sumall aur himmaal
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Hindi Immortal Story: अमरावती के राजा सुमल्ल की वीरता की दूर-दूर तक चर्चा थी। वह था भी ऐसा प्रतापी। हाथ में तलवार ले, काले घोड़े पर सवार हो, युद्ध के मैदान में आता, तो शत्रु थर्राने लगते। लेकिन यही वीरता सुमल्ल के लिए अभिशाप बन गई। घमंड का पुतला तो था ही वह। धीरे-धीरे गुस्सैल और सनकी भी होता गया। दिन-रात युद्धों के सिवाय उसे कुछ और सूझता ही न था।

प्रजा राजा के सनकीपन से तंग थी, पर उसे समझाए कौन। बस एक ही खयाल उसके दिमाग में उथल-पुथल मचाए रखता था, “काश, मैं दुनिया का सबसे बड़ा योद्धा बन जाऊँ।” अब उसे सपने भी इसी तरह के आने लगे थे।

एक बार राजा सेना का निरीक्षण करके लौटा। स्नान करके भोजन करने के बाद लेटा, तो पलकें मुंदने लगीं। उसने अपने सेवक हेमू को पंखा झलने का आदेश दिया। साथ ही समझाया, “मेरे सोने के बाद अच्छे सपनों का यक्ष आएगा—सतरंगी तितली के रूप में। वह मेरा मित्र है। हाथ हिलाकर उसका स्वागत करना किंतु बुरे सपनों का यक्ष आए तो उसे फटकार देना। उसके आने पर दीवार पर काली-काली छायाएँ नजर आएँगीं। तीन बार ‘जाओ, जाओ, जाओ’ कहोगे तो वह चला जाएगा।”

कुछ ही देर में सुमल्ल को नींद आ गई। सेवक उसी तरह पंख झलता रहा। सुमल्ल जोर-जोर से खर्राटे ले रहा था। खर्राटों की आवाज सुन हेमू को भी नींद आ गई। वह वहीं जमीन पर ही सो गया।

उस समय सुमल्ल सपना देख रहा था। सपने में वह एक बड़े समुद्री जहाज पर विश्वविजय के लिए निकला था। उसने आस-पड़ोस के अनेक राज्यों को जीता। फिर राज्यों के प्रमुख सैनिकों और सेनापतियों को हथकड़ियाँ पहनाकर जहाज पर ही कैदी बना लिया। जहाज गर्व से पानी की लहरों पर आगे बढ़ता जा रहा था।

राजा मोहक सपने में खोया था। अचानक हेमू भी खर्राटे भरे लगा। तभी आ गया बुरे सपनों का यक्ष। उसके आते ही सारा सपना उलट-पुलट हो गया। फिर सुमल्ल को सपने में दिखाई देने लगा—बड़ा जबरदस्त तूफान आया है। पानी की लहरों पर जहाज थरथरा रहा है। शत्रुओं के बंधन छूट गए। उन्होंने मिलकर सुमल्ल को पकड़ा और समुद्र में फेंक दिया। सुमल्ल चिल्लाया, “बचाओ…बचाओ।”

सुमल्ल सपने में इतनी जोर से चीखा, उसकी आवाज साथ वाले कमरे में सुनाई पड़ी। वहाँ राजकुमार हिम्माल बैठा चित्र बना रहा था। राजकुमार शांत स्वभाव का था। वह युद्ध से घृणा करता था।

पिता की “बचाओ…बचाओ” की आवाज सुनकर राजकुमार राजा के शयन कक्ष में गया। वहाँ उसने देखा, राजा झुँझलाया हुआ अपने पलंग पर बैठा है। सेवक सो रहा है। हिम्माल समझ गया कि जरूर किसी ने पिता के सपने में खलल डाली है। उसने कहा, “पिता जी, क्या बात है? आप कुछ परेशान हैं?”

सुमल्ल पर अभी तक सपने का असर था। सपना टूटने के कारण वह बौखला गया था। राजकुमार कुछ और कहता, इससे पहले ही चिल्लाकर बोला, “तुमने जुर्रत कैसे की यहाँ आने की? हट जाओ मेरी आँखों के आगे से।”

“आप क्या कह रहे हैं, पिता जी?” राजकुमार ने पिता का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था।

“तुम्हारी बदकिस्मती ही तुम्हें यहाँ लाई है।” राजा सुमल्ल गरजा, “तुम्हें मालूम है, मैंने प्रतिज्ञा की थी, सपना टूटने के बाद जो भी मुझे सबसे पहले दिखाई पड़ेगा, उसे जीवित नहीं छोडूँगा…मैं तुम्हें मारूँगा नहीं। आज ही राजमहल छोड़कर चले जाओ।”

