भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
“मैं तो अभी तक इस ‘बैकवाटर’ से बाहर ही नहीं निकली!” नाव में रॉबर्ट से पहली बार मिलने पर अन्ना ने बड़ी नाजुक-मिज़ाजी से कहा था।
“फिर तो तुमने खुला सागर भी नहीं देखा होगा। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें दूर तक ले जाऊँ।”
धरती के कटे-फटे किनारों से धुर अंदर तक धंस आए समुंदर के पानी ‘बैकवाटर’ में इतनी देर से रहती अन्ना को सागर की विशालता का अंदाज़ा ही नहीं था। उसने एलपी के आसपास बैकवाटर में छोटे-छोटे जहाजों की चलती लहरों को किनारों से टकराते देखा था, परन्तु अब उसका दिल चाहता था कि एक बार वह भी बैकवाटर से निकल कर सागर की लहरों में से गुज़रे और उसने ‘हाँ’ की मुद्रा में गर्दन हिला दी।
एम. बी. ए. करने के दौरान कोची कॉलेज द्वारा अलपुड़ा की पनामड़ा झील-बैकवाटर में वलमकलीस स्नेक बोट-रेस पर अन्ना की रॉबर्ट से हुई जान-पहचान के अवसर पर यह वार्तालाप हुआ था।
इस मुलाकात के पश्चात् मुनार की पहाड़ियों की कटाई, चाय के बाग, फैक्ट्रियाँ, लेबर वर्क, कंपनी में वर्करों की साँझेदारी, सामाजिक सिल्वर रॉक, पेड़ों से लटकी सफेद और काली मिर्च की बेलें, चंदन की लकड़ी का व्यापार…..और सबसे बढ़कर अपनी स्टेट केरला को आधुनिक शिक्षा द्वारा शिखर तक पहुँचाना; सब पर विचार-विमर्श होता।
उन्होंने एक साथ ‘मुदरा’ थियेटर में इंद्रदेव और अप्सरा का ‘कथाकली नृत्य देखा, ऊँचे स्थानों पर पहाड़ों के बीच बाँध बनाकर बनाई गई कृत्रिम झीलों में नाव चलाई, दोनों ने एक ही नारियल में स्ट्रा लगा कर पानी पिया और कच्चे नारियल का गूदा खाया। दो-दो, तीन-तीन मंज़िल जितनी ऊँची उठती समुद्री लहरों में एक निपुण तैराक की तरह सर्किंग करते रॉबर्ट को देख, अन्ना रोमांचित हो उठती।
अन्ना तो विवाह करवा कर रॉबर्ट द्वारा दिखाए गए सब्ज-बाग देखने मनार तक चली गई थी।
पर फिर अन्ना को लगा कि वक्त ठहर-सा गया है।
रॉबर्ट का किया हुआ बड़े ऊँचे चढ़े नारियल के पत्तों का धुआँ रोज़ घर में फैलने लगा था। अब ना कोई गहरा विचार-विमर्श होता और ना ही सपने साकार होते दिखाई देते।
‘टी-टेस्टर’ रॉबर्ट चाय चखता-चखता अब ज़मीन की परख के चक्कर में अन्ना से सलाह-मशविरा किए बिना, उसे वहीं छोड़कर, कंपनी की तरफ से लेह पहुँच गया। अन्ना बच्चे के लिए रही-सही आशा भी खो चुकी थी।
कलाई पर फूलों का गजरा पहने, ताज़ा फूलों से भरी टोकरी को हिलोरें देती रूबी ने उसमें से एक खूबसूरत फूल रॉबर्ट को देते हुए कहा, “जूले साहिब, यह आपके लिए!” रॉबर्ट भी अब तक लेह वालों से मिलते-मिलाते हुए ‘जूले’ शब्द से अच्छी तरह परिचित हो चुका था। उत्तर में उसने फूल लेकर रूबी के चेहरे पर फेरते हुए “जूले जूले, कितना अच्छा लगता है।” कह कर उसे मुग्ध करने की कोशिश की। वह रोमांचित हो गई। उस वक्त तक रूबी की माँ को कुछ पता ना था कि ट्यूशन पढ़ाने जाती उसकी बेटी और रॉबर्ट का फेस-बुक पर पनपा यह मेल-मिलाप पहले से था।
रॉबर्ट रूबी से नज़दीकियाँ बढ़ाने लगा था।
धीरे-धीरे अलहड़-सी युवती, रूबी को उसके पास खड़े होने पर साँसों की मदभरी आवाज़ बहुत सुखद लगने लगी थी।
अगले दिन रूबी की माँ की तिरछी नज़र रॉबर्ट के हाथ में पकड़ी शहद की बोतल और होंठों पर जीभ फेरती रूबी के हाथ में जूठे चम्मच पर पड़ते देख आत्म-ग्लानि में डूबा रॉबर्ट अपने आप ही बोल पड़ा- “परख रहा था कि मधुमक्खी का पेड़ पर बनाया प्राकृतिक छत्ते में तैयार किया शहद है या कृत्रिम छत्ते में इकट्ठे किए अप्राकृतिक मकरंद से?”
