………….‘चलो‒’ वह बोली और फिर उसे रास्ता बताती हुई सीधी फादर जोजफ के बंगले में पहुंच गई। बंगला पहले के समान ही अब तक सुंदरता से रखा गया था। क्यारियां, फुलवारियां, लॉन, सब कुछ तो उसी प्रकार था।

वह झट कार से बाहर आई, मूर्ति को हाथों में संभाले हुए। लॉन में पग रखा तो पहले ही से अगणित कारें खड़ी थीं। शायद फादर जोजफ की विदाई बहुत धूमधाम से की जा रही है। बरामदे में खड़ी होकर वह किसी नौकर की तलाश में इधर-उधर देखने लगी परंतु जब कोई नहीं मिला तो बाहर आती आवाज़ों का शोर सुनकर उसने दरवाजे पर से पर्दा हटाया और अंदर झांका। जगमगाते प्रकाश में उसने देखा डिनर समाप्त हो चुका है। कमरे के बीच एक बड़ी और लंबी-सी मेज़ थी जिस पर से नौकर प्लेटें उठाने में व्यस्त थे। कुछेक अपरिचित, फादर तथा अन्य आदरणीय हस्तियां एक बहुत ही बूढ़े संन्यासी जैसे महात्मा से बार-बार हाथ मिलाकर हर्ष प्रकट कर रहे थे। कुछेक हाथ मिलाकर बाहर निकलने की तैयारी में भी थे। राधा ने देखा‒एक ओर एक मेज़ पर अगणित उपहार रखे हैं जो निश्चय ही फादर जोजफ को उनके चाहने वालों ने भेंट किए होंगे। उसने एक बार अपने हाथ में ली हुई मूर्ति को देखा। फादर को भेंट देने के बहाने वह आसानी से अंदर जा सकती है और यह विचार आते ही वह झट अंदर पहुंच गई। किसी ने उस पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया तो उसका साहस बंधा। वह आगे बढ़ी और आगे…और ठीक उस बूढ़े संन्यासी समान व्यक्ति के सामने जाकर खड़ी हो गई, जिसके मुखड़े से वास्तव में भगवान की महिमा टपक रही थी। किस कदर बूढ़े तथा बदले-बदले से थे फादर जोजफ, फिर भी उसने उन्हें पहचान ही लिया। मनुष्य कितना ही बूढ़ा हो जाए परंतु अपने व्यक्तित्व का एक अंग अपने साथ ऐसा अवश्य रखता है जो उसकी पहचान कभी नहीं छोड़ता। फादर जोजफ के साथ ही फादर फ्रांसिस भी खड़े थे, जिन्हें वह एक ही दृष्टि में पहचान गई। वे भी कितना बदल चुके थे।

 फादर फ्रांसिस की निगाह उस पर अचानक ही पड़ी तो उसे गौर से देखते हुए वह आगे बढ़े। चश्मे के अंदर से उन्होंने राधा पर ऊपर से नीचे तक दृष्टि डाली।

 ‘आप…।’ उन्होंने कहना चाहा।

 ‘मैं राधा हूं‒कमल की मां।’ राधा ने झट उत्तर दिया।

 राधा। यह नाम फादर जोजफ के कानों में पड़ा तो वह ठिठक गए, अपने लोगों से बातें करते-करते वह अचानक ही रुक गए, चश्मे के अंदर से उन्होंने राधा को भी गौर से देखा और झट उसके सामने आ खड़े हुए।

 ‘आप राधा देवी हैं?’ ख़ुशी से उनका स्वर कांप रहा था।

 ‘जी हां फादर! मैं राधा ही हूं।’ राधा की आवाज़ भी जाने किस दबाव में आकर कांपने लगी, ‘वही राधा जिसे कीचड़ से उठाकर आपने नया जीवन प्रदान किया, जिसके बच्चे को आपने आकाश का तारा बना दिया।’

 ‘नहीं-नहीं राधा बेटी! ऐसी बात नहीं।’ फादर जोजफ बोले‒ ‘ऐसा लगता है राजा विजयभान सिंह ने अभी तक तुम्हें कुछ नहीं बताया। वह भी साथ आए हैं क्या?’ उन्होंने इधर-उधर देखा।

 ‘उनसे मिले तो एक युग बीत गया फादर!’ राधा ने एक निराश आह भरी, ‘इसलिए तो एक भेद जानकर अपने दिल का बोझ दूर करना चाहती हूं।’

 ‘ऐसी क्या बात है बेटी‒जो तुम्हारी सहायता करूं?’ फादर जोजफ ने आश्चर्य से पूछा‒ ‘क्या वास्तव में तुम्हारी भेंट राजा विजयभान सिंह से अब तक नहीं हुई?’ उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ।

 ‘उन्हें देखे तो एक युग बीत चुका है फादर!’ राधा का स्वर भीग गया। परंतु दूसरों की उपस्थिति का ज्ञान करके उसने अपने को संभाला‒ ‘मुझे इतना बताने का कष्ट कीजिए कि यह मूर्ति आपने बाबा से प्राप्त करने के बाद किसे दे दी थी?’

