पौराणिक काल से ही व्रत करने की रीत भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। कहते हैं 5000 वर्ष पूर्व जब भक्तगण ईश्वर को ही अपनी आत्मा और प्राणों की शक्ति मानते थे उस समय उन्होंने व्रत करना आरंभ किया और तब से लेकर आज तक व्रत का चलन हमें ईश्वर की अनुभूति कराता चला आ रहा है। ऐसा माना जाता है, जो भी व्यक्ति व्रत करता है वह ईश्वर के सीधे संपर्क में आ जाता है और उसका हृदय निर्मल भावों से परिपूर्ण हो जाता है फिर उसके मन में ईश्वर के अलावा कोई भी अन्य चीज नहीं रहती वह पवित्र हो जाता है, व्रत करने से उसे गंगा में स्नान से मिली पवित्रता मिल जाती है और वह अनुभव करता है ईश्वर के प्रताप को जो उसे बुद्धि एवं शक्ति देता है।

शास्त्रों में भी कुछ ऐसी ही बात देखने को मिलती है। हमारे शास्त्रों के अनुसार व्रत करने से व्यक्ति का मन और तन प्रसन्न, निर्मल, शुद्ध एवं हल्का हो जाता है।

यूं तो हमारी भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं में हर ईश्वर (भगवान) विशेष के लिए एक व्रत का विधान है और हर व्रत का अपना ही एक महत्त्व है एवं हर व्रत से ही पुण्य एवं आशीर्वाद मिलता है परन्तु फिर भी एक ऐसा व्रत है जिसे लगभग पूरा भारत ही बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाता है वह है

‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत’।

व्रत विधि- जिस भी व्यक्ति को जन्माष्टमी का व्रत रखना हो उसे प्रात: काल ब्रह्मï मुहुर्त में उठकर यानी प्रात:काल 4:00 से 5:30 बजे के बीच उठकर अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर यह संकल्प करना चाहिए।

अहं अढ़्य मनोकामना सिद्धि निवित्तम्।

श्री जन्माष्टमी वृतम् करिष्य॥

अर्थात् मैं अपनी मनोकामनाओं की सिद्धियों के लिए जन्माष्टमी का व्रत करने का संकल्प करता या करती हूं। फिर मन, वचन और कर्म की शुद्धि के लिए तीन आचमन करें।

चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर कलश पर आम के पत्ते एवं नारियल स्थापित करें एवं कलश पर स्वस्तिक का चित्र भी बनाएं। इन आम के पत्तों से वातावरण शुद्ध एवं नारियल से व्रत पूर्ण होता है। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। एक थाली में कुमकुम, चंदन, अक्षत, पुष्प (सफेद या पीले), तुलसी दल या पत्र, मोली कलावा रख लें।

प्रसाद में खोए या मावा का पेठा, माखन मिश्री, ऋतु फल ले लें और चौकी के दाहिनी ओर घी का दीपक प्रज्जवलित करें। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण के माता-पिता वसुदेव-देवकी एवं नंद-यशोदा की पूजा-अर्चना करें।

इसके पश्चात् अपनी दिनचर्या के सभी कार्य पूर्ण कर लें और रात्रि में होने वाली जन्माष्टमी पूजा के लिए तैयारी करें। दिन में व्रती केवल फल एवं दूध का ही सेवन कर सकते हैं। बच्चों एवं वृद्धों को व्रत की छूट दी गई है। हमारे शास्त्रों में भी लिखा है कि ‘बाल आतुर: वृद्धानाम नियम: नेव वृतते’।।

रात्रि को 8:00 बजे पूजा पुन: प्रारंभ करें और एक खीरे को काटकर उसमें श्रीकृष्ण का विग्रह रूप स्थापित करें इससे तात्पर्य है कि श्रीकृष्ण अभी मां के गर्भ में हैं करीब 10:00 बजे मूॢत या विग्रह अर्थात् लड्डु गोपाल को खीरे से अलग कर दें और पंचामृत से उसका अभिषेक करें।

पंचामृत में विद्यमान दूध से वंशवृद्धि, दही से स्वास्थ्य, घी से समृद्धि, शहद (मधु) से मधुरता, बूरा से परोपकार की भावना एवं गंगाजल से भक्ति प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण को पंचामृत का अभिषेक शंख (सफेद या चांदी से मढ़े) से करने से 100 गुणा फल प्राप्त होता है और यह फल सात पीढ़ियों तक को प्राप्त होता है।

रात्रि 12:00 बजे श्रीकृष्ण का इस धरती पर प्राकट्य हुआ था इस समय श्रीकृष्ण का निराजन 11, 21 या 101 बत्तियों के दीपक से करना चाहिए। इस दिन निराजन पांच प्रकार से होता है। पहला दीपक से, दूसरा जल से, तीसरा वस्त्रों से, चौथा चंवर (पंखे) से एवं पांचवां पुष्प से, निराजन के समय ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाÓ॥ अथवा ‘ऊं नमो भगवते वासुदेवायÓ का जाप करते रहें। इसके पश्चात् प्रसाद अर्पण करें। प्रसाद में धनिए वाली पंजीरी, फल, मिष्ठान एवं खोए की मिठाई, पंचामृत एवं चरणामृत सभी को अॢपत करें एवं अपने बड़ों का आशीर्वाद लें।

