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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Punjab Kahani: पार्टी रात देर तक चली। पूनम ने अपने दस निकटवर्ती दोस्तों को आने का निमंत्रण दिया था। आ गए बीस। खब रंग जमा। इस घर में यह अपने किस्म की पहली पार्टी थी। बच्चों की खुशी देखने वाली थी। जिन्दगी में पहली बार मुझे एहसास हुआ कि जवानी का भी अपना ही नशा होता है।

कमलकांत ने कंप्यटर के साथ एटैचड स्पीकरों से डैक का काम लिया। विदेशी संगीत था। विदशी नाच था। कुछ भी रस्मी नहीं था। कोई भी ऊंच-नीच की भावना नहीं थी। सभी बहत खश थे। हरसरत को आस्ट्रेलिया का वीजा मिलने पर और पूनम की पहली नौकरी के लिए। नाचने के लिए भी किसी ने जोर नहीं डाला। सभी एक सुर में नाच रहे थे। लगता था, जैसे बीस आदमी मूल रूप से एक ही हों।

जब मुझे बैंड नसीब हुआ, तब बारह से ऊपर का समय हो रहा था। मैं बुरी तरह से थक गई थी। सुदेश की पक्की आदत थी, बिस्तर पर गिरते ही उसे नींद घेर लेती थी। मैं जल्दी सोने की आदी हूं परन्तु आज मुझे नींद नहीं आ रही।

फिर मुझे खीझ आने लगी। इस में गुस्सा शामिल हो गया। मुझे लगा, जैसे मैं कछ भी नहीं हैं। अब मैं कछ भी नहीं हैं। यह कैसी स्थिति है? इसका कारण मां थी? मैं थी? या पूनम? या हरसूरत? इसके बारे में क्या कहूं? मेरे सामने मां आ गई। मन ने खीझ कर कहा, “जा मां जा। अपने घर जा” यह कहना कितना आसान था। इन दिनों मां असहाय, लाचार और बेसहारा थी। मुझे पता था कि जब मां को उसके लाडले ना संभाले, तब बेटी ही उसका अंतिम सहारा होती है। यही सोच कर मैं चुप हो गई।

पूनम के दोस्तों के आने पर, सामने कमरे में बैठी मां चिढ़ने लगती। मेरे लिए इन पलों में मुसीबत खड़ी हो जाती। मुझे संशय लगा रहता कि कहीं वह हरसूरत को कछ कह-सुना न दे। ऐसे में मुझे तीखी नजरों से घूरने लगती। अपने बैंड पर बैठ कर बुदबुदाने लगती, “है, इन्हें कोई लाज-शर्म। कैसी कुर्ती पहन रखी है। लड़की को सिर पर चढ़ा रखा है इसने। तब मालूम होगा इसे, जब लड़की ने कोई गुल खिला दिया। ऐसी लड़कियां भाग जाती हैं ड्राईवरों के साथ।” मैं मां का ध्यान बंटाने के इरादे से उसके कमरे में जाती तो मुंह भींच लेती। मैं उसका आशय समझ जाती। उसकी नजर पूछ रही होती, नौजवान लड़का-लड़की एक साथ क्यों बैठे हैं कमरे में। एक छत तले तो अकेले भाई-बहन को भी नहीं बैठने देना चाहिए। क्या मैं अंधी हूं। वह मुझसे बहुत कुछ पूछना चाहती थी। वह मुझसे खूब सवाल-जवाब करना चाहती थी। फिर पता नहीं, क्या सोच कर खामोश रह जाती।

