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Bhagwaan shiv ka vrat

आज से सावन सोमवार की शुरुआत हो रही है. 6 जुलाई से सोमवार 3 अगस्त तक सावन माह रहेगा. इस माह शिवजी की विशेष पूजा करें. ये शिव का प्रिय माह है. इसमें शिव का पूजन और दर्शन करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. शिवजी शीघ्रता से प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं. भगवान शिव की पूजा में शिवलिंग पर जल, बिल्व पत्र, आंकड़े के फूल, धतूरा जरूर चढ़ाना चाहिए. भगवान शिव की आराधना और उनकी भक्ति के लिए कई हिन्दू ग्रंथों में भी इस माह को विशेष महत्व दिया गया है. यह भी माना जाता है कि यदि सावन माह में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाए तो उनकी कृपा बड़ी आसानी से पाई जा सकती है. 

 

सावन सोमवार की व्रत कथार

पौराणिक कथा की मानें तो , अमरपुर नगर में एक व्यापारी रहता था. मगरउस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था. उसे चिंता थी कि मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा. पुत्र इच्छा को लेकर अब व्यापारी सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था. एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- स्वामी, ये व्यापारी पूरे तन मन से आपकी तपस्या में लगा हुआ है। आपको इसी मनोकामना जरूर  पूर्ण करनी चाहिए।  

 

भगवान शिव ने  कहा- हे पार्वती! इस संसार में प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है.   

पार्वतीजी ने कहा- नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी. 

पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- श्तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं. लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा.

उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई.

भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो मिली मगर अधूरी, कुछ वक्त बीतने के बाद व्यापारी के घर में पुत्र का जन्म हुआ। अब वो बेहद खुश था, मगर साथ ही साथ उसे पुत्र की अल्पआयु की चिंता भी सताने लगी थी। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा.

12 वर्ष की आयु में अमर को उसके मामा दीपचंद शिक्षा प्रदान कराने के लिए वाराणसी ले गए।. रास्ते मे वो एक नगर में रूके जहां एक विवाह समारोह की तैयारी चल रही थी। जहां वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था. उसने धोखे से अमर को अपने बेटे के स्थान पर बैठाकर विवाह संपन्न करवा दिया। मगर अमर ने दूल्हन की चुनरी पर सारा सच लिख दिया था। अब 

राजकुमारी ने अपनी चुनरी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया. उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया. अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया. एक रात शयनावस्था में ही अमर के प्राण निकल गए. सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा. आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे.

पार्वतीजी ने भगवान से कहा- श्प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे. आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें.श्

भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- श्पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है. मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था. इसकी आयु तो पूरी हो गई.श्

पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- श्हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें. नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे. पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव के वरदान से वो कुछ ही देर में पुर्नजीवित हो गया। 

शिक्षा समाप्त करके के बाद अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था. उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया. समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा.

राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया. यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया. व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था. भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे.

व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा. अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- श्हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है. व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ. सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं. शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं.आज से सावन मास और भगवान शिव की आराधना का महोत्सव शुरू हो गया है। धर्म के अनुसार पूजा का तीसरा क्रम भी भगवान शिव है। शिव ही अकेले ऐसे देव हैं जो साकार और निराकार दोनों हैं। श्रीविग्रह साकार और शिवलिंग निराकार। भगवान शिव रुद्र हैं। हम जिस अखिल ब्रह्मांड की बात करते हैं और एक ही सत्ता का आत्मसात करते हैं, वह कोई और नहीं भगवान शिव अर्थात रुद्र हैं।रुद्र हमारी सृष्टि और समष्टि है। समाजिक सरोकार से भगवान शिव से ही परिवार, विवाह संस्कार गोत्र, ममता, पितृत्व, मातृत्व, पुत्रत्व, सम्बोधन संबंध आदि अनेकानेक परम्पराओं की नींव पड़ी।

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