इतना कहकर सुमल्ल अपने काले घोड़े पर सवार हो, घूमने निकल गया।

राजकुमार हिम्माल देर तक सन्न खड़ा रहा। उसने एक नजर महल के रंग-बिरंगे फूलों, पौधों पर डाली। कितने प्यार से उन्हें सींचा था उसने। पिता का प्यार तो कभी मिला नहीं, आज इन फूलों, पौधों का साथ भी छिन जाएगा।

हिम्माल महल से निकला ही था, सामने लाल-लाल फूलों से लदा कचनार का पेड़ नजर आया। उसे लगा, पेड़ खिलखिलाकर हँस रहा है। वह उस पेड़ के नीचे जा खड़ा हुआ। तभी उस पेड़ से टूटकर एक पत्ता उसके पैरों के पास गिरा। पत्ते से सुनहला प्रकाश निकल रहा था।

हिम्माल ने पत्ता उठाया तो एक बड़ा सा नीला पंख उसके हाथ में आ गिरा। पेड़ पर एक रंग-बिरंगा पक्षी बैठा था। उसी का पंख गिरा था। पक्षी उड़ गया।

राजकुमार हैरानी से से सुनहले पत्ते और नीले पंख को देख रहा था। अचानक एक भारी सी आवाज सुनाई दी। यह पेड़ की आवाज थी। कचनार का पेड़ बोल रहा था, “हैरान मत होओ। यह पत्ता और पंख तुम्हारे दोस्त हैं। काम आएँगे।”

राजकुमार आगे चला, तो पंख उसके हाथ से छूटकर हवा में उड़ने लगा। वह समझ गया, पंख उसे रास्ता दिखा रहा है। वह उसी दिखा में आगे बढ़ता गया। कचनार के पत्ते को उसने जेब में सँभालकर रख लिया था। जब भी कोई जंगली जानवर राजकुमार पर आक्रमण करने आता, उस पत्ते से निकलते प्रकाश से उसकी आँखें चौंधिया जातीं।

कई दिन, कई रात राजकुमार चलता रहा। चलते-चलते काले पहाड़ पर जा पहुंचा। वहाँ दूर-दूर तक काले पत्थरों के सिवा कुछ न था। राजकुमार भूख-प्यास से बेहाल हो गिर पड़ने को था। तभी उसे नदी की कल-कल आवाज सुनाई दी। हिम्माल उधर चल पड़ा। कुछ आगे नदी बह रही थी। तट के पास दो-चार झोपड़ियाँ थीं। इनमें मछुआरे रहते थे।

वहाँ मछुआरों ने बड़े प्यार से राजकुमार का स्वागत किया। राजकुमार को मछुआरों का सीधा-सरल व्यवहार अच्छा लगा। वह उन्हीं के साथ रहने लगा। धीरे-धीरे उसने भी मछली पकड़ना सीख लिया।

एक दिन तट पर घूमते हुए हिम्माल ने देखा—आसपास रेत में ढेरों रत्न, मणियाँ बिखरी पड़ी हैं। उसे आश्चर्य हुआ, ‘इतने कीमती रत्न कंकड़-पत्थरों की तरह इधर-उधर पड़े हैं। कोई उन्हें उठाता ही नहीं।’ राजकुमार समझ गया, ये लोग इन्हें नहीं पहचानते।

राजकुमार ने बस्ती के लोगों से रेत से रत्न, मोती और कीमती मणियाँ चुनने के लिए कहा। रत्न, मोतियों के ढेर लग गए। अब राजकुमार ने कचनार का पत्ता और पंख निकाला। पंख उड़कर रास्ता दिखाने लगा। राजकुमार ने अनेक नगरों की यात्रा की। उन्हें काले पहाड़ और वहाँ के निवासियों के बारे में बताया। काले पहाड़ पर आने की दावत दी।

एक दिन काले पहाड़ पर भव्य समारोह हुआ। बाहर से अनेक व्यापारी आए। व्यापारियों ने उन रत्नों की कीमत कई करोड़ मुद्राएँ आँकी।

धीरे-धीरे अन्य राज्यों के अनेक व्यापारी वहाँ आने लगे। वे रेशमी, ऊनी वस्त्र और अन्य कीमती सामान लाते बदले में मोती, रत्न ले जाते। धीरे-धीरे बस्ती में धन-धान्य और समृद्धि छा गई। लोगों ने मिल-जुलकर काम करना सीखा। काले पत्थर के खूबसूरत, नक्काशीदार घर बनाए। हिम्माल के लिए एक आलीशान महल बनाया गया। बस्ती के लोग हिम्माल को राजा की तरह मान-सम्मान देने लगे। काले पहाड़ के बीच एक खूबसूरत राज्य बन गया। हिम्माल ने उसका नाम रखा, ‘शांति नगर’।