अचानक रॉबर्ट के प्रति रूबी के इस तरह बेझिझक खुलने पर हड़बड़ाहट में कह बैठी- “शहद तो शहद ही है। कुदरती हो या बनावटी। साहब, पीनी है तो मुझे कहो, नमकीन ‘गुड़गुड़’ चाय पीलाऊँगी…..मक्खन डालकर!” माथे पर हल्की-सी शिकन लिए सर्वेट क्वाटर के सामने खड़ी मान्हे (लेहवासियों द्वारा सिमरन हेतु हाथ में ली हुई तकली) घुमाती रूबी की माँ को लगा कि अपनी अपरिपक्व पुत्री को जीवन की ऊँच-नीच समझाने का समय आ गया है। उसने बहाने से रूबी को पास बुलाकर सामने-सामने केवल इतना ही कहा- “बेवजह हर ऐरे-गैरे के पास खड़ा नहीं होते। यदि तू अपना ख्याल रखे बिना यूँ ही घूमेगी तो तुझे पता भी नहीं चलेगा कि कब तेरी यह नाजुक-सी चमड़ी यहाँ सीधी पड़ने वाली अल्ट्रावायलट किरणों से झुलस जाएगी और तेरे ये खूबसूरत गाल मुर्झ कर रह जाएँगे।”
रास्तों के आस-पास रखे शिलालेखों पर लिखे हुए मंत्रों से हवा के टकराने पर वातावरण के शुद्ध होने के लेहवासियों के भरोसे की तरह रूबी की माँ पुत्री को नसीहत देकर अपना कर्त्तव्य अदा करते हुए फिर से माने को घुमाने लगी। इससे पहले भी उसने एक दिन बातों-बातों में उसे बताया था- “प्राचीन काल से ही इस प्लेटू पर ऑक्सीजन की कमी अनुभव होती रही, जिसे नई सोच के लोगों द्वारा अपने ढंग से प्लांटेशन आने में वर्षों लग गए।…..हालांकि यह ज़रूरी नहीं कि हर तजुर्बा हर जगह ठीक ही बैठे।”
रूबी तो बिना कोई प्रभाव लिए और बिना कुछ कहे सिर झुकाए आगे बढ़ गई।
सर्वे को आया रॉबर्ट तो अनजोती भूमि की तलाश में ही लग गया कि बारिश हो भी और पानी भी ना टिके।
सारा दिन हवा का गुबार बनता रहा। सर्द धुंधला मौसम घुटा-घुटा अनुभव हो रहा था।
आकाश में घिर-घिर आते बादल पूरी शिद्दत से धरती पर छा जाने को आमादा थे।
रूबी की माँ गाँव वाले घर की मिट्टी की चिनाई वाली बिना पलस्तर दीवारों पर ध्यान जाते ही छत को तिरपाल से ढकने के लिए रूबी के बाप द्वारा इनकार करने पर अगले दिन लौट आने के लिए कह कर गाँव चली गई।
शाम को शहर से लौटे नशे में धुत रूबी के पिता, दार्जिंग दूरजे को रूबी की माँ को चौकसी हेतु कहे गए विशेष शब्द ‘रूबी का ख्याल रखना’ सिरे से भूल गए और उसने साहिब रॉबर्ट को फोन द्वारा रात दोस्त के पास ही रुकने की बात बता कर अपनी पुत्री का ख्याल रखने के लिए मनवा कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली।
रूबी की माँ को अभी संभलने का मौका ही नहीं लगा था कि बस उसी रात आँधी चल पड़ी। क्वाटर में नितांत अकेली पड़ी रूबी को ढाढ़स बँधाने के बहाने रॉबर्ट उसकी ओर बढ़ रहा था। बिजली और हवा की एक तेज़ तर्रार लहर चल पड़ी थी।
