उसकी इस विवशता को उसकी दोनों बेटियों रमा और विभा तो जानती थीं क्योकि उन किशोर बालाओं ने वह विवशता अपनी आंखों से देखी थी मगर लोगों के मूंह पर तो ताला नहीं लगा और ना ही कोई समाज की सोच बदल सकता है। भारती को अपने माथे की बिंदिया आग का गोला और पांव के बिछिया बिच्छू समान डंक मारते प्रतीत होते। एक विधवा के लिए इन चीजों का औचित्य ही क्या मगर अपने बच्चों को पालने और समाज की प्रदूषित नजरों से तथा दफ्तर के दायरे में आने वाली भूखी ललायित आंखों से कन्नी काटने के लिए भारती को यह सुहाग के परिचायक धारण करने ही पड़ते थे। एक विधवा के लिए उसका विधवा होना अभिशाप है मगर उससे भी बड़ा अभिशाप है उसका सुन्दर होना और यही अभिशाप ईश्वर ने भारती को दिया था।
कंधे पर पर्स टांगे भारती ने दफ्तर में प्रवेश किया तब उसके साथी कर्मचारी सारे आ चुके थे। अभी भारती अपनी कुर्सी पर बैठी ही थी कि बगल की कुर्सी से मिस्टर थापक उठकर उसके पास आये और उसकी टेबिल पर कुहनी के बल हाथ रखकर खड़े होकर मंद-मंद मुस्काते हुए भारती से बोले,
‘‘हैलो भारती, ओह साॅरी-मिसेज भारती-आज आप कुछ लेट नहीं हो गई?”
‘‘जी-घर पर कुछ मेहमान आ गये थे-” भारती उसकी तरफ देखे बिना ही बोली।
‘‘आपने बताया कि आपके पति दिल्ली सर्विस में हैं, मगर आप उनके पास क्यों नही जाती?
‘‘देखिए, यह मेरा पर्सनल मामला है।
‘‘हां भई-मगर पर्सनल मामला है।
‘‘हां भई-मगर एक बात तो मैं आज भी कहूंगा।”
‘‘कौन-सी बात?
‘‘आप बला की खूबसूरत हैं यदि आप शादीशुदा नहीं होती तो आपके शौहर होने का पहला हक हमारा ही होता।”
‘‘आप मुझे काम करने दें थापक साहब…” भारती ने उसे झिड़की दी तो वह सकपकाकर अपनी कुर्सी पर जा बैठा मगर भारती को उसकी आंखों में तैरते लाल डोरे स्पष्ट दिखाई दिये। भारती का मन रोज इसी तरह जबाब देते-देते उकता गया था मगर अपनी बच्चियों की परवरिश की खातिर वह इतनी अच्छी नौकरी छोड़ भी तो नहीं सकती थी और ना ही विधवा का की तरह सूनी मांग और माथा लिए एक अन्य दफ्तर में नौकरी के लिए आवेदन देने गई तो वहां के जनरल मैनेजर ने उसे सिर से पांव तक निरखने के बाद कहा, ‘‘मैं तुम्हें अपनी पर्सनल सेक्रेटरी की नौकरी दे सकता हूं मगर तुम्हें कभी-कभी मेरे साथ बाहर भी जाना होगा। तुम समझ सकती हो, तुम जो चाहो वेतन ले सकती हो-।”
‘‘मुझे अपनी इज्जत नौकरी से ज्यादा पसंद है जी……” भारती यह कहकर पलटकर उसके केबिन से जाने लगी मगर मैनेजर ने उसे रोककर कहा, ‘‘ठहरो-जरा ठण्डे दिमाग से सोचो-तुम्हें नौकरी की सख्त आवश्यकता है, इस बला की खूबसूरती पर वैधण्य का श्राप तुम्हें कहीं भी इज्जत की नौकरी नहीं करने देगा, इसलिए मेरी बात मानो यह नौकरी कर लो…।”
‘‘क्षमा कीजिएगा श्रीमान-यदि मेरी सुन्दरता मेरी बच्चियों के भविष्य के आड़े आएगी तो मैं इसे तेजाब से फूंककर ईटों के भट्टे पर बेगारी कर लूंगी-”
भारती इतना कहकर एक झटके से बाहर चली गई मगर तब उसे अहसास हुआ कि पति भले ही अपनी पत्नी को शराब पीकर मारे या उसका जीवन नरक से भी ज्यादा भयावह बना दे मगर उसके होने से जो सुहाग के प्रतीक औरत से जुड़े होते हैं, असल में वही उस औरत के सुरक्षा कवच होते हैं। वरना समाज में भटकते वासना के पुतले उस औरत को औरत भी नहीं रहने दें। तब भारती ने विधवा होते हुए भी सुहाग के प्रतीकों को सुरक्षा कवच मानकर अपना लिया।
भारती ने दिमाग को एक झटका देकर पुरानी बातों को बिसारा और फाइलों में मगन हो गई। शाम को कंपनी का बॉस उसके समीप आकर बोला,
‘‘आज शाम को फ्री हो क्या भारती?
