर्य का प्रकाश पहुंच जाता है।
  • सतह के पत्थर ग्रेनाइट और बसाल्ट से मिलतेजुलते हैं।
  • शुक्र की सतह काफी समतल है और पृथ्वी की सतह से कम ऊबड़खाबड़ है।
  • वहां वायु मंडल का दबाव पृथ्वी से 97 गुणा अधिक है।
  • शुक्र के गहनतम भाग में निकल और लौह उपस्थित हैं।
  • गुरुत्व बल पृथ्वी का 0.91 है।
  • शुक्र का व्यास 12404 कि. मी. है, जो पृथ्वी का 95 प्रतिशत है।

सप्तम भाव का मनुष्य के जीवन में शुक्र बहुत महत्त्व है। सप्तम भाव केंद्र में होने से, शुभ ग्रह इसके स्वामी होने पर केंद्राधिपत्य दोष लगता है, जबकि अशुभ ग्रह इसके स्वामी होने पर शुभ भावेश माने जाते हैं। सप्तम भाव का कारक ग्रह शुक्र है। स्त्री के लिए इसका कारक ग्रह गुरु होता है। पति की कुंडली में शुक्र का संबंध सप्तम भाव, या सप्तमेश से होना सुखी वैवाहिक जीवन को प्रकट करता है और पत्नी की कुंडली में गुरु का संबंध सप्तम भाव से, या सप्तमेश से हो, तो सुखी जीवन होता है। वैसे भी गुरु की स्थिति कुंडली में बलवान होने पर गुरु सब अरिष्टों का नाश करता है। 

कुंडली मिलाने में गुण मिलान आदि का चलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। मंगलादि दोशों का विचार विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। गुण मिलाने के बाद ग्रह मिलाने का भी बहुत महत्त्व है। यह पत्नी, या विवाह से संबंधित संपूर्ण विवरण ज्ञात करने का स्रोत है। दांपत्य जीवन कैसा रहेगा? इसकी समस्त जानकारी सप्तम भाव से मिल सकती है। कुंडली में सप्तम भाव पति-पत्नी का है। इससे ज्योतिष में दांपत्य जीवन का विचार किया जाता है। सप्तम भाव में सौम्य ग्रह हो, वहां शुभ ग्रह भी स्थित हो, शुभ ग्रह की दृष्टि हो, सप्तमेश भी शुभ स्थान में हो, सप्तमेश पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, सप्तमेश, या सप्तम भाव पर किसी पाप ग्रह की युति, या दृष्टि न हो, तो जीवन साथी सुंदर, सुशील, विद्वान, कुलीन, अच्छे स्वभाव वाला, भाग्यवान मिलता है। संक्षिप्त में कह सकते हैं कि पुरुषों का विवाहकारक ग्रह शुक्र और स्त्रियों का गुरु ग्रह होता है। जब वे उच्च, बली और शुभ दृष्ट होते हैं, तब विवाह यथासमय और उत्तम होता है।

विवाह योग: शुक्र ग्रह स्वग्रही, या कन्या राशि का हो, तो विवाह उत्तम होता है। परंतु उसे अशुभ ग्रहों से दृष्ट नहीं होना चाहिए। मंगल, या सूर्य के नवांश में बुध- गुरु गये हों, या सप्तम में गुरु, या नवांश हो, तो विवाह अवश्य होता है। जितने ज्यादा बलवान और शुभ ग्रह सप्तम भाव में स्थित हों, या दृष्टि संबंध कर रहे हों, उतना शीघ्र विवाह होता है। गुरु ग्रह के अपने नवांश में होने पर विवाह अवश्य होता है।

वृष लग्न: वृष लग्न वाले का पत्नीकारक ग्रह मंगल है। पत्नी गौर वर्ण, गठे शरीर वाली होती है। मंगल लग्न, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, दशम, एकादश व्यय भाव में रहने पर पत्नी स्वस्थ एवं दीर्घायु होती है। मंगल द्वितीय, तृतीय, षष्ठ, अष्ट भाव में रहने पर पत्नी अस्वस्थ रहती है और पंचम एवं नवम में रहने पर दांपत्य सुख चिरस्थायी नहीं होता है। सप्तम भाव में गुरु एवं मंगल की स्थिति एवं दृष्टि सुखद होती है। अन्य ग्रहों की युति, या दृष्टि कष्ट एवं कलहमय होती है।

तुला लग्न: तुला लग्न की पत्नी का कारक ग्रह भौम है। पत्नी सामान्य कद की, सामान्य वर्ण, रोबीली, सुदृढ़ शरीर की होती है। मंगल लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, एकादश भाव में हो, तो पत्नी स्वस्थ एवं दीर्घायु होती है। शेष ग्रह नष्ट होते हैं। सप्तम भाव में चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र की दृष्टि तथा युति लाभप्रद होती है। 

निम्न स्थितियों में विवाह प्रतिबंधक योग होता है

  • सप्तमेश 6,8,12 में नीच, या अस्त हो, तो विवाह नहीं होगा, या जातक विधुर हो जाएगा।
  • चंद्रमा और शनि सप्तम भाव में होने पर विवाह नहीं होता।
  • मंगल और शुक्रग्रह संतान भाव, सप्तम भाव, या भाग्य भवन में हों, तो विवाह में बाधा उत्पन्न होती है।
  • लग्न में केतु, सप्तम में अशुभ ग्रह हों, तो विवाह नही होता, या स्त्री की मृत्यु हो जाती है। 