स्पर्श के उस सूक्ष्म एहसास में आँखें मीचे बैठी धरती, अपने साथ हो रही ज़्यादती के प्रतिशोध में बेशक बिजली की तरह कड़की भी हो और फिर शायद बादलों की कानफोडू गर्जन में उसकी चीख धीरे-धीरे कहीं अलोप हो गई हो। आस्मानी बिजली की कौंध में रूबी की आँखें चुंधिया गई थीं।
कुदरत का कहर सबने देखा। खूब आँधी चली। परन्तु फिर…..बादल फटा और कच्चे पहाड़ का तो सारा मलबा ही बह गया।
रूबी की समझ से बाहर था कि वास्तव में उसके साथ क्या घट गया था।
वह निढाल-सी पड़ी थी।
एक रात में सब तहस-नहस! इस समय सब संपर्क टूट गए थे। हाहाकार मच गई। किसी को किसी की कोई खबर नहीं थी।
रूबी की माँ को हल्की-हल्की बारिश से अपना घर खराब होने का डर था। पर यहाँ तो सुबह होने से पहले इस कहर से हुई तबाही का तो अंदेशा ही नहीं था। भयानक तूफान के थमने के तुरंत बाद तक उसे कोई पता नहीं था कि प्रारब्ध ने उसका क्या-क्या बहा दिया था!
विधि के विधानानुसार जीवन-जल सागर से भाप के रूप में उठी उमंग कोसों दूर ऊंचे पहाड़ों से टकरा कर जल-स्रोतों द्वारा फिर निचले स्थानों से होती हुई वापिस सागर की ओर अग्रसर थी।
दूर्जे की लाश का कुछ पता नहीं लगा था।
ज़िन्दगी एक बार थम-सी ग
ई।
माँ के सिर एक बार फिर गम का पहाड़ तब टूटा, जब उसने रूबी की बदली-बदली चाल देखी। उसका माथा ठनका। माँ तिनके से हल्की और बेटी पैरों से भारी हो गई थी। उनकी समझ के अनुसार रॉबर्ट पर उनकी गीदड़ भभकी का कोई असर नहीं होने वाला था। माँ की फटकार से रूबी जैसे बेजुबान हो गई हो। और जुबान बंद रखने की एवज में रॉबर्ट ने बच्चा गोद लेने और कोई योग्य वर देख कर रूबी की शादी का खर्च मुआवज़े के तौर पर देने का भरोसा दिया।
एक बार फिर अपना टीन-कनस्तर और बचा-खुचा सामान समेट कर कहीं दूर जाकर आशियाना बसाने का फैसला लिए। माँ-बेटी ने इसी में गनीमत समझी।
रूबी गुमसुम-सी रहने लगी थी।
लेह पहुँचते ही अन्ना की व्याकुलता चेहरे पर साफ झलक पड़ी थी कि इतनी दूर बुलाकर आखिर रॉबर्ट उसे कौन-सी अचंभे वाली बात बताने वाला था।
फिलहाल यह सब अन्ना की समझ से बाहर की बात थी।
वक्त की नज़ाकत को भाँप कर रॉबर्ट नपी-तुली योजनानुसार अन्ना को शीशे में ढालने के प्रयास में था, “बाहर से आने वाले को इस ‘हाई एलटीटयूट’ पर ऑक्सीजन की कमी के कारण पहले-पहले इसी तरह बेचैनी होती है। एक-दो दिन के बाद तुम अपने आपको यहाँ के वातावरण में एडजस्ट कर लोगी।”
दो दिन बाद रॉबर्ट अन्ना को ‘शांति-स्तूपा’ ले गया।
“पता नहीं मेरा जी ऐसी शांतमयी जगह पर भी क्यों घबराता है?…..”
