sharaab kee dukaan by munshi premchand
sharaab kee dukaan by munshi premchand

कांग्रेस-कमेटी में यह सवाल पेश था – शराब और ताड़ी की दुकानों पर कौन धरना देते जाये? कमेटी के पच्चीस मैंबर सिर झुकाए बैठे थे पर किसी के मुंह से बात न निकलती थी। मामला बड़ा नाजुक था। पुलिस के हाथों गिरफ्तार हो जाना तो ज्यादा मुश्किल बात न थी। पुलिस के कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं। चूंकि अच्छे और बुरे सभी जगह होते हैं, लेकिन पुलिस के अफसर, कुछ लोगों को छोड़कर सभ्यता से इतने खाली नहीं होते कि जाति और देश पर जान देने वालों के साथ दुर्व्यवहार करें लेकिन नशेबाजों में यह जिम्मेदारी कहां? उनमें तो अधिकांश ऐसे लोग होते है, जिन्हें घुड़की-धमकी के सिवा और किसी शक्ति के सामने झुकने की आदत नहीं। मारपीट से नशा हिरन हो सकता है पर शांतवादियों के लिए तो वह दरवाजा बंद है। तब कौन इस ओखली में सिर दे, कौन पियक्कड़ों की गालियां खाए? बहुत सम्भव है कि वे हाथापाई कर बैठें। उनके हाथों पिटना किसे मंजूर हो सकता था? फिर पुलिसवाले भी तमाशा न देखेंगे। उन्हें और भी भड़काते रहेंगे। पुलिस की शह पाकर ये नशे के बंदे जो कुछ न कर डालें, वह थोड़ा! ईंट का जवाब पत्थर से नहीं दे सकते और इस समुदाय पर विनती का कोई असर नहीं।

एक मैंबर ने कहा – ‘मेरे विचार में तो इन जातों में पंचायतों को फिर संभालना चाहिए। इधर हमारी लापरवाही से उनकी पंचायतें निर्जीव हो गई हैं। इसके सिवा मुझे तो और कोई उपाय नहीं सूझता।’

सभापति ने कहा – ‘हां, एक उपाय है। मैं इसे नोट किए लेता हूं पर धरना देना जरूरी है।’

दूसरे महाशय बोले – ‘उनके घरों पर जाकर समझाया जाय, तो अच्छा असर होगा। सभापति ने अपनी चिकनी खोपड़ी सहलाते हुए कहा – ‘यह भी अच्छा उपाय है अगर धरने को हम लोग त्याग नहीं सकते।’

फिर सन्नाटा हो गया।

पिछली कतार में एक देवी भी मौन बैठी हुई थी। जब कोई मैंबर बोलता, वह एक नजर उसकी तरफ डालकर फिर सिर झुका लेती थी। यही कांग्रेस की लेडी नेस्टर थी। उनके पति महाशय जी. पी. सक्सेना कांग्रेस के अच्छे काम करने वालों में थे। उनका देहान्त हुए तीन साल हो गए थे। मिसेज सोना ने इधर एक साल से कांग्रेस के कामों में भाग लेना शुरू कर दिया था और कांग्रेस कमेटी ने उन्हें अपना मैंबर चुन लिया था। वह शरीफ घरानों में जाकर स्वदेशी और खद्दर का प्रचार करती थी। जब कभी कांग्रेस के प्लेटफार्म पर बोलने खड़ी होती तो उनका जोश देखकर ऐसा मालूम होता था, आकाश में उड़ जाना चाहती है। कुंदन का-सा रंग लाल हो जाता था, बड़ी-बड़ी करुण आंखें, जिनमें जल धरा हुआ मालूम होता था, चमकने लगती थी। बड़ी खुशमिज़ाज और इसके साथ बला की निर्भीक स्त्री थी। दबी हुई चिनगारी थी, जो हवा पाकर दहक उठती है। उसके मामूली शब्दों में इतना आकर्षण कहां से आ जाता था, कह नहीं सकते। कमेटी के कई जवाब नेस्टर, जो पहले कांग्रेस में बहुत कम आते थे, अब बिना नागा आने लगे थे। मिसेज सक्सेना कोई भी प्रस्ताव करें, उनका अनुमोदन करने वालों की कमी न थी। उनकी सादगी, उनका उत्साह, उनकी विनय, उनकी मृदु-वाणी कांग्रेस पर उनका सिक्का जमाए देती थी। हर आदमी उनकी खातिर-सम्मान की सीमा तक करता था पर उनकी स्वाभाविक नम्रता उन्हें अपने दैवी साधनों से पूरा-पूरा फायदा न उठाने- देती थी। जब कमरे में आती, लोग खड़े हो जाते थे पर वह पिछली सफ से आगे न बढ़ती थीं।