मां यह बात नहीं समझती कि अब उसका समय नहीं रहा। मेरा समय भी नहीं रहा। पूनम वही बनेगी, जो वह बनना चाहती है। वह किसी भी प्रकार की जबर्दस्ती सहन नहीं करती। मां को यह मानना चाहिए कि उसका समय उसके साथ गया। मेरा समय भी मेरे साथ चला गया। पूनम मेरा हाथ थाम कर, हर जगह नहीं चल सकती। उसे जहां भी जाना है, वह अकेली ही जाएगी। वह जानती है कि उसे अपना कैरियर बनाना है तो इसका फैसला वह स्वयं ही करेगी। मां चाहती है कि पूनम उसके जैसी बने। उसकी शिक्षा-नसीहत को माने। बंदिशों में रहे। लेकिन पूनम की अपनी निजी जिन्दगी है। वह किसी दूसरे-तीसरे की दखलअंदाजी बर्दाशत नहीं कर सकती। मैं मां हूं। डर जाती हूं। कई प्रकार की शंकाएं मुझे घेर लेती हैं। मैं अपना दुख-दर्द किससे साझा करूं। सुदेश से? वह बच्चों को अपना दोस्त समझता है। मुझे कई बार लगता है कि वह खुद भी बच्चों से डरने लगा है। वह उनके सामने अपने आपको बौना महसूस करने लगा है। मैं अधिक जोर दूं तो वह लंबा-चौड़ा भाषण देना शुरू कर देता है। मुझे उसकी अधिकतर बातें समझ में नहीं आती। पिछले महीने ही पूनम के कारण हमारी आपस में लड़ाई हो गई थी। उसने जल्दी-जल्दी में बताया, “तुम समझती क्यों नहीं हो? आज सूचनाओं का इतना बड़ा ढेर हमारे सामने है कि स्थितियां बेहद जटिल हो गई हैं। कई प्रकार के सच है. अर्ध सच। सभी एक साथ ही परोसे जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में नई पीढ़ी के राह की रुकावट नहीं बनना चाहिए। यहां बाजार का दबाव है। सूचनाओं का प्रभाव है। ऐसी स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक है। बच्चों का बड़ा सपना रोजी-रोटी का है। बंधनों में उनका विकास नहीं हो सकता। “यू नो, चेंज इज दा लॉ ऑफ नेचर।” मुझे घर बैठी को इन बातों की क्या समझ। मैंने अपनी चिन्ता सुदेश के कुलीग रमन की मिसेज कमलेश से साझा की। उसने भी यही समझाया, “बच्चों को बहुत रोकना-टोकना नहीं चाहिए। उन्हें समझना चाहिए। वह भी प्यार से, दोस्तों की तरह। सख्ती से वह बागी हो जाएंगे। एक बार वह बागी हो गए तो फिर उन्हें रास्ते पर लाना मुश्किल हो जाता है। मेरे विचार में हमारे बच्चे हम से अधिक समझदार हैं।”

मां की कई बातें ठीक भी थीं। बच्चों को समय पर सोना चाहिए। समय पर उठना चाहिए। घर से अधिक समय तक बाहर नहीं रहना चाहिए। किसी को किसी की इज्जत की परवाह नहीं, खास करके लड़कियों के लिए। इसलिए मैंने बातों-बातों में उसे घूरा, उसका घर से इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं। उसने मुझे ऐसे लैक्चर दिया, जैसा कोई बड़ा, छोटे को समझाता है, “मम्मी, आप अच्छे-भले, समझदार होकर, क्यों इतने बैकवर्ड हो रहे हैं। आपमें से नानी बोलने लगती है। मैंने आपको कितनी बार बताया है कि यह कंप्यूटर और मार्किटिंग का युग है। इसे नर्डस भी कहते हैं। अब मुझे बताना पड़ेगा कि नर्डस क्या होता है। पहले आपको ट्रेंड कर लूं। ठहर कर बताऊंगी।”

पूनम ने कंप्यूटर मेनटैंस में बी.एस.सी. की है। वह भागती रहती है। पता नहीं लगता, किस-किस को फोन करती है। किस-किस से मिलती है। कंप्यूटर पर इंटरनेट की फाइलें पढ़ती-परखती रहती है। छोटी-मोटी जॉब उसके नाक तले नहीं आती। एक दिन उसने बताया कि उसे पन्द्रह हजार की एक ऑफर आई थी। उसने इन्कार कर दिया। उसका ख्याल था कि शुरूआत अच्छी होनी चाहिए। उसे सैट होने की जल्दी है, लेकिन उतनी भी नहीं जितना मैं सोच रही हूं। उसने एक और डिप्लोमा शुरू कर दिया। मैंने पूछा तो उसने बताया, “सिसको सर्टिफिकेट एसोसिएट का डिप्लोमा कर रही हूं। इंडस्ट्री में जाने का मन बनाया है।” मुझे उसकी पढ़ाई के बारे में कुछ पल्ले नहीं पड़ता। मैं बी. ए. सैंकड इयर पास, उसके आगे अनपढ़ हूं। मैं बिटर-बिटर उसकी ओर ताकने लगी। वह अपनी पढ़ाई के बारे में अपने डैडी के साथ ही सलाह-मशविरा करती है। मुझे तो जैसे अनपढ़-गंवार समझ रखा है। उसके डैडी उसे कभी रोकते-टोकते नहीं। नित नए फैशन और उसके खर्चों के बारे में उन्हें ही पता है। वह टॉप, ऐडीदास की जीन्स और रॉबौक के बूटों के नीचे बात ही नहीं करती। मैं नाक-मुंह सिकोडूं तो वह विश्वास से कह देती है, “सोसाइटी में स्टेटस रखना पड़ता है।”

