sharaab kee dukaan by munshi premchand
sharaab kee dukaan by munshi premchand

‘बहुत पक्की बात कहते हो खां साहब! अपनी असलियत पर डटे रहो। जो राजा है, वह राजा है, जो परजा है, वह परजा है। भला, परजा कहीं राजा हो सकता है?’

इतने में जयराम ने आकर कहा – ‘राम राम भाइयों, राम राम।’

पांच-छह खद्दरधारी मनुष्यों को देखकर सभी लोग उनकी ओर शंका और कुतूहल से ताकने लगे। दुकानदार ने चुपके से अपने एक नौकर के कान में कुछ कहा और नौकर दुकान से उतरकर चला गया।

जयराम ने झंडे को जमीन पर खड़ा करके कहा – ‘भाइयों, महात्मा गांधी का हुक्म है कि आप लोग ताड़ी शराब न पिये। जो रुपये आप यहां उड़ा देते है, वह अगर अपने बाल-बच्चों को खिलाने-पिलाने में खर्च करें, तो कितनी अच्छी बात हो। जरा देर के नशे के लिए आप लोग अपने बाल-बच्चों को भूखा मारते है, गंदे घरों में रहते है, महाजन की गालियां खाते हैं। सोचिए, इस रुपये से आप अपने बाल-बच्चों को कितने आराम से रख सकते हैं।’

एक बूढ़े शराबी ने अपने साथी से कहा – ‘भैया, है तो बुरी चीज, घर तबाह करके छोड़ देती है। मुदा इतनी उमर पीते कट गई, तो अब मरते दम क्या छोड़े। उसके साथी ने समर्थन किया – पक्की बात कहते हो चौधरी! अब इतनी उमिर पीते कट गई, तो अब मरते दम क्या छोड़े?’

जयराम ने कहा – ‘वाह चौधरी, यही तो उमिर है छेड़ने को। जवानी तो दीवानी होती है, उस वक्त सब कुछ माफ है।’

चौधरी ने तो कोई जवाब न दिया लेकिन उसके साथी ने, जो काला कोट, बड़ी-बड़ी मूंछें वाला आदमी था, सरल आपत्ति के भाव से कहा – ‘अगर पीना बुरा है, तो अंग्रेज क्यों पीते हैं?’

जयराम वकील था, उससे बहस करना भिड़ के छत्ते को छेड़ना था। बोला – ‘यह तुमने बहुत अच्छा सवाल पूछा भाई। अंग्रेजों के बाप-दादा अभी डेढ़-दो सौ साल पहले लुटेरे थे। हमारे-तुम्हारे बाप-दादा ऋषि-मुनि थे। लुटेरों की सन्तान पिए, तो पीने दो। उनके पास न कोई धर्म है न नीति लेकिन ऋषियों की सन्तान उनकी नकल क्यों करे? हम और तुम उन महात्माओं की सन्तान है, जिन्होंने दुनिया को सिखाया, जिन्होंने दुनिया को आदमी बनाया। हम अपना धर्म छोड़ बैठे, उसी का फल है कि आज हम गुलाम हैं। लेकिन अब हमने गुलामी की जंजीर को तोड़ने का फैसला कर लिया है और –

एकाएक थानेदार और चार-पांच कांस्टेबल आ खड़े हुए।

थानेदार ने चौधरी से पूछा – ‘यह लोग तुमको धमका रहे हैं?’

चौधरी ने खड़े होकर कहा – ‘नहीं हुजूर यह तो हमें समझा रहे हैं। कैसे प्रेम से समझा रहे हैं के वाह!

थानेदार ने जयराम से कहा – ‘अगर यहां फसाद हो जाये, तो आप जिम्मेदार होंगे?’

जयराम – ‘मैं उस वक्त तक जिम्मेदार हूं जब तक आप न रहें।’

‘आपका मतलब है कि मैं फसाद करने आया हूं।’

‘मैं यह नहीं कहता लेकिन आप आये हैं तो अंग्रेजी साम्राज्य की अतुल शक्ति का परिचय जरूर ही दीजिएगा। जनता में उत्तेजना फैलेगी। तब आप पिल पड़ेंगे और दस-बीस आदमियों को मार गिरायेंगे। यही सब जगह होता है और यहां भी होगा।’

सब-इंस्पेक्टर ने ओठ चबाकर कहा – ‘मैं आपसे कहता हूं यहां से चले जाइए, वरना मुझे जाब्ते की कार्रवाई करनी पड़ेगी।’