मिसेज सक्सेना ने प्रधान से पूछा – ‘शराब की दुकानों पर औरतें धरना दे सकती हैं?’ सबकी आंखें उनकी ओर उठ गई। इस प्रश्न का आशय सब समझ गए।

प्रधान ने कातर स्वर में कहा – ‘महात्माजी ने तो यह काम औरतों ही को सुपुर्द करने पर जोर दिया है पर…

मिसेज सक्सेना ने उन्हें अपना वाक्य पूरा न करने दिया। बोली – ‘तो मुझे इस काम पर भेज दीजिए।’

लोगों ने कुतूहल की आंखों से मिसेज सक्सेना को देखा। यह सुकुमारी जिसके कोमल अंगों में शायद हवा भी चुभती हो, गंदी गलियों में, ताड़ी और शराब की दुर्गन्ध-भरी दुकानों के सामने जाने और नशे से पागल आदमियों की कलुषित आंखों और बातों का सामना करने को कैसे तैयार हो गयी।

एक महाशय ने अपने समीप के आदमी के कान में कहा – ‘बला की निडर औरत है।’ उन महाशय ने जले हुए शब्दों में कहा – ‘हम लोगों को कांटों में घसीटना चाहती है और कुछ नहीं।’ वह बेचारी क्या पिकेटिंग करेंगी। दुकान के सामने खड़ी तक तो हुआ न जायेगा।

प्रधान ने सिर झुकाकर कहा – ‘मैं आपके साहस और उत्सर्ग की प्रशंसा करता हूं लेकिन मेरे विचार में अभी इस शहर की दशा ऐसी नहीं है कि देवियां पिकेटिंग कर सकें। आपको खबर नहीं, नशेबाज लोग कितने मुंहफट होते है। विनय तो वे जानते ही नहीं।’

मिसेज सक्सेना ने व्यंग्य-भाव से कहा – ‘तो क्या आपका विचार है कि कोई ऐसा जमाना भी आयेगा, जब शराबी लोग विनय और शील के पुतले बन जायेंगे? यह दशा तो हमेशा ही रहेगी। आखिर महात्माजी ने कुछ समझकर ही तो औरतों को यह काम सौंपा है। मैं नहीं कह सकती कि मुझे कहां तक सफलता होगी, पर इस कर्त्तव्य को टालने से काम न चलेगा।’ प्रधान ने पशोपेश में पड़कर कहा – ‘मैं तो आपको इस काम के लिए घसीटना उचित नहीं समझता, आगे आपको अख्तियार है।’

मिसेज सक्सेना ने जैसे विजय का आलिंगन करते हुए कहा – ‘मैं आपके पास फरियाद लेकर न आऊंगी कि मुझे फलां आदमी ने मारा या गाली दी। इतना जानती हूं कि अगर मैं सफल हो गई, तो ऐसी स्त्रियों की कमी न रहेगी, जो इस काम को सोलहों आने अपने हाथ में न ले लें।’

इस पर एक नौजवान मेम्बर ने कहा – ‘मैं सभापति जी से निवेदन करूंगा कि मिसेज सक्सेना को यह काम देकर आप हिंसा का सामना कर रहे हैं। इससे यह कहीं अच्छा है कि आप मुझे यह काम सौंपे।’

मिसेज सक्सेना ने गर्म होकर कहा – ‘आपके हाथों हिंसा होने का डर और भी ज्यादा है।’

