पहली नजर का प्यार
Pehli Nazar ka Pyaar

Hindi Love Story: उसकी झील सी आंखें शून्य में कहीं खोई हुई थी। उसकी उम्र लगभग 18 या 19 साल के आसपास रही होगी, उसे देखते ही मैं उसकी खूबसूरती का दीवाना हो गया।

ये बात सन 1993 की है उन दिनों जब मेरी उम्र सिर्फ 15 साल की थी। मैं अपनी चचेरी बहन की शादी के सिलसिले में अपने गांव गया था। मेरे पिताजी 1975 में दिल्ली आकर बस गए थे, तब से हम लोग दिल्ली में ही रहते हैं। कभी-कभार शादी-ब्याह में ही हम लोग गांव जाते हैं, एक दिन शाम को मैं अपने गांव में घूम रहा था, तभी अचानक मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी। वो लड़की अपने हाथो में मेहंदी लगाए अपने दरवाजे पर बहुत उदास मुद्रा में बैठी थी। वह इतनी सुंदर थी कि उसका बखान मैं शब्दों में नहीं कर सकता हूं।

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उसकी झील सी आंखें शून्य में कहीं खोई हुई थी उसकी उम्र लगभग 18 या 19 साल के आसपास रही होगी उसे देखते ही मैं उसकी खूबसूरती का दीवाना हो गया। मैं उम्र के जिस पड़ाव पर था उस उम्र में दिल तरह-तरह के सपने देखता है। मैं भी एक हसीन सपने में खो गया।
काश! मेरी शादी इससे हो पाती। उस समय मुझे ये मालूम नहीं था कि अगले ही दिन उसकी शादी है। बहरहाल उसकी शादी हो गई। मैं भी 10 दिन बाद वापस दिल्ली आ गया। उसके बाद धीरे-धीरे मैं उसे भूल गया।
जिंदगी के सात साल देखते ही देखते गुजर गए। साल, 2000 आ गया अब मैं बाइस साल का हो गया था। एक प्राइवेट ऑफिस में मेरी नौकरी लग गई थी, 3000 रुपये मासिक वेतन पर घर वाले मेरी शादी पर जोर दे रहे थे। मैं गांव की लड़की से शादी करना चाहता था क्योंकि मुझे गांव की लड़कियां अच्छी लगती थी और एक दिन मैं और मेरी माताजी लड़की देखने के इरादे से गांव जाने का निश्चय किया।
वो जनवरी की एक सुनहरी सुबह थी जब मैंने अपने गांव की धरती पर कदम रखा। वातावरण में ठंड का एहसास और उस पर मीठी-मीठी धूप बहुत अच्छी लग रही थी। हम लोग जीप का सफर तय करके अपने घर पहुंच गए जो कि स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर था। दिनभर सबसे मिलते-मिलते कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। शाम को मुझे घूमने की इच्छा हुई तो मैं अपने चचेरे भाई को साथ लेकर बाजार घूमने गया संयोगवश मेरे भाई को भी दवा लेने बाजार जाना था। बाजार पहुंच कर हम दोनों एक डॉक्टर की दुकान में गए, मेरा भाई अपनी बारी आने का इंतजार करने लगा।
तभी शादीशुदा सी दिख रही एक लड़की अपनी गोद में एक 6 साल का बच्चा लेकर दुकान में दाखिल हुई। हमारे पास बैठे एक बुजुर्ग जो शायद उसकी जान-पहचान वाले थे उनको अपना बच्चा देते हुए बोली काका आप आशीष को पकड़िये मैं सामान ले लूं। आशीष शायद उसके बच्चे का नाम था। उस युवती ने खुद को इतने करीने से संवार रखा था की उसको देखने के बाद मेरे मन में यही ख्याल आया की ये जरूर कहीं शहर में रहती होगी। हो सकता है यहां मेरी तरह घूमने आई हो! मैंने उसके चेहरे की बस एक झलक देखी पर पता नहीं क्यों घर आने के बाद भी मैं उसके चेहरे को भूल नहीं पा रहा था।