मां को क्या बताऊं? पहले लड़कियों को पढ़ाया जाता था ताकि उन्हें अच्छा घर-वर मिल सके। अब उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया जाता है। पूनम की दुनिया मेरे लिए अनोखी है। वह और उसकी मित्र-मंडली कंप्यूटर के आगे बैठ जाती हैं। वे इंटरनेट पर अलग-अलग फाइलें खोलते, बहस करते, अलग-अलग वेबसाईटें देखते। महीना भर पहले हरसूरत बता रहा था, ‘मेलबोर्न में आर. एम. आई. यूनिवर्सिटी में एम. आई. टी. की डिग्री के लिए एडवैर्टामैंट निकला है। मैं एप्लाई कर रहा हूं। पूनम तू भी एप्लाई कर दे।”

“उनकी कंडीशन क्या है?” पूनम ने पहले जसप्रीत से पूछा था।

“बी.एस.सी. कंप्यूटर। यह डिप्लोमा करने से आस्ट्रेलिया में सैट भी हुआ जा सकता है और यहां भी नेटवर्क पर आसानी से जॉब मिल सकती है।”

“खर्चा?”

“ग्यारह लाख एडमिशन फीस है। साथ ही वह चार घंटे का वर्क परमिट इशू करेंगे। आप अपने खर्च योग्य कमा सकते हो।”

“ओ.के.। आई मस्ट ज्वाइन इट।” जसप्रीत ने एकदम से हां कह दिया। पूनम चुप हो गई। वह कुछ देर के लिए अपसेट हो गई। यह उसकी आदत है। घर की स्थिति को देख-जान कर कुछ ही पलों में वह पहले जैसी हो गई। उसे अपनी सीमा का पता है। यही उसकी खास विशेषता है। पूनम ने मुझे कॉफी पीने के लिए आवाज दी। पता नहीं किस बात पर सभी तालियां बजा कर खूब हंस रहे थे? सभी खुशी के मूड में थे। मैं आधे मन से उनकी खुशी में शामिल हुई। आधा मन चिन्ताओं से भरा हुआ था। अक्सर मेरी यही अवस्था रहती है। इससे बाहर निकलने की कोशिश करूं तो मेरी मां जबर्दस्ती मुझमें घुस जाती है। मुझे कई डर घेर लेते हैं। मेरी परेशानी बढ़ जाती है। अंदर ही अंदर शब्द उभरने लगते हैं, “मांओं को बच्चों की फिक्र ही मार जाते हैं। मैंने कभी अपनी जरूरतों के बारे में नहीं सोचा। अपनी जिन्दगी नहीं जी।” मैं रसोई में चली गई। तभी मां के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई। उसने कटोरी या गिलास जानबूझ कर फेंका होगा। इस समय वह बहुत रोष में थी। उसका अपना घर होता तो वह हुक्म सुना देती, “क्या खिच-खिच लगा रखी है। दफा हो जाओ। खबरदार, जो हमारे घर में फिर कभी आए तो। यह घर है। कोई रेलवे स्टेशन नहीं।” यहां उसकी कोई पेश नहीं चलतीं। परन्तु वह अपनी आदत से मजबूर थी। बातों-बातों में वह पनम से कई बार कह भी चकी थी परन्त पनम एक कान से सन दसरे से निकाल देती थी। वह कहती थी, उसके पास आउट-डेटेड बातें सुनने का समय नहीं है। ना ही वह अपना ध्यान इस ओर लगाना चाहती है। उसके पास करने के लिए बहुत कुछ है। वह हर बात के लिए क्लीयर है। उसके पास बीच-बचाव का रास्ता नहीं है। घर में उसका सुर कमलकांत से मिलता है। उससे उसके सब्जैक्ट के बारे में पूछती है। वह उसका चुनाव जानती है। वह उसे समझाती है, आजकल मार्किट में किन विषयों की अधिक मांग है। बी.ए., बी.एससी. और बी.कॉम का अब कोई फायदा नहीं रहा। इनसे फास्ट रिजल्ट नहीं मिल सकते। फास्ट-फूड, फास्ट-एजुकेशन, फास्ट रिजल्ट। कमलकांत भी ‘दीदी-दीदी’ करता रहता है।

