जयराम शराबखाना के सामने पहुंचा तो देखा, मिसेज सक्सेना के चारों स्वयंसेवक दुकान के सामने लेटे हुए है और मिसेज सक्सेना एक किनारे सिर झुकाए खड़ी है। जयराम ने डरते-डरते उनके चेहरे पर निगाह डाली। आंचल पर रक्त की बूंदें दिखाई दी। उसे फिर कुछ सुध न रही। खून की वह चिनगारियां जैसे उसके रोम-रोम में समा गई। उसका खून खौलने लगा, मानो उसके सिर पर खून सवार हो गया हो। वह उन चारों शराबियों पर टूट पड़ा और पूरे जोर के साथ लकड़ी चलाने लगा। एक-एक बूंद की जगह वह एक-एक घड़ा खून बहा देना चाहता था। खून उसे कभी इतना प्यारा न था। खून में इतनी उत्तेजना है, इसकी उसे खबर न थी।
वह पूरे जोर से लकड़ी चला रहा था। मिसेज सक्सेना कब आकर उसके सामने खड़ी हो गई, उसे कुछ पता न चला। जब वह जमीन पर गिर पड़ी, तब उसे जैसे होश आ गया हो। उसने लकड़ी फेंक दी और वहीं निश्चल, निस्पंद खड़ा हो गया, मानो उसका रक्तप्रवाह रुक गया है।
चारों स्वयंसेवकों ने दौड़कर मिसेज सक्सेना को पंखा झलना शुरू किया। दुकानदार ठंडा पानी लेकर दौड़ा। एक दर्शक डॉक्टर को बुलाने भागा, पर जयराम वहीं बेजान खड़ा था, जैसे स्वयं अपने तिरस्कार भाव का पुतला बन गया हो। अगर इस वक्त कोई उसके दोनों हाथ काट डालता, कोई उसकी आंखें लाल लोहे से फोड़ देता, तब भी वह चूं न करता।
फिर वहीं सड़क पर बैठकर उसने अपने लज्जित, तिरस्कृत, पराजित मस्तक को भूमि पर पटक दिया और बेहोश हो गया।
उसी वक्त उस काले मोटे शराबी ने बोतल जमीन पर पटक दी और उसके सिर पर ठंडा पानी डालने लगा।
एक शराबी ने लैसंसदार से कहा – ‘तुम्हारा रोजगार अन्य लोगों की जान लेकर रहेगा। आज तो अभी दूसरा ही दिन है।’
लैसंसदार ने कहा – ‘कल से मेरा इस्तीफा है। अब स्वदेशी कपड़े का रोजगार करूंगा, जिसमें जस भी है और उपकार भी।’
शराबी ने कहा – ‘घाटा तो बहुत रहेगा।’
दुकानदार ने किस्मत ठोंक कर कहा – ‘घाटा-नफा तो जिंदगी के साथ है।’