रात को तकरीबन 8 बजे खाना खाने के बाद मुझे सिगरेट पीने की तलब हुई। हालांकि, मुझे सिगरेट पीने की आदत नहीं थी बस ऐसे ही कभी-कभी पी लेता था। मैंने अपने भाई से पूछा तो पता चला की गांव में एक दुकान है जहां से सिगरेट मिल जाएगी, वो मुझे साथ लेकर उस दुकान में गया।
दुकान में कदम रखते ही मुझे एक साथ कई झटके लगे। मेरे सामने वही युवती थी, जिसे मैंने शाम को बाजार में डाक्टर के यहां देखा था उसको, साथ में माताजी भी थीं। दोनों को देखते ही अतीत की सारी बातें मुझे याद आती चली गईं। ये वही लड़की थी जिसे सात साल पहले मैंने उसकी शादी से एक दिन पहले गांव में देखा था।
उसका नाम चन्द्रकला था जो मुझे बाद में पता चला, उसका परिवार भी हमारी तरह दिल्ली में ही रहता था। चन्द्रकला दिल्ली में पली बढ़ी थी, उसका कोई भाई नहीं था वो एकलौती थी। उसने अपनी पढ़ाई दिल्ली से ही की थी लेकिन उसके पिताजी ने उसकी शादी आजमगढ़ शहर में कर दी थी। शायद इसलिए जब मैंने उसे पहली बार देखा था तब वो काफी उदास थी। शायद वो गांव में शादी नहीं करना चाहती होगी। सच कहूं तो उसकी शादी के साथ ही मेरा उसके साथ शादी का सपना भी टूट गया था।
उसकी मां की आवाज सुनकर मैं अतीत से वर्तमान में आ गया। उसकी मां ने मुझसे पूछा बेटा सनोज दिल्ली से कब आए। मैंने बताया आज ही आया हूं। मेरे बड़े भाई का नाम मनोज है इसलिए घरवालों ने मेरा नाम सनोज रखा था। हमारे यहां ऐसे ही नाम रखे जाते हैं।
उसकी मां ने मुझसे सारा हालचाल पूछा और मैं बताता रहा। मेरी बात सुनकर चन्द्रकला मुस्कुरा कर सुनती रही। मैंने सिगरेट मांगी, सिगरेट देते हुए उसने पूछा इतने दिन बाद गांव की याद कैसे आ गई। मैंने बताया कि शादी करने आया हूं। इतना सुनते ही वो खिलखिला कर हंस पड़ी। मैंने पूछा क्या हुआ। वो हंसते हुए बोली आप इतने सुन्दर हैं, स्मार्ट है लम्बे हैं। आपके लायक यहां लड़की नहीं मिलेगी। यहां जो लड़कियां हैं, वो शहर वालों की तरह नहीं हैं। वो आपको पसंद नहीं आएगी।
उसके कहने का तात्पर्य शायद गोरा रंग और सुंदरता से था। मैंने सिगरेट पीते हुए कहा ऐसी बात नहीं है। सुंदरता का पैमाना सिर्फ गोरा रंग नहीं होता गांव में भी सुन्दर लड़कियां होती हैं। उसने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा, ठीक है देखते हैं। घर आने के बाद मैं सोने चला गया पर आज बिस्तर पर नींद नहीं आ रही थी बार-बार उसका ख्याल आ रहा था।
मैं सोचने लगा, वो आज भी कितनी सुन्दर है वो बच्चा, वो बच्चा उसी का है। इतने सालों में बहुत कुछ बदल गया लेकिन उसमें ज्यादा बदलाव नहीं आया था। वो आज भी उतनी ही सुन्दर लग रही है या मेरा नजरिया ही ऐसा था।
अगले दिन मुझे अपनी ननिहाल मेहनगर जाना था। वहां मामाजी ने मेरे लिए कोई लड़की देख रखी थी, उसे ही पसंद करने जाना था। जाने से पहले मैंने अपने भाई को बोला की अगर चन्द्रकला मुझे पूछे तो बता देना की मैं ननिहाल गया हूं।
पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि वो मुझे जरूर पूछेगी। मैंने उसकी आंखों में एक अजीब सा सुनापन महसूस किया था। मैं दो दिन बाद वापिस आया तो मेरे भाई ने बताया की वो आपको पूछ रही थी। मैं बगैर एक पल गंवाए उसके पास पहुंचा। उसने मुझे देखते ही तंज कसा, लड़की पसंद आ गई। मैंने कहा नहीं, फिर मैंने अनजान बनते हुए कहा की आपको कैसे पता की मैं लड़की देखने गया हूं। उसने बोला, अरे गांव में रहते हैं तो गांव वालों की खबर तो रखनी ही पड़ती है। मैं मुस्कुरा कर रह गया खैर कुछ देर बातें करने के बाद मैं घर चला आया। अगले दिन चन्द्रकला अपने मौसा जी के घर चली आई।
