भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
तेरवाडा ब्रिटिशर के जमाने में एक अख्तियारी सिविल और फौजदारी हुकुमत वाला बारह गांव का तहसील था। वहां के जागीरदार यानी हमारा बहुत पुराना कबीला है। इतिहास के मुताबिक, हमारा कबीला मुस्लिम सिंध बलोच के मुसलमानों में उच्च जाति का कबीला था। अभी हमारे यहां मरण और परण में हिंदू रिवाजों के मुताबिक व्यवहार चलते हैं। इतना ही नहीं, हमारा सम्पूर्ण रहन-सहन भी हिंदुओं के जैसा ही है।
हमारी एक-दो पीढी के पहले हमें पारकर के सोढा राजपूतों के साथ शादी करने का व्यवहार था। तेरवाडा और तेरवाडा के तहसीलदार सिंधी बलोचों का इतिहास “तवारीखे फिरस्ता” ई.स. 1207 में फारसी में लिखी गई किताब में मिलता है। उपरांत. ‘मीराते अहेमदी’ और ‘खातीजो सलेमान’ जैसे मान्य इतिहास में भी वर्णन मिलते हैं।
गुजरात का इतिहास ‘कौमे सरियद’ में इस कबीला के बारे लिखे हुए छोटे-छोटे वर्णन मिलते हैं। इन जागीरदारों के कबीले गुजरात में बादशाह ममंद बेगडा के समय में आये थे। हमारे पुरखे गुजरात के कुछ परगने में सूबा के ओहदे में भी रहे थे।
बनासकांठा के पुराने रजवाडे अलग-अलग राज्य जैसे कि पालनपुर, राधनपुर, थराद, दियोदर राज्य के इतिहास में तेरवाडा के बलोच ठाकुरों के इतिहास की हकीकत जानने को मिलती है।
पुरानी उर्दु की ऐतिहासिक पुस्तकें और काल की दृष्टि से देखें तो तेरवाडा का इतिहास थराद के राज्यकर्ताओं के इतिहास के साथ सन 1403 में जब अहमदाबाद में मुस्लिम राज्य की वृद्धि हुई। तब थराद में मुलतानी कबीला राज करता था। वह अहमदाबाद को ताबे हुआ इसके बाद फतेह खान बलोच, जो गुजरात का एक मुख्य अमीर था, उन्होंने थराद के मुलतानी कबीलों को निकाल दिया। और राधनपुर और तेरवाड़ा पर कब्जा किया। [देखो; पालनपुर डायरेक्टरी भाग-1 थराद स्वस्थान का इतिहास पेरा-14]
उसके बाद पालनपुर के राज्यकर्ता के इतिहास में दीवान गजनी खान की मृत्यु के बाद पांचवे वर्ष को यानी कि इ.स. 1525 [हिजरी सन 962] में तेरवाडा और राधनपुर के बलोच फतेह खान ने जालोर पर हमला कर श्री मलेक खान जीनाभाई खुर्रम खान को मार कर लगभग पंद्रह बरस ई.स. 1570 तक राज्य किया। जिससे हाल में चारण, भाट, मीरासी और तुरी… उन तेरवाड़ा के ठाकोरों को ‘मारवाराय’ शब्द से सम्बोधन करते हैं। क्योंकि जालोर मारवाड़ का ही हिस्सा है। उसके बाद तेरवाड़ा के ठाकुरों के पुरखों ने ‘पालनपुर राज्य का इतिहास भाग-1” पृष्ठ 35 पर बताया है उसके मुताबिक मलेक खान ई. स. 1553 से 1576 के वक्त में श्री फतेह खान बलोच और उनके सरदार और जालोर के मलेक शेरखान और अनवर खान के वक्त में जालोर ‘लासका’ की लडाई में शीरोही के राव उदय भाण ने देवडा राजपूत रतन सिन्ह सरतान सिंह, काबा और दूसरे जागीरदार इकठे मिले। कुछ भेदियों के द्वारा बडे लश्कर पर हमला किया। उस वक्त बलोच राजकर्ताओ के पास से जालोर मुक्त हो गया। तब फतेह खान के कारभारी श्री गंगादास जालोर के किले में से मालदेव राठोड के लश्कर के सरदारों की मदद से सही-सलामत पाटण पहुंच गया। (पालनपुर का इतिहास पृष्ठ-36)
तेरवाडा के जागीरदार के पराने इतिहास में तेरवाडा एक बडे परगाणा का कसबा था। और वह पास हि की दियोदर जागीर के साथ भीलडिया वाघेला की सत्ता में था। अहमदाबाद के सुल्तानों के वक्त में तेरवाडा और साथ में राध नपुर और थराद परगाणे श्री फतेह सिंह और श्री रुस्तम खान के हाथ में आये। जो कि गुजरात के शक्तिशाली सरदारों में से एक थे। और उन्होंने तेरवाडा में अपनी राजधानी रखीं और अठारहवी शताब्दी तक शासन किया था। इसके बाद कुछ हिस्सों में राधनपुर में नवाब साहेब के वंशज बाबी कमालुद्दीन खान के कब्जे में गये। और तेरवाडा के पास अंग्रेजों के साथ संधि के वक्त सिर्फ बारह ही गांव रहे। हमारे वंशज ने 1/8/1954 तक जागीरी नाबूदी तक उस पर शासन किया। तेरवाड़ा में तीन पार्टी के तौर पर भागेणी जागीर थी। उपर जिसका उल्लेख किया उन तेरवाडा के तहसीलदार में से जागीर की नाबूदी के बाद अलग अलग व्यवसाय करते है। और उनमें से सरदार तहसीलदार और रफीक तहसीलदार फिल्म लाइन में हैं। सरदार तहसीलदार फिल्म डायरेक्टर है। और रफीक तहसीलदार फिल्मी पटकथा लेखक है।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
