वास्तु एवं फेंग-शुई के बदलते जमाने में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं एवं मूर्तियां मात्र मंदिरों की चाहरदीवारी तक ही सीमित नहीं रह गई हैं बल्कि पूजा स्थल से निकलकर ड्रांईग रूम, लिविंग रूम, प्रवेश द्वार आदि की सज्जा का भी हिस्सा बन गई है। खासतौर पर गणेश जी की प्रतिमा को लोग आज अपने भाग्य एवं सुख-समृद्धि के साथसाथ अपने इंटीरियर से भी जोड़ने लगे हैं।

भगवान गणेश से जुड़ी कथाएं

भारतीय संस्कृति में पौराणिक कथाओं के माध्यम से जीवन एवं वातावरण से जुड़ी विभिन्न ऊर्जाओं का चित्रण देवताओं की आकृतियों के रूप में हुआ है। इनमें दो विशिष्ट आकृति हैं- श्री गणेश एवं श्री हनुमान। श्री गणेश ऊर्जा के अग्र भाग का एवं श्री हनुमान ऊर्जा के अंतिम छोर का प्रतिनिधित्व करते हैं। पुराणों में उनके जन्म की अनेक कथाएं हैं।

कहते हैं माता पार्वती ने गणेश जी को द्वार पर रक्षा के लिए स्वयं अपनी शक्ति से रचा था। शिव पुराण की यह घटना ही श्री गणेश को द्वार पर विराजमान करने का कारण है, परंतु श्री गणेश कोई द्वारपाल नहीं हैं। द्वार की गरिमा में रक्षा, स्वागत एवं प्रवेश के विभिन्न आयाम भी सम्मिलित हैं। इस कारण श्री गणेश को द्वार के दाएं या बाएं नहीं द्वार के ऊपर स्थापित किया जाता है।

गणेश उस ऊर्जा के संवाहक हैं जो हमारे प्रवेश द्वार पर होती है। वास्तु व फेंग-शुई के अनुसार जो मुंह का स्थान शरीर में हैं वही प्रवेश (मुख्य) द्वार का स्थान किसी भी भवन में होता है, जैसे मुंह के द्वारा ही शरीर भोजन-पानी ग्रहणकर अपना निर्माण व पालन करता है, वैसे ही मुख्य द्वार से घर में ऊर्जा प्रवेश करती है और भवन से जुड़ी सभी अभिलाषाओं की पूर्ति करती है। वास्तु में गणेश व फेंग-शुई में ड्रैगन की द्वार पर संकेतात्मक उपस्थिति ऊर्जा का विशाल भंडारण इंगित करती है।

आजकल यह भ्रांति है कि गणेश को द्वार पर पीठ करके नहीं स्थापित करना चाहिए, यह वास्तु शास्त्र के सम्मत नहीं है। आप यह चिंता या तर्क कदापि न करें कि उनकी पीठ दरवाजे की ओर होने के कारण या तो उनके पीछे शीशा लगाना चाहिए या फिर दरवाजे के अंदर की ओर भी एक गणेश लगाएं। यहां प्रश्न मान-सम्मान का नहीं, गणेश की उस मुखाकृति या शारीरिक संरचना का है जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने गहन मनन के उपरांत प्रस्तुत किया है। 

अष्टविनायक गणेश

यूं तो भगवान गणेश जी के अनेक रूप है, परंतु उनमें से आठ रूप अधिक प्रसिद्ध हैं। इन अवतारों का नाम श्री गणेश द्वारा संहार किए गए असुरों के नामानुसार ही रखा गया है। यदि इन असुरों का विवेचन करके देखें तो मत्सर, मद, मोह, लोभ, क्रोध, काम, ममता तथा अहंता रूप जैसे अन्त शत्रुओं का नाम उभर कर आता है। भगवान श्री गणेश का यह संहारक रूप इस दृष्टि के विघ्नहर्ता रूप का परिचायक है।

