मगर दर्शकों का समूह बढ़ता जाता था, अभी तक चार-पांच आदमी बेदम बैठे हुए कुल्हड़-पर-कुल्हड़ चढ़ा रहे थे। एक मनचले आदमी ने जाकर उस बोतल को उठा लिया, जो उसके बीच में रखी हुई थी और उसे पटकना चाहता था कि चारों शराबी उठ खड़े हुए और उसे बचाने की चेष्टा करने लगे कि चारों उसे छोड़कर जयराम की तरफ लपके। दर्शकों ने देखा कि जयराम पर मार पड़ा चाहती है, तो कई आदमी झल्लाकर उन चारों शराबियों पर टूट पड़े। लातें, घूंसे और डंडे चलाने लगे। जयराम को इसका कुछ अवसर न मिलता था कि किसी को समझाए। दोनों हाथ फैलाए उन चारों के वारों से बच रहा था, वह चारों भी आपे से बाहर होकर दर्शकों पर डण्डे चला रहे थे। जयराम दोनों तरफ से मार खाता था। शराबियों के वार भी उस पर पड़ते थे, तमाशाई के वार भी उसी पर पड़ते थे, पर वह उनके बीच से हटता न था। अगर वह इस वक्त अपनी जान बचाकर हट जाता, तो शराबियों की खैरियत न थी। इसका दोष कांग्रेस पर पड़ता। वह कांग्रेस को इस आक्षेप से बचाने के लिए अपने प्राण देने पर तैयार था। मिसेज सक्सेना को अपने ऊपर हंसने का मौका वह न देना चाहता था।
आखिर उसके सिर पर डण्डा इस जोर से पड़ा कि वह सिर पकड़कर बैठ गया। आंखों के सामने तितलियां उड़ने लगी। फिर उसे होश न रहा।
जयराम सारी रात बेहोश पड़ा रहा। दूसरे दिन सुबह जब उसे होश आया, तो सारी देह में पीड़ा हो रही थी और कमजोरी इतनी थी कि रह-रहकर जी डूब जाता था। एकाएक सिरहाने की तरफ आंख उठ गई, तो मिसेज सक्सेना बैठी नजर आईं। उन्हें देखते ही स्वयंसेवकों के मना करने पर भी उठ बैठा। दर्द और कमजोरी दोनों जैसे गायब हो गई। एक-एक अंग में स्फूर्ति दौड़ गई।
मिसेज सक्सेना ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा – ‘आपको बड़ी चोट आयी। इसका सारा दोष मुझ पर है।’
जयराम ने भक्तिमय कृतज्ञता के भाव से देखकर कहा – ‘चोट तो ऐसी ज्यादा न थी, इन लोगों ने बरबस पट्टी-सट्टी बांधकर जख्मी बना दिया।’
मिसेज सक्सेना ने ग्लानि होकर कहा – ‘मुझे आपको न जाने देना चाहिए था।’ जयराम – ‘आपका वहां जाना उचित न था। मैं आपसे अब भी यही अनुरोध करूंगा कि उस तरफ न जाइयेगा।’
मिसेज सक्सेना ने जैसे उन बाधाओं पर हंसकर कहा – ‘वाह! मुझे आज से वहां पिकेट करने की आज्ञा मिल गई है।’
‘आप मेरी इतनी विनय मान जाइयेगा। शोहदों के लिए आवाज कसना बिलकुल मामूली बात है।’
‘मैं आवाजों की परवाह नहीं करती।’
‘तो फिर मैं भी आपके साथ चलूंगा।’
‘आप इस हालत में?’ – मिसेज सक्सेना ने आश्चर्य से कहा।
‘मैं बिलकुल अच्छा हूं सच।’
‘यह नहीं हो सकता। जब तक डॉक्टर यह न कह देगा कि अब आप वहां जाने के योग्य हैं, आपको न जाने दूंगी। किसी तरह नहीं।’
‘तो मैं भी आपको न जाने दूंगा।’
मिसेज सक्सेना ने मृदु-व्यंग्य के साथ कहा – ‘आप भी अन्य पुरुषों ही की भांति स्वार्थ के पुतले हैं। सदा यश खुद कमाना चाहते हैं, औरतों को कोई मौका नहीं देना चाहते। कम-से-कम यह तो देख लीजिए कि मैं भी कुछ कर सकती हूं या नहीं।’
जयराम ने व्यथित कंठ से कहा – ‘जैसी आपकी इच्छा।’
तीसरे पहर मिसेज सक्सेना चार स्वयंसेवकों के साथ बेगमगंज चली। जयराम आंखें बंद किए चारपाई पर पड़ा था। शोर सुनकर चौंका और अपनी स्त्री से पूछा – ‘यह कैसा शोर है?’