हिम्माल बहुत खुश था। पर उसे कचनार के पेड़ की अकसर याद आती। उसी ने यहाँ आने का रास्ता बताया था। एक दिन हिम्माल सुबह उठा, तो देखकर हैरान। उसके महल के आगे कचनार का पेड़ था। रातों-रात यह पेड़ कहाँ से आ गया? हिम्माल आश्चर्य में था। वह पेड़ के पास गया, तो आवाज सुनाई दी, “पहचाना मुझे? मैं वही पुराना दोस्त हूँ तुम्हारा। पिता के घर में तुम घंटों मेरी छाया में बैठते थे। तुम्हारे जाने के बाद से ही मैं उदास रहता था। फूल आने भी बंद हो गए थे। कल तुम्हारे पिता ने युद्ध के लिए जाते हुए तलवार से मेरी एक शाख काट डाली। बस, मैं वहाँ से चला आया।”

उस दिन से हिम्माल रोज शाम को पहले की तरह कचनार के पेड़ के नीचे बैठता। वहाँ मन को शांति मिलती।

एक दिन हिम्माल सो रहा था, तभी उसे ‘सन-सन’ की आवाज सुनाई दी। उसकी नींद खुल गई। समझ गया, यह आवाज पेड़ के पत्तों से आ रही है। राजकुमार दौड़ा-दौड़ा कचनार के पेड़ के पास गया। पेड़ बोला, “जल्दी करो। तुम्हारे पिता की हालत खराब है। वह युद्ध में बुरी तरह घायल होकर लौटे हैं। उन्हें तुम्हारी जरूरत है।”

“लेकिन…मैं तो रास्ता ही भूल गया।” हिम्माल अचकचाया।

“वही पत्ता और नीला पंख निकालो। रास्ता अपने आप पता चल जाएगा।” पेड़ ने कहा।

राजा दौड़ा-दौड़ा महल में गया। चाँदी के संदूक से नीला पंख और कचनार का पत्ता ले चल पड़ा। चलते-चलते राजकुमार अमरावती पहुंचा। वहाँ शोक का वातावरण था। सबके चेहरे लटके हुए थे। शहर उजड़ा-उजड़ा नजर आ रहा था।

हिम्माल चुपचाप महल में गया। उस कक्ष में झाँककर देखा, जहाँ उसके पिता घायल लेटे थे। उसने देखा, पिता के सारे शरीर पर पट्टियाँ बँधी हैं। चेहरा पीला पड़ गया है। मंत्री, सभासद और अनेक सेवक आसपास खड़े हैं। एकाएक घायल राजा ने एक सैनिक को इशारा किया। अपनी तलवार उठा लाने के लिए कहा। इसी तलवार से उसने अनेक युद्ध जीते थे। सैनिक ने तलवार उठाकर सुमल्ल के सिरहाने रख दी। सुमल्ल ने तलवार उठाने की कोशिश की। पूरा जोर लगाया पर उसे हिला भी नहीं सका। वह धीरे से बुदबुदाया, “लग रहा है, जैसे यह तलवार सौ मन भारी हो।”

आसपास खड़े मंत्री, सभासदों व सेवकों की आँखें भीग गईं। वह योद्धा जो युद्धभूमि में बिजली की लपलपाती गति से तलवार चलाता था, आज अपनी तलवार उठा तक नहीं पा रहा था। सुमल्ल को हवा में उड़ता नीला पंख दिखाई दिया। फिर आसपास एक विचित्र सुगंध महसूस हुई। उसे लगा, शरीर का दर्द कुछ कम हो गया है। मन भी हलका-फुलका लगने लगा।

सुमल्ल सोचने लगा, ‘कैसी विचित्र है यह सुगंध?’ उसे याद आया, महल के सामने कचनार का एक पेड़ा था। राजकुमार हिम्माल अकसर उसके नीचे बैठता था। उसी से ऐसी सुगंध फूटती थी।

सुमल्ल इन्हीं विचारों में खोया था। अचानक उसे अपने माथे पर कुछ महसूस हुआ। उसने उठाकर देखा, वह कचनार का एक पत्ता था। इसी के साथ जैसे जादू हुआ। वह बिल्कुल ठीक हो गया। उसने मुड़कर देखा, पीछे राजकुमार हिम्माल खड़ा था।

“पिता जी, कैसे हैं?” हिम्माल ने पूछा, तो सुमल्ल ने उसे बाँहों में भर लिया, “बेटा, तुमने आकर मुझे मौत के चंगुल से छुड़ा लिया, वरना…” कहते-कहते सुमल्ल की आँखें भीग गईं। फिर उसने संकल्प किया, “कभी युद्ध करके धरती पर रक्त नहीं बहाऊँगा।”

ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)