 फादर जोजफ ने मूर्ति हाथ में ले ली…प्रभु यीशु मसीह की मूर्ति को देखते ही पहचान गए। पहचानते भी क्यों नहीं? यह मूर्ति तो उन्होंने एक महान आदमी को भेंट में दी थी, जिसने बिना किसी स्वार्थ के केवल अपने प्रेम के लिए ही, पूरी-की-पूरी एक कोठी उनके अस्पताल को भेंट कर दी थी।

 ‘यह मूर्ति मैंने राजा विजयभान सिंह को दी थी…’ उन्होंने कहा‒ ‘इसलिए कि उन्होंने इसकी ख़ुद ही मांग की थी। संसार की हर उस वस्तु को वे अपने अधिकार में लेकर सुरक्षित कर लेना चाहते थे, जिस किसी वस्तु से तुम्हारा संबंध था। इसीलिए उन्होंने अपने प्यार की ख़ातिर अस्पताल के समीप वाली अपनी कोठी भी हमें दान कर दी। फिर भला मैं यह मूर्ति उन्हें देने से कैसे इनकार कर सकता था? मुझे अच्छी तरह याद है वह तुम्हारी ही तलाश में वहां आए थे। तुमसे क्षमा चाहते थे, तुम्हें अपनी रानी बनाकर राजमहल की शोभा बढ़ाना चाहते थे, लेकिन राधा…उन्होंने आश्चर्य से पूछा, ‘तुम उनसे मिली क्यों नहीं, उन्हें क्षमा नहीं किया? तुम्हारी ख़ुशी की ख़ातिर उन्होंने क्या त्याग नहीं करना चाहा था?’

 ‘क्या त्याग करना चाहते थे फादर?’ राधा ने हर बात का वास्तविक अनुमान लगाने के बाद भी पूछा। कभी-कभी मानव सब कुछ जानने के पश्चात् भी संदेहपूर्ण इसलिए पूछ लेता है ताकि उसके दिल को पूरा-पूरा संतोष प्राप्त हो।

 ‘तुम्हारी ख़ुशी, तुम्हारे सुख और आराम के लिए उन्होंने कहा था कि वह तुम्हारे बाबा की सारी मूर्तियां ख़रीद लेंगे‒अधिक-से-अधिक दामों में। क्या उन्होंने ऐसा किया?’

 राधा स्तब्ध रह गई। इस बारे में भी उसका अनुमान ठीक ही निकला।

 

‘तुम्हारे बच्चे के लिए उन्होंने नर्सरी से लेकर सीनियर क्रैम्बिज तक ऐसे फंड खोल दिए जिससे उसे स्कॉलरशिप मिलती रहे।’ सहसा बीच में फादर फ्रांसिस ने कहा, ‘यही नहीं बल्कि तुम्हें याद होगा कि तुम्हारे कहने पर हमने कई बार एक बदमाश की रिपोर्ट पुलिस में की थी, परंतु फिर भी उसे कोई टोकने वाला नहीं था। इस बात का ज्ञान राजा विजयभान सिंह को हुआ तो उन्होंने अपना प्रभाव डालकर उसे सज़ा तक करा दी थी‒केवल तुम्हारे ही आराम के लिए उन्होंने वह सड़क भी बनवा दी जो तुम्हारे क्वार्टर के पीछे थी।’

 ‘ओह!’ राधा के मुंह से इतना ही निकला। आंखें फटी-की-फटी रह गईं। अवाक्-सी वह इस वास्तविकता को सत्य देखकर भी विश्वास नहीं करना चाहती थी। इतना अधिक प्यार, इतनी बड़ी तपस्या। उनके पापों का प्रायश्चित तो कभी का हो चुका है। अब तो वह पुण्य कमा रहे हैं। उसने यह क्या गजब उन पर ढा दिया। इतना बड़ा अन्याय, इतना बड़ा अत्याचार जो जुल्म उन्होंने उस पर नहीं किया, वह उन पर किए जा रही है।

 ‘लेकिन फादर!’ कुछ देर बाद वह बोली, ‘आपने ये सारी बातें मुझे क्यों नहीं बतार्इं?’

‘राधा बेटी!’ फादर जोजफ ने उत्तर दिया, ‘मैं और फादर फ्रांसिस जब भी मिले अक्सर तुम्हारे और उनके बारे में ही बातें करते थे। कई बार चाहा भी कि तुम्हें इस वास्तविकता से परिचित करा दूं परंतु फिर यह सोचकर हम चुप रह जाते कि कहीं राजा विजयभान सिंह की सारी मेहनत पर पानी न पड़ जाए। उन्होंने हमसे वचन लिया था कि तुम्हें इन बातों का ज़रा भी ज्ञान नहीं होना चाहिए। यह सब पुण्य उन्होंने किया है तुम पर‒हमने नहीं, जिसके भ्रम में तुम अब तक डूबी हुई थीं। दरअसल वह तुम्हें अपने अहसानों से नहीं बल्कि प्यार से जीतना चाहते थे।’