स्त्री ने खिड़की से झांककर देखा और बोली – ‘वह औरत, जो कल आयी थी, झंडा लिये कई आदमियों के साथ जा रही है। इसे शर्म भी नहीं आती।’
जयराम ने उसके चेहरे पर क्षमा की दृष्टि डाली और विचार में डूब गया। फिर वह उठ खड़ा हुआ और बोला – ‘मैं भी वहीं जाता हूं।’
स्त्री ने उसका हाथ पकड़कर कहा – ‘अभी कल मार खाकर आये हो, आज फिर जाने की सूझी।’
जयराम ने हाथ छुड़ाकर कहा – ‘तुम उसे मार कहती हो, मैं उसे उपहार समझाता हूं।’ स्त्री ने उसका रास्ता रोक लिया – ‘कहती हूं तुम्हारा जी अच्छा नहीं है, मत जाओ। क्यों मेरी जान के गाहक हुए हो? उसकी देह -में हीरे नहीं जड़े हैं जो वहां कोई नोंच लेगा।’ जयराम ने मिन्नत करके कहा – ‘मेरी तबीयत बिलकुल अच्छी है चम्मू! अगर कुछ कसर है तो वह भी मिट जाएगी। भला सोचो, यह कैसे मुमकिन है कि एक देवी उन शोहदों के बीच में पिकेटिंग करने जाये और मैं बैठा रहूं। मेरा वहां रहना जरूरी है। अगर कोई बात आ पड़ी, तो कम-से-कम मैं लोगों को समझा तो सकूंगा।
चम्मू ने जलकर कहा – ‘यह क्यों नहीं कहते कि कोई और चीज खींचे लिए जाती है।’ जयराम ने मुस्कराकर उसकी ओर देखा, जैसे कह रहा हो – यह बात तुम्हारे दिल से नहीं, कंठ से निकल रही है और कतरा कर निकल गया। फिर द्वार पर खड़ा होकर बोला – ‘शहर में तीन लाख से कुछ ही कम आदमी हैं। कमेटी में भी तीस मेम्बर हैं, मगर सब-के-सब जी चुरा रहे हैं। लोगों को अच्छा बहाना मिल गया कि शराबखानों पर धरना देने के लिए स्त्रियों ही की जरूरत है। आखिर क्यों स्त्रियों ही को इस काम के लिये उपयुक्त समझा जाता है? इसलिए कि मर्दों के सिर भूत सवार हो जाता है और जहां नम्रता से काम लेना चाहिए, वहां लोग उग्रता से काम लेने लगते हैं। वे देवियां क्या इसी योग्य हैं कि शोहदों के फिकरे सुनें और उनकी कुदृष्टि का निशाना बनें? कम-से-कम मैं यह नहीं देख सकता।
वह लंगड़ाता हुआ घर से निकल पड़ा। चम्मू ने फिर उसे रोकने का प्रयास नहीं किया। रास्ते में एक स्वयंसेवक मिल गया। जयराम जे उसे साथ लिया और एक तांगे पर बैठकर चला। शराबखाने से कुछ दूर इधर लेमनेड-बर्फ की दुकान थी। उसने तांगे को छोड़ दिया और वालंटियर को शराबखाने भेजकर खुद उसी दुकान में जा बैठा।
दुकानदार वे लेमनेड का एक गिलास उसे देते हुए कहा – ‘बाबूजी, कल वाले चारों बदमाश आज फिर आये हुए हैं। आपने न बचाया होता तो आज शराब या ताड़ी की जगह हल्दी-गुड़ पीते होते।
जयराम ने गिलास लेकर कहा – ‘तुम लोग बीच में न कूद पड़ते, तो मैंने उन सबों को ठीक कर लिया होता।’
दुकानदार ने प्रतिवाद किया – ‘नहीं बाबूजी, वह सब छंटे हुए गुंडे हैं। मैं तो उन्हें अपनी दुकान के सामने खड़ा भी नहीं होने देता। चारों तीन-तीन साल काट आये हैं।’
अभी बीस मिनट भी न गुजरे होंगे कि एक स्वयंसेवक आकर खड़ा हो गया। जयराम ने शंकित होकर पूछा – ‘कहो, वहां क्या हो रहा है?’
