हम कई बार मुसीबत और परेशानी में होते हैं ‘तो ईश्वर से ढेर से वायदे और संकल्प करते हैं यदि हमारा फलाना मंतव्य पूर्ण हो जाए तो प्रभुजी मैं यह करूंगा, वह करूंगा परन्तु जैसे ही हमारा कार्य पूरा हो जाता है, हम ईश्वर के उपादानों और उनके उपकार को विस्मित कर बैठते हैं। जबकि हमें उपकारों को हमेशा याद करना चाहिए और हमारे जो संकल्प हों उन्हें पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए। एक बार एक जगह कुछ नारियल बिक रहे थे। एक व्यक्ति ने नारियल वाले से नारियल का दाम पूछा।
नारियल वाले ने जो मूल्य बतलाया। उससे काफी कम मूल्य में वह व्यक्ति नारियल खरीदना चाहता था। नारियल वाला उस व्यक्ति से बोला,- ‘श्रीमान, आगे नारियल का एक पूरा बगीचा है। आप वहाँ जाइए तो मुफ्रत में ही नारियल मिल जाएंगे। वह व्यक्ति नारियल के बगीचे में पहुँचा। नारियल देखकर वह एक नारियल के पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ पर चढ़ने के बाद उसने खूब सारे नारियल तोड़ लिए। लेकिन जब पेड़ से उतरने लगा तो उसे ऊंचाई से उतरने में डर लगने लगा। अब तो बस। वह व्यक्ति ईश्वर से प्रार्थना करने लगा- ‘हे ईश्वर, मुझे ठीक-ठीक उतार दीजिए, मैं पांच ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा।
वह व्यक्ति संभल-संभल कर नीचे उतर रहा था। थोड़ा नीचे आने पर एक-एक ब्राह्मण कम होता गया और अंत में एक ब्राह्मण को भोजन कराने की बात आ गई। इस तरह वह व्यक्ति नीचे आ गया। नीचे आकर वह व्यक्ति सोचने लगा- मेरे भीतर भी ब्रह्म है। हम भोजन करेंगे तो ब्राह्मण का भोजन हो जाएगा। और बस उस व्यक्ति की तरह हम भी अपने संकल्पों की पूर्ति नहीं कर पाते।
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