ज्योतिष की सहायता से कर्म संबंधित शुक्र विषयों का चुनाव

सर्वप्रथम लग्न से, फिर चंद्रमा से और फिर सूर्य से दशम भाव में स्थित ग्रहों से कर्म की प्रकृति ज्ञात की जाती है। इन तीनों प्रकार के लग्नों में से जो बली हो, उससे दशम भावगत ग्रह के आधार पर कर्म और उस कर्म से संबंधित विषय का चुनाव कर लेना चाहिए। मंत्रेश्वर फलदीपिका में कहते हैं कि ‘लग्न कुंडली में दशम भाव का स्वामी नवांश कुंडली के जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव के स्वामी से कर्म निर्धारित करें। इसके बाद उस कर्म से संबंधित विषय का चुनाव कर लें। यदि दशम भाव में कोई ग्रह नहीं है, तब मंत्रेश्वर की विधि का उपयोग करें, या लग्न से दशम भाव का स्वामी जिस राशि में स्थित है, उस राशि के स्वामी के अनुसार विषय का चुनाव करें। 

विभिन्न ग्रहों से संबंधित विषय निम्नवत हैं

शुक्र: कंप्यूटर (सॉफ्टवेयर), होटल प्रबंधन, पर्यटन, वाद्य, नृत्य, संगीत, वनस्पति शास्त्र, संचार, हिंदी, कला संकाय के विषय, शुक्र-शनि से संस्कृत।

वृष: संचार के कार्य, प्रकाशक, बैंक से संबंधित कार्य, रोकड़िया, उद्योगपति, प्रसाधन से संबंधित कार्य, सुनार, फैशन से संबंधित कार्य, प्रचार का काम, गायनवादन से संबंधित कार्य, खेती, इलैक्ट्रानिक्स।

तुला: सलाहकार, वकील, न्यायाधीश, प्रशासनिक कार्यों में न्याय अधिकारी, जन संपर्क, गायक, फिल्मी कलाकार, सज्जा से संबंधित कार्य, उत्सुकता से करने वाले कार्य, जैसे कंप्यूटर, रॉकेट आदि के कार्य, फैशन डिजाइन, फैशन मॉडल, फर्नीचर से संबंधित कार्य, सेंट से संबंधित कार्य, फोटोग्राफर, होटल से संबंधित कार्य, कार्टून, दर्जी, कैमरा मैन, भौतिकता के चमक-दमक वाले कार्य, आहार-पोषण संबंधित कार्य। 

दशमेश होने के फल से रोजगार का चुनाव

जन्मकुंडली जीवन का दर्पण है। इसमें द्वादश भाव होते हैं। प्रत्येक भाव अपनी अलग-अलग विशेषताएं रखता है। जीवन का आधार कर्म है और कर्म हेतु दशम भाव है। ज्योतिष के आधार पर अपना व्यवसाय चुन सकते हैं। वह कौन सी दिशा में होगा? व्यवसाय करेंगे, या नौकरी? किस प्रकार का व्यवसाय, या नौकरी रहेगी, जिससे हम जीवन में उच्चतम शिखर पर पहुंच सकते हैं? इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए दशम भाव, दशमेश, दशम भाव का कारक, दशम भाव में स्थित ग्रह, दशम भाव पर ग्रहों की दृष्टियां, दशमेश के बैठने की राशि और भाव, दशमेश से अन्य ग्रहों की युति, या संबंध, महादशा एवं अंतर्दशा के साथ ही नवमांश कुंडली की आवश्यकता होगी।

शुक्र: सिनेमा के कलाकार, संगीतज्ञ, गायक, वादक, फैशन से संबंधित कार्य, रेडियो, दूरदर्शन के कलाकार, घी, खाद्य पदार्थों का व्यवसाय, फैंसी वस्त्र, सेंट संबंधित कार्य, फूलों का व्यवसाय, सूचना तकनीक, मकान एवं भवनों का क्रयविक्रय, कपड़ा उद्योग, वाहन से संबंधित कार्य, उद्यान से संबंधित कार्य। दशमेश की दशा का फल शुक्र: जातक, फैशन, सिनेमा, भवन एवं स्त्री वर्ग से लाभ प्राप्त कर, उच्च स्थान पर पहुंच जाता है। विदेश यात्रा का सुख भी प्राप्त होगा। सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ मित्र वर्ग का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। 

दशम स्थान में ग्रह और उनके परिणाम शुक्र दशम स्थान में स्थित होने पर जीवन यशदायी होता है। सुख-चैन से नौकरी या धंधा करने का संकेत मिलता है। शुक्र बलवान होने पर स्वस्त्री खानदानी परिवार की होती है। ऐसे जातक राजनीति में होने पर अपनी मधुर वाणी एवं अच्छे बर्ताव से लोगों का दिल जीत लेते हैं। इनमें कूटनीति और व्यवहार कुशलता से यश प्राप्त करने की क्षमता रहती है। पीड़ित शुक्रजातक को रंगीला बनाता है। इससे बेआबरू होने की संभावना बनती है। पृथ्वी राशि में लग्न और दशम में शुक्र होने पर वह हॉल सजावट, अंदरूनी सजावट और सौंदर्य प्रसाधन व्यवसायों के लिए फलदायी होता है।

यह भी पढ़ें –भगवान और उनकी पसंद के प्रसादम