स्वयंसेवक ने कुछ ऐसा मुंह बना लिया, जैसे वहां की दशा कहना वह उचित नहीं समझता और बोला – ‘कुछ नहीं, देवीजी आदमियों को समझा रही हैं।’
जयराम ने उसकी ओर अतृप्त नेत्रों से देखा, मानो कह रहे हों – ‘बस इतना ही! इतना तो मैं जानता ही था।’
स्वयंसेवक ने एक क्षण बाद फिर कहा – ‘देवियों का ऐसे शोहदों के सामने जाना अच्छा नहीं।’
जयराम ने अधीर होकर पूछा – ‘साफ-साफ क्यों नहीं कहते, क्या बात है?’
स्वयंसेवक डरते-डरते बोला – ‘सब-के-सब उनसे दिल्लगी कर रहे हैं। देवियों का यहां आना अच्छा नहीं।’
जयराम ने और कुछ न पूछा। डंडा उठाया और लाल-लाल आंखें निकाले बिजली की तरह कौंध कर शराब खाने के सामने जा पहुंचा और मिसेज सक्सेना का हाथ पकड़कर पीछे हटता हुआ शराबियों से बोला – ‘अगर तुम लोगों ने देवियों के साथ जरा भी गुस्ताख़ी की तो तुम्हारे हक में ठीक नहीं होगा। कल मैंने तुम लोगों की जान बचायी थी, आज इसी डंडे से तुम्हारी खोपड़ी तोड़कर रख दूंगा।’
उसके बदले हुए तेवर को देखकर सब-के-सब नशेबाज घबड़ा गए। वे कुछ कहना चाहते थे कि मिसेज सक्सेना ने गम्भीर भाव से पूछा – ‘आप यहां क्यों आये! मैंने तो आपसे कहा था, अपनी जगह से न हिलिएगा। मैंने तो आपसे मदद न मांगी थी?’
जयराम ने लज्जित होकर कहा – ‘मैं इस नीयत से यहां नहीं आया था। एक जरूरत से इधर आ निकला था। यहां जमाव देखकर आ गया। मेरे ख्याल में आप यहां से चलें। मैं आज कांग्रेस कमेटी में यह सवाल पेश करूंगा कि इस काम के लिए पुरुषों को भेजें।’
मिसेज सक्सेना ने तीखे स्वर में कहा – ‘आपके विचार में दुनिया के सारे काम मर्दों के लिए हैं।’
जयराम – ‘मेरा यह मतलब न था।’
मिसेज सक्सेना – ‘तो आप जाकर आराम से लेटे और मुझे अपना काम करने दें।’ जयराम वहीं सिर झुकाए खड़ा रहा।
मिसेज सक्सेना ने पूछा – ‘अब आप क्यों खड़े हैं।’
जयराम ने विनीत स्वर में कहा – ‘मैं भी यही एक किनारे खड़ा रहूंगा।’
मिसेज सक्सेना ने कठोर स्वर में कहा – ‘जी नहीं, आप जायें।’
जयराम धीरे-धीरे लदी हुई गाड़ी की भांति चला और आकर फिर उसी लेमनेड की दुकान पर बैठ गया। उसे जोर की प्यास लगी थी। उसने एक गिलास शर्बत बनवाया और सामने मेज़ पर रखकर विचार में डूब गया मगर आंख और कान उसी तरफ लगे हुए थे।
जब कोई आदमी दुकान पर आता, वह चौंक कर उसकी तरफ ताकने लगता। वहां कोई नयी बात तो नहीं हो गई?
कोई आधा घंटे बाद ही स्वयंसेवक फिर डरा हुआ-सा आकर खड़ा हो गया। जयराम ने उदासीन बनने की चेष्टा करके पूछा – ‘वहां क्या हो रहा है जी?’
स्वयंसेवक ने कानों पर हाथ रखकर कहा – ‘मैं कुछ नहीं जनता बाबू जी, मुझसे कुछ न पूछिए।’
जयराम ने एक साथ ही नम्र और कठोर होकर पूछा – ‘फिर कोई छेड़छाड़ हुई?’
स्वयंसेवक – ‘जी नहीं, कोई छेड़छाड़ नहीं हुई। एक आदमी ने देवीजी को धक्का दे दिया, वे गिर पड़ी।’
जयराम निस्पंद बैठा रहा पर उसके अंतराल में भूकंप-सा मचा हुआ था। बोला – ‘उसके साथ स्वयंसेवक क्या कर रहे हैं?’
‘खड़े हैं, देवीजी उन्हें बोलने ही नहीं देती।’
तो क्या बड़े जोर से धक्का दिया?’