“ज़िन्दगी कौन-सी हज़ारों वर्ष की है, जो अकेले-अकेले गुज़रती है।” कह कर अन्ना ने अपना सिर रॉबर्ट के कंधे पर रख दिया। वह सतह-समुन्दर से वहाँ की ऊँचाई के विषय में सोचने लगी। अन्ना के खाब-ओ-ख्याल में भी नहीं था कि यहाँ वह जितनी और आगे बढ़ने की कोशिश करती जाएगी, वातावरण उतना और दमघोंटू होता जाएगा।
“एक बार जब तुम इस वातावरण में जीना सीख लोगी तो शायद और भी ऊँचाई तक जा सकोगी।” रॉबर्ट ने अन्ना को भरोसा देते हुए कहा।
“अथाह गहराई से समुन्दर की लहरों से किनारे आ पड़ी, आकाश की ओर किए खुले मुख वाली सिप्पी बारिश की एक बूंद मुख में पड़ते ही तृप्त हई मुख बंद कर लेती है और फिर बरसती बारिश या लहरों से ही समन्दर की तह में धकेली गई, हज़ारों साल पड़े रहने के बाद एक सुच्चा मोती तैयार करती है। उस सुच्चे मोती की तलाश में मुझे भी केवल एक स्वांति बूंद की तृष्णा…..अधिक बारिश की नहीं। मैं फिर सागर की तह में समा जाना चाहती हूँ!” अन्ना ने आकाश में छोटी-सी चांदी जैसी झलक मारती बदली की ओर देख कर बड़ी ही दार्शनिकता से उत्तर दिया।
कशमकश में पड़ी अन्ना क्या जाने, सतह-समुन्दर से ऊँचाई उसे और आगे कहाँ तक ले जाएगी। भावुकता में डूबी ने जब ऊँचाई पर स्थित ‘शांति-स्तूपा’ की दीवार से नीचे सारे लेह पर नज़र दौड़ाई तो बात का रुख अपने आप मोड़ लिए, “यहाँ के लोगों ने कैसी त्रासदी देखी होगी। पानी का बहाव पहाड़ पर भी बाढ़।…..कुदरत का कहर कब, कहाँ और किस रूप में आता है; किसी को कुछ आभास नहीं होता।”
“पहाड़ के ऊँचे स्थानों से टूटी, मैदानी इलाके और मुहाने पर आ कर बिछी लस मिट्टी निचले स्थानों की किसी-किसी बंजर भूमि के लिए कितनी उपजाऊ सिद्ध होती है!” आगे रॉबर्ट ने बात का रुख दूसरी तरफ मोड़ दिया था।
“हाँ, पर धरातल पर ही बिछी यह लस मिट्टी वक्त आने पर बाढ़ के साथ बह भी जल्दी ही जाती है।” अरसे से अनछुए रॉबर्ट-अन्ना रोमांटिक होते हुए भी उस त्रासदी भरे माहौल से अछूते ना रह सके।
कोची के समुन्दर-किनारे पर सुनामी के कारण हुई सारी उथल-पुथल को अन्ना ने अपनी आँखों से देखा था। ताजा-ताज़ा हुई घटना के समय सबके मुँह पर यही था- “धरती के धुर अंदर से निकले खनिजों के कारण उसमें आए खालीपन की बदौलत आई सुनामी, ज़रूरत से ज्यादा कुदरत के साथ की गई छेड़छाड़ का ही परिणाम है।”
और सुनामी के डर से समुन्दर से उठ अलपुड़ा के पन्नामड़ा बैकवाटर में आ बसे अन्ना के माता-पिता ने तो कुछ और ही उलझन मोल ले ली थी। अपनी माँ के पिता को कहे जले-कटे शब्द, “तेरी बैकवाटर की दुर्गंध को झेलने के लिए मेरी अनपढ़ता ने मुझे विवश किए रखा, वरन् परिवार को लेकर मैं कब की मुक्त हो गई होती।” सुनकर वह माँ से उलझ पड़ी थी, “बैकवाटर में आनन्द लेने के लिए सैलानी दूर-दूर से आते हैं। लेकिन माँ एक तुम हो, जो इसे बैकवाटर की सड़ांध कहती हो। ना जाने कभी-कभी तुम्हें क्या हो जाता है, जो तुम पापा से यूँ उलझने लग जाती हो?”