मां के लिए अब इस घर में कोई स्थान नहीं है। यदि उसे इस घर में रहना है तो वह चुपचाप अपनी सेवा करवाती रहे। उसकी टोका-टाकी यहां नहीं चलेगी। उसे हरसूरत को सति सिरी अकाल कह कर खिले मन से स्वीकार करना ही होगा। फिर वह कौन-सा किसी छोटे-मोटे परिवार का है। उनका अपना वैल सैटल्ड परिवार है। उसमें बैठने-उठने, बोलने और खाने-पीने का एक सलीका है। आते-जाते मेरे चरण स्पर्श करता है। मां की इज्जत करता है। बाकी लड़के-लड़कियां भी ऐसा ही करते हैं। हमें और क्या चाहिए। बच्चों का अपना सर्कल है। उन्हें उनमें ही घूमना होता है। यह समय संपर्कों का है। अकेला आदमी क्या होता है। एक बात और है जो मैंने किसी से साझा नहीं की। कर ही नहीं सकती। मुझे खुद हरसूरत अच्छा लगता है। मैं चाहती हूं कि इनकी जोड़ी बन जाए। परन्तु मां को पता नहीं हरसूरत में क्या खराबी लगती है कि उसके घर आते ही, इसके माथे पर त्यौरियां पड़ जाती है। आगे-पीछे वह फिर भी ठीक रहती है। किसी बात के लिए परेशान नहीं करती। जो दिया, खा लिया। जहां बैठा दिया, बैठ गई। किसी से कोई शिकायत नहीं। कोई गिला-शिकवा नहीं। पूछने पर ही किसी बात का जवाब देती है। अधिकतर पाठ करती रहती है या टी.वी. पर धार्मिक प्रोग्राम देखती रहती है।

मुझे लगता है कि मैंने इसे यहां लाकर भारी गलती की है। उसने मेरी शांति भंग कर दी है। मैं खुद ही उसके पास दो महीने रह आती। जब भी पूनम और हरसूरत अकेले बैठे हों, मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होती है। मेरे मन में आता है कि उनसे कहूं, बच्चों भाग जाओ! इस संसार के बंधन तोड़ दो। मैं तुम्हारे साथ हूं। कुछ नहीं होगा। तुम मेरी मौत ना मरना। जब कभी मझे उन दिनों की याद आती है तो मझे यह जीना बेकार लगता है। कितने अच्छे थे वो दिन। बी. ए. पार्ट फर्स्ट में पढ़ती थी। कोठी वालों के पुरुषोत्तम के साथ नोट्स लेने-देने का दौर शुरू हुआ। वह पढ़ने और बातें सुनाने में बहत तेज था। मैं उसके बनाए नोटस ले लेती। उसकी मां का हमारे घर में आना-जाना था। हमारा उनके यहां। हम एक साथ ही डी.ए.वी. कॉलेज में दाखिल हुए थे। मेरी मां उसे शरीफ लडका कहती थी। वह भी हमारे घर पर आता था। मां के चरण स्पर्श करता। चोर निगाह से मेरी ओर भी देख लेता था। हम पीरियड़ ‘मिस’ करके धर्मेन्द्र की ‘आजाद’ फिल्म देखने गए थे। हम चोरी-छिपे मिलने लगे। एक दिन मां बाजार गई थी। आम दिनों की तरह पुरुषोत्तम घर आया। मैं चाय के दो कप बना कर अगली बैठक में ले आई। उसके सामने आ बैठी। उसने बिना किसी छिपाव के सुझाव रखा, “मीत चल कहीं भाग चलें।”

मुझे हैरानी हुई कि वह यहां तक सोच चुका है। मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं था। यदि था भी तो मुझे उसका एहसास नहीं था।

“एक बार फिर कहना…क्या कहा है?”

“यह छोटा शहर है, अपने सपनों का शहर नहीं है। यहां मेरा दम घुटता है। हिम्मत कर ले। भाग चलते हैं।”

“पल्ले एक पैसा नहीं। कहता है, भाग चलें।”

“अपने लिए हम कमा ही लेंगे।” उसकी नजर में सपने थे। आसाधारण सपने। मैंने उन्हें पढ़ लिया था। मेरा रोम-रोम खिल उठा। वह उठ कर मेरे पास आ बैठा। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया था।

हम चुपचाप बैठे थे। वहां सिर्फ दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थी। समय जैसे ठहर गया था। कुदरत के बनाए दो अनमोल जीव। एक जान होने के लिए उतावले थे। उसके हाथों में तेजी आने लगी। मेरा खुद पर वश नहीं रहा था। कोई शै थी, जो मुझे उडाए लिए जा रही थी। मैं उत्तेजित हो गई। उसने किस करने के लिए अपना मुंह आगे किया या मैं ही उसकी ओर सरक गई थी। उतने में मां आ गई। मुझे तो इस बात का अंदाजा ही नहीं रहा था कि बाहर का दरवाजा खुला था।