जयराम ने अविचल भाव से कहा – ‘और मैं आपसे कहता हूं कि आप मुझे अपना काम करने दीजिए। मेरे बहुत से भाई यहां जमा हैं और मुझे उनसे बात-चीत करने का उतना ही हक है, जितना आपको।

इस वक्त तक सैकड़ों दर्शक, जमा हो गये थे। दरोगा ने अफसरों से पूछे बगैर और कोई कार्रवाई करना उचित न समझा। अकड़ते हुए दुकान पर गये और कुर्सी पर पांव रखकर बोले – ‘ये लोग तो मानने वाले नहीं हैं।’

दुकानदार ने गिड़गिड़ाकर – ‘हुजूर मेरी तो बधिया बैठ जायेगी।’

दारोगा – ‘दो-चार गुंडे बुलाकर भगा क्यों नहीं देते? मैं कुछ न बोलूंगा। हां, जरा एक बोतल अच्छी-सी भेज देना। कल न जाने क्या भेज दिया, कुछ मजा ही नहीं आया।’

थानेदार चला गया, तो चौधरी ने अपने साथी ने कहा – ‘देखा कल, थानेदार कितना बिगड़ रहा था? सरकार चाहती है कि हम लोग खूब शराब पियें और कोई हमें समझाने न पाए। शराब का पैसा भी तो सरकार ही में जाता है।’

कल्लू ने दार्शनिक भाव से कहा – ‘हर एक बहाने से पैसा खींचते हैं सब।’

चौधरी – ‘अच्छा तो यह लो, आज से अगर पिये तो दोगला!’

यह कहते हुए चौधरी ने बोतल जमीन पर पटक दी। आधी बोतल शराब जमीन पर बहकर सूख गई।

जयराम को शायद जिंदगी में कभी इतनी खुशी न हुई थी। जोर-जोर से तालियां बजाकर उछल पड़े।

उसी वक्त दोनों ताड़ी पीने वालों ने भी ‘महात्माजी की जय’ पुकारी और अपनी हांडी जमीन पर पटक दी। एक स्वयंसेवक ने लपक कर फूलों की माला ली और चारों आदमियों के गले डाल दी।

सड़क की पटरी पर कई नशेबाज बैठे इन चारों आदमियों की तरफ उस दुर्बल भक्ति से ताक रहे थे, जो पुरुषार्थहीन मनुष्यों का लक्षण है। वहां एक भी ऐसा व्यक्ति न था, जो अंग्रेजों को, मांस-मदिरा या ताड़ी को जिंदगी के लिए अनिवार्य समझता हो और उसके बगैर जिंदगी की कल्पना भी न कर सके। सभी लोग नशे को दूषित समझते थे, केवल दुर्बलेन्द्रिय होने के कारण नित्य आकर पी जाते थे। चौधरी जैसे घाघ पियक्कड़ को बोतल पटकते देखकर उनकी आंखें खुल गई।

एक मरियल दाढ़ी वाले आदमी ने आकर चौधरी की पीठ ठोंकी चौधरी ने उसे पीछे ढकेल कर कहा – ‘पीठ क्या ठोकते हो जी, जाकर अपनी बोतल पटक दो।’

दाढ़ी वाले ने कहा – ‘आज और पी लेने दो चौधरी! अल्लाह जानता है, कल से इधर भूलकर भी न आऊंगा।’

चौधरी – ‘जितनी बची हो, उसके पैसे हमसे ले लो। घर जाकर बच्चों को मिठाई खिला देना।’ दाढ़ी वाले ने जाकर बोतल पटक दी और बोला – ‘लो, तुम भी क्या कहोगे? अब तो हुए खुश!’

चौधरी ने कहा – ‘अब तो न पियोगे कभी?’

दाढ़ी वाले ने कहा अगर तुम न पियोगे, तो मैं भी न पीऊंगा। जिस दिन तुमने पी, उसी दिन फिर शुरू कर दी।’

चौधरी की तत्परता ने दुराग्रह की जड़े हिला दी। बाहर अभी पांच-छह आदमी और थे। वे सचेत निर्लज्जता से बैठे हुए अभी तक पीते जाते थे। जयराम ने उनके सामने जाकर कहा – ‘भाइयों ने अभी आपके सामने अपनी-अपनी बोतल पटक दी। क्या आप उन लोगों को बाजी जीत ले जाने देंगे?’

एक ठिगने, काले आदमी ने जो किसी अंग्रेज का खानसामा मालूम होता था, लाल-लाल आंखें निकालकर कहा – ‘हम पीते हैं, तुमसे मतलब? तुमसे भीख मांगने तो नहीं जाते?’