संयोगवश उनको भी अपनी लड़की के लिए लड़के की तलाश थी। उन्होंने मुझे देखा और पसंद कर लिया और अगले दिन लड़की देखने की बात कहकर चले गए। अगले दिन मुझे और मेरी माताजी को लड़की देखने जाना था। चूंकि, उनका गांव हमारे यहां से 25 किलोमीटर दूर था और मैंने देखा भी नहीं था इसलिए चन्द्रकला बोली कि मैं लेकर चलती हूं।
तय समय पर हम तीनो लोग जीप की सवारी से 25 किलोमीटर दूर लड़की के गांव पहुंच गए। लड़की हमें पसंद नहीं आई और हम वापिस चल दिए। वापसी में जब हम जीप में बैठे तो मैं और चन्द्रकला अंदर की तरफ बैठे वो मेरे बगल मे बैठी। जबकि मेरी माताजी ने पान खा लिया था तो थूकने की सहूलियत के लिए पीछे की ओर किनारे पर बैठ गईं। गाड़ियों में बिलकुल ठूस कर सवारी बिठाई जाती है। इस जीप में भी काफी ठूस कर सवारी बैठ गई, जिसकी वजह से मेरा और उसका बदन आपस में चिपक गया। ऐसा नहीं था कि आज से पहले मैं किसी लड़की के संपर्क में नहीं आया था, लेकिन इसका स्पर्श पाकर मैं रोमांचित हो गया। मेरे पूरे बदन मे सिहरन सी दौड़ गई, भीड़ की वजह से शोर भी बहुत था। इसलिए बात करने के लिए भी हमें एक-दूसरे के कान में कहना पड़ रहा था। कुछ देर गाड़ी चलने के बाद उसने मेरे कान में सरगोशी की, वो बोली आओ मुझे गाना सुनाओं क्योंकि सफर लंबा है। गाना सुनूंगी तो सफर कट जाएगा।
मैंने कहा ठीक है, इससे अच्छा मौका मुझे कहां मिलने वाला था। मैंने सोचा गाने की ओट में, मैं इसे अपने दिल का हाल बता देता हूं। मैंने उसे ‘हमराज’ फिल्म का गाना, किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है, परस्त इसकी तमन्ना है इबादत का इरादा है। मैं उसके कानो में धीरे-धीरे गा रहा था ताकि कोई और न सुने शोर होने की वजह से मेरी आवाज सिर्फ वो ही सुन रही थी। गाना सुनने के बाद उसने मदहोशी वाले अंदाज में धीरे से मेरे कान में बोली एक और सुनाओ बहुत अच्छा लग रहा है। मुझे भी उसका सानिध्य पाकर बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने उसे कहा तुम अगर साथ देने का वादा करो। मैं यूं ही मस्त नग्में लुटाता रहूं। तुम मुझे देखकर मुस्कुराती रहो मैं तुम्हें देखकर गीत गाता रहूं। मेरा इजहारे मोहब्बत शायद वो समझ गई थी। उसने अपना सिर मेरे कांधे पर रख दिया था। उसकी पलकें बोझिल हो गई थी। उसे देखकर ऐसा बरसों से जलते हुए वीरान पड़े रेगिस्तान में बारिश की बूंदें बरस गईं। उसने मेरी आंखों में देखा उसकी आंखें नम थी कुछ कहना चाह रही थी। कह नहीं पा रही थी।