मां को अधिक दौरे पड़ने लगे। वह अर्धपागल हो गई। बैठी-बैठी हंसने लगती। कभी रोना शुरू कर देती। मुझे इस बात की संतुष्टि थी कि उसने यह बात परिवार के किसी सदस्य से नहीं कही थी। उस दिन, जब उसने पुरुषोत्तम के साथ मुझे देखा था, वह पिछले कमरे में औंधे मुंह पड़ी रही थी। मैं डरते-सहमते दो-तीन बार गई। ‘मां, मां’ कह कर बार-बार पुकारा भी परन्तु उसने मेरी किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया। वह पापाजी के आने पर भी नहीं उठी थी। बस इतना ही कहा था. “मैं बहत ज्यादा परेशान हूं। अच्छा रहेगा कि मुझे ना बुलाएं। मुझे अकेली छोड़ दें।” रात को जब मैं उसे खाना देने गई, उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। ना ही मेरी किसी बात पर हुंकार भरी। ना ही खाना खाया। मेरे मिन्नत, विनती, माफी मांगने पर भी उस पर कोई असर नहीं हुआ था। दूसरा दिन भी यूं ही बीत गया। तीसरे दिन केसर ने उसे जबर्दस्ती चाय पिलाई थी। आधा कप चाय पीने के बाद वह दहाड़े मार कर रोने लगी। मुझसे उसकी चीखें बर्दाशत नहीं हुई थी। पांच मिनट के बाद वह खिलखिलाकर हंस दी। केसर पापाजी को बुला लाया। मैंने उसे बांहों में भर लिया। उसकी हालत पागलों-सी हो गई थी। कभी वह हंसने लगती। मैं भी बहुत रोई। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मां को कैसे मनाऊं। उसके मन पर गहरी चोट लगी थी। फिर वह जोर-जोर से बोलने लगी। उसने कई नाम लिए। उन्हें गंदी गालियां दी। बहुत ही गंदी गालियां। बेशर्मी की हद तक। मैंने उसके मुंह के आगे हाथ रख दिया। कहा था, “मां, जैसा तू कहेगी, मैं वैसा ही करूंगी। जिसकी मर्जी सौगंध ले ले। केसर की सौगंध खाती हूं मैं।”

“कुतिया! बदमाश! दूर हो जा मेरी नजरों से। मैंने सारी उम्र से कभी ओए नहीं कहलवाया। तुझ पर नई जवानी आई है।” उसने अपने मुंह पर तकिया रख लिया। पापाजी ने आते ही बहुत गुस्से से पूछा, “आखिर बात क्या है?” मैं उन्हें क्या बताती कि उसकी यह हालत मेरे कारण हुई है। मैंने ही उसका विश्वास तोड़ा था। मैंने ऐसी ही कोई सोच कर रखी कहानी थी, उन्हें सुना दी। मां को कमल मैंटल अस्पताल में दाखिल करवा दिया। डॉक्टर का कहना था कि उसे कोई गहरा सदमा पहुंचा था। उसे विशेष देखभाल की आवश्यकता थी। जिस आदमी के कारण उसकी ऐसी हालत हुई थी, वह उसके सामने न आए। मैंने पापाजी से कह कर मासी जी को बुलवा लिया था। मैंने एक दिन भी कॉलेज से छुट्टी नहीं की थी। घर संभाला और पढ़ाई का नुकसान भी नहीं होने दिया था। पुरुषोत्तम ने आने-बहाने कई बार मिलने की कोशिश की, परन्तु मैंने उसकी ओर देखा तक नहीं था। उसने मुझे लंबा-सा खत लिखा। मैं खत पढ़ते हुए जार-जार रोई। मुझे पता नहीं लग रहा था कि इस समय मेरी भूमिका क्या है। मेरी स्थिति अजीब-सी थी। मैं ना दुख में थी ना सुख में थी। कभी पुरुषोत्तम का चेहरा दिखाई देता, कभी मां का डरावना चेहरा। मुझ पर गुनाह की भावना भारी होने लगी। मैं अस्पताल तब ही जाती थी, जब मां को नींद का इंजेक्शन लगा होता।

एक दिन गली में पडोस की बातें चलने पर. मैंने उससे पछा. “मां. वह कोठी वाला पुरुषोत्तम होता था।”

“मीतो, उनका कारोबार बहुत बढ़िया है। पुरुषोत्तम के दो लड़के हैं। दोनों इंग्लैंड चले गए। पुरुषोत्तम कॉलेज में पढ़ाता है। उसकी घरवाली बैंक में नौकरी करती है।”