जयराम ने समझ लिया, अब बाजी मार ली। गुमराह आदमी जब विवाद करने पर उतर आए, तो समझ लो, वह रास्ते पर आएगा। चुप्पा ऐब वह चिकना घड़ा है जिस पर किसी बात का असर नहीं होता।

जयराम ने कहा – ‘अगर मैं अपने घर में आग लगाऊं, तो उसे देखकर क्या आप मेरा हाथ न पकड़ लेंगे? मुझे तो इसमें रत्ती-भर सन्देह नहीं है कि आप मेरा हाथ ही न पकड़ लेंगे, बल्कि मुझे वहां से जबरदस्ती खींच ले जायेंगे।’

चौधरी ने खानसामा की तरफ मुग्ध आंखों से देखा, मानो कह रहा है इसका तुम्हारे पास क्या जवाब है? और बोला – ‘जमादार, अब इसी बात पर बोतल पटक दो।’

खानसामा ने जैसे काट खाने के लिए दांत तेज कर लिए और बोला – ‘बोतल क्यों पटक दूं, पैसे नहीं दिये हैं?’

चौधरी परास्त हो गया। जयराम से बोला – ‘इन्हें छोड़िए बाबूजी, यह लोग इस तरह मानने वाले आसामी नहीं हैं। आप इनके सामने जान भी दे दें तो शराब न छोड़ेंगे। हां, पुलिस की एक घुड़की पा जाये तो फिर कभी इधर भूलकर भी न आयें।’

खानसामा ने चौधरी की ओर तिरस्कार के भाव से देखा, जैसे कह रहा हो – क्या तुम समझते हो कि मैं ही मनुष्य हूं, यह सब पशु हैं? फिर बोला – ‘तुमसे क्या मतलब है जी, क्यों बीच में कूद पड़ते हो? मैं तो बाबूजी से बात कर रहा हूं। तुम कौन होते हो बीच में बोलने वाले? मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं कि बोतल पटककर वाह-वाह कराऊं। कल फिर मुंह में कालिख लगाऊं, और घर पर मंगवाकर पीऊं? जब यहां छोड़ेंगे, तो सच्चे दिल से छोड़ेंगे, फिर कोई लाख रुपये भी दे तो आंख उठाकर न देखें।’

जयराम मुझे आप लोगों से ऐसी ही आशा है।

चौधरी खानसामा की ओर कटाक्ष करके कहा – ‘क्या समझते हो, मैं कल फिर पीने आऊंगा?’

खानसामा ने उद्दंडता से कहा – ‘हां-हां, कहता हूं तुम आओगे और बदकर आओगे। कहो, पक्के कागज पर लिख दूं?’

चौधरी – ‘अच्छा भाई, तुम बड़े धर्मात्मा हो, मैं पापी सही। तुम छोड़ोगे तो जिंदगी-भर के लिए छोड़ोगे, मैं आज छोड़कर कल फिर पीने लगूंगा, यही सही। मेरी एक बात गांठ बांध लो। तुम उस वक्त छोड़ोगे, जब जिन्दगी तुम्हारा साथ छोड़ देगी। इसके पहले तुम नहीं छोड़ सकते।’

खानसामा – ‘तुम मेरे दिल का क्या हाल जानते हो?’

चौधरी – ‘जानता हूं, तुम्हारे जैसे सैकड़ों आदमी को भुगत चुका हूं।’

खानसामा – ‘तो तुमने ऐसे-वैसे बेशर्म को देखा होगा। हयादार आदमियों को न देखा होगा।’

यह कहते हुए उसने जाकर बोतल पटक दी और बोला – ‘अब अगर तुम इस दुकान पर देखना, तो मुंह में कालिख लगा देना।’

चारों तरफ तालियां बजने लगी। मर्द ऐसे होते हैं।

ठेकेदार ने दुकान से नीचे उतरकर कहा – ‘तुम लोग अपनी-अपनी दुकान पर क्यों नहीं जाते जी? मैं तो किसी की दुकान पर नहीं जाता।’

एक दर्शक ने कहा – ‘खड़े हैं, तो तुमसे मतलब? सड़क तुम्हारी नहीं है। तुम गरीबों को लूटे जाओ। किसी के बाल-बच्चे भूखों मरें, तुम्हारा क्या बिगड़ता है। (दूसरे शराबियों से) क्या यारों, अब भी पीते जाओगे। जानते हो यह किसका हुक्म है? अरे, कुछ तो शर्म हो?’

जयराम ने दर्शकों से कहा – ‘आप लोग यहां भीड़ न लगायें और न किसी को भला-बुरा कहें।’