इस नौजवान मैंबर का नाम था जयराम। एक बार एक कड़ा व्याख्यान देने के लिए जेल हो आए थे, पर उस वक्त उनके सिर गृहस्थी का भार न था। कानून पढ़ते थे। अब उनका विवाह हो गया था, दो-तीन बच्चे भी हो गए थे, दशा बदल गई थी। दिल में वहीं जोश, वहीं तड़प, वही दर्द था, पर अपनी हालत से मजबूर थे।

मिसेज सक्सेना की ओर नम्र आग्रह से देखकर बोले – ‘आप मेरी खातिर से इस गंदे काम में हाथ न डालें। मुझे एक सप्ताह का अवसर दीजिए। और इस बीच में कहीं दंगा हो जाय, तो आपको मुझे निकाल देने का अधिकार होगा।’

मिसेज सक्सेना जयराम को खूब जानती थी। उन्हें मालूम था कि यह त्याग और साहस का पुतला है और अब तक परिस्थितियों के कारण पीछे दुबका हुआ था। इसके साथ ही वह यह भी जानती थी कि उसमें वह धैर्य और बर्दाश्त नहीं है, जो पिकेटिंग के लिए लाजिमी है। जेल में उसने दरोगा को अपशब्द कहने पर चांटा लगाया था और उसकी सजा तीन महीने और बढ़ गई थी। बोली – ‘आपके सिर गृहस्थी का भार है। मैं घमंड नहीं करती, पर जितने धैर्य से मैं यह काम कर सकती हूं आप नहीं कर सकते।’

जयराम ने उसी आग्रह के साथ कहा – ‘आप मेरे पिछले रिकार्ड पर फैसला कर रही है। आप भूल जाती हैं कि आदमी की अवस्था के साथ उसकी उद्दंडता घटती जाती है।’

प्रधान ने कहा – ‘मैं चाहता हूं महाशय जयराम इस काम को अपने हाथों में लें। जयराम ने प्रसन्न होकर कहा – ‘मैं सच्चे हृदय से आपको धन्यवाद देता हूं।’

मिसेज सक्सेना ने निराश होकर कहा – ‘महाशय जयराम, आपने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है और मैं इसे कभी क्षमा नहीं करूंगी। आप लोगों ने इस बात का आज नया परिचय दे दिया कि पुरुषों के अधीन स्त्रियां अपने देश की सेवा भी नहीं कर सकती।’

दूसरे दिन, तीसरे पहर जयराम पांच स्वयंसेवकों को लेकर बेगमगंज शराब की दुकान के शराबखाने में पिकेटिंग करने जा पहुंचे। ताड़ी और शराब – दोनों की दुकानें मिली हुई थी। ठेकेदार भी एक ही था। दुकान के सामने, सड़क की पटरी पर, अंदर के आंगन में नशेबाजों की टोलियां विष में अमृत का आनन्द लूट रही थी। कोई वहां अफलातून से कम न था। कहीं वीरता की डींग थी, कहीं अपने दान-दक्षिणा के पचड़े, कहीं अपने बुद्धि-कौशल का आलाप। अहंकार नशे का मुख्य रूप है।

एक बूढ़ा शराबी कह रहा था.. भैया, जिंदगानी का भरोसा नहीं। हां कोई भरोसा नहीं। मेरी बात मान लो, जिंदगानी का कोई भरोसा नहीं। बस, यहीं खाना-खिलाना याद रह जाएगा। धन-दौलत, जगह-जमीन सब धरी रह जायेगी।

दो ताड़ी वालों में एक-दूसरी बहस छिड़ गई थी –

‘हम-तुम रिआया हैं भाई! हमारी मजाल है कि सरकार के सामने सिर उठा सकें।’

‘अपने घर में बैठकर बादशाह को गालियां दे लो, लेकिन मैदान में आना कठिन है।’

‘कहां की बात भैया, सरकार तो बड़ी चीज है। लाल पगड़ी देखकर तो घर भाग जाते हो।’

छोटा आदमी भर-पेट खाकर बैठता है, तो समझता है, अब बादशाह हम हैं। लेकिन अपनी हैसियत को भूलना न चाहिए।’