और माँ ने ठंडी सांस लेते हुए कहा था, “तेरी उम्र गीली लकड़ी के इस धुएँ को नहीं समझ सकती।” सुनकर अन्ना हमेशा के लिए खामोश हो गई थी।
उस वक्त अन्ना ने सोचा था कि कम से कम ऊँचे स्थानों या पहाड़ों पर बेघर करने जैसी संभावना नहीं होती होगी! परन्तु…..इस वक्त उसे रत्ती भर भी शंका नहीं हुई कि इस संवाद से उसकी निजी ज़िन्दगी का कितना गहरा संबंध था।
“आज हम यहीं से लौट चलते हैं। फिर किसी अवसर पर मैं तुम्हें 18 हज़ार फुट की ऊँचाई पर दुनिया की सबसे ऊँची मोटरेबल रोड, खरदंगला के पास कर ले जाऊँगा। और यदि परमिशन मिली तो कभी आकाश छूती पैंगाग लेक भी दिखाऊँगा। तुम भी क्या याद रखोगी!” रॉबर्ट ने उसका ध्यान बटा कर अपने वजूद का एहसास जताते हुए कहा।
परन्तु अन्ना हर छोटी-छोटी बात पर ऊँचाई को सतह-समुन्दर के स्तर से नापती।
अगले दिन जब वह रॉबर्ट के साथ लेह घूमने निकली तो ‘थिकसे-गुंपा’ बोध मंदिर के डुप्लैक्स में बीचो-बीच दूसरी मंज़िल के ऊपर तक 49 फुट ऊँची पदमा सम्भवा की मूर्ति को देखकर एक बच्चे द्वारा अपनी माँ से किए प्रश्न, “क्या कभी किसी इंसान का कद इतना ऊँचा भी हो सकता है?” प्रत्युत्तर में सरल शब्द- “जब कोई किसी विशेष मिशन अथवा लोक-भलाई के लिए निकलता है तो उसका कद एक साधारण मनुष्य से कहीं ऊँचा हो जाता है, शायद इसी आशय से यह मूर्ति बनी है- जहाँ तक मेरा विचार है..नहीं तो साधारण व्यक्ति का कद सामान्य ही होता है।” सुनकर बच्चे के लिए तड़पती मां ने कई बार अपनी मुट्ठियों को भींच लिए था।
वर्षों तक बच्चे के लिए तरसती अन्ना को साथ ले, रॉबर्ट नपे-तुले वक्त पर रूबी के घर जन्मे बच्चे से उसकी मानसिक सांझ जोड़ने के लिए गया तो रूबी को देख अन्ना हक्की-बक्की होकर रह गई। केवल फेस-बुक पर अन्ना-रॉबर्ट की हुई पहचान के विषय में एक बार जब अन्ना ने पूछा था तो रॉबर्ट का उत्तर था- “सोशल नेटवर्किंग द्वारा बस चैटिंग करके इलाके की अधिक जानकारी प्राप्त कर रहा हूँ।”
मुनार की तरह हिमालय की तकरीबन-तकरीबन पूरी उत्तरी बैल्ट के निवासियों की चायपत्ती के बागानों में पत्ती-पत्ती चुन कर झोली और पीठ पीछे लटकाए बैग में डालने की एक जैसी कार्य-विधि और पिछले कुछ समय से लेह इलाके के संतुलित तापमान को विचार में रखकर कंपनी द्वारा सर्वे के लिए भेजे जाने पर रॉबर्ट का चुपचाप अन्ना को छोड़ लेह चले आना भी अन्ना के लिए एक रहस्य था।
बच्चे को गोद में ले दुलार-प्यार करने पर अन्ना को छातियों में कुछ आनन्द भरी सुरसुराहट-सी अनुभव होती। उसे अभ्यस्त करने के लिए बच्चे से मिलाना रॉबर्ट का एक दैनिक कार्यक्रम बन गया। जिस दिन अन्ना बच्चे को नहीं देखती अथवा लाड-दुलार ना करती, उसे ज़िन्दगी में कुछ खालीपन-सा महसूस होता।
हालांकि रूबी की माँ द्वारा गुड़-गुड़ चाय की पेशकश पर अन्ना ने ‘सिलवरी टिप्स’ की कोंपलों के स्वाद को याद करते हुए सोचा, ‘कितनी भी बढ़िया चायपत्ती क्यों ना होती हो, उसका फ्लेवर सिर्फ और सिर्फ भाप पर ही बनता है। बाकी सब तो गुड़-गुड़ ही है।’
केरला से अकेली आई अन्ना से हर समय लसूड़े की लेस की तरह चिपका रॉबर्ट ऐसा कोई अवसर न छोड़ता जो रूबी अथवा उसकी माँ अन्ना से अपने ढंग से बातचीत कर सकतीं।
फिर भी रूबी की सूजी-सूजी आँखें देखकर मौका ताड़ कर रॉबर्ट के पल भर इधर-उधर होने पर, अन्ना के पूछने पर रूबी की माँ बच्चा गोद में लेने आई अन्ना के आगे फूट पड़ी थी- “बीबी जी, निचले मैदानी इलाकों से आने वाले कुछ-एक…..बादलों की तरह हमारे लिए तबाही का सबब साबित होते हैं!”
