भारतीय संस्कृति में पौराणिक कथाओं के माध्यम से जीवन एवं वातावरण से जुड़ी विभिन्न ऊर्जाओं का चित्रण देवताओं की आकृतियों के रूप में हुआ है।

इनमें दो विशिष्ट आकृति हैं- भगवान गणेश एवं श्री हनुमान। गणेश ऊर्जा के अग्र भाग का एवं श्री हनुमान ऊर्जा के अंतिम छोर का प्रतिनिधित्व करते हैं। गणेश जी को ऐसा देव माना गया है जो सभी कल्पों में उत्पन्न होते रहते हैं। पुराणों में उनके जन्म की अनेक कथाएं हैं। कहते हैं माता पार्वती ने गणेश जी को द्वार पर रक्षा के लिए स्वयं अपनी शक्ति से रचा था।

परंतु श्री गणेश कोई द्वारपाल नहीं हैं। द्वार की गरिमा में रक्षा, स्वागत एवं प्रवेश के विभिन्न आयाम भी सम्मिलित हैं। इस कारण श्री गणेश को द्वार के दाएं या बाएं नहीं द्वार के ऊपर स्थापित किया जाता है। गणेश उस ऊर्जा के संवाहक हैं जो हमारे प्रवेश द्वार पर होती है। वास्तु व फेंग-शुई के अनुसार जो स्थान मुंह का शरीर में है वही प्रवेश (मुख्य) द्वार का स्थान किसी भी भवन में होता है। जैसे मुंह के द्वारा ही शरीर भोजन-पानी ग्रहण कर अपना निर्माण करता है, वैसे ही मुख्य द्वार से ऊर्जा प्रवेश करती है और भवन से जुड़ी सभी अभिलाषाओं की पूर्ति करती है। वास्तु में गणेश व फेंग-शुई में ड्रैगन की द्वार पर संकेतात्मक उपस्थिति ऊर्जा का विशाल भंडारण इंगित करती है। गणेश के विभिन्न अवतारों में प्रमुख आठ अवतारों द्वारा हम इस आकृति (ऊर्जा) को और विशिष्ट रूप से समझ पाएंगे।

वक्रतुण्ड

गणेश का एक ऐसा स्वरूप, जिसमें उनकी सूंड मुड़ी हुई है। गणेश जी की सूंड को लेकर भी कई वास्तुविदों में भ्रम है कि उनकी सूंड किस दिशा में होनी चाहिए। अमूमन हमारा बायां हाथ ही ऊर्जा को ग्रहण करके उसे हमारे शरीर में वितरित करता है, इस कारण मुख्य द्वार पर ऐसी गणेश आकृति लगाई जाती है जिसकी सूंड उनकी बाई तरफ हो। जल का स्रोत भवन में बाएं से दाएं इस कारण भी स्थापित किया जाता है। घर के मध्य भाग में ऐसी गणेश आकृति की स्थापना करें जिसकी सूंड उनके मध्य में हो। यह स्थिति वातावरण में ऊर्जा के प्रवेश के उपरांत उसकी स्थापना संतुलन को इंगित करती है। पूजा स्थान में ऐसी गणेश आकृति उचित होती है जिसकी सूंड उनके बाएं तरफ हो। 

एकदंत 

‘एक’ शब्द माया का सूचक है जो देह स्वरूपा एवं विलासवती है। ‘दंत’ शब्द भगवान की सत्ता का पर्याय है। ‘गज’ के बारे में विख्यात है कि उसके दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं। दिखावे (प्रदर्शन) की इस कुधारणा पर विजय पाकर ही मद, विलासिता, लोलुपता एवं धन प्रियता पर विजय प्राप्त करने का संदेश इस अवतार में छुपा है। 

महोद

वास्तु अनुसार उनका यह रूप अत्यंत कल्याणकारी एवं सभी नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने में प्रभावकारी है। यदि गणेश का महोदर रूप बैठक या घर के मध्य भाग में स्थापित किया जाए तो अग्नि एवं जल के असंतुलन द्वारा उत्पन्न समस्त वास्तु दोषों का शमन होता है। बुरी नजर, प्रेत बाधा, कार्य में विघ्न, जमीन-जायदाद से संबंधित कष्ट तुरंत दूर हो जाते हैं।