शायद मां को भी वह घटना याद आ गई हो। सारा दिन मैं उखड़ी-उखड़ी रही। सिर में गुबार-सा चढ़ता-उतरता रहा था। मैं फिर से उसके कमरे में नहीं गई थी।

पूनम की मां से बहुत बनती नहीं थी। मां उसे बांह से पकड़ कर बिठा लेती। अपने पास से उठने ही न देती। मां उसे बहुत ज्यादा प्यार करती है। बचपन से ही। ननिहाल-ददियाल में वह पहली औलाद थी। दोनों घर में उसे पुत्रों की तरह समझते थे। मैं मां से मिलने जाती तो मां रात को पूनम को अपने साथ सुला लेती। वापसी पर उसकी आंखें भर आतीं। वह भरे मन से कहती, “बेटे को यहीं छोड़ जाओ। “फिर उसके खत आते। संदेशें आते। मिडल पास करने तक पूनम भी मां को बहुत प्यार करती रही। छुट्टियां होती तो वह मां के पास छोड़ कर आने की जिद करती या खत लिख कर मां को यहीं बुला लेती। मां उस पर नानी वाला हक जतलाती। यह सिलसिला प्लस टू तक निर्विघ्न चलता रहा। दोनों की जान एक-दूसरे में बसती थी। कॉलेज ज्वाइन करते ही पूनम के स्वभाव में कई परिवर्तन आ गए। मां का अस्तित्व पीछे छूटने लगा। उसके सर्कल के लड़के-लड़कियां निकट आने लगे। अब उसे मां की बहुत-सी आदतें पसंद नहीं थीं। वह कहती, मां को घुमा-फिरा कर बातें करने की आदत है। वह किसी भी शै या आदमी के बारे में स्पष्ट राय नहीं रखती। बचपन वाला प्यार याद आता तो मां के पास बैठ कर नई बातें छेड़ लेती। मां उससे कहती, “चुप रह लड़की! मुझे सब मालूम है।”

“आपको क्या मालूम है? ना आपको मालूम है और ना आपकी बेटी को।”

“तू ही एक सयानी पैदा हुई है।”

“देखो, आप हैं, 1947 से पहले के यानी बेबी बूमर क्लास। मम्मी साठ के बाद की है। यह हुई जनरेशन एक्स। मैं इक्कासी की हूं। जनरेशन वाई।”

मां को उसकी इन बातों की समझ न आती। वह कहती, “तुम क्या ऊंट-पटांग बोलती रहती हो। सीधी बात कर।”

पूनम को इस बात का पता लग गया कि सीधी बात मां के पल्ले नहीं पड़ती थी। उसे समझाने के लिए भूमिका बांधनी पड़ती थी।

एक दिन पूनम मां को उठा कर लॉबी में ले आई। उसने नेशनल ज्योग्राफिकल चैनल लगा दिया। गोरे ने शेर का बच्चा पाल रखा था। वह बच्चे को दूध पिलाता। बच्चा गोरे से बहुत स्नेह करने लगा। उसकी आदतें शेर वाली नहीं रही थी। गोरा चाहता था कि बच्चा अपने असली रूप में आ जाए। वह उसे जंगल में ले गया। उसे खुला छोड़ दिया। अब उसे अपनी खुराक का बंदोबस्त खुद करना था। वह पालतू शेर था। इसलिए उसे पता नहीं लग रहा था कि शिकार पर वार कैसे करना है। जब उसे पता लगा तो शिकार पर झपटते ही उसका पंजा टूट गया। गोरे ने उसे उठाया। पशुओं के डॉक्टर के पास ले गया। उन्होंने शेर की अर्धबेहोशी में टीका लगाया और पंजे की सर्जरी कर दी।

मां ने दांतों तले जीभ ले ली। “कमाल है गोरे के। कुर्बान जाऊं इस कौम के। मैंने खुद लाहौर में अंग्रेज देखे थे।”

पूनम ने ‘एफ’ चैनल लगा दिया। मां चीखने लगी, “तुम क्या दिखाने लाई हो?” उसने आंखों के आगे दुपट्टा फैला लिया, “बंद करो यह कंजरखाना! दुनिया गर्क होने लगी है।”

“इसमें क्या बुरा है। दुनिया भर का फैशन घर बैठे देख लो।”

“मुझसे यह लुच्चापन नहीं देखा जाता।”

