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Why is Indian culture the best?

Why is Indian culture the best?

भारत की संस्कृति ऐसी है कि जो भी इसके सम्पर्क में आता है इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह ऌपाता। भला ऐसा क्या खास है यहां की संस्कृति में, आइए जानें इस लेख के माध्यम से।

भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में एक अद्ïभुत संस्कृति है। इसमें अनेक ऐसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं, जो इसे विश्व की अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट बनाते हैं।

‘भारतीय संस्कृति नामक ग्रन्थ में डॉ- बलदेव प्रसाद ने भारतीय संस्कृति की विशेषताओं के बारे में कहा है कि यह किसी व्यक्ति या एक ग्रन्थ पर आधारित न होकर चिरंतन विकास का परिणाम है। वस्तुत: भारतीय संस्कृति कर्तव्यबोध के प्रति सजगता पर आधारित है। जबकि पाश्चात्य संस्कृति अधिकारों के संघर्षजन्य विचारों पर आधारित है। हमारी संस्कृति में आप अपने को ‘माता भूमि: पुत्रेऽहं पृथिव्या: (मेरी माता पृथ्वी तथा मैं इसका पुत्र) कहते हैं।

भारतीय मनीषा के निकट पूर्व और पश्चिम, अपना और पराया जैसी वस्तु कभी नहीं रही। उसने ‘वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा द्वारा अनुप्राणित होकर ‘सर्वेभवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: की कामना की है।

भारतीय चिन्तकों ने विश्व के कण-कण में ब्रम्हा के व्यक्त स्वरूप की रसात्मक अनुभूति की है। इसी को लक्ष्य करके गांधी जी ने कहा था- ‘कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती, यदि वह अपने को अन्य से पृथक रखने का प्रयास करे। भारतीय संस्कृति में प्रश्नगत का लेखमात्र भी नहीं है, क्योंकि वह आध्यात्मिकता की अमर आधारशिला पर आधारित है। इसी सन्दर्भ में डॉ- सत्यकेतु, भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता को जोड़ते हुए कहते हैं- ‘भारतीय संस्कृति भौतिकवादी न होकर अध्यात्म पर आधारित है। विश्व की सभी संस्कृतियों से भिन्न एवं विलक्षण संस्कृति भारतीय संस्कृति पर यदि दृष्टि डालें तो यह न्यूनाधिक परिवर्तन के बाद भी अपने मौलिक स्वरूप में विद्यमान है।

भारतीय संस्कृति ने लोक की अपेक्षा नहीं की है, परन्तु उसको सर्वस्व नहीं माना है। वैसे इसके साधकों में चार्वाक, सदृश भौतिकतावादी विचारक भी हुए हैं। जिन्होंने ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत का प्रतिवादन किया है तथा शंकराचार्य जैसे वेदान्तवादियों ने ‘ब्रम्हा सत्यं जगन्मिथ्या आदि सिद्धान्तों की परिकल्पना की है। ईश्वर के प्रति आस्था मनुष्य को धर्म-परायण बनाती है। पुरुषार्थ चतुष्टय में भी मोक्ष के अतिरिक्त धर्म को प्रमुख स्थान प्राप्त है। जैसा कि ‘यतो भ्युदय नि:श्रेयसमिद्धि: स धर्म:।

स्वामी विवेकानन्द के मत में भारतीय संस्कृति अध्यात्मदर्शन एवं आस्तिकता पर आधारित है। भारतीय संस्कृति की अन्य विशेषता पुनर्जन्म की अवधारणा है, जो मानव को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करती है। मानव के व्यक्तिगत उत्कर्ष के लिए पुरुषार्थ चतुष्टय की कल्पना की गई थी, ये 4 पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव की मानसिक एवं शारीरिक उन्नति के लिए जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त सोलह संस्कारों की व्यवस्था स्मृति आदि ग्रन्थों के माध्यम से निबद्ध की। यहां अग्रजों, गुरुओं, माता-पिता एवं अन्य प्राणियों के प्रति आदर भावना शास्त्रों में कथित एवं व्यवहार में आचरित भी हैं, जैसे-मातृदेवो भव:, पितृ देवो भव:, आचार्यदेवो भव:, अतिथिदेवो भव:।

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