गजानन

गजानन का अर्थ होता है- हाथी जैसी मुखाकृति वाला। गजमुख की लंबी सूंड, दो बड़े-बड़े कान, तीक्ष्ण दृष्टि, लोभ को वश में करने के लिए बहुत कुछ कहती है। हाथी की सूंड में विशेष धमनियां होती हैं जो उसे किसी भी गंध के प्रति विशिष्ट बनाती हैं। हाथी एक बार किसी की गंध सूंघ ले तो वह उसे लगभग 30 वर्षों तक नहीं भूलता। उसकी लंबी सूंड हमें पहले से स्थिति भांपने की प्रेरणा देती है। छोटी आंखें तीक्ष्ण विश्लेषण और लंबे कान ध्यान से सुनने की प्रेरणा देते हैं। गजमुख की प्रत्येक विशेषता हमें शांत, धैर्य धारण कर गहन विश्लेषण के उपरांत ही कर्मरत होने का संदेश देती है। यह सच है कि हमें यदि लोभ पर विजय प्राप्त करना है तो गजानन के इन विशिष्ट गुणों को जीवन में उतारना ही होगा।

कहते हैं कि गज मस्तक पर गज मोती भी होता है जो एक दुर्लभ रत्न है। इसी प्रकार हमारे मस्तक पर भी सहस्रधार चक्र होता है जिसका जागरण एक दुर्लभ उपलब्धि है। श्री गणेश की इस आकृति, यंत्र व मंत्र द्वारा योगियों ने अपना सहस्रधार भी जागृत किया है। 

लंबोदर

लंबोदर अर्थात्‌ लंबे उदर (पेट) वाला। हमारे पेट (उदर) पर ऊर्जा का एक केंद्र होता है जिसे मणिपूर चक्र कहते हैं। यह चक्र हमारे बाहरी जगत्‌ से संबंधों का होता है। क्रोध (नकारात्मक ऊर्जा) रूपी शत्रु हमारे जीवन को नष्ट करता है। यदि हम अपने क्रोध एवं क्रोध उत्पन्न करने वाले कारणों को पचा सकें तो जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं। वास्तु व फेंग-शुई की दृष्टि से भी यह रूप हमारे भवन निर्माण से आंगन को विस्तृत, खुला एवं स्वच्छ रखने की प्रेरणा देता है।

विकट 

मयूर वाहक विकट रूप धारण कर श्री गणेश ने कामासुर को परास्त किया था। काम पर विजय केवल आध्यात्मिक जागरण द्वारा ही संभव है। हमारे अंतिम चक्र (मूलाधार) और प्रथम चक्र (आज्ञा) का यह संबंध सर्पकार है।

वास्तुशास्त्र में यह गणेश रूप भवन निर्माण में बहुत ही अहम भूमिका निभाता है। मुख्य द्वार की स्थापना की दिशा के साथ ही भवन का अंतिम द्वार (बैक डोर) और शौचघर की स्थिति का निर्धारण किया जाता है। ईशान कोण में देवालय और नैऋत्य कोण में शौचघर एक ही तिरछी रेखा में रखने का प्रावधान है। 

विघ्नराज

कहते हैं कि श्री गणेश ने अपने कमल पुष्प की गंध द्वारा समस्त दैव्य सेना को मूर्छित कर दिया था। श्री गणेश को कमल पुष्प पर विराजमान या उनके हाथ में कमल पुष्प की उपस्थिति वाली आकृति समस्त विध्न का हरण करती है। फेंग-शुई में भी हृदय सूत्र (ú मणिपद्मे हूं) द्वारा विघ्र हरण या वस्तुओं को ऊर्जावान करने का प्रावधान है। ऌफेंग-शुई के जानकार इस रूप, मंत्र, यंत्र, ध्यान, मुद्रा द्वारा अपने वातावरण एवं वस्तुओं को ऊर्जावन करते हैं।

धूम्रवर्ण

धुएं जैसे रंग वाले गणेश जी ने एक दैत्य का वध किया जो सूर्य की छींक द्वारा उत्पन्न हुआ था। यानी सूर्य द्वारा त्यागा हुआ। ज्योतिष शास्त्र में राहु ग्रह भी धूम्र वर्ण का, सूर्य, पृथ्वी एवं चंद्रमा के एक विशिष्ट स्थिति में आ जाने पर उत्पन्न होने वाला छाया ग्रह है। राहु ग्रह की शांति के लिए सूर्य (प्रकाश) को जागृत करना उसके कुप्रभावों से मुक्ति दिलाता है। वास्तु व फेंग-शुई में इसी कारण घर को बुरी नजर से बचाने के लिए मुख्य द्वार पर घोड़े की नाल या स्वयं श्री गणेश को विराजमान करने का प्रावधान है।

श्री गणेश के उपरोक्त आठ रूप हमारी चित्त की वृत्ति, जीवन के उद्देश्य और वातावरण की संरचना से संबंधित हैं। पुराण, शास्त्र, सिद्धांत, ऋषि-मुनि भी सभी श्री गणेश की महिमा इसी कारण अवर्णित बताते हैं। जब स्वयं गणेश को महाकथा लिखने के लिए आमंत्रित किया जाता है तो भला उनकी कथा कौन लिख सकता है? शायद वे स्वयं ही।  

यह भी पढ़ें –आयुर्वेद के अष्टांग-विभाग