‘जी हां, गिर पड़ी। घुटनों में चोट आ गई। वे आदमी साथ पी रहे थे। जब एक बोतल उड़ गई, तो उनमें से एक आदमी दूसरी बोतल लेने चला। देवीजी ने रास्ता रोक लिया। बस, उसने धक्का दे दिया। वही जो काला-काला मोटा-सा आदमी है। कल वाले चारों आदमियों की शरारत है।’
जयराम उन्माद की दशा में वहां से उठा और दौड़ता हुआ शराब खाने के सामने आया। मिसेज सक्सेना सिर पकड़ जमीन पर बैठी हुई थी और वह काला मोटा आदमी दुकान के कठघरे के सामने खड़ा था। पचासों आदमी जमा थे। जयराम ने उसे देखते ही लपक कर उसकी गर्दन पकड़ ली और इतने जोर से दबायी कि उसकी आंखें बाहर निकल आईं। मालूम होता था, उसके हाथ फौलाद हो गए हैं।
सहसा मिसेज सक्सेना ने आकर उसका फौलादी हाथ पकड़ लिया और भवें सिकोड़ कर बोली – ‘छोड़ दो इसकी गर्दन! क्या इसकी जान ले लोगे?’
जयराम ने और जोर से उसकी गर्दन दबायी और बोला – ‘हां, ले लूंगा। ऐसे दुष्ट की यही सजा है।’
मिसेज सक्सेना ने अधिकार-गर्व से गर्दन उठकर कहा – ‘आपको यहां आने का कोई अधिकार नहीं है।’
एक दर्शक ने कहा – ‘ऐसा दबाओ बाबूजी, कि साला ठंडा हो जाये इसने देवी जी को ऐसा ढकेला कि बेचारी गिर पड़ी। हमें तो बोलने का हुक्म नहीं है, नहीं तो हाथ-पैर तोड़कर रख देते।’
जयराम ने शराबी की गर्दन छोड़ दी। वह किसी बाज के चंगुल से छूटी हुई चिड़िया की तरह सहमा हुआ खड़ा हो गया। उसे धक्का देते हुए उसने मिसेज सक्सेना से कहा – ‘आप यहां से चलती क्यों नहीं? आप जायें, मैं बैठता हूं अगर एक छटांक शराब बिक जाय, तो मेरा कान पकड़ लीजिएगा।’
उसका दम फूलने लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था। वह खड़ा न रह सका। जमीन पर बैठकर रूमाल से माथे का पसीना पोंछने लगा।
मिसेज सक्सेना ने परिहास करके कहा- ‘आप कांग्रेस नहीं हैं कि मैं आपका हुक्म मानूं। अगर आप यहां से न जायेंगे तो मैं सत्याग्रह करूंगी।’
फिर एकाएक कठोर होकर बोली – ‘जब तक कांग्रेस ने इस काम का भार मुझ पर रखा है, आपको मेरे बीच में बोलने का कोई हक नहीं हैं। आप मेरा अपमान कर रहे हैं। कांग्रेस-कमेटी के सामने आपको इसका जवाब देना होगा।’
जयराम तिलमिला उठा। बिना कोई जवाब दिए लौट पड़ा और वेग से घर की तरफ चला, पर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता था, उसकी गति मंद होती जाती थी। यहां तक कि बाजार के दूसरे सिरे पर आकर वह रुक गया। रस्सी यहां खत्म हो गई। उसके आगे जाना उसके लिए असाध्य हो गया। जिस झटके ने उसे यहां तक भेजा था, उसकी शक्ति अब शेष हो गई थी। उन शब्दों में जो कटुता और चोट थी, उसमें अब उसे सहानुभूति और स्नेह की सुगंध आ रही थी। उसे फिर चिंता हुई, न जाने वहां क्या हो रहा है। कहीं उन बदमाशों ने और दुष्टता न की हो, या पुलिस न आ जाये।
वह बाजार की तरफ मुड़ा लेकिन एक कदम ही चलकर फिर रुक गया। ऐसे पशोपेश में वह कभी न पड़ा था।
सहसा उसे वहीं स्वयंसेवक दौड़ता आता दिखाई दिया। वह बदहवास होकर उससे मिलने के लिए खुद भी उसकी तरफ दौड़ा। बीच में दोनों मिल गए।
जयराम ने हांफते हुए पूछा – ‘क्या हुआ? क्यों जा रहे हो?’
स्वयंसेवक ने दम लेकर कहा – ‘बड़ा गजब हो गया बाबूजी! आपके आने के बाद वह काला शराबी बोतल लेकर दुकान से चला, तो देवीजी दरवाजे पर बैठ गईं। वह बार-बार देवीजी को हटकर निकलना चाहता था पर वह फिर आकर बैठ जाती हैं। धक्कम-धक्के में उनके कुछ कपड़े फट गए हैं और कुछ चोट भी…
अभी बात पूरी न हुई थी कि जयराम शराब खाने की तरफ दौड़ा।