मां खीझते-कलपते हुए अपने कमरे में आ गई। उसने मुझे जोर से पुकारा। मैं रसोई में व्यस्त थी। थोड़ी देर बाद उसके पास गई तो उसने कहा, “मैं भूल ही गई कि मैंने आवाज क्यों दी थी।” वह भूली नहीं थी। उसे कुछ भूलता नहीं था। बस कभी-कभी सब्र कर जाती थी। कभी बेचैन होने लगती थी। मुझे मां पर तरस आ गया। मैंने उसे जबर्दस्ती उठाया और ‘संस्कार’ चैनल लगा दिया। वह माई प्रीति का प्रवचन सुनने लगी।

मैंने कभी पूनम से कोई काम करने के लिए नहीं कहा। उसके पास फालतू समय होता तो वह स्वयं ही मेरा हाथ बंटाने लगती। वह छोटे-मोटे काम कर लेती परन्तु रसोई में खड़े होकर काम करना मौत समान प्रतीत होता, “इट इज बोरिंग जॉब। कितना वक्त बर्बाद हो जाता। मैं तो फास्ट फूड ही खाऊंगी।” मैंने उसे बताया कि “औरत की सांस आधी रसोई में बसती है और आधी अपनी संतान में।”

मुझे तो ब्यूटी पार्लर भी पूनम ही लेकर गई थी, “आपने खुद को अभी से बूढ़ा मान लिया है। आपकी उम्र ही कितनी है। आपको अपनी फेस ब्यूटी की ओर ध्यान देना चाहिए। शीशे के सामने खड़े होकर देखिए, आपकी पलकों पर कितने ब्लैक स्पॉट नजर आ रहे हैं।” अब अगर मैं महीने भर में न जाऊं तो वह मुझे इस बारे में याद करवा देती है या मुझे खुद साथ लेकर जाती।

मैं कोशिश करती कि मेरे अंदर बैठी मां सदा के लिए सो जाए। मुझसे मेरी बेटी का अक्स उभर कर सामने आए। मैं जितना आगे बढ़ती, वह उतना ही मेरी टांग खींच कर पीछे ले जाती। ऐसा सब कुछ मां के यहां आने के बाद होने लगा। वह हर समय मुझे समझाती रहती और रोकती-टोकती रहती। मेरी आदतों पर पूनम को बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता। वह मुझे मां की ही कार्बन कॉपी बताती। एक दिन वह मुझसे बातें करते हुए बोली, “मुझे छोटे मामा जी से पता लगा है कि पापा जी ने मां को काफी छूट दे रखी थी। उन्होंने मां की कभी किसी गलत राय का भी विरोध नहीं किया था। जो मां कर दे, पापाजी उसे स्वीकार कर लेते थे। इसी बात ने मां को बिगाड़ दिया था। मां चाहने लगी कि सब कुछ उसकी मर्जी मुताबिक हो। वह रुठ कर, झगड़ कर अपनी बात मनवा लेती थी। उसने अपने अलावा कभी किसी की परवाह नहीं की थी। यहां तो सिस्टम ही खराब था। वह यह बात बिलकुल भूल चुकी थी कि उससे कोई छोटा भी सयानी बात कर सकता है। मैं उनके सारे डेटा कंप्यूटर में फीड कर रही हूं। इसका सार भी आपको पढ़वाऊंगी। कंप्यूटर की राय भी लूंगी।” वह कहां तक सोचता है।

पूनम की कोशिश है कि उन्हें मॉडर्न बनाना है। वह कहती है, “आज के समय में वही कामयाब है जिसके पास शार्प ब्रेन होगा। जब परिवार में दोनों पति-पत्नी कमाते हों, तब किसी की किसी पर इक्नोमिकली डिपैंडिट कम हो जाती है। आपकी जिन्दगी की भी यही गलती है। कभी अकेले बैठ कर सोचना।”

पूनम की बात सच थी। विवाह के पहले पन्द्रह साल बहुत मुश्किल से गुजरे थे। सुदेश की तनख्वाह से घर का खर्च पूरा नहीं पड़ता था। फिर घर-परिवार के खर्च। सुदेश के सीनियर सहायक और अच्छी सीट मिलने के बाद ही घर की हालत में सुधार हुआ था। मैंने उसे पल-पल मरते देखा था। मैं खुद भी पल-पल मरती रही थी। उसकी चार बहनें थी। नित्य दिन कोई न कोई काम-धंधा निकल आता था। जब भी दो पैसे जुड़ते, उस ओर निकल जाते थे। सुदेश कहता, “हमने तो मुश्किल समय काट लिया। बस बच्चे सैट हो जाएं, तो यही हमारी प्राप्ति होगी।” यह भी अच्छा रहा कि हम उस छोटे शहर को छोड़ कर बड़े शहर में आ गए। वहां का मकान बेच कर, यहां अपने ढंग की कोठी बना ली। सुदेश कहता, “अगर मैं नूर महल छोड़ कर यहां न आता तो कुएं का मेंढक ही बना रहता। बड़े शहर की बडी बातें होती हैं। यहां बच्चों का भविष्य सरक्षित है।” शाम को पनम का फोन आया था, “मम्मी, मेरे 97.5 प्रतिशत नंबर आएं।”

“तेरा रिजल्ट आज ही आ गया?”