खामोशी में भी बहुत कुछ बोल रही थी, 25 किलोमीटर का सफर कब खत्म हो गया पता ही नहीं चला। हम जीप से उतरकर अपने गांव के कच्चे रास्ते पर चलने लगे, चलते हुए मैंने उससे पूछा कैसा रहा सफर? उसने मेरी और गर्दन घुमाई और कहा ये सफर जिंदगी भर याद रहेगा, मेरी माताजी पीछे थी इसलिए हमारी बात नहीं सुन पा रही थी, मैं अगले दिन उसकी दुकान में गया वो मुझे अकेली ही मिल गई मैंने उसे कहा की मैं तुम्हारे लिए एक तोहफा लाया हूं अपनी आंखे बंद करो, उसने जब आंखे बंद की तो मैंने उसके चेहरे को अपने हाथो में लेकर उसके फूल से होठो पर अपने होंठ रख दिए मेरा ऐसा करते ही वो किसी जंगली बेल की तरह मुझसे लिपट गई कुछ देर हम दोनों इसी अवस्था में रहे जब अलग हुए तो वो मुझसे नजरें नहीं मिला पा रही थी, उसने कहा ये गलत है मैं शादीशुदा हूं, एक बच्चे की मां हूं, समाज हमें इसकी इजाजत नहीं देगा।
मैंने कहा ठीक है, तो कह दो कि तुम मुझसे प्यार नहीं करती? मेरी इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि हम दोनों ही एक-दूसरे के प्रेम मे बंध चुके थे। खैर पंद्रह बीस दिन ऐसे ही गुजर गए और मेरी शादी आजमगढ़ जिले के ही जहानागंज कस्बे के पास एक गांव में तय हो गई जो कि मेरे घर से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर है। शादी तय होने के बाद मैं दिल्ली आ गया। इस बीच मेरा और चन्द्रकला का मिलन हो चुका था। उसने मुझे बताया कि उसका पति शराब का आदी है, शक करके मारता-पीटता है। दोनों पति, पत्नी की सुंदरता और पढ़ाई में भी अंतर था इसलिए उसके अंदर आत्मग्लानि का भाव आता था। जिसे वो अपनी भड़ास मारपीट के जरिये निकालता था। कुल मिलाकर बीते सात सालों में वो सिर्फ गालियां, मारपीट और दुत्कार ही सह रही है। सबसे बड़ा फर्क यही था कि वो शहर में पली-बढ़ी थी और उसका पति गांव में। दोनों के विचार रहन-सहन में कोई मेल नहीं था।
शादी तय होने के बाद मैं दिल्ली आ गया। दिल्ली आने के बाद मुझे उसकी बहुत याद आई। मेरी उससे कभी बात नहीं हो पाई क्योंकि उस समय मोबाइल सिर्फ अमीर लोगों के पास होता था। तीन महीने बाद मैं वापस गांव गया, वहां पहुंचकर हमारे मिलने का सिलसला फिर चल पड़ा गांव के कुछ लड़कों ने उसके पति को बता दिया कि वो मुझसे बात करती है। इसलिए वो उस पर ज्यादा नजर रखने लगा। इसी बीच मेरी शादी हो गई और मैं दिल्ली आ गया।
दिल्ली आकर मैं अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गया लेकिन गांव में मुझसे दूर होने के बाद वो घुटने लगी। मारपीट का सिलसिला और ज्यादा बढ़ गया। तंग आकर उसने अपने पति को तलाक दे दिया और मेरी तलाश में दिल्ली आ गई। वो मुझसे मिलना चाहती थी लेकिन उसे मेरा पता मालूम नहीं था लेकिन कहते हैं न कि जहां चाह वहां राह। एक हफ्ते के बाद मैं उसे संयोगवश अपने ऑफिस के नीचे मिल गया। दरअसल, मैंने उसे अपने ऑफिस के बारे में बताया था कि अमुक स्थान पर मेरा ऑफिस है। लेकिन उसे ऑफिस का पता मालूम नहीं था, न ही ऑफिस का नाम मालूम था वो तो अंदाजे से ही रोजाना उस मार्केट में आकर मुझे ढूंढा करती थी। मैं उसे दिल्ली में देखकर चौंक गया, वो मुझसे बहुत नाराज थी क्योंकि बार-बार कहने के बाद भी वो मेरे स्कूटर पर नहीं बैठ रही थी। लेकिन जब मैंने जोर देकर बोला तो वो बैठ गई। मैं उसे पंजाबी बाग के एक रेस्तरां में ले गया। वहां मैंने कॉफी मंगवाई लेकिन उसने कॉफी नहीं पी। काफी देर रोती रही, उलाहना देती रही, शिकायत करती रही। उसके कहने का यही भाव था कि तुम यहां अपनी पत्नी के साथ सुख की जिंदगी बिता रहे हो और वहां मेरी जिंदगी नर्क बन गई है।