रॉबर्ट के जल्द लौट आने पर बातचीत अधूरी रह गई।
पर अन्ना इतनी-सी व्यथा सुन कर स्तब्ध रह गई थी।
ज्यों ही रनवे पर तेज रफ्तार पकड़ते जहाज़ ने उड़ान भरी, अन्ना का दिल धक-धक करके डूबने लगा। मौसम साधारण होने के बावजूद, अपने अंदर की खलबली के कारण अन्ना पसीना-पसीना हो गई।
दरअसल, अपनी झिझक के चलते अन्ना जो बात पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, वापसी के समय ऐन आखिरी मौके पर एयरपोर्ट पर ‘सी-ऑफ’ करने आए रॉबर्ट ने अन्ना के सीने से चिपके बच्चे की तरफ इशारा करके उसका कंधा सहलाते हुए कहा, “सिर्फ तुम्हारी गोद भरने के लिए। यह बच्चा कोई बेगाना नहीं है, अंश और वंश मेरा ही है।”
‘इस ठंडे मरुस्थल में यह दक्षिणी समुन्दर की वाष्पीकरण हुई हवाओं के हिमालय की श्रृंखला से टकराने पर बने गुबार के कारण घटा अथवा स्थानीय प्रभाव का परिणाम था।’ अन्ना इस पर कुछ भी सुनिश्चित नहीं थी।
‘एक ‘गोद भराई’ या ‘वंश चलाई’ की खातिर दूसरी कोख तक का इस्तेमाल?…..वाह!’ अन्ना दंग रह गई थी।
पसीना-पसीना हुई अन्ना के कदम जैसे जमीन में गढ़ कर रह गए हों। वह झुंझला कर रह गई थी।
आखिरकार उसने एक-एक करके अगली-पिछली सभी कड़ियों को जोड़ लिए।
उसके चेहरे पर झलकी परेशानी को भाँप कर पास खड़ी महिला सिक्योरिटी अफसर ने उसके कंधे को हिलाते हुए कहा, “मैडम, आगे बढ़ो, पीछे की छोड़ो अब।” झुंझलाई अन्ना इस समय बच्चे के विषय में और कुछ भी फैसला ना ले सकी किन्तु रॉबर्ट के लिए उसके मुँह से बस इतना ही निकला, “आखिर तू कच्चा पहाड़ निकला!” रॉबर्ट अन्ना की बात का अर्थ तो खूब समझ गया। पर बात को टालने के लिए अनजान बन कर कहने लगा, “मैं भी जल्द ही तुम्हारे लिए अच्छा-सा गर्म, शहतूश की शॉल लेकर लौट आऊँगा।” फिर वह कुटिल मुस्कान देकर जहाज़ की ओर देखने लग पड़ा।
अपनी तरफ से तो वह रॉबर्ट के अकवेरियम से मछली निकाल कर ‘इनडस’ दरिया में छोड़ आई थी। सारी उम्र सिर्फ ‘मछलिरों को पकड़े जाते’ देखती आ रही अन्ना ने पहली बार अपनी आँखों से लेह में आकर एक आँगन में ऊन कतरे जाने पर ‘मैं-मैं’ करती भेड़ को देखा था। पल के पल अन्ना ने सोचा, ‘घर-परिवारों में आनंदित होती दुनिया को क्या पता, किस की ऊन कहाँ और कैसे उतरती है?’
गुस्से से दांत पीसते हुए उसने रॉबर्ट को उत्तर में कहा, “22-24 हज़ार फुट की ऊँचाई पर पाए जाते जानवर के लुप्त हो जाने की आशंका से सरकार द्वारा पाबंदी लगाए जाने के बावजूद तस्करी करने वालों की किसी चीज़ का मुझे कोई चाव नहीं!…..और ना ही मुझे अब किसी स्त्रिग्ध की ज़रूरत है’
किसी व्यक्ति की गंदी हरकतों को देखकर अच्छी-भली शक्ल भी भद्दी नज़र आने लगती है।’ मन ही मन रॉबर्ट के बारे में सोचती अन्ना को इस समय उसकी सूरत देखना भी गवारा ना था। पर्वतों की खूबसूरती के विषय में सुनी-सुनाई बातों पर लेह से होकर रॉबर्ट के साथ सड़क के रास्ते से कारगिल घूमने आई अन्ना ने, सबसे पहले कितने सारे रंग और ढंग के ऊँचे-ऊँचे पर्वत देखे। हरे, काले, नीले, बैंगनी रंग के नंगे पर्वत और चट्टाने! परन्तु अब जहाज़ में बैठे इतनी ऊँचाई से देखने पर उसे नन्हें पर्वतों का रंग, बर्फ से ढका होने के कारण, दूध जैसा झक-सफेद दिखाई दिया। ‘यदि नज़दीक से देखो तो और ही रंग दिखता है। कैसी कुदरत है!’