 ‘ओह!’ राधा के मुंह से निकला। दिल पर बरछियां चल रही थीं, घाव और तेज हो गया। उसका मन हुआ यह धरती फट जाए, यह आकाश उसके सिर पर गिर पड़े।

 ‘अच्छा बेटी! और कुछ पूछना हो तो पूछ लो।’ फादर जोजफ ने कहा, ‘क्योंकि कल सुबह मैं अपने देश चला जाऊंगा। पैंतीस वर्ष तक जनसेवा करने के बाद अब कुछ दिन अपने घर भी रहना चाहता हूं, जहां मेरे भाई-बहन हैं‒इस आयु में भी मेरे माता-पिता मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’ फादर ने अपनी कलाई में बंधी घड़ी देखी।

 ‘कुछ नहीं फादर, कुछ भी नहीं।’ राधा का गला भर आया। स्वर भीग गया। बड़ी कठिनाई के बाद हिचकी पर काबू करके बोली‒ ‘कुछ भी नहीं, इससे अधिक प्यार का बोझ मैं सहन नहीं कर सकूंगी।’

 ‘यह मूर्ति तुम्हारी भेंट समझकर मैं ले जाऊं।’ फादर जोजफ ने प्रभु यीशु मसीह की मूर्ति को अपनी नज़रों के समीप करते हुए पूछा।

 राधा ने न चाहते हुए ‘हां’ के इशारे में सिर हिला दिया‒ऐसा करते समय आंखों के आंसू गाल पर ढलक आए‒अपने देवता की किसी भी वस्तु को वह किसी के अधिकार में नहीं देना चाहती थी, परंतु फादर जोजफ से वह इनकार नहीं कर सकी।

 ‘जाओ बेटी! राजा विजयभान सिंह को अपना लो।’ फादर फ्रांसिस ने अंत में कहा‒ ‘वह सचमुच तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।’

 ‘जी फादर…जी।’ राधा सिसककर बोली और पलटकर धीमे पगों से बाहर निकल गई। उसने देखा, अभी बहुत सारे लोग फादर से मिलने की प्रतीक्षा में खड़े हुए हैं।

 दूर‒बहुत दूर। एक पहाड़ी इलाके की ख़ामोशी शाम‒सुनसान वातावरण। केवल हवाओं की सनसनाहट ही कभी-कभी सुनाई पड़ जाती थी। घिरे-घिरे बादल, ऐसा लगता था मानो सूर्य आज समय से पहले ही डूब गया है। केवल कहीं-कहीं ही बादलों की परतों पर डूबे हुए सूर्य की लालिमा दिखाई पड़ जाती थी।

 और इस इलाके में, एक अलग पहाड़ी पर स्थित सैनिटोरियम के एक वार्ड में खाट पर लेटा टी.बी. का एक बूढ़ा और निर्बल रोगी चुपचाप अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहा था‒गहरी और गहराती हुई सांसें, जिसमें खोखली छाती की जकड़न तथा गले के अंदर जमे बलगम की गंध थी, जब वह खांसता तो उसकी छाती का उतार-चढ़ाव तेज हो जाता, सांस और गहरी हो जाती, क्रमशः रक्त के छींटे बाहर निकल पड़ते। होंठों के किनारे लाली से भीग जाते और तब वह अपनी आवाज़ पर काबू पाने के प्रयत्न में झट उठकर बैठ जाता और अपने हाथों से छाती दबाने लगता। खांसी रुकती तो वह गहरी-गहरी सांसों के साथ अपनी आंखों में आए आंसुओं को पोंछते हुए समीप की खिड़की से बाहर झांकने लगता, काली और मोटी परतें, मन करता वह शीघ्र ही इनसे भी ऊपर बहुत दूर चला जाए। जीवन बोझ बन जाए, तो जीने की चाह मिट जाती है। उस बूढ़े और निर्बल रोगी का दिल टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो चुका था। जब भारी सांसें हल्की होतीं तब छाती का उतार-चढ़ाव सामान्य रूप में आ जाता तो एक बार फिर पलंग पर लेट जाता। गर्दन घुमाकर वार्ड के अंदर देखता‒ बीच के दरवाजे के उस पार दूसरे वार्ड में‒ जो इस अस्पताल का सबसे बड़ा हॉल था। उस वार्ड में दीवार पर एक बड़ी संगमरमर की प्लेट जड़ी हुई थी, जिस पर अंकित की हुई पंक्तियां उसने सैनिटोरियम में भर्ती होने के बाद पहले ही दिन पढ़ ली थीं। लिखा था‒

इस संगमरमर को राजा विजयभान सिंह, एक्स रूलर ऑफ रामगढ़ स्टेट की असीम कृपाओं के कारण धन्यवाद के रूप में यहां जड़ा गया है। यदि उन्होंने इस सैनिटोरियम को सहायता नहीं की होती तो निश्चय ही यह आर्थिक स्थिति के कारण बंद कर दिया जाता।

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