‘‘क्यों सर?” भारती ने पूछा।
‘‘आज तुम्हारे साथ किसी शानदार होटल में डिनर लेने का मूड है हमारा।”
‘‘क्षमा कीजिएगा सर-मेरे पति दिल्ली से आए हुए हैं आज मैं और मेरा परिवार उनके साथ ही अपना समय बिताएंगे-” भारती सकपकाकर बोली।
‘‘अच्छा तो कल या परसों- ” बाॅस ने पूछा।
‘‘नो सर-पहली बात मैं होटलों में जाती नहीं -दूसरी मेरी बच्चियों के एग्जाम हैं उनके साथ मेरा घर होना जरूरी है-” भारती ने अपना पर्स उठाकर कुर्सी से उठते हुए कहा तो बाॅस अपना-सा मूंह लेकर रह गये। भारती अभी अपने घर से कुछ कदमों के फांसले पर ही थी, काॅलोनी में रहने वाली एक अधेड़ उम्र की महिला सरोज महाजन उसे रोकते हुए बोली, ‘‘कहां से आ रही हो भारती-?
‘‘दफ्तर से आ रही हूं चाची-” ‘‘भारती मीठे स्वर में बोली।
‘‘यह तुम जो सिंगार पट्टे करके दफ्तर जाती हो तुम्हे शोभा नहीं देता।
आखिर तुम्हारे पति को गुजरे अभी समय ही कितना हुआ है भारती। कहीं ऐसा तो नहीं कि दफ्तर में तुम किसी…”
सरोज महाजन के अधूरे वाक्य का आशय समझते ही भारती तेजी से अपने घर की ओर दौड़ पड़ी। वह सीधी अपने कमरे में पहुँची और बिलख बिलखकर रो पड़ी। रमा और विभा ने जब अपनी मां को इस हालत में पाया तो वह दौड़कर उनके पास पहुंची। विभा, भारती के कंधे पर हाथ रखकर बोली,
‘‘क्या हुआ मम्मी-? आप रो क्यों रही है-”
‘‘हाॅं मम्मी बताइए तो सही, किसी ने आपसे कुछ कहा है क्या-?
श्रमा भी चिन्तित स्वर में बोली मगर भारती रोती रही तब तक, जब तक कि स्वयं उसके आंसू थम नहीं गये। राम आर विभा ने भी उन्हें जी हल्का करने के लिए रोने दिया फिर रमा एक गिलास पानी भारती की ओर बढ़ाकर बोली।
‘‘मम्मी-अब हम बच्ची नहीं हैं जो इस रोने का कारण नहीं समझे। जो कुछ सरोज आन्टी ने आपसे कहा वह तो हम रोज ही सुनते हैं मगर हमने कभी इसका आपसे जिक्र नहीं किया?
‘‘हां मम्मी” दुनिया जो कहती है उसे कहने दें, आपके आंसू उसकी जुबान पर ताला नहीं सकते अलबत्ता आपकी जिन्दगी और हमारे भविष्य पर ग्रहण जरूर लगा सकते हैं। ये माथे की बिन्दिया और बिछिये सुहागिनाें के लिए सुहाग चिन्ह होते होंगे मम्मी मगर हमारे लिए, इस परिवार के लिए हमारा सुरक्षा कवच हैं। आप इन्हें अपने से कभी अलग मत होने देना, नहीं तो हमें लगेगा कि हमने सचमुच अपने पापा खो दिये।”
भारती दोनों बेटियों का मूंह ताकती रह गई फिर उसने उन्हें कसकर अपने सीने से भींच लिया।
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