garibnawaz ameer badshah
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

गरीबी के दीदार के नीचे एक अमीर कलेजा धडक रहा था। जिस्म के प्यार से ज्यादा रूह का नाद जिसे अधिक प्यारा लग रहा था। ऐसे अमीरों के अमीर और अमीर बादशाह के नाम से प्रख्यात ओलिया अमीर बापू को भला कौन भूल सकता है?

इतिहास उसकी ओर ध्यान दें, न दे लेकिन लोगों ने उनको जिगर के पायतख्त पर बिठाया था। पालनपुर में मुर्शद की दरगाह पर आज भी पंद्रह दिवस का उर्स यानी मेला लगता है। जहां पालनपुर के लोग कौम और जात-पात का भेद भूलकर इकट्ठे होते हैं।

अमीर बापू उर्फ अमीर बादशाह का जन्म पालनपुर के एक पठान परिवार में हुआ था। जन्म होते ही बच्चे को गरीबी के दर्शन हुए। तालीम पाने की उम्र में अमीर बापू मजदूरी करने जाने लगे थे। उन्हें बीडी बनाने का शौक था। अमीर बापू का स्वभाव कुछ हठी था इसलिए वे जो मन में ठान लेते थे, वही मजदूरी करके ही शाम को कमा कर घर आते थे। बचपन से ही बापू को तन्हाई काफी पसंद थी। अंधेरी रात में घण्टों तक आसमान के सितारों को देखा करते। अमीर बापू की रूह में अलख का कोई गेबी सुर सुनाई देता था। कारखाने में बीडियां बनाते-बनाते कभी-कभी वे बाहर चले जाते। और खुली जगह में जाकर अल्लाह की इबादत करते। अल्लाह के प्रति उनका बडा स्नेह था। जब वे बाहर चले जाते, तब बीडी बनाने का काम बंद हो जाता लेकिन जब वे वापस आते तब कौन जाने कैसे टोकरी में बीडी बनी हुई मिलती। आसपास बैठने वाले अनेक दोस्त यह चमत्कार को देखते ही रह जाते। कुछ दोस्तों ने अमीर बापू के अब्बा को यह बात कह दी। अब्बाजान अपने पुत्र के यह अलगारी स्वभाव को देख सोच में पड़ गये और तुरंत ही पुत्र की शादी कर देने का फैसला किया।

अपनी शादी की चर्चा सुनकर अमीर बापू एक रात को घर से निकल गये। उन्होंने सर्दी, गर्मी और बारिश को सह कर बारह-बारह बरसों तक खुदा की बंदगी की। बालाराम के किसी स्थान पर कड़ा तप किया। और बारह बरस के बाद खुदा का साक्षात्कार कर सके। बेखुदी में निमग्न बापू बारह बरसों के बाद पालपर शहर से दर एक पानी की नाली के नीचे रहते थे। एक बार किसी आदमी ने गंदे पानी के नाले में इस ओलिये को देखा। वह हर रोज अपने घर से खाने की थाली लेकर अमीर बापू को भेजता था। एक बार पालनपुर के नगर सेठ की बारात वहां से निकली। उन्होंने खुदा के इस बंदे को पकडवा कर जेल में डलवाया। लेकिन खुदा के बंदे को कोई कब तक कैद रख सकता है? अंत में उन्हें छोड दिया गया।

कैद में से छूट कर अभी मुर्शद बाबा का रोजा जहां पर है वहां जो वक्त अमीरगढ के नसीरुद्दीन नाम के एक भाई वहां पर आये। इन्हें किसी ने जहर खिला दिया था। इस ओलिया की कृपा से नसीरुद्दीन के पेट में से जहर निकल गया।

अमीर बाप के अनेक चमत्कार प्रसिद्ध हैं। अहमदाबाद के उमराव कबीले का एक लड़का, जो गूंगा था उसे बोलता किया था। अनेक दीन-दुखियों का दुख उन्होंने दूर किया था। इडर में एक कुएं का पानी खारा था। बापू से किसी ने विनती की तो बापू ने उसमें नारियल पानी डलवाया और पानी मीठा कर दिया।

अमीर बापू को भजन का बहुत शौक था। वे हर शनिवार अपने रोजा के बाद भजन करवाते। पालनपुर से उनके लिए खाने की थाली आती। वे उनमें से प्रसाद के रूप में थोड़ा ग्रहण कर बाकी का साधु-फकीरों में बांट देते थे। कभी-कभी तो दिवसों तक उन्हें खाने-पीने का ख्याल भी नहीं रहता था। रामकृष्ण परमहंस जैसी समाधि अवस्था में वे डूबे रहते थे। दिन-रात वे खुदा की बंदगी में निमग्न रहते थे। कुछ लोग अमीर बापू से मन्नत मानते थे और घर बैठे ही उनकी मन्नत पूर्ण हो जाती थी। पालनपुर के कई गरीब लोगों को उन्होंने अपनी दुआ से रोजगार दिलवाया था। गरीबों के दुःख-दर्द दूर करने और उनकी इज्जत रखने के लिए वे हमेशा प्रयत्नशील रहते थे। एक भी किताब नहीं पढ़े थे फिर भी ये ओलिया कई भाषाएं जानते थे।

समदृष्टि का पाठ सिखाने वाली यह मूरत अभी भले ही हयात न हो पर स्मृति के रूप में आज भी मौजूद है। अभी पालनपुर में उनका रोजा तैयार हो रहा है। जिसमें हिंदु-मुस्लिम के भेद बिना यहां हर साल 15 दिन का मेला लगता है। जिसमें हरेक कौम के भाविक शरीक होते हैं और अमीर बापू में अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। अनेक दुखियों के दु:ख दूर करने वाले अमीर बापू भाविकों के हृदय में बसते हैं। उनके नाम से पालनपुर के एक रोड़ का नाम अमीर रोड़ रखा गया है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’