ठाठे मारते सागर की तरह रॉबर्ट के प्रेम के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान अन्ना को अब लगा, रॉबर्ट की इस सनसनीखेज़ हरकत ने जैसे उसे चकनाचूर कर दिया हो।
आत्मा तक कुचले जाने पर कुछ समय के लिए मनुष्य के मन में एक बार यह सारी धरती ही तहस-नहस हो, फिर नए सिरे से सब कुछ शुरू होने’ की सोच आने की तरह पल के पल उसका दिल किया कि वह बच्चे को उठाकर खिड़की से बाहर फेंक दे।
‘अब यदि यह रॉबर्ट का खून है तो उसकी बेवफाई की निशानी का बोझ ढोती हुई मैं कैसे जीऊँगी?’ सांय-सायं की आवाज़…..रॉबर्ट…..रूबी.. ..अन्ना ….
अब उसका सिर चक्कर खाने लग पड़ा।
इस समय अन्ना का मन किया कि वह दहाड़ें मार-मार कर सारा जहाज़, जो बादलों ने पहले ही ऊँचा बहुत ऊँचा उठाया लग रहा था, सिर पर उठा ले या परमात्मा करें एक धमाके के साथ यह जहाज़ क्रैश हो जाए और उसके साथ-साथ यह तमाम दुनिया भी।’ कुछ ऐसी सोच उसके दिल-दिमाग पर हावी होने लग पड़ी थी। जहाज़ की तेज़ गड़गड़ाहट से जब उसके कान शिद्दत से दर्द करने लग पड़े तो उसने हाथों से कान बंद कर लिए। एयर होस्टेस ने उसे रुई पकड़ाते हुए कहा- “इसे कानों में डाल लो, राहत मिलेगी।” लेकिन अन्ना समझ गई कि कानों का दर्द तो बेशक जहाज़ से उतरने पर ठीक हो जाए, पर उसकी मानसिक पीड़ा का ना तो कोई एलोपैथिक इलाज है, ना आयुर्वेदिक और ना ही होम्योपैथिक का!
‘ज़ख्म दिलों के सागर से गहरे,
रिसते रहेंगे जीवन भी!’
सोचते-सोचते अन्ना का ध्यान कहीं का कहीं जा पहुँचा। बच्चे के लिए तड़पती अन्ना ने तो रॉबर्ट के टेस्ट-टयूब बेबी तक की ऑफर दे दी थी। चेकअप के लिए अस्पताल गई को लेडी डॉक्टर के कहे शब्द ज़हन में गूंज गए- ‘परमात्मा ने जब चाहा दे देगा। अच्छा होगा आप इस बात की चिन्ता करनी छोड़ दो। बल्कि नवजात बच्चों को गोद में लेकर लाड़-प्यार किया करो। सृजन के लिए हारमोन्ज़ विकसित होंगे।’ अन्ना की इस बात का सहारा लेकर ही रॉबर्ट ने उसे लेह बुलाया था।
इस बीती बात का विचार आते ही उसने गोद लिए बच्चे को देखा जो उस समय अपना अंगूठा चूस रहा था। अन्ना ने उसका मुख चूम लिया। छातियों में कुछ सिहरन-सी हुई। कमीज़ सामने से भीग गई थी।
मुंबई से कोची के लिए फ्लाइट बदलते जहाज़ में अन्ना बेहोश हो गई थी।
एमरजेंसी चैकअप करते समय लेडी डॉक्टर ने अन्ना को होश आने पर उसकी गोद में पड़े नन्हें बच्चे की ओर देखा और उसे घूरते हुआ कहा “दूसरा बच्चा इतनी जल्दी!”