“हां, पांच मिनट पहले ही कंप्यूटर पर आ गया। मोनीटर पर कोवश्न आते रहे, मैं साथ-साथ जवाब देती गई। इधर आखिरी कोवश्च्न का जवाब दिया, उधर से तुरन्त रिजल्ट भी आ गया।”

“आज बड़ा खुशी भरा दिन चढ़ा है। तेरा मोबाईल बंद था, तुझे एक खुशी की बात बताऊं, तेरे लिए भी यह सरप्राइज होगा। हरसूरत का फोन आया था। मां ने सुना था, उसे आस्ट्रेलिया का वीजा मिल गया है।” मुझे पूनम से ज्यादा हरसूरत के बारे में खुशी हुई थी।

एक पल के लिए पूनम ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर वह जल्दी से बोली, “यह भी अच्छी खबर है। हमें उसे पार्टी देनी है। आज ही शाम को। फिर मैं बिजी हो जाऊंगी। आप ऐसा करो, बस से यहां आ जाएं। हम बाईस की मार्किट से सामान खरीद लेंगे। ठीक है ना। घर आकर ही हरसूरत को फोन करूंगी।”

हम सामान खरीद कर वापस आए तो लॉबी में हरसूरत मां के पास बैठा था। यह हम दोनों के लिए अचरज की बात थी। मां उसे अथाह नफरत करती थी। वह तो उसका मुंह भी नहीं देखती थी। यह आज क्या हो गया था। मां मुझे बार-बार कहती थी, “मुझे इस लड़के का चाल-चलन ठीक नहीं लगता। एकदम बेकार लगता है। इसके कपड़ों की ओर देख कर मुझे खीझ आती है। इससे कह दे, हमारे घर ना आया करे। अगर तुझे यह कहने में शर्म आती है तो मैं कह देती हूं।” मैंने उनसे कहा, इस बारे में पहले पूनम से बात कर ले। मां पूनम से बचती थी। शायद डरती भी थी। पूनम का क्या पता, आगे से क्या कह दे। एक की चार सुना दे।

मां कह रही थी, “बेटा, मेहनत से आदमी क्या नहीं कर सकता। तुम बाहर जा रहे हो। जाकर पूनम को भी बुला लेना। मेरे लिए बढिया-सा सूट भेजना। देखो, भूल ना जाना, वायदा कर।”

मैं बाहर के दरवाजे के पास खड़ी मां का ड्रामा देख रही थी। पूनम से रहा नहीं गया। उसने धीरे से मेरे कान में कहा, “मम्मी, मैं मानूं या ना मानूं, आप माने या माने, मां जी ने हरसूरत को मेरे लिए पसंद कर लिया है। देखा आपने मां जी, क्या कह रही है। अब आप ही मां जी को बताएं, अभी वह मेरा रियल लाइफ हीरो नहीं है। उसके जैसे मेरे पांच और मित्र हैं।”

मां ने पूनम को बधाई दी। उसे गले से लगाया, प्यार किया। पूनम ने मां की ओर ध्यान नहीं दिया। ना ही उसकी किसी बात का जवाब दिया। वह जाकर हरसरत के पास बैठ गई। मझे प्रसन्नता ने घेर लिया। क्या मालम. पूनम यूं ही ऊपर-ऊपर से कह रही हो। खुशी के अपने इन पलों को साझा करने के लिए मैं सुदेश को उसके दफ्तर में फोन करने के लिए ड्राईंगरूम में गई तो पनम कह रही थी. “हरसरत. तम्हें एक बात बताऊं. यह भी खशी की बात है। इस बारे में अभी मैंने किसी को बताया नहीं। ईवन मम्मी को भी नहीं। मुझे एस्कॉर्टस से ऑफर आई है। बीस हजार तनख्वाह है। एकोमडेशन फ्री है। अगले हफ्ते मैं फरीदाबाद ज्वाइन करने जा रही हूं। तुम अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान देना। अगर पॉकेट एलॉ करें तो कभी फोन कर लेना।”

मेरे सिर को चक्कर आने लगे। अब यह बात मैं मां को कैसे समझाऊंगी कि!

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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