वक्रतुण्ड

गणेश का एक ऐसा स्वरूप जिसमें उनकी सूंड मुड़ी हुई है। गणेश जी की सूंड को लेकर भी कई वास्तुविदों में भ्रम है कि उनकी सूंड किस दिशा में होनी चाहिए। अमूमन हमारा बायां हाथ ही ऊर्जा को ग्रहण करके उसे हमारे शरीर में वितरित करता है इसी कारण मुख्य द्वार पर ऐसी गणेश आकृति लगाई जाती है जिसकी सूंड उनकी बाईं तरफ हो। जल का स्रोत भी भवन में बाएं से दाएं इसी कारण ही स्थापित किया जाता है। घर के मध्य भाग में ऐसी गणेश आकृति की स्थापना करें जिसकी सूंड उनके मध्य में हो। यह स्थिति वातावरण में ऊर्जा के प्रवेश के उपरांत उसकी स्थापना संतुलन को इंगित करती है। गणेश जी की मूर्ति पर पीले फूल चढ़ाने का रिवाज है, जिसका एकमात्र कारण घर के मध्य भाग (ब्रह्मï स्थान) का पृथ्वी तत्त्व होना है। पूजा स्थान में ऐसी गणेश आकृति उचित होती है जिसकी सूंड उनके बाएं तरफ हो। यह आकृति ऊर्जा को ग्रहणकर संतुलन करने के उपरांत उसके वातावरण में बस जाने की प्रतीक है। वक्रतुण्ड आकृति द्वारा फेंग-शुई के इस नियम का भलीभांति ज्ञान हो जाता है कि सकारात्मक ऊर्जा वक्र (घुमावदार) स्थिति में चलती है।

एकदंत

‘एक’ शब्द माया का सूचक है जो देह स्वरूपा एवं विलासवती है। ‘दंत’ शब्द भगवान की सत्ता का पर्याय है। गज के बारे में विख्यात है कि उसके दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं। दिखावे (प्रदर्शन) की इस कुधारणा पर विजय पाकर ही मद, विलासिता, लोलुपता एवं धन प्रियता पर विजय प्राप्त करने का संदेश इस अवतार में छुपा है। कहते हैं कि दंत, शक्ति के कारण ही अल्पायु होते हैं और जिह्वा मुलायम होने (स्वीकृति) के कारण ही शरीर के अंत तक उसका साथ देती है। 

महोदर

वास्तु अनुसार उनका यह रूप अत्यंत कल्याणकारी एवं सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने में प्रभावकारी है। यदि गणेश का महोदर रूप बैठक या घर के मध्य भाग में स्थापित किया जाए तो अग्नि एवं जल के असंतुलन द्वारा उत्पन्न समस्त वास्तु दोषों का शमन होता है।

गजानन

कहते हैं कि गज मस्तक पर गज मोती भी होता है जो एक दुर्लभ रत्न है। इसी प्रकार हमारे मस्तक पर भी सहस्रधार चक्र होता है जिसका जागरण एक दुर्लभ उपलब्धि है। श्री गणेश की इस आकृति, यंत्र व मंत्र द्वारा योगियों ने अपना सहस्रधार भी जागृत किया है।

लंबोदर

लंबोदर अर्थात् लंबे उदर (पेट) वाला। हमारे पेट (उदर) पर ऊर्जा का एक केंद्र होता है जिसे मणिपूर चक्र कहते हैं। यह चक्र हमारे बाहरी जगत् से संबंधों का होता है। क्रोध (नाकारात्मक ऊर्जा) रूपी शत्रु हमारे जीवन को नष्ट करता है। यदि हम अपने क्रोध एवं वो बातें जिनसे क्रोध उत्पन्न होता है उनको पचा सकें तो जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं। वास्तु व फेंग- शुई की दृष्टि से भी यह रूप हमारे भवन निर्माण से आंगन को विस्तृत, खुला एवं स्वच्छ रखने की प्रेरणा देता है।

विकट

मयूर वाहक विकट रूप धारण कर श्री गणेश ने कामासुर को परास्त किया था। काम पर विजय केवल आध्यात्मिक जागरण द्वारा ही संभव है। हमारे अंतिम चक्र (मूलाधार) और प्रथम चक्र (आज्ञा) का यह संबंध सर्पा। वास्तुशास्त्र में यह गणेश रूप भवन निर्माण में बहुत ही अहम भूमिका निभाता है। मुख्य द्वार की स्थापना की दिशा के साथ ही भवन का अंतिम द्वार (बैक डोर) और शौच घर की स्थिति का निर्धारण किया जाता है। ईशान कोण में देवालय और नैऋत्य कोण में शौच घर एक ही तिरछी रेखा में रखने का प्रावधान है। इसी रूप की भांति हम दक्षिण-पश्चिम, उत्तरपूर्व और केंद्र को हम पृथ्वी तत्त्व की दिशा मानते हैं जो हमारे काम केंद्र से ही संबंधित है।

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