अन्ना तो जैसे आकाश में लटक कर रह गई हो।
बर्फ से ढके पहाड़ दूर बहुत दूर पीछे रह गए थे। मुंबई से आगे बादलों के बीचो-बीच उड़ते जहाज़ के अंदर बैठे-बैठे अन्ना ने फिर मुनार की उन प्राकृतिक ऊबड़-खाबड़ ऊँची पहाड़ियों, जो चाय पत्ती उगाने के लिए समतल किए जाने पर भी सैलानियों को रोमांचित करने के साथ-साथ अपनी जड़ों पर काबिज़ को बहने से बचाती आ रही हैं, का विचार आते ही बच्चे को सीने से लगा लिए।
पिछले समय से वह हवा में उड़ रही थी।
कोच्चि हवाई अड्डे पर पहुँचते ही उसके पाँव धरती पर आ गए थे।
अगले दिन उसने चर्च में ईसा मसीह की मूर्ति की ओर देखा और फिर अपने आप को उसी सूली पर लटके महसूस किया, जैसे उसके दोनों हाथ कीले गए हों।
अजीब-सी कशमकश से गुज़रती, ना वह अपने ससुराल मुनार गई और ना ही एलपी में अपनी माँ के पास ठहरी। बस उसने अपनी पढ़ाई संबंधी डॉक्यूमेंटस और दूसरे ज़रूरी कागज़-पत्र इकट्ठे किए और उसके बाद उसका अता-पता किसी को नहीं था।
ठीक नौ महीने पश्चात् डिलीवरी होने पर अन्ना दोनों बच्चों को एक साथ दूध पिला कर जैसे प्रत्येक जलन और श्राप से मुक्त हो गई हो!
धीरे-धीरे अपनी जान और कारगो की परवाह किए बिना अब अन्ना कितनी बार लहरों से खेलती हुई दूर तक निकल जाने का साहस करती, बेबाकी से खुले समुन्दर में उतरने का अभ्यास करती।
सिर्फ रंग-रूप से अलग गोरे-काले रॉबर्ट के हमशक्ल दोनों बच्चों के नामकरण और फरारी के अवसर पर दूसरे सगे-संबंधियों के साथ-साथ अन्ना की ओर से न्योता मिलने पर रॉबर्ट की बाछे खिल गईं, “मेरे दो-दो बच्चे रखने वाली मेरी अन्ना!” बातों की शौकीन अन्ना हर अवसर पर रॉबर्ट से कोई-ना-कोई बात छेड़े रखती थी। उसकी कही बात ‘काली और सफेद, दोनों मिर्च एक ही बेल पर लगते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि सफेद मिर्च निकालने के लिए उसे सही तरीके से पकने से पहले ही बेल से अलग कर छिलका उतार दिया जाता है जबकि काली मिर्च अपने समय पर तैयार होने के बाद।’ अभी तक रॉबर्ट के दिल-ओ-दिमाग में यह बात घूम रही थी कि ‘सिल्वर रॉक’ पेड़ पर लटक कर ऊपर चढ़ती ‘काली और सफेद मिर्च’ की बेल की तरह अन्ना को अब उसकी सख्त ज़रूरत होगी।
अन्ना ने अपने उद्योग के लिए सबसिडी से लिए, छोटे-छोटे टापुओं से बड़े समुन्दरी जहाज़ों तक सवारियां ढोते, छोटे से जहाज़ का नाम ‘अन्ना फैरई’ रखा।
इनागरेशन के समय अन्ना के ‘फैरई’ पर लिखे शे’र-
‘सारी उम्र हम थलों में रहे प्यासे
प्यास लेकर हम सागर किनारे आ बैठे।’
को पढ़ कर किसी के पूछने पर “खारा पानी पी नहीं सकते, सागर की लहरें तो देख ही सकते हैं।” हँस कर उत्तर देते जब अन्ना रॉबर्ट के करीब पहुंची तो रॉबर्ट ने उसके और करीब होते हुए कहा, “अब हम एलपी के बैकवाटर में ही रहेंगे।” सागर की ओर जाती अन्ना ने आहिस्ता से कहा-
“ज़िन्दगी कोई बैकवाटर का खेल नहीं! मैं तो पूरा सागर चाहती हूँ!
अब तेरे बैकवाटर पर जीने से किनारा अच्छा!”
और फिर उसने “फैरई’ को अकेले ही सागर में उतार दिया।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