वो बोली, ‘मैं सब कुछ छोड़कर चली आई हूं। एक नई जिंदगी की शुरुआत करने के लिए क्या तुम मेरा साथ दे सकते हो? ऐसा संभव नहीं है। मैंने कहा अगर ये संभव होता तो मैं दूसरी जगह शादी न करके तुमसे ही शादी करता। चूंकि, हम दोनों एक ही गांव के हैं तो शादी तो हो ही नहीं सकती और अब तो मैं भी शादीशुदा हूं। मैं जिसे ब्याह कर लाया हूं उस बेचारी की क्या गलती है। मैं उसे नहीं छोड़ सकता, वो खामोश निगाहों से मुझे देखती रही। कुछ नहीं कहा। फिर हम दोनों वहां से चले आए। मेरे ऑफिस के पास ही उसके किसी रिश्तेदार का घर था, जहां वो ठहरी हुई थी। मैंने उसे वहां छोड़ दिया। हमारे बीच मुलाकातें होने लगी। वो रोज मेरे ऑफिस के पास आ जाती थी। फिर हम कहीं पार्क या कभी मार्केट में साथ-साथ समय बिताते थे। एक हफ्ता गुजरने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेरी वजह से इसकी जिंदगी तो पहले ही बर्बाद हो चुकी है और अब क्या होगा आगे। क्या नतीजा निकलेगा इन मुलाकातों का।

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pehli nazar ka pyar

मेरी आत्मा ने मुझसे कहा सनोज मत मिल। मत बात कर, अगर तू इससे ऐसे ही मिलता रहा तो इसकी जिंदगी में अंधेरे के सिवा कुछ नहीं होगा। मत कर इसकी जिंदगी बर्बाद। शायद अगर तू इससे न मिले तो ये अपना रास्ता अपने आप बना ले। हो सकता है कि कोई अच्छा जीवनसाथी चुन ले और मुझे भूल जाए। ऐसा सोचकर मैंने उससे बात करना बंद कर दिया। मैंने उससे मिलना बंद कर दिया। अपने आप को कठोर बना लिया। वो रोज आती पर मैं नहीं मिलता। वो बहुत रोई, गिड़गिड़ाई पर मैं नहीं मिला और न ही मैंने उससे बात की। यहां तक कि मैंने उसे एक बार अप्शब्द भी कहे, ताकि वो मुझसे नफरत करने लगे और अपनी दुनिया में लौट जाए। कुछ दिन बाद वो चली गई। उसके जाने के बाद मैं बहुत रोया। मुझे लगा कि वो गांव गई होगी पर वो वहां नहीं गई। पता नहीं कहां चली गई। उस दिन के बाद उसे किसी ने नहीं देखा। इस बात को 23 साल हो चुके हैं। अब मेरा बेटा भी 21 साल का हो चुका है। मेरे चेहरे पर बढ़ती उम्र झलकने लगी है लेकिन उसका वो रोता हुआ चेहरा मुझे आज भी याद है। जब वो जा रही थी और उसने कहा था अब तुम मुझे कभी नहीं देखोगे और आज तक मैं उसे नहीं देख पाया। पता नहीं कहां और किस हाल में है। मुझे उसकी बहुत याद आती है वो जो मेरा पहला प्यार थी। मैंने सुना था कि इंसान अपना पहला प्यार कभी नहीं भूल पाता है, ये बात सच है। ये आज मुझे महसूस होता है।
जब भी मोहब्बत का जिक्र होता है तो मेरी आंखों के सामने उसका फूल सा चेहरा आ जाता है। आज इतने साल गुजरने के बाद भी मैं उसे नहीं भूला हूं। मैं आज भी उससे मिलकर माफी मांगना चाहता हूं। उसके पास बैठना चाहता हूं। उससे गले मिलना चाहता हूं। मुझे उसकी बहुत याद आती है। काश फिर किसी मोड पर वो फिर से मुझे मिल जाए।

उसके कहने का तात्पर्य शायद गोरा रंग और सुंदरता से था। मैंने सिगरेट पीते हुए कहा ऐसी बात नहीं है। सुंदरता का पैमाना सिर्फ गोरा रंग नहीं होता, गांव में भी सुन्दर लड़कियां होती हैं। उसने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा ठीक है देखते हैं। घर आने के बाद मैं सोने चला गया पर आज बिस्तर पर नींद नहीं आ रही थी बार-बार उसका ख्याल आ रहा था।