मंत्रों द्वारा श्री कृष्ण की स्तुति

 भगवान श्री कृष्ण की पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें नारियल फल समर्पण करना चाहिए।

इदं फलं मया देव स्थापित पुर-तस्तव।

तेन मे सफलावाप्तिर्भवेत् जन्मनि।।

इस मंत्र को पढ़ते हुए भगवान श्री कृष्ण को पान-बीड़ा समर्पण करना चाहिए। 

ऊं पूंगीफलं महादिव्यं नागवल्ली दलैर्युतक्वा्म्।

एला-चूर्णादि संयुञ्चतं ताक्वबुलं प्रतिगृहयन्ताम्।।

इस मंत्र को पढ़ते हुए बाल-गोपाल भगवान श्री कृष्ण को चन्दन अर्पण करना चाहिए।

ऊं श्रीखण्ड-चन्दनं दिव्यं गंधाढ़्यं सुमनोहरम।

विलेपन श्री कृष्ण चन्दनं प्रतिगृहयन्ता।। 

श्री कृष्ण की पूजा करते समय इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें सुगन्धित धूप अर्पण करनी चाहिए।

वनस्पति रसोद भूतो गन्धाढ़्यो गन्ध उत्तम:।

आघ्रेय: सर्व देवानां धूपोढ़्यं प्रतिगृहयन्ता।।

इस मंत्र के द्वारा नंदलाल भगवान श्री कृष्ण को यज्ञोपवीत समर्पण करना चाहिए।

नव-भिस्तन्तु-भिर्यक्तं त्रिगुणं देवता मय। 

उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर:।।

भगवान देवकी नंदन की पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए श्री कृष्ण जी को वस्त्र समर्पण करना चाहिए।

शांन्ति-वातोष्ण-सन्त्राणं लज्जाया रक्षणं परम।

देहा-लंकारणं वस्त्रमत: शान्ति प्रयच्छ में।।

श्री कृष्ण पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए बाल-गोपाल को शहद स्नान कराना चाहिए। 

पुष्प रेणु समुद्र-भूतं सुस्वाद मधुरं मधु।

तेज-पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृहयन्ताम।।

भगवान श्री कृष्ण की पूजा करते समय इस मंत्र के द्वारा उन्हें अर्घ्य समर्पण करना चाहिए।

ऊं पालनकर्ता नमस्ते-स्तु गृहाण करूणाक:।

अर्घ्य च फलं संयुक्तं गन्धमाल्या-क्षतैयुतम।।

भगवान श्री कृष्ण की पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें आसन समर्पण करना चाहिए।

‘ऊं विचित्र रत्न-खचितं दिव्या-स्तरण-संयुक्तं।

स्वर्ण-सिंहासन चारू गृहिष्च भगवन् कृष्ण पूजित:।।’

इस मंत्र के द्वारा भगवान श्री कृष्ण का आवाहन करना चाहिए।

‘ऊं सहस्त्र शीर्शा: पुरूष: सहस्त्राक्ष: सहस्त्र-पातम-भूमिग्वं सव्वेत-सत्पुत्वायतिष्ठ दर्शागुलाम।

आगच्छ श्री कृष्ण देव: स्थाने-चात्र सिथरो भव।।’

अगले दिन नवमी को नंदोत्सव में कढ़ी-चावल से व्रत की पारणा करें और तुलसी की पूजा एवं उसका वितरण करें। सात बच्चों या बड़ों को खिलाकर ही खाएं।

इस प्रकार व्रत अर्चन करने से व्रती की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं और नि:संतान दंपत्ति को संतान प्राप्त होती है।

व्रत के समय क्या करें?

  • व्रती को पीले वस्त्र धारण करने चाहिए या पीले फूल अपने पास रखने चाहिए।
  • चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
  • उत्सव का वातावरण बनाए रखना चाहिए।
  • बड़ों का सम्मान एवं आदर करें।
  • भव्य एवं सुन्दर झाकियां बनाएं।
  • मंदिर अवश्य जाएं।
  • बच्चों को वीरता और उत्साह की कथाएं सुनाएं एवं उन्हें अपने वंश, परिवार के विषय में जानकारी देें।

क्या न करें?

  • व्रती को सोना नहीं चाहिए।
  • क्रोध नहीं करना चाहिए।
  • यात्रा प्रारंभ न करें।
  • किसी का अपमान न करें।
  • किसी का मन न दुखाएं।
  • किसी को भी छोटा न समझें।
  • आपस में मतभेद न करें। 

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