एक राम राजा दशरथ का बेटा, एक राम घर.घर में बैठा
एक राम का सकल पसारा एक राम सारे जग से न्यारा
राम सिर्फ दो अक्षर का नाम नहीं, राम तो प्रत्येक प्राणी में रमा हुआ है, राम चेतना और सजीवता का प्रमाण है। अगर राम नहीं तो जीवन मरा है। श्रीराम भगवान विष्णु के सातवें अवतार माने जाते हैं। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यों और संयम का नाम राम है। असीम ताकत अहंकार को जन्म देती है। लेकिन अपार शक्ति के बावजूद राम संयमित हैं।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम
भगवान श्रीराम का पूरा जीवन आदर्शों संघर्षों से भरा पड़ा है। राम सिर्फ एक आदर्श पुत्र ही नहीं, आदर्श पति और भाई भी थे। जो व्यक्ति संयमित, मर्यादित और संस्कारित जीवन जीता है निःस्वार्थ भाव से उसी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की झलक परिलक्षित हो सकती है। राम के आदर्श लक्ष्मण रेखा की उस मर्यादा के समान है जो लांघी तो अनर्थ ही अनर्थ और सीमा की मर्यादा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन।
श्री राम एक भाई के रूप में
श्री राम के तीन भाई थे भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। तीनों अपने बड़े भाई का बहुत आदर करते थे। श्री राम इन तीनों के लिए एक आदर्श थे। राम जी के वनवास जाने के पश्चात सारा राजपाट भरत को सौंप दिया था लेकिन फिर भी अपने छोटे भाई के प्रति उनका प्रेम कम नहीं हुआ। वनवास के दौरान जब भी भरत राम जी से मिलने आते श्री राम हमेशा एक बड़े भाई की तरह उनका मार्गदर्शन करते।
श्री राम एक पति के रूप में
श्री राम हमेशा अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे। कभी वे ऋषि मुनियों के साथ मिलकर अपने राज्य की उन्नति पर चर्चा करते तो कभी अपने भक्तो को दानवों के अत्याचारों से मुक्त कराने में लगे रहते थे। किन्तु इतनी व्यस्तता के बावजूद वे अपनी पत्नी देवी सीता का पूरा ध्यान रखते। वे उनकी सुरक्षा को लेकर इतने गंभीर रहते थे कि उन्होंने माता सीता को आदेश दिया था कि उनकी गैर हाजिरी में वे कहीं बाहर न निकलें। वनवास के दौरान एक दिन जब माता सीता ने सोने के हिरण की मांग की तो श्री राम उनकी इच्छा पूर्ति के लिए अपनी कुटिया से बाहर गए। तब उन्होंने लक्ष्मण जी को माता सीता की रक्षा करने के लिए कहा। लक्ष्मण जी ने एक रेखा खींच कर अपनी भाभी से अनुरोध किया कि वे इसे पार करके बाहर न आएं। इतने में रावण एक साधु का वेश धारण कर वहां पहुंच गया और माता सीता से भिक्षा मांगने लगा जैसे ही माता लक्ष्मण रेखा लांघ कर बाहर निकली रावण ने उनका अपहरण कर लिया।
गुरू का सम्मान
कहते है कि गुरू के आर्शीवाद में ही मानव मात्र का कल्याण निहित है। गुरू के मार्गदर्शन के बिना हर पथ कठिन और परेशानी से भरा हुआ नजर आता है। भगवान श्रीराम ने आजीवन अपने गुरू की आज्ञा का ही पालन किया और अपने गुरू वशिष्ट को ही हर स्थान पर सर्वप्रथम रखा।
माता पिता का सम्मान
भगवान श्रीराम का पूरा जीवन ही एक मार्गदर्शन है और हम भक्तों को उनके जीवन के हर क्षण में छिपी सीख को समझना होगा। माता कैकेयी और पिता दशरथ के वनवास भेजले के फैसले का उन्होंने बिना किसी प्रश्न के शांतिपूर्वक पालन किया। वे 14 वर्षों तक लक्ष्मण और माता सीता के साथ वनवास काटते रहे। अपने पिता के दिए वचन की पूर्णता के लिए उन्होंने इस फैसले का सम्मान किया और